तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१०० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१०० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
तस्यैवमविद्ययानाप्तब्रह्मस्व- | जिस प्रकार प्रकृत ( दशम )
रूपस्य प्रकृतसंख्यापूरणस्यात्म- | संख्याको पूर्ण करनेवाला अपना-आप
नोऽविद्ययानाप्तस्य सतः केन- | अविद्यावश अप्राप्त रहता है और फिर
चित्स्मारितस्य पुनस्तस्यैव वि- | किसीके द्वारा स्मरण करा दिये जाने-
द्ययाप्तिर्यथा तथा श्रुत्युपदिष्टस्य | पर विद्याद्वारा उसकी प्राप्ति हो जाती
सर्वात्मब्रह्मण आत्मत्वदर्शनेन | है उसी प्रकार अविद्यावश जिसके
विद्यया तदाप्तिरुपपद्यत एव । | ब्रह्मस्वरूपकी उपलब्धि नहीं होती
उस सबके आत्मभूत श्रुत्युपदिष्ट
ब्रह्मकी आत्मदर्शनरूप विद्याके द्वारा
प्राप्ति होनी उचित ही है ।
ब्रह्मविदाप्नोति परमिति वाक्यं | 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' यह वाक्य
[उत्तरग्रन्थावतरणिका] सूत्रभूतम् । सर्वस्य | सूत्रभूत है । जो सम्पूर्ण वल्लीके
वल्ल्यर्थस्य ब्रह्म- | अर्थका विषय है, जिसका 'ब्रह्मविदा-
विदाप्नोति परमित्यनेन वाक्येन | प्नोति परम्' इस वाक्यद्वारा ज्ञातव्य-
वेद्यतया सूत्रितस्य ब्रह्मणोऽनि- | रूपसे सूत्रतः उल्लेख किया गया
र्धारितस्वरूपविशेषस्य सर्वतो | है, उस ब्रह्मके ऐसे लक्षणका—
व्यावृत्तस्वरूपविशेषसमर्पणसम- | जिसके विशेष रूपका निश्चय नहीं
र्थस्य लक्षणस्याविशेषेण चोक्तवेद- | किया गया है और जो सम्पूर्ण
नस्य ब्रह्मणो वक्ष्यमाणलक्षणस्य | वस्तुओंसे व्यावृत्त स्वरूपविशेषका
ज्ञान करानेमें समर्थ है—वर्णन करते
हुए स्वरूपका निश्चय करानेके लिये
तथा जिसके ज्ञानका सामान्यरूपसे
वर्णन कर दिया गया है उस आगे
कहे जानेवाले लक्षणोंसे युक्त ब्रह्मको
पुरुष उधर आ निकला। उसने सब वृत्तान्त जानकर उन्हें एक लाइनमें खड़ा
किया और हाथमें डंडा लेकर एक, दो, तीन—इस प्रकार गिनते हुए हर
एकके एक-एक डंडा लगाकर उन्हें दश होनेका निश्चय करा दिया और
यह भी दिखला दिया कि वह दशवाँ पुरुष स्वयं गिननेवाला ही था जो
दूसरोंमें आसक्तचित्त रहनेके कारण अपनेको भूले हुए था ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१
विशेषेण प्रत्यगात्मतयानन्य- | विशेषतः 'अपना अन्तरात्मा होनेसे
रूपेण विज्ञेयत्वाय, ब्रह्मविद्याफलं | अनन्यरूपसे जाननेयोग्य है' ऐसा
च ब्रह्मविदो यत्परब्रह्मप्राप्ति- | प्रतिपादन करनेके लिये और यह दिखलानेके लिये कि—ब्रह्मवेत्ताको जो
लक्षणमुक्तं स सर्वात्मभावः सर्व- | परमात्माकी प्राप्तिरूप ब्रह्मविद्याका फल बतलाया गया है वह सर्वात्मभाव
संसारधर्मातीतब्रह्मस्वरूपत्वमेव | सम्पूर्ण सांसारिक धर्मोंसे अतीत
नान्यदित्येतत्प्रदर्शनायैषर्गुदाहि- | ब्रह्मस्वरूपता ही है—और कुछ नहीं है—'तदेषाभ्युक्ता' यह ऋचा कही
यते—तदेषाम्युक्तेति । | जाती है ।
तत्तस्मिन्नेव ब्राह्मणवाक्यो- | तत्—उस ब्राह्मणवाक्यद्वारा
क्तेऽर्थे एषर्ग्भ्युक्ताम्नाता । सत्यं | बतलाये हुए अर्थमें ही [ सत्यं ज्ञान-
ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेति ब्रह्मणो लक्ष- | मनन्तं ब्रह्म ] यह ऋचा कही गयी है । 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' यह
णार्थं वाक्यम् । सत्यादीनि हि | वाक्य ब्रह्मका लक्षण करनेके लिये
त्रीणि विशेषणार्थानि पदानि | है । 'सत्य' आदि तीन पद विशेष्य
विशेष्यस्य ब्रह्मणः । विशेष्यं | ब्रह्मके विशेषण बतलानेके लिये हैं ।
ब्रह्म विवक्षितत्वाज्ज्ञेयतया । | वेद्यरूपसे विवक्षित ( बतलाये जाने-
वेद्यत्वेन यतो ब्रह्म प्राधान्येन | को इष्ट ) होनेके कारण ब्रह्म विशेष्य है । क्योंकि ब्रह्म प्रधानतया
विवक्षितं तस्माद्विशेष्यं विज्ञेयम् । | वेद्यरूपसे ( ज्ञानके विषयरूपसे )
अतः अस्माद् विशेषणविशेष्य- | विवक्षित है; इसलिये उसे विशेष्य समझना चाहिये । अतः इस
त्वादेव सत्यादीनि एक- | विशेषण-विशेष्यभावके कारण एक
विभक्त्यन्तानि पदानि समाना- | ही विभक्तिवाले 'सत्य' आदि तीनों
धिकरणानि । सत्यादि- | पद समानाधिकरण हैं । सत्य आदि
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri