तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
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२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[वाम स्तम्भ / Left Column - संस्कृत मूल एवं भाष्य]
भावप्रतियोगी ह्यभावः ।
यथा ह्यभिन्नोऽपि भावो घट-
पटादिभिर्विशेष्यते भिन्न इव
घटभावः पटभाव इति; एवं
निर्विशेषोऽप्यभावः क्रिया-
गुणयोगाद्द्रव्यादिवद्विकल्प्यते ।
न ह्यभाव उत्पलादिवद्विशेषण-
सहभावी । विशेषणवत्त्वे भाव
एव स्यात् ।
विद्याकर्मकर्तृनित्यत्वाद्विद्या-
कर्मसन्तानजनितमोक्षनित्यत्व-
मिति चेत् ?
न; गङ्गास्रोतोवत्कर्तृत्वस्य
दुःखरूपत्वात् । कर्तृत्वोपरमे च
मोक्षविच्छेदात् । तस्मादविद्या-
कामकर्मोपादानहेतुनिवृत्तौ स्वा-
त्मन्यवस्थानं मोक्ष इति । स्वयं
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column - हिन्दी अनुवाद]
प्रतियोगी ही 'अभाव' कहलाता
है । जिस प्रकार भाव वस्तुतः
अभिन्न होनेपर भी घट-पट आदि
विशेषणोंसे भिन्नके समान घटभाव,
पटभाव आदि रूपसे विशेषित किया
जाता है इसी प्रकार अभाव
निर्विशेष होनेपर भी क्रिया और
गुणके योगसे द्रव्यादिके समान
विकल्पित होता है । कमल आदि
पदार्थोंके समान अभाव विशेषणके
सहित रहनेवाला नहीं है । विशेषण-
युक्त होनेपर तो वह भाव ही हो
जायगा ।
पूर्व०-विद्या और कर्म इनका
कर्ता नित्य होनेके कारण विद्या
और कर्मके अविच्छिन्न प्रवाहसे
होनेवाला मोक्ष नित्य ही होना
चाहिये । ऐसा मानें तो ?
सिद्धान्ती-नहीं, गङ्गाप्रवाहके
समान जो कर्तृत्व है वह तो दुःख-
रूप है । [अतः उससे मोक्षकी प्राप्ति
नहीं हो सकती, और यदि उसीसे
मोक्ष माना जाय तो भी ] कर्तृत्वकी
निवृत्ति होनेपर मोक्षका विच्छेद हो
जायगा । अतः अविद्या, कामना
और कर्म-इनके उपादान कारणकी
निवृत्ति होनेपर आत्मस्वरूपमें स्थित
हो जाना ही मोक्ष है-यह सिद्ध
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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
चात्मा ब्रह्म । तद्विज्ञानादविद्या- | होता है । तथा स्वयं आत्मा ही ब्रह्म
| है और उसके ज्ञानसे ही अविद्याकी
निवृत्तिरिति ब्रह्मविद्यार्थोपनिष- | निवृत्ति होती है; अतः अब ब्रह्म-
| ज्ञानके लिये उपनिषद्का आरम्भ
दारभ्यते । | किया जाता है ।
उपनिषदिति विद्योच्यते; | अपना सेवन करनेवाले पुरुषोंके
उपनिषच्छब्द- तच्छीलिनां गर्भज- | गर्भ, जन्म और जरा आदिका निशातन
निरुक्तिः | ( उच्छेद ) करने या उनका अवसादन
न्मजरादिनिशात- | ( नाश ) करनेके कारण 'उपनिषद्'
नात्तदवसादनाद्वा ब्रह्मणो वोप- | शब्दसे विद्या ही कही जाती है ।
| अथवा ब्रह्मके समीप ले जानेवाली
निगमयितृत्वादुपनिषण्णं वास्यां | होनेसे या इसमें परम श्रेय ब्रह्म
| उपस्थित है इसलिये [ यह विद्या 'उप-
परं श्रेय इति । तदर्थत्वाद्- | निषद्' है ] । उस विद्याके ही लिये
ग्रन्थोऽप्युपनिषत् । | होनेके कारण ग्रन्थ भी 'उपनिषद्' है ।
शीक्षावल्लीका शान्तिपाठ
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा ।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो
ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव
प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं
वदिष्यामि । तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् ।
अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥
[ प्राणवृत्ति और दिनका अभिमानी देवता ] मित्र ( सूर्यदेव )
हमारे लिये सुखकर हो । [ अपानवृत्ति और रात्रिका अभिमानी ] वरुण
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