तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
२२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत मूल एवं भाष्य]
न्तरतममानन्दं ब्रह्म विज्ञातवां-
स्तपसैव साधनेन भृगुः । तस्माद्ब्र-
ह्मविजिज्ञासुना बाह्यान्तःकरण-
समाधानलक्षणं परमं तपःसाधन-
मनुष्ठेयमिति प्रकरणार्थः ।
अधुनाख्यायिकातोऽपसृत्य
श्रुतिः स्वेन वचनेनाख्यायिका-
निर्वर्त्यमर्थमाचष्टे—सैषा भार्गवी
भृगुणा विदिता वरुणेन प्रोक्ता
वारुणी विद्या परमे व्योमन्हृदया-
काशगुहायां परम आनन्देऽद्वैते
प्रतिष्ठिता परिसमाप्तान्नमयादात्म-
नोऽधिप्रवृत्ता । य एवमन्योऽपि
तपसैव साधनेनानेनैव क्रमेणा-
नुप्रविश्यानन्दं ब्रह्म वेद स एवं
विद्याप्रतिष्ठानात्प्रतितिष्ठत्यानन्दे
परमे ब्रह्मणि ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः ।
दृष्टं च फलं तस्योच्यते—
अन्नवान्प्रभूतमन्नमस्य विद्यत
[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]
द्वारा ही सबकी अपेक्षा अन्तरतम
आनन्दको ब्रह्म जाना । अतः जो
ब्रह्मको जाननेकी इच्छावाला हो उसे
साधनरूपसे बाह्य इन्द्रिय और
अन्तःकरणका समाधानरूप परम
तप ही करना चाहिये—यह इस
प्रकरणका तात्पर्य है ।
अब आख्यायिकासे निवृत्त होकर
श्रुति अपने ही वाक्यसे आख्यायिका-
से निष्पन्न होनेवाला अर्थ बतलाती
है—अन्नमय आत्मासे प्रारम्भ हुई
यह भार्गवी—भृगुकी जानी हुई और
वारुणी—वरुणकी कही हुई विद्या
परमाकाशमें—हृदयाकाशस्थित गुहा-
के भीतर अद्वैत परमानन्दमें प्रतिष्ठित
है अर्थात् वहीं इसका पर्यवसान
होता है । इसी प्रकार जो कोई
दूसरा पुरुष भी इसी क्रमसे तपरूप
साधनके द्वारा क्रमशः अनुप्रवेश
करके आनन्दको ब्रह्मरूपसे जानता
है वह इस प्रकार विद्यामें
स्थिति लाभ करनेसे आनन्द अर्थात्
परब्रह्ममें स्थिति प्राप्त करता है, यानी
ब्रह्म ही हो जाता है ।
अब उसका दृष्ट ( इस लोकमें
प्राप्त होनेवाला ) फल बतलाया
जाता है—अन्नवान्—जिसके पास
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अनु० ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २२५
इत्यन्नवान् । सत्तामात्रेण तु | बहुत-सा अन्न हो उसे अन्नवान्
| कहते हैं।* अन्नकी सत्तामात्रसे तो
सर्वो ह्यन्नवानिति विद्याया | सभी अन्नवान् हैं, अतः [यदि उस
| प्रकार अर्थ किया जाय तो]
विशेषो न स्यात् । एवमन्नमत्ती- | विद्याकी कोई विशेषता नहीं रहती।
| इसी प्रकार वह अन्नाद-जो अन्नभक्षण
त्यन्नादो दीप्ताग्निर्भवतीत्यर्थः । | करे यानी दीप्ताग्नि हो जाता है। वह
महान्भवति । केन महत्त्वमित्यत | महान् हो जाता है। उसका महत्त्व
| किस कारणसे होता है ? इसपर
आह--प्रजया पुत्रादिना पशु- | कहते हैं-पुत्रादि प्रजा, गौ, अश्व
| आदि पशु तथा ब्रह्मतेज यानी शम,
भिर्गवाश्वादिभिर्ब्रह्मवर्चसेन शम- | दम एवं ज्ञानादिके कारण होनेवाले
दमज्ञानादिनिमित्तेन तेजसा । | तेजसे तथा कीर्ति यानी शुभाचरणके
| कारण होनेवाली ख्यातिसे वह
महान्भवति कीर्त्या ख्यात्या | महान् हो जाता है ॥ १ ॥
शुभप्रचारनिमित्तया ॥१॥
इति भृगुवल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥६॥
- मूलमें केवल 'अन्नवान्' है, भाष्यमें उसका अर्थ 'प्रभूत (बहुतसे)
अन्नवाला' किया गया है। इससे यह शंका होती है कि 'प्रभूत' विशेषणका
प्रयोग क्यों किया गया। इसीका समाधान करनेके लिये आगेका वाक्य है।
तै० उ० २९-३०-
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सप्तम अनुवाक
अन्नकी निन्दा न करनारूप व्रत तथा शरीर और प्राणरूप अन्न-
ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन
अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् ।
शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः
प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने
प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्
भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥१॥
अन्नकी निन्दा न करे। यह ब्रह्मज्ञका व्रत है। प्राण ही अन्न है
और शरीर अन्नाद है। प्राणमें शरीर स्थित है और शरीरमें प्राण स्थित
है। इस प्रकार [ एक दूसरेके आश्रित होनेसे वे एक दूसरेके अन्न हैं;
अतः ] ये दोनों अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्नको
अन्नमें स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित ( प्रख्यात ) होता है, अन्नवान्
और अन्नभोक्ता होता है। प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता
है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥
| किं चान्नेन द्वारभूतेन ब्रह्म | इसके सिवा क्योंकि द्वारभूत |
| विज्ञातं यस्मात्तस्माद्गुरुमिव | अन्नके द्वारा ही ब्रह्मको जाना है इसलिये गुरुके समान अन्नकी भी |
| अन्नं न निन्द्यात्तदस्यैवं ब्रह्म- | निन्दा न करे। इस प्रकार ब्रह्म-वेत्ताके लिये यह व्रत उपदेश किया |
| विदो व्रतमुपदिश्यते । व्रतोप- | जाता है। यह व्रतका उपदेश |
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अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७
देशोऽन्नस्तुतये, स्तुतिभाक्त्वं | अन्नकी स्तुतिके लिये है और अन्नकी
| स्तुतिपात्रता ब्रह्मोपलब्धिका साधन
चान्नस्य ब्रह्मोपलब्ध्युपायत्वात् । | होनेके कारण है ।
प्राणो वा अन्नम्, शरीरान्त- | प्राण ही अन्न है; क्योंकि प्राण
र्भावात्प्राणस्य । यद्यस्यान्तः- | शरीरके भीतर रहनेवाला है । जो
प्रतिष्ठितं भवति तत्तस्यान्नं भव- | जिसके भीतर स्थित रहता है वह
तीति । शरीरे च प्राणः प्रति- | उसका अन्न हुआ करता है । प्राण
ष्ठितस्तस्मात्प्राणोऽन्नं शरीरमन्ना- | शरीरमें स्थित है, इसलिये प्राण
दम् । तथा शरीरमप्यन्नं प्राणो- | अन्न है और शरीर अन्नाद है ।
ऽन्नादः । कस्मात् ? प्राणे शरीरं | इसी प्रकार शरीर भी अन्न है और
प्रतिष्ठितम्; तन्निमित्तत्वाच्छरी- | प्राण अन्नाद है; कैसे ?—प्राणमें
रस्थितेः । तस्मात्तदेतदुभयं शरीरं | शरीर स्थित है; क्योंकि शरीरकी
प्राणश्चान्न मन्नादश्च । येनान्योन्य- | स्थिति प्राणके ही कारण है अतः
स्मिन्प्रतिष्ठितं तेनान्नम् । येना- | ये दोनों शरीर और प्राण अन्न और
न्योन्यस्य प्रतिष्ठा तेनान्नादः । | अन्नाद हैं; क्योंकि वे एक दूसरेमें
तस्मात्प्राणः शरीरं चोभयमन्न- | स्थित हैं इसलिये अन्न हैं और
मन्नादं च । | क्योंकि एक दूसरेके आधार हैं
| इसलिये अन्नाद हैं । अतएव प्राण
| और शरीर दोनों ही अन्न और
| अन्नाद हैं ।
स य एवमेतदन्नमन्ने प्रति- | वह जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें
ष्ठितं वेद प्रतितिष्ठत्यन्नादा- | स्थित जानता है, अन्न और अन्नाद-
त्मनैव । किं चान्नवानन्नादो भव- | रूपसे ही स्थित होता है तथा अन्न-
तीत्यादि पूर्ववत् ॥१॥ | वान् और अन्नाद होता है—इत्यादि
| शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १ ॥
इति भृगुवल्ल्यां सप्तमोऽनुवाकः ॥७॥
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अष्टम अनुवाक
अन्नका त्याग न करना Schneider/व्रत तथा जल और ज्योतिरूप
अन्न-ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन
अन्नं न परिचक्षीत। तद्व्रतम्। आपो वा अन्नम्।
ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः
प्रतिष्ठिताः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्न-
मन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति।
महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान्कीर्त्या ॥१॥
अन्नका त्याग न करे। यह व्रत है। जल ही अन्न है। ज्योति
अन्नाद है। जलमें ज्योति प्रतिष्ठित है और ज्योतिमें जल स्थित है।
इस प्रकार ये दोनों अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्नको
अन्नमें स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित होता है, अन्नवान् और अन्नाद
होता है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके
कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥
अन्नं न परिचक्षीत न परि- | अन्नका प्रत्याख्यान अर्थात् त्याग
| न करे, यह व्रत है—यह कथन
हरेत्। तद्व्रतं पूर्ववत्स्तुत्यर्थम्। | पूर्ववत् स्तुतिके लिये है। इस
| प्रकार शुभाशुभकी कल्पनासे उपेक्षा
तदेवं शुभाशुभकल्पनया अपरि- | न किया हुआ अन्न ही यहाँ स्तुत
हियमाणं स्तुतं महीकृतमन्नं स्यात्। | एवं महिमान्वित किया जाता है।
एवं यथोक्तमुत्तरेष्वप्यापो वा | तथा आगेके 'आपो वा अन्नम्'
| इत्यादि वाक्योंमें भी पूर्वोक्त अर्थकी
अन्नमित्यादिषु योजयेत् ॥१॥ | ही योजना करनी चाहिये ॥१॥
इति भृगुवल्ल्यामष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥
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नवम अनुवाक
अन्नसञ्चयरूप व्रत तथा पृथिवी और आकाशरूप अन्न-ब्रह्मके
उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन
अन्नं बहु कुर्वीत । तद्व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम् ।
आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे
पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य
एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो
भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ।
महान्कीर्त्या ॥ १ ॥
अन्नको बढ़ावे--यह व्रत है। पृथिवी ही अन्न है। आकाश
अन्नाद है। पृथिवीमें आकाश स्थित है और आकाशमें पृथिवी स्थित है।
इस प्रकार ये दोनों अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्नको
अन्नमें स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित होता है, अन्नवान् और अन्नाद
होता है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके
कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥
अप्सु ज्योतिरित्यब्ज्योति- | पूर्वोक्त 'अप्सु ज्योतिः' आदि
मन्त्रके अनुसार जल और ज्योतिकी
अन्न और अन्नाद गुणसे उपासना
षोरन्नान्नादगुणत्वेनोपासकस्या- | करनेवालेके लिये 'अन्नको बढ़ाना
व्रत है' [-यह बात इस मन्त्रमें
न्नस्य बहुकरणं व्रतम् ॥ १ ॥ | कही गयी है] ॥ १ ॥
इति भृगुवल्ल्यां नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥
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दशम अनुवाक
गृहागत अतिथिको आश्रय और अन्न देनेका विधान एवं
उससे प्राप्त होनेवाला फल; तथा प्रकारान्तरसे
ब्रह्मकी उपासनाका वर्णन
न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षीत । तद्व्रतम् । तस्माद्यया
कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् । अराध्यस्मा अन्न-
मित्याचक्षते । एतद्वै मुखतोऽन्नꣳराद्धम् । मुखतोऽस्मा
अन्नꣳराध्यते । एतद्वै मध्यतोऽन्नꣳराद्धम् । मध्यतो-
ऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वा अन्ततोऽन्नꣳराद्धम् ।
अन्ततोऽस्मा अन्नꣳराध्यते ॥ १ ॥
य एवं वेद । क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति
प्राणापानयोः । कर्मेति हस्तयोः । गतिरिति पादयोः ।
विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः ।
तृप्तिरिति वृष्टौ । बलमिति विद्युति ॥ २ ॥
यश इति पशुषु ज्योतिरिति नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृत-
मानन्द इत्युपस्थे । सर्वमित्याकाशे । तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत ।
प्रतिष्ठावान् भवति । तन्मह इत्युपासीत । महान्
भवति । तन्मन इत्युपासीत । मानवान् भवति ॥ ३ ॥
तन्नम इत्युपासीत । नम्यन्तेऽस्मै कामाः ।
तद्ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्मवान् भवति । तद्ब्रह्मणः परिमर
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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३१
इत्युपासीत । पर्यैणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः । परि
येऽप्रिया भ्रातृव्याः । स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये
स एकः ॥ ४ ॥
अपने यहाँ रहनेके लिये आये हुए किसीका भी परित्याग न करे।
यह व्रत है । अतः किसी-न-किसी प्रकारसे बहुत-सा अन्न प्राप्त करे;
क्योंकि वह (अन्नोपासक) उस (गृहगत अतिथि) से 'मैंने अन्न
तैयार किया है' ऐसा कहता है । जो पुरुष मुख्यतः (प्रथम अवस्थामें
अथवा मुख्यवृत्तिसे यानी सत्कारपूर्वक) सिद्ध किया हुआ अन्न देता है
उसे मुख्यवृत्तिसे ही अन्नकी प्राप्ति होती है । जो मध्यतः (मध्यम आयुमें
अथवा मध्यम वृत्तिसे) सिद्ध किया हुआ अन्न देता है उसे मध्यम वृत्तिसे
ही अन्नकी प्राप्ति होती है । तथा जो अन्ततः (अन्तिम अवस्थामें अथवा
निकृष्ट वृत्तिसे) सिद्ध किया हुआ अन्न देता है उसे निकृष्ट वृत्तिसे ही
अन्न प्राप्त होता है ॥ १ ॥ जो इस प्रकार जानता है [उसे पूर्वोक्त फल
प्राप्त होता है । अब आगे प्रकारन्तरसे ब्रह्मकी उपासनाका वर्णन किया
जाता है—] ब्रह्म वाणीमें क्षेम (प्राप्त वस्तुके परिरक्षण) रूपसे [स्थित
है—इस प्रकार उपासनीय है], योगक्षेमरूपसे प्राण और अपानमें,
कर्मरूपसे हाथोंमें, गतिरूपसे चरणोंमें और त्यागरूपसे पायुमें [उपासनीय
है], यह मनुष्यसम्बन्धिनी उपासना है । अब देवताओंसे सम्बन्धित
उपासना कही जाती है—तृप्तिरूपसे वृष्टिमें, बलरूपसे विद्युत्में ॥ २ ॥
यशोरूपसे पशुओंमें, ज्योतिरूपसे नक्षत्रोंमें, पुत्रादि प्रजा, अमृतत्व और
आनन्दरूपसे उपस्थमें तथा सर्वरूपसे आकाशमें [ब्रह्मकी उपासना करे]।
वह ब्रह्म सबका प्रतिष्ठा (आधार) है—इस भावसे उसकी उपासना
करे। इससे उपासक प्रतिष्ठावान् होता है । वह महः [नामक व्याहृति
अथवा तेज] है—इस भावसे उसकी उपासना करे। इससे उपासक महान्
होता है । वह मन है—इस प्रकार उपासना करे । इससे उपासक
मानवान् (मनन करनेमें समर्थ) होता है ॥ ३ ॥ वह नमः है—इस
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