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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 261 में से

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पृष्ठ 77

अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१

संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः ।
यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः ।
एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एव-
मुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ॥ ४ ॥
वेदाध्ययन करानेके अनन्तर आचार्य शिष्यको उपदेश देता है—
सत्य बोल । धर्मका आचरण कर । स्वाध्यायसे प्रमाद न कर । आचार्यके
लिये अभीष्ट धन लाकर [ उसकी आज्ञासे स्त्रीपरिग्रह कर और ] सन्तान-
परम्पराका छेदन न कर । सत्यसे प्रमाद नहीं करना चाहिये । धर्मसे
प्रमाद नहीं करना चाहिये । कुशल ( आत्मरक्षामें उपयोगी ) कर्मसे
प्रमाद नहीं करना चाहिये । ऐश्वर्य देनेवाले माङ्गलिक कर्मोंसे प्रमाद
नहीं करना चाहिये । स्वाध्याय और प्रवचनसे प्रमाद नहीं करना
चाहिये ॥ १ ॥ देवकार्य और पितृकार्योंसे प्रमाद नहीं करना चाहिये ।
तू मातृदेव ( माता ही जिसका देव है ऐसा ) हो, पितृदेव हो, आचार्य-
देव हो और अतिथिदेव हो । जो अनिन्द्य कर्म हैं उन्हींका सेवन करना
चाहिये—दूसरोंका नहीं । हमारे ( हम गुरुजनोंके ) जो शुभ आचरण
हैं तुझे उन्हींकी उपासना करनी चाहिये ॥ २ ॥ दूसरे प्रकारके कर्मोंकी
नहीं । जो कोई [ आचार्यादि धर्मोंसे युक्त होनेके कारण ] हमारी अपेक्षा भी
श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं उनका आसनादिके द्वारा तुझे आश्वासन ( श्रमापहरण )
करना चाहिये । श्रद्धापूर्वक देना चाहिये । अश्रद्धापूर्वक नहीं देना चाहिये ।
अपने ऐश्वर्यके अनुसार देना चाहिये । लज्जापूर्वक देना चाहिये । भय मानते
हुए देना चाहिये । संवित्—मैत्री आदि कार्यके निमित्तसे देना चाहिये ।
यदि तुझे कर्म या आचारके विषयमें कोई सन्देह उपस्थित हो ॥ ३ ॥
तो वहाँ जो विचारशील, कर्ममें नियुक्त, आयुक्त ( स्वेच्छासे कर्मपरायण ),
अरूक्ष ( सरलमति ) एवं धर्माभिलाषी ब्राह्मण हों, उस प्रसङ्गमें वे जैसा
व्यवहार करें वैसा ही तू भी कर । इसी प्रकार जिनपर संशययुक्त दोष
आरोपित किये गये हों उनके विषयमें, वहाँ जो विचारशील, कर्ममें

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri