तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत भाष्य]
समाधानम्, आत्मेवात्मा ।
आत्मवतो हि युक्तस्य समाधान-
वतोऽङ्गानीव श्रद्धादीनि यथार्थ-
प्रतिपत्चिक्षमाणि भवन्ति ।
तस्मात्समाधानं योग आत्मा
विज्ञानमयस्य । महः पुच्छं प्रतिष्ठा ।
मह इति महत्तत्त्वं प्रथमजम् ।
"महद्यक्षं प्रथमजं वेद" (बृ० उ०
५।४।१) इति श्रुत्यन्तरात् ।
पुच्छं प्रतिष्ठा कारणत्वात् ।
कारणं हि कार्याणां प्रतिष्ठा ।
यथा वृक्षवीरुधां पृथिवी । सर्व-
बुद्धिविज्ञानानां च महत्तत्त्वं
कारणम् । तेन तद्विज्ञानमयस्या-
त्मनः प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको
भवति पूर्ववत् । यथान्नमयादी-
नां ब्राह्मणोक्तानां प्रकाशकाः
श्लोका एवं विज्ञानमयस्यापि ॥१॥
[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]
योग-युक्ति अर्थात् समाधान ही
आत्माके समान उसका आत्मा है ।
युक्त अर्थात् समाधानसम्पन्न
आत्मवान् पुरुषके ही अङ्गादिके
समान श्रद्धा आदि साधन यथार्थ
ज्ञानकी प्राप्तिमें समर्थ होते हैं ।
अतः समाधान यानी योग ही
विज्ञानमय कोशका आत्मा है और
महः उसकी पुच्छ—प्रतिष्ठा है ।
"प्रथम उत्पन्न हुए महान् यक्ष
(पूजनीय) को जानता है" इस
एक अन्य श्रुतिके अनुसार 'महः'
यह महत्तत्त्वका नाम है । वही
[ विज्ञानमयका ] कारण होनेसे
उसकी पुच्छ—प्रतिष्ठा है; क्योंकि
कारण ही कार्यवर्गकी प्रतिष्ठा
(आश्रय) हुआ करता है, जैसे कि
वृक्ष और लता-गुल्मादिकी प्रतिष्ठा
पृथिवी है। महत्तत्त्व ही बुद्धिके सम्पूर्ण
विज्ञानोंका कारण है । इसलिये वह
विज्ञानमय आत्माकी प्रतिष्ठा है ।
पूर्ववत् उसके विषयमें ही यह श्लोक
है अर्थात् जैसे पहले श्लोक ब्राह्मणोक्त
अन्नमय आदिके प्रकाशक हैं उसी
प्रकार यह विज्ञानमयका भी प्रकाशक
श्लोक है ॥ १ ॥
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥
पञ्चम अनुवाक
विज्ञानकी महिमा तथा आनन्दमय कोशका वर्णन
विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेऽपि च ।
विज्ञानं देवाः सर्वे । ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते । विज्ञानं ब्रह्म
चेद्वेद । तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति । शरीरे पाप्मनो हित्वा ।
सर्वान्कामान्समश्नुत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा
यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर
आत्मानन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव ।
तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः ।
मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द
आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥१॥
विज्ञान (विज्ञानवान् पुरुष) यज्ञका विस्तार करता है और वही
कर्मोंका भी विस्तार करता है। सम्पूर्ण देव ज्येष्ठ विज्ञान-ब्रह्मकी उपासना
करते हैं। यदि साधक 'विज्ञान ब्रह्म है' ऐसा जान जाय और फिर
उससे प्रमाद न करे तो अपने शरीरके सारे पापोंको त्यागकर वह समस्त
कामनाओं (भोगों) को पूर्णतया प्राप्त कर लेता है। यह जो विज्ञानमय
है वही उस अपने पूर्ववर्ती मनोमय शरीरका आत्मा है। उस इस
विज्ञानमयसे दूसरा इसका अन्तर्वर्ती आत्मा आनन्दमय है। उस
आनन्दमयके द्वारा यह पूर्ण है। वह यह आनन्दमय भी पुरुषाकार ही
है। उस (विज्ञानमय) की पुरुषाकारताके समान ही यह पुरुषाकार
है। उसका प्रिय ही शिर है, मोद दक्षिण पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष
है, आनन्द आत्मा है और ब्रह्म पुच्छ-प्रतिष्ठा है। उसके विषयमें ही
यह श्लोक है ॥ १ ॥
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri