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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 261 में से

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पृष्ठ 69

अनु० ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३

तव्याः । अग्निहोत्रं च होतव्यम् । | हैं ] । अग्नियोंका आधान करना
अतिथयश्च पूज्याः । मानुषमिति | चाहिये। अग्निहोत्र होम करने योग्य
लौकिकः संव्यवहारः, तच्च | है । अतिथियोंका पूजन करना
चाहिये । मानुष यानी लौकिक
यथाप्राप्तमनुष्ठेयम् । प्रजा चोत्पा- | व्यवहार; उसका भी यथाप्राप्त
द्या । प्रजननश्च प्रजननमृतौ | अनुष्ठान करना चाहिये । प्रजा
उत्पन्न करनी चाहिये । प्रजन-
भार्यागमनमित्यर्थः । प्रजातिः | प्रजनन-ऋतुकालमें भार्यागमन और
पौत्रोत्पत्तिः पुत्रो निवेशयितव्य | प्रजाति-पौत्रोत्पत्ति अर्थात् पुत्रको
इत्येतत् । | स्त्रीपरिग्रह कराना चाहिये ।
सर्वैरेतैः कर्मभिर्युक्तस्यापि | इन सब कर्मोंसे युक्त पुरुषको
[स्वाध्यायप्रवचन-सहयोगकारणम्] स्वाध्यायप्रवचने | भी स्वाध्याय और प्रवचनका यत्न-
यत्ततोऽनुष्ठेये इत्येव- | पूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये-इसी-
मर्धं सर्वेण सह स्वाध्यायप्रवचन- | लिये इन सबके साथ स्वाध्याय और
प्रवचनको ग्रहण किया गया है ।
ग्रहणम् । स्वाध्यायाधीनं ह्यर्थ- | स्वाध्यायके अधीन ही अर्थज्ञान है
ज्ञानम्, अर्थज्ञानायत्तं च परं | और अर्थज्ञानके अधीन ही परमश्रेय
श्रेयः; प्रवचनं च तदविस्मरणार्थं | है, तथा प्रवचन उसकी अविस्मृति
और धर्मकी वृद्धिके लिये है; इसलिये
धर्मप्रवृद्ध्यर्थं च । अतः स्वाध्या- | स्वाध्याय और प्रवचनमें आदर
यप्रवचनयोरादरः कार्यः । | ( श्रद्धा ) रखना चाहिये ।
सत्यमिति सत्यमेवानुष्ठातव्य- | सत्य अर्थात् सत्य ही अनुष्ठान
[सत्यादिप्राधान्ये मुनीनां मतभेदाः] मिति सत्यमेव | किये जाने योग्य है-ऐसा सत्यवचा
वचो यस्य सोऽयं | -सत्य ही जिसका वचन हो वह
अथवा जिसका नाम ही सत्यवचा है
सत्यवचा नाम वा तस्य । राथी- | वह राथीतर अर्थात् रथीतरके वंशमें
तरो रथीतरस्य गोत्रो राथीतरा- | उत्पन्न हुआ राथीतर आचार्य मानता
चार्यो मन्यते । तप इति तप एव | है । तप यानी तप ही कर्त्तव्य है-