तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
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२१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
[बायाँ स्तम्भ / Sanskrit Text]
च यत्प्रयन्ति यद्ब्रह्म प्रतिगच्छ-
न्ति, अभिसंविशन्ति तादात्म्य-
मेव प्रतिपद्यन्ते । उत्पत्तिस्थिति-
लयकालेषु यदात्मतां न जहति
भूतानि तदेतद्ब्रह्मणो लक्षणम् ।
तद्ब्रह्म विजिज्ञासस्व विशेषेण
ज्ञातुमिच्छस्व । यदेवंलक्षणं ब्रह्म
तदन्नादिद्वारेण प्रतिपद्यस्वे-
त्यर्थः । श्रुत्यन्तरं च—"प्राण-
स्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य
श्रोत्रमन्नस्यान्नं मनसो ये मनो
विदुस्ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराण-
मग्य्रम्” ( बृ० उ० ४ । ४ ।
१८ ) इति ब्रह्मोपलब्धौ द्वारा-
ण्येतानीति दर्शयति ।
स भृगुर्ब्रह्मोपलब्धिद्वाराणि
[पार्श्व टिप्पणी: ब्रह्मोपलब्धये भृगोस्तपः] ब्रह्मलक्षणं च श्रुत्वा
पितुस्तपो ब्रह्मोप-
लब्धिसाधनत्वेनातप्यत तप्त-
वान् । कुतः पुनरनुपदिष्टस्यैव
तपसः साधनत्वप्रतिपत्तिर्भृगोः ?
[दायाँ स्तम्भ / Hindi Translation]
जिसके प्रति प्रयाण करनेवाले
अर्थात् जिस ब्रह्मके प्रति गमन
करनेवाले वे जीव उसमें प्रवेश
करते—उसके तादात्म्यभावको प्राप्त
हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि
उत्पत्ति, स्थिति और लयकालमें
प्राणी जिसकी तद्रूपताका त्याग नहीं
करते यही उस ब्रह्मका लक्षण है।
तू उस ब्रह्मको विशेषरूपसे जाननेकी
इच्छा कर; अर्थात् जो ऐसे लक्षणों-
वाला ब्रह्म है उसे अन्नादिके द्वारा
प्राप्त कर। "ब्रह्म प्राणका प्राण,
चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र, अन्नका
अन्न और मनका मन है—ऐसा जो
जानते हैं वे उस पुरातन और श्रेष्ठ
ब्रह्मको साक्षात् जान सकते हैं" ऐसी
एक दूसरी श्रुति भी इस बातको
प्रदर्शित करती है कि ये प्राणादि
ब्रह्मकी उपलब्धिमें द्वारस्वरूप हैं।
उस भृगुने अपने पितासे ब्रह्मकी
उपलब्धिके द्वार और ब्रह्मका लक्षण
सुनकर ब्रह्मसाक्षात्कारके साधन-
रूपसे तप किया । [ यहाँ प्रश्न
होता है कि ] जिसका उपदेश ही
नहीं दिया गया था उस तपके
[ ब्रह्मप्राप्तिका ] साधन होनेका
ज्ञान भृगुको कैसे हुआ ? [ उत्तर—]
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[शीर्षक]
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१७
[मूल संस्कृत - शाङ्करभाष्यम्]
सावशेषोक्तेः । अन्नादि ब्रह्मणः
प्रतिपत्तौ द्वारं लक्षणं च यतो
वा इमानीत्याद्युक्तवान् । सावशेषं
हि तत्साक्षाद्ब्रह्मणोऽनिर्देशात् ।
अन्यथा हि स्वरूपेणैव ब्रह्म
निर्देष्टव्यं जिज्ञासवे पुत्रायेद-
मित्थंरूपं ब्रह्मेति । न चैवं निर-
दिशत्किं तर्हि ? सावशेषमेवोक्त-
वान् । अतोऽवगम्यते नूनं साध-
नान्तरमप्यपेक्षते पिता ब्रह्म-
विज्ञानं प्रतीति । तपोविशेषप्रति-
पत्तिस्तु सर्वसाधकतमत्वात् ।
सर्वेषां हि नियतसाध्यविषयाणां
साधनानां तप एव साधकतमं
साधनमिति हि प्रसिद्धं लोके ।
तस्मात्पित्रानुपदिष्टमपि ब्रह्म-
विज्ञानसाधनत्वेन तपः प्रतिपेदे
भृगुः । तच्च तपो बाह्यान्तः-
करणसमाधानं तद्द्वारकत्वाद्ब्रह्म-
[हिन्दी भाष्यार्थ]
क्योंकि [ उसके पिताका ] कथन
सावशेष ( जिसमें कुछ कहना शेष
रह गया हो—ऐसा ) था । वरुणने
'यतो वा इमानि भूतानि' इत्यादि
रूपसे अन्नादि ब्रह्मकी प्राप्तिका द्वार
और लक्षण कहा था । वह सावशेष
( असम्पूर्ण ) था; क्योंकि उससे
ब्रह्मका साक्षात् निर्देश नहीं होता ।
नहीं तो, उसे अपने जिज्ञासु
पुत्रके प्रति 'वह ब्रह्म ऐसा है' इस
प्रकार उसका स्वरूपसे ही निर्देश
करना चाहिये था । किन्तु इस
प्रकार उसने निर्देश किया नहीं है ।
तो किस प्रकार किया है ? उसने
उसे सावशेष ही उपदेश किया है ।
इससे जाना जाता है कि उसके
पिताको अवश्य ही ब्रह्मज्ञानके प्रति
किसी अन्य साधनकी भी अपेक्षा
है । सबसे बड़ा साधन होनेके
कारण भृगुने तपको ही विशेष
रूपसे ग्रहण किया । जिनके साध्य
विषय नियत हैं उन साधनोंमें तप
ही सबसे अधिक सिद्धि प्राप्त कराने-
वाला साधन है—यह बात लोकमें
प्रसिद्ध ही है । इसलिये पिताके
उपदेश न देनेपर भी भृगुने ब्रह्म-
विज्ञानके साधनरूपसे तपको स्वीकार
किया । वह तप बाह्य इन्द्रिय
और अन्तःकरणका समाहित करना
[पाद-टिप्पणी / फुटर]:
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