तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
इतराश्च व्याहृतयो लोका देवा | देव, वेद और प्राणरूप अन्य
वेदाः प्राणाश्च मह इत्यनेन | व्याहृतियाँ आदित्य, चन्द्र, ब्रह्म एवं
व्याहृत्यात्मनादित्यचन्द्रब्रह्मान्न- | अन्नस्वरूप व्याहृत्यात्मक महःसे
भूतेन व्याप्यन्ते यतः अतो- | व्याप्त हैं, इसलिये वे अन्य देवता
ऽङ्गान्यवयवा अन्या देवताः। | इसके अंग—अवयव हैं । यहाँ
देवताग्रहणमुपलक्षणार्थं लोका- | लोकादिका उपलक्षण करानेके लिये
दीनाम् । मह इत्येतस्य व्या- | 'देवता' शब्दका ग्रहण किया
हृत्यात्मनो देवलोकादयः सर्वे- | गया है। क्योंकि देव और लोक
ऽवयवभूता यतोऽत आहादित्या- | आदि सभी 'महः' इस व्याहृत्यात्माके
दिभिर्लोकादयो महीयन्ते इति । | अवयवस्वरूप हैं, इसीलिये ऐसा
आत्मनो ह्यङ्गानि महीयन्ते, महनं | कहा है कि आदित्यादिके योगसे
वृद्धिरुपचयः । महीयन्ते वर्धन्त | लोकादि महत्ताको प्राप्त होते हैं ।
इत्यर्थः । | आत्मासे ही अङ्ग महत्ताको प्राप्त
| हुआ करते हैं । 'महन' शब्दका
| अर्थ वृद्धि—उपचय है । अतः
| 'महीयन्ते' इसका 'वृद्धिको प्राप्त
| होते हैं' यह अर्थ है ।
अयं लोकोऽग्निर्ऋग्वेदः प्राण | यह लोक, अग्नि, ऋग्वेद और
प्रतिव्याहृति चत्वारो भेदाः इति प्रथमा व्याहृति- | प्राण—ये पहली व्याहृति भूः हैं; इसी
भूरिति । एवमुत्त- | प्रकार उत्तरोत्तर प्रत्येक व्याहृति चार-
रोत्तरैकैका चतुर्धा भवति । | चार प्रकारकी है ।* 'महः' ब्रह्म
मह इति ब्रह्म । ब्रह्मेत्योङ्कारः, | है; ब्रह्मका अर्थ ओंकार है; क्योंकि
शब्दाधिकारेऽन्यस्यासंभवात् । | शब्दके प्रकरणमें अन्य किसी ब्रह्म-
उक्तार्थमन्यत् । | का होना असम्भव है । शेष सबका
| अर्थ पहले कहा जा चुका है ।
* यथा अन्तरिक्षलोक, वायु, सामवेद और अपान—ये दूसरी व्याहृति
भुवः हैं; द्युलोक, आदित्य, यजुर्वेद और व्यान—ये तीसरी व्याहृति सुवः हैं;
तथा आदित्य, चन्द्रमा, ब्रह्म और अन्न—ये चौथी व्याहृति महः हैं ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धेति । | वे ये चारों व्याहृतियाँ चार प्रकारकी हैं । अर्थात् वे ये भूः, भुवः, सुवः और महः चार व्याहृतियाँ प्रत्येक चार-चार प्रकारकी हैं । 'धा' शब्द 'प्रकार' का वाचक है । अर्थात् वे चार-चार होती हुई चार प्रकारकी हैं । उनकी जिस प्रकार पहले कल्पना की गयी है उसी प्रकार उपासना करनेका नियम करनेके लिये उनका पुनः उपदेश किया गया है । उन उपर्युक्त व्याहृतियोंको जो पुरुष जानता है वही जानता है । किसे जानता है ? ब्रह्मको ।
ता वा एता भूर्भुवः सुवर्मह इति
चतस्र एकैकशश्चतुर्धा चतुष्प्र-
काराः । धाशब्दः प्रकारवचनः ।
चतस्रश्चतस्रः सत्यश्चतुर्धा भव-
न्तीत्यर्थः । तासां यथाक्लृप्तानां
पुनरुपदेशस्तथैवोपासननियमार्थः।
ता यथोक्तव्याहृतीर्यो वेद स
वेद विजानाति । किम् ? ब्रह्म ।
ननु “तद्ब्रह्म स आत्मा” इति | शङ्का- "वह ब्रह्म है, वह आत्मा है" इस वाक्यद्वारा [ महः रूपसे ] ब्रह्मको जान लेनेपर भी उसे न जाननेके समान '[ उसे जो जानता है ] वह ब्रह्मको जानता है' ऐसा कहना तो ठीक नहीं है ।
ज्ञाते ब्रह्मणि न वक्तव्यमविज्ञात-
वत्स वेद ब्रह्मेति ।
न; तद्विशेषविवक्षुत्वाद- | समाधान-ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उस [ ब्रह्मविषयक ज्ञान ] के विषयमें विशेष कहना अभीष्ट होनेके कारण इस प्रकार कहनेमें कोई दोष नहीं है । यह ठीक है कि इतना तो जान लिया कि चतुर्थ व्याहृतिरूप ब्रह्म है; किन्तु हृदयके भीतर उपलब्ध होना तथा मनो- मयत्वादिरूप उसकी विशेषताओंका
दोषः । सत्यं विज्ञातं
[पञ्चमषष्ठानु-वाक्ययोरेकवाक्यता] चतुर्थव्याहृत्यात्मा
ब्रह्मेति न तु तद्विशेषो हृदयान्त-
रुपलभ्यत्वं मनोमयत्वादिश्च ।