तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
११४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
११४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[संस्कृत-मूलम् / भाष्यम्]
व्योम्नीति वा सामानाधिकरण्या-
दव्याकृताकाशमेव गुहा। तत्रा-
पि निगूढाः सर्वे पदार्थास्त्रिषु
कालेषु कारणत्वात्सूक्ष्मतरत्वा-
च्च। तस्मिन्नन्तर्निहितं ब्रह्म।
हार्दमेव तु परमं व्योमेति
न्याय्यं विज्ञानाङ्गत्वेनोपासनाङ्ग-
त्वेन व्योम्नो विवक्षितत्वात्।
"यो वै स बहिर्धा पुरुषादा-
काशः" (छा० उ० ३।१२।
७) "यो वै सोऽन्तःपुरुष
आकाशः" (छा० उ० ३।१२।
८) "योऽयमन्तर्हृदय आकाशः"
(छा० उ० ३।१२।९)
इति श्रुत्यन्तरात्प्रसिद्धं हार्दस्य
व्योम्नः परमत्वम्। तस्मिन्हार्दे
व्योम्नि या बुद्धिर्गुहा तस्यां
निहितं ब्रह्म तद्वृत्त्या विविक्त-
तयोपलभ्यत इति। न ह्यन्यथा
विशिष्टदेशकालसंबन्धोऽस्ति ब्र-
ह्मणः सर्वगतत्वान्निर्विशेषत्वाच्च।
[हिन्दी-अनुवाद/व्याख्या]
ही परमाकाश है। अथवा 'गुहायां
व्योम्नि' इस प्रकार इन दोनों पदों-
का सामानाधिकरण्य होनेके कारण
आकाशको ही गुहा कहा गया है;
क्योंकि सबका कारण और सूक्ष्मतर
होनेके कारण उसमें भी तीनों
कालोंमें सारे पदार्थ छिपे हुए हैं।
उसीके भीतर ब्रह्म भी स्थित है।
परन्तु युक्तियुक्त तो यही है कि
हृदयाकाश ही परमाकाश है; क्योंकि
उस आकाशको विज्ञानाङ्ग यानी
उपासनाके अंगरूपसे बतलाना यहाँ
इष्ट है "जो आकाश इस [ शरीर-
संज्ञक ] पुरुषसे बाहर है" "जो
आकाश इस पुरुषके भीतर है" "जो
यह आकाश हृदयके भीतर है" इस
प्रकार एक अन्य श्रुतिसे हृदयाकाश-
का परमत्व प्रसिद्ध है। उस हृदया-
काशमें जो बुद्धिरूप गुहा है उसमें
ब्रह्म निहित है; अर्थात् उस (बुद्धि-
वृत्ति) से वह व्यावृत्त (पृथक्)
रूपसे स्पष्टतया उपलब्ध होता है;
अन्यथा ब्रह्मका किसी भी विशेष
देश या कालसे सम्बन्ध नहीं है;
क्योंकि वह सर्वगत और निर्विशेष है।
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
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स एवं ब्रह्म विजानन्किमि- | वह इस प्रकार ब्रह्मको जानने-
| वाला क्या करता है ? इसपर श्रुति
ब्रह्मविद त्याह-अश्नुते भुङ्क्ते | कहती है—वह सम्पूर्ण अर्थात् निः-
ऐश्वर्यम् सर्वान्निरवशिष्टान्का- | शेष कामनाओं यानी इच्छित भोगों-
| को प्राप्त कर लेता है अर्थात् उन्हें
मान्भोगानित्यर्थः । किमस्मदादि- | भोगता है । तो क्या वह हमारे-
| तुम्हारे समान पुत्र एवं स्वर्गादि
वत्पुत्रस्वर्गादीन्पर्यायेण नेत्याह । | भोगोंको क्रमसे भोगता है ? इसपर
सह युगपदेकक्षणोपारूढानेव | श्रुति कहती है—नहीं, उन्हें एक
| साथ भोगता है । वह एक ही क्षणमें
एकयोपलब्ध्या सवितृप्रकाशवत् | बुद्धिवृत्तिपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण
| भोगोंको सूर्यके प्रकाशके समान
नित्यया ब्रह्मस्वरूपाव्यतिरिक्तया | नित्य तथा ब्रह्मस्वरूपसे अभिन्न एक
| ही उपलब्धिके द्वारा, जिसका हमने
यामवोचाम सत्यं ज्ञानमनन्त- | 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्' ऐसा निरूपण
मिति । एतत्तदुच्यते—ब्रह्मणा | किया है, भोगता है । 'ब्रह्मणा
| सह सर्वान्कामानश्नुते' इस वाक्यसे
सहेति । | यही अर्थ कहा गया है ।
ब्रह्मभूतो विद्वान्ब्रह्मस्वरूपे- | ब्रह्मभूत विद्वान् ब्रह्मस्वरूपसे
णैव सर्वान्कामान्सहाश्नुते, न | ही एक साथ सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्त
| कर लेता है । अर्थात् दूसरे लोग
यथोपाधिकृतेन स्वरूपेणात्मना | जिस प्रकार जलमें प्रतिबिम्बित
| सूर्यके समान अपने औपाधिक और
जलसूर्यकादिवत्प्रतिबिम्बभूतेन | संसारी आत्माके द्वारा धर्मादि
सांसारिकेण धर्मादिनिमित्तापे- | निमित्तकी अपेक्षावाले तथा चक्षु
| आदि इन्द्रियोंकी अपेक्षासे युक्त
क्षांश्चक्षुरादिकरणापेक्षांश्च कामान् | सम्पूर्ण भोगोंको क्रमशः भोगते हैं
| उस प्रकार उन्हें नहीं भोगता । तो
पर्यायेणाश्नुते लोकः; कथं तर्हि ? | फिर कैसे भोगता है ? वह उपर्युक्त
यथोक्तेन प्रकारेण सर्वज्ञेन सर्व- |
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri