तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१८८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१८८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
व्यक्तिः । एवं पूर्वस्याः पूर्वस्या | अभिव्यक्ति होती है । इस प्रकार
भूमेरुत्तरस्यामुत्तरस्यां भूमौ | पूर्व-पूर्व भूमिकी अपेक्षा आगे-आगे-
प्रसादविशेषतः शतगुणेनानन्दो- | की भूमिमें प्रसादकी विशेषता होने-
त्कर्ष उपपद्यते । | से सौ-सौ गुने आनन्दका उत्कर्ष
| होना सम्भव ही है ।
प्रथमं त्वकामहताग्रहणं मनु- | [ आगेके सब वाक्योंके साथ
| रहनेवाला ] 'श्रोत्रियस्य चाकामह-
ष्यविषयभोगकामानभिहतस्य | तस्य' यह वाक्य पहले [ मानुष
| आनन्दके साथ ] इसलिये ग्रहण
श्रोत्रियस्य मनुष्यानन्दाच्छत- | नहीं किया गया कि विषय-भोग
| और कामनाओंसे व्याकुल न रहने-
गुणेनानन्दोत्कर्षो मनुष्यगन्धर्वेण | वाले श्रोत्रियके आनन्दका उत्कर्ष
| मानुष आनन्दकी अपेक्षा सौ गुना
| अर्थात् मनुष्यगन्धर्वके आनन्दके
तुल्यो वक्तव्य इत्येवमर्थम् । | तुल्य बतलाना है । श्रुतिमें 'साधु-
| युवा' और 'अध्यायक' ये दो विशेषण
साधुयुवाध्यायक इति श्रोत्रिय- | [ सार्वभौम राजाका ] श्रोत्रियत्व
| और निष्पापत्व प्रदर्शित करनेके
त्वावृजिनत्वे गृह्येते । ते ह्यवि- | लिये ग्रहण किये जाते हैं । इन्हें
| आगे भी सबके साथ समानभावसे
शिष्टे सर्वत्र । अकामहतत्वं तु | समझना चाहिये । विषयके उत्कर्ष
| और अपकर्षसे सुखका भी उत्कर्ष
| और अपकर्ष होता है [ किन्तु
विषयोत्कर्षापकर्षतः सुखोत्कर्षा- | कामनारहित पुरुषके लिये सुखका
| उत्कर्ष या अपकर्ष हुआ नहीं
पकर्षाय विशेष्यते । अतोऽकाम- | करता ] इसीलिये अकामहतत्वकी
| विशेषता है । और इसीसे
| 'अकामहत' पद ग्रहण किया गया
हतग्रहणम्, तद्विशेषतः शतगुण- | है । अतः उससे विशिष्ट पुरुषके
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८९
सुखोत्कर्षोपलब्धेरकामहतत्वस्य | सुखका सौगुना उत्कर्ष देखा जाता
| है; अतः अकामहतत्वको परमानन्द-
परमानन्दप्राप्तिसाधनत्वविधाना- | की प्राप्तिका साधन बतलानेके लिये
| 'अकामहत' विशेषण ग्रहण किया
र्थम् । व्याख्यातमन्यत् । | है । और सबक़ी व्याख्या पहले की
| जा चुकी है ।
देवगन्धर्वा जातित एव । | देवगन्धर्व—जो जन्मसे ही गन्धर्व
चिरलोकलोकानामिति पितॄणां | हों 'चिरलोकलोकानाम्' ( चिरस्थायी
विशेषणम् । चिरकालस्थायी | लोकमें रहनेवाले ) यह पितृगणका
लोको येषां पितॄणां ते चिर- | विशेषण है । जिन पितृगणका
लोकलोका इति । आजान इति | चिरस्थायी लोक है वे चिरलोक-
देवलोकस्तस्मिन्नाजाने जाता आ- | लोक कहे जाते हैं । 'आजान'
जानजा देवाः स्मार्तकर्मविशेषतो | देवलोकका नाम है, उस आजानमें
देवस्थानेषु जाताः । | जो उत्पन्न हुए हैं वे देवगण
| 'आजानज' हैं, जो कि स्मार्त्त कर्म-
| विशेषके कारण देवस्थानमें उत्पन्न
| हुए हैं ।
कर्मदेवा ये वैदिकेन कर्मणा- | जो केवल अग्निहोत्रादि वैदिक
ग्निहोत्रादिना केवलेन देवान- | कर्मसे देवभावको प्राप्त हुए हैं वे
पियन्ति । देवा इति त्रयस्त्रिंश- | 'कर्मदेव' कहलाते हैं । जो तैंतीस
द्धविर्भुजः । इन्द्रस्तेषां स्वामी | देवगण यज्ञमें हविर्भाग लेनेवाले हैं
तस्याचार्यो बृहस्पतिः । प्रजा- | वे ही यहाँ 'देव' शब्दसे कहे गये हैं ।
पतिर्विराट् । त्रैलोक्यशरीरो ब्रह्मा | उनका स्वामी इन्द्र है और इन्द्रका
समष्टिव्यष्टिरूपः संसारमण्डल- | गुरु बृहस्पति है । 'प्रजापति' का
व्यापी । | अर्थ विराट् है, तथा त्रैलोक्यशरीर-
| धारी ब्रह्मा है जो समष्टि-व्यष्टिरूप
| और समस्त संसारमण्डलमें व्याप्त है ।
यत्रैत आनन्दभेदा एकतां | जहाँ ये आनन्दके भेद एकताको
| प्राप्त होते हैं [ अर्थात् एक
गच्छन्ति धर्मश्च तन्निमित्तो ज्ञानं | ही गिने जाते हैं ] तथा जहाँ
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri