तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 81, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
व्यानीतराणि सावद्यानि शिष्ट- | निन्दायुक्त कर्म-भले ही वे शिष्ट
कृतान्यपि । यान्यस्माकमाचा- | पुरुषोंके किये हुए हों-तुझे नहीं
र्याणां सुचरितानि शोभनचरि- | करने चाहिये । हम आचार्यलोगोंके
तान्याम्नायाद्यविरुद्धानि तान्येव | भी जो सुचरित-शुभ चरित अर्थात्
त्वयोपास्यान्यहृष्टार्थान्यनुष्ठेया- | शास्त्रसे अविरुद्ध कर्म हैं उन्हींकी
नि, नियमेन कर्तव्यानीति या- | तुझे उपासना करनी चाहिये; अदृष्ट
वत् ॥ २ ॥ नो इतराणि विपरी- | फलके लिये उन्हींका अनुष्ठान करना
तान्याचार्यकृतान्यपि । | चाहिये अर्थात् तेरे लिये वे ही
| नियमसे कर्त्तव्य हैं ॥ २ ॥-दूसरे
ये के च विशेषिता आचार्य- | नहीं, अर्थात् उनसे विपरीत कर्म
त्वादिधर्मैरस्मदस्मत्तः श्रेयांसः | आचार्यके किये हुए भी कर्त्तव्य
प्रशस्यतरास्ते च ब्राह्मणा न | नहीं हैं ।
क्षत्रियादयस्तेषामासनेनासनदा- | जो कोई भी आचार्यत्व आदि धर्मोंके
नादिना त्वया प्रश्वसितव्यम् । | कारण विशिष्ट हैं, अर्थात् हमसे श्रेष्ठ-
प्रश्वसनं प्रश्वासः श्रमापनयः । | बड़े हैं तथा वे ब्राह्मण भी हैं-क्षत्रिय
तेषां श्रमस्त्वयापनेतव्य इत्यर्थः । | आदि नहीं हैं, उनका आसनादिके
तेषां चासने गोष्ठीनिमित्ते समु- | द्वारा अर्थात् उन्हें आसनादि देकर
दिते तेषु न प्रश्वसितव्यं प्रश्वा- | तुझे प्रश्वास-प्रश्वासका अर्थ है
सोऽपि न कर्तव्यः केवलं तदुक्त- | आश्वासन यानी श्रमापहरण करना
सारग्राहिणा भवितव्यम् । | चाहिये । तात्पर्य यह है कि तुझे
| उनका श्रम निवृत्त करना चाहिये ।
| तथा किसी गोष्ठी ( सभा ) के लिये
| उन्हें उच्चासन प्राप्त होनेपर तुझे
| प्रश्वास-दीर्घनिःश्वास भी नहीं
| छोड़ना चाहिये; तुझे केवल उनके
| कथनका सार ग्रहण करनेवाला
| होना चाहिये ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri