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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

१६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
सति निरवयवत्वादप्रविष्टदेशा- | निरवयव और उससे अप्रविष्ट देशका
भावाच्च प्रवेश उपपद्यते । कथं | अभाव होनेके कारण उसका प्रवेश करना सम्भव नहीं है । तो फिर उसका
तर्हि प्रवेशः स्यात् ? युक्तश्च प्रवेशः | प्रवेश कैसे होना चाहिये ? तथा उसका प्रवेश होना उचित ही है;
श्रुतत्वात्तदेवानुप्राविशदिति । | क्योंकि 'उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया' ऐसी श्रुति है ।
सावयवमेवास्तु तर्हि । साव- | पूर्व०-तब तो ब्रह्म सावयव ही
यवत्वान्मुखे हस्तप्रवेशवन्नाम- | होना चाहिये । उस अवस्थामें, सावयव होनेके कारण मुखमें हाथका
रूपकार्ये जीवात्मनानुप्रवेशो युक्त | प्रवेश होनेके समान उसका नाम-रूप कार्यमें जीवरूपसे प्रवेश होना ठीक
एवेति चेत् ? | ही होगा-यदि ऐसा कहें तो ?
नाशून्यदेशत्वात् । न हि | सिद्धान्ती-नहीं; क्योंकि उससे
कार्यात्मना परिणतस्य नाम- | शून्य कोई देश नहीं है । कार्य-रूपमें परिणत हुए ब्रह्मका नाम-रूप
रूपकार्यदेशव्यतिरेकेणात्मशून्यः | कार्यके देशसे अतिरिक्त और कोई अपनेसे शून्य देश नहीं है, जिसमें
प्रदेशोऽस्ति यं प्रविशेज्जीवात्मना । | उसका जीवरूपसे प्रवेश करना सम्भव हो । और यदि यह मानो
कारणमेव चेत्प्रविशेज्जीवात्मत्वं | कि जीवात्माने कारणमें ही प्रवेश किया तब तो वह अपने जीवत्वको
जह्याद्यथा घटो मृत्प्रवेशे घटत्वं | ही त्याग देगा, जिस प्रकार कि घड़ा मृत्तिकामें प्रवेश करनेपर
जहाति । तदेवानुप्राविशदिति | अपना घटत्व त्याग देता है । तथा 'उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया' इस
च श्रुतेर्न कारणानुप्रवेशो युक्तः । | श्रुतिसे भी कारणमें अनुप्रवेश करना सम्भव नहीं है ।

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६५

[संस्कृत-मूल]
कार्यान्तरमेव स्यादिति चेत् ?
तदेवानुप्राविशदिति जीवात्मरूपं
कार्यं नामरूपपरिणतं कार्यान्तर-
मेवापद्यत इति चेत् ?
न; विरोधात् । न हि घटो
घटान्तरमापद्यते । व्यतिरेक-
श्रुतिविरोधाच्च । जीवस्य नाम-
रूपकार्यव्यतिरेकानुवादिन्यः
श्रुतयो विरुध्येरन् । तदापत्तौ
मोक्षासंभवाच्च । न हि यतो
मुच्यमानस्तदेवापद्यते । न हि
शृङ्खलापत्तिर्बद्धस्य तस्करादेः ।
बाह्यान्तर्भेदेन परिणतमिति
चेत्तदेव कारणं ब्रह्म शरीराद्या-
धारत्वेन तदन्तर्जीवात्मनाधेय-
त्वेन च परिणतमिति चेत् ?

  • अर्थात् जीवको तो नाम-रूपात्मक कार्यसे मुक्त होना इष्ट है, फिर वह उसीको क्यों प्राप्त होगा ?