तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 83, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
[संस्कृत-मूल/भाष्य]
र्मणि वृत्ते वा वर्तेरंस्तथा त्वमपि
वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु,
अभ्याख्याता अभ्युक्ता दोषेण
संदिह्यमानेन संयोजिताः केन-
चित्तेषु च यथोक्तं सर्वमुपन-
येद्ये तत्रेत्यादि ।
एष आदेशो विधिः । एष
उपदेशः पुत्रादिभ्यः पित्रादी-
नाम् । एषा वेदोपनिषद्वेदरहस्यं
वेदार्थ इत्येतत् । एतदेवानुशा-
सनमीश्वरवचनम् । आदेश-
वाक्यस्य विधेरुक्तत्वात्सर्वेषां वा
प्रमाणभूतानामनुशासनमेतत् ।
यस्मादेवं तस्मादेवं यथोक्तं सर्व-
मुपासितव्यं कर्तव्यम् । एवमु
चैतदुपास्यमुपास्यमेव चैतन्नानुपा-
स्यमित्यादरार्थं पुनर्वचनम् ॥४॥
[हिन्दी-अनुवाद]
प्रकार बर्ताव करें उसी प्रकार तुझे
भी बर्ताव करना चाहिये । इसी
प्रकार अभ्याख्यातोंके प्रति-
अभ्याख्यात-अभ्युक्त अर्थात् जिन-
पर कोई संशययुक्त दोष आरोपित
किया गया हो उनके प्रति जैसा
पहले 'ये तत्र' इत्यादिसे कहा गया
है उसी सब व्यवहारका प्रयोग
करना चाहिये ।
यह आदेश अर्थात् विधि है,
यह पुत्रादिको पिता आदिका उपदेश
है, यह वेदोपनिषद्-वेदका रहस्य
यानी वेदार्थ है । यही अनुशासन
यानी ईश्वरका वाक्य है । अथवा
आदेशवाक्य विधि है-ऐसा पहले
कहा जा चुका है इसलिये यह
सभी प्रमाणभूत [ उपदेशकों ] का
अनुशासन है । क्योंकि ऐसा
है इसलिये पहले जो कुछ
कहा गया है वह सब इसी
प्रकार उपासनीय-करने योग्य हैं ।
इस प्रकार ही इसकी उपासना
करनी चाहिये-यह उपासनीय ही
है, अनुपास्य नहीं है-इस प्रकार
यह पुनरुक्ति उपासनाके आदरके
लिये है ॥ ४ ॥