तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ११] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
[वाम स्तम्भः / Left Column - शाङ्करभाष्यम्]
ध्यायादध्ययनान्मा प्रमादः प्रमादं
मा कार्षीः । आचार्यायाचार्यर्थं
प्रियमिष्टं धनमाहृत्यानीय दत्त्वा
विद्यानिष्क्रयार्थम्, आचार्येण
चानुज्ञातोऽनुरूपान्दारानृत्य
प्रजातन्तुं प्रजासन्तानं मा व्यव-
च्छेत्सीः । प्रजासन्ततेर्विच्छित्तिर्न
कर्तव्या । अनुत्पद्यमानेऽपि पुत्रे
पुत्रकाम्यादिकर्मणा तदुत्पत्तौ
यत्नः कर्तव्य इत्यभिप्रायः ।
प्रजाप्रजनप्रजातित्रयनिर्देश-
सामर्थ्यात् । अन्यथा प्रजनश्चे-
त्येतदेकमेवावक्ष्यत् ।
सत्यान्न प्रमदितव्यं प्रमादो
न कर्तव्यः । सत्याच्च प्रमदनम-
नृतप्रसङ्गः, प्रमादशब्दसामर्थ्यात्।
विस्मृत्याप्यनृतं न वक्तव्य-
मित्यर्थः । अन्यथासत्यवदन-
प्रतिषेध एव स्यात् । धर्मान्न
[दक्षिण स्तम्भः / Right Column - भाष्यार्थः]
अर्थात् अध्ययनसे प्रमाद न कर ।
आचार्यके लिये प्रिय—उनका अभीष्ट
धन लाकर और विद्यादानसे उऋण
होनेके लिये उन्हें देकर आचार्यके
आज्ञा देनेपर अपने अनुरूप स्त्रीसे
विवाह करके प्रजातन्तु—सन्तति-
क्रमका छेदन न कर । अर्थात्
प्रजासन्ततिका विच्छेद नहीं करना
चाहिये । तात्पर्य यह है कि यदि
पुत्र उत्पन्न न हो तो भी पुत्र-काम्या
(पुत्रेष्टि) आदि कर्मोंद्वारा उसकी
उत्पत्तिके लिये यत्न करना ही
चाहिये । [नवम अनुवाकमें ] प्रजा,
प्रजन और प्रजाति—तीनोंहीका
निर्देश किया गया है; उसकी
सामर्थ्यसे यही बात सिद्ध होती है;
अन्यथा वहाँ केवल 'प्रजन' इस
एक ही साधनका निर्देश किया
जाता ।
सत्यसे प्रमाद नहीं करना
चाहिये । सत्यसे प्रमादका अभिप्राय
है असत्यका प्रसंग, यह प्रमादशब्द-
के सामर्थ्यसे बोधित होता है। तात्पर्य
यह है कि कभी भूलकर भी असत्य-
भाषण नहीं करना चाहिये; यदि
ऐसा तात्पर्य न होता तो, यहाँ
केवल असत्यभाषणका निषेध ही
किया जाता । धर्मसे प्रमाद नहीं