तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
२१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
प्रतिपत्तेः । “मनसश्चेन्द्रियाणां | ही है; क्योंकि ब्रह्मप्राप्ति उसीके
च ह्येकाग्र्यं परमं तपः। | द्वारा होनेवाली है । “मन और
तज्ज्यायः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः | इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही परम तप
| है । वह सब धर्मोंसे उत्कृष्ट है और
पर उच्यते” (महा० शा० २५०। | वही परम धर्म कहा जाता है”—इस
४) इति स्मृतेः । स च तपस्त- | स्मृतिसे यही बात सिद्ध होती है ।
प्त्वा ॥ १ ॥ | उस भृगुने तप करके—॥ १ ॥
इति भृगुवल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥
द्वितीय अनुवाक
अन्न ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर
भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके
उपदेशसे पुनः तप करना
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् । अन्नाद्ध्येव खल्विमानि
भूतानि जायन्ते । अन्नेन जातानि जीवन्ति । अन्नं
प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितर-
मुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳ होवाच ।
तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत ।
स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
अन्न ब्रह्म है—ऐसा जाना । क्योंकि निश्चय अन्नसे ही ये सब
प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर अन्नसे ही जीवित रहते हैं तथा
प्रयाण करते समय अन्नमें ही लीन होते हैं । ऐसा जानकर वह फिर
अपने पिता वरुणके पास आया [ और कहा— ] ‘भगवन् ! मुझे ब्रह्मका
उपदेश कीजिये ।’ वरुणने उससे कहा—‘ब्रह्मको तपके द्वारा जाननेकी
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अनु० २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१९
इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है।' तब उसने तप किया और उसने तप
करके—॥ १ ॥
[मूल संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) एवं हिन्दी अनुवाद]
संस्कृत भाष्य: अन्नं ब्रह्मेति व्यजानाद्वि- | हिन्दी अनुवाद: अन्न ब्रह्म है—ऐसा जाना । वही
ज्ञातवान् तद्धि यथोक्तलक्षणो- | उपर्युक्त लक्षणसे युक्त है। सो कैसे ?
पेतम् । कथम् ? अन्नाद्ध्येव | क्योंकि निश्चय अन्नसे ही ये सब
खल्विमानि भूतानि जायन्ते; | प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर
अन्नेन जातानि जीवन्ति अन्नं | अन्नसे ही जीवित रहते हैं तथा
प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति तस्मा- | मरणोन्मुख होनेपर अन्नमें ही लीन
द्युक्तमन्नस्य ब्रह्मत्वमित्यभि- | हो जाते हैं। अतः तात्पर्य यह है
प्रायः । स एवं तपस्तप्त्वाऽन्नं | कि अन्नका ब्रह्मरूप होना ठीक ही
ब्रह्मेति विज्ञायान्नलक्षणेनोप- | है। वह इस प्रकार तप करके तथा
पत्त्या च पुनरेव संशयमापन्नो | अन्नके लक्षण और युक्तिके द्वारा 'अन्न
वरुणं पितरमुपससार अधीहि | ही ब्रह्म है' ऐसा जानकर फिर भी
भगवो ब्रह्मेति । | संशयग्रस्त हो पिता वरुणके पास आया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिये' ।
कः पुनः संशयहेतुरस्येत्यु- | परन्तु इसमें उसके संशयका
च्यते-अन्नस्योत्पत्तिदर्शनात् । | कारण क्या था ? सो बतलाया जाता है। अन्नकी उत्पत्ति देखनेसे [ उसे ऐसा सन्देह हुआ ] । यहाँ
तपसः पुनः पुनरुपदेशः साधना- | तपका जो बारम्बार उपदेश किया
तिशयत्वावधारणार्थः । यावद्ब्र- | गया है वह उसका प्रधान साधनत्व प्रदर्शित करनेके लिये है। अर्थात्
ह्मणो लक्षणं निरतिशयं न भवति | जबतक ब्रह्मका लक्षण निरतिशय
यावच्च जिज्ञासा न निवर्तते | न हो जाय और जबतक तेरी जिज्ञासा शान्त न हो तबतक तप
तावत्तप एव ते साधनम् । तप- | ही तेरे लिये साधन है । तात्पर्य यह
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