तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
२२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
सैव ब्रह्म विजिज्ञासस्वेत्यर्थः । | है कि तू तपसे ही ब्रह्मको जाननेकी
ऋज्वन्यत् ॥ १ ॥ | इच्छा कर । शेष अर्थ सरल है ॥१॥
इति भृगुवल्ल्यां द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥
तृतीय अनुवाक
प्राण ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसीमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर
भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके
उपदेशसे पुनः तप करना
प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात् । प्राणाद्ध्येव खल्विमानि
भूतानि जायन्ते । प्राणेन जातानि जीवन्ति । प्राणं
प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं
पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳ होवाच ।
तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपो-
ऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
प्राण ब्रह्म है—ऐसा जाना । क्योंकि निश्चय प्राणसे ही ये प्राणी
उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर प्राणसे ही जीवित रहते हैं और मरणोन्मुख
होनेपर प्राणमें ही लीन हो जाते हैं । ऐसा जानकर वह फिर अपने पिता
वरुणके पास आया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश
कीजिये ।' उससे वरुणने कहा—'तू तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर ।
तप ही ब्रह्म है ।' तब उसने तप किया और उसने तप करके—॥ १ ॥
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चतुर्थ अनुवाक
मन ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर
भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके
उपदेशसे पुनः तप करना
मनो ब्रह्मेति व्यजानात् । मनसो ह्येव खल्विमानि
भूतानि जायन्ते । मनसा जातानि जीवन्ति । मनः
प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं
पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳ होवाच ।
तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत ।
स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
मन ब्रह्म है—ऐसा जाना; क्योंकि निश्चय मनसे ही ये जीव
उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर मनके द्वारा ही जीवित रहते हैं और
अन्तमें प्रयाण करते हुए मनमें ही लीन हो जाते हैं। ऐसा जानकर
वह फिर पिता वरुणके पास गया [ और बोला—] 'भगवन् ! मुझे
ब्रह्मका उपदेश कीजिये।' वरुणने उससे कहा—'तू तपसे ब्रह्मको
जाननेकी इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है।' तब उसने तप किया और उसने
तप करके—॥ १ ॥
इति भृगुवल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥
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पञ्चम अनुवाक
विज्ञान ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण
घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और
उसके उपदेशसे पुनः तप करना
विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात् । विज्ञानाद्ध्येव
खल्विमानि भूतानि जायन्ते । विज्ञानेन जातानि
जीवन्ति । विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय
पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति ।
तꣳहोवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति ।
स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
विज्ञान ब्रह्म है—ऐसा जाना। क्योंकि निश्चय विज्ञानसे ही ये
सब जीव उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर विज्ञानसे ही जीवित रहते हैं
और फिर मरणोन्मुख होकर विज्ञानमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। ऐसा
जानकर वह फिर पिता वरुणके समीप आया [और बोला—] 'भगवन् !
मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिये ।' वरुणने उससे कहा—'तू तपके द्वारा
ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर । तप ही ब्रह्म है ।' तब उसने तप किया
और तप करके—॥ १ ॥
इति भृगुवल्ल्यां पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥
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षष्ठ अनुवाक
आनन्द ही ब्रह्म है—ऐसा भृगुका निश्चय करना तथा इस भार्गवी
वारुणी विद्याका महत्त्व और फल
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्धयेव
खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि
जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । सैषा
भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता । स य
एवं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्
भवति, प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥१॥
आनन्द ब्रह्म है—ऐसा जाना; क्योंकि आनन्दसे ही ये सब प्राणी
उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर आनन्दके द्वारा ही जीवित रहते हैं और
प्रयाण करते समय आनन्दमें ही समा जाते हैं। वह यह भृगुकी जानी
हुई और वरुणकी उपदेश की हुई विद्या परमाकाशमें स्थित है। जो ऐसा
जानता है वह ब्रह्ममें स्थित होता है; वह अन्नवान् और अन्नका भोक्ता
होता है; प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके
कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥
एवं तपसा विशुद्धात्मा | इस प्रकार तपसे शुद्धचित्त हुए
प्राणादिषु साकल्येन ब्रह्मलक्षण- | भृगुने प्राणादिमें पूर्णतया ब्रह्मका
मपश्यञ्शनैः शनैरन्तरनुप्रविश्या- | लक्षण न देखकर धीरे-धीरे भीतरकी
ओर प्रवेश कर तपरूप साधनके
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