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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

मत्तमा मधुमत्यतिशयेन मधुर- | जिह्वा मधुमत्तमा-अतिशय मधुमती
भाषिणीत्यर्थः । कर्णाभ्यां श्रोत्रा- | अर्थात् अत्यन्त मधुरभाषिणी हो । मैं
भ्यां भूरि बहु विश्रुवं व्यश्रवं | कानोंसे भूरि-अधिक मात्रामें श्रवण
श्रोता भूयासमित्यर्थः । आत्म- | करूँ अर्थात् बड़ा श्रोता होऊँ ।
ज्ञानयोग्यः कार्यकारणसंघातो- | इस वाक्यका तात्पर्य यह है कि
ऽस्त्विति वाक्यार्थः । मेधा च | मेरा शरीर और इन्द्रियसंधात आत्म-
तदर्थमेव हि प्रार्थ्यते । | ज्ञानके योग्य हो । तथा उसीके
लिये ही बुद्धिकी याचना की जाती है ।
ब्रह्मणः परमात्मनः कोशो- | परमात्माकी उपलब्धिका स्थान
ऽसि । असेरिवोपलब्ध्यधिष्ठान- | होनेके कारण तू तलवारके कोशके
त्वात् । त्वं हि ब्रह्मणः प्रतीकं | समान ब्रह्म यानी परमात्माका कोश
त्वयि ब्रह्मोपलभ्यते । मेधया | है; क्योंकि तू ब्रह्मका प्रतीक है—
लौकिकप्रज्ञया पिहित आच्छा- | तुझमें ब्रह्मकी उपलब्धि होती है ।
दितः स त्वं सामान्यप्रज्ञैरविदि- | वही तू मेधा अर्थात् लौकिकी बुद्धि-
ततत्त्व इत्यर्थः । श्रुतं श्रवणपूर्व- | से आच्छादित यानी ढका हुआ है;
कमात्मज्ञानादिकं मे गोपाय | अर्थात् सामान्य-बुद्धि पुरुषोंको तेरे
रक्ष । तत्प्राप्त्यविस्मरणादि | तत्त्वका ज्ञान नहीं होता । मेरे
कुर्वित्यर्थः । जपार्था एते मन्त्रा | श्रुत अर्थात् श्रवणपूर्वक आत्म-
ज्ञानादि विज्ञानकी रक्षा कर; अर्थात्
उसकी प्राप्ति एवं अविस्मरण आदि
मेधाकामस्य । | कर । ये मन्त्र मेधाकामी पुरुषके जपके लिये हैं ।
होमार्थास्त्वधुना श्रीकामस्य | अब लक्ष्मीकामी पुरुषको होमके
ओङ्कारतः मन्त्रा उच्यन्ते । | लिये मन्त्र बतलाये जाते हैं—आव-
श्रियः प्रार्थना आवहन्त्यानयन्ती । | हन्ती—लानेवाली; वितन्वाना—
वितन्वाना विस्तारयन्ती । तनो- | विस्तार करनेवाली; क्योंकि 'तनु'

अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७


संस्कृत मूल एवं भाष्यहिन्दी अनुवाद
तैस्तत्कर्मत्वात् । कुर्वाणा निर्वर्त-धातुका अर्थ विस्तार करना ही है;
यन्ती, अचीरमचिरं क्षिप्रमेव,कुर्वाणा—करनेवाली; अचीरम्—
छान्दसो दीर्घः; चिरं वा कुर्वा-अचिर अर्थात् शीघ्र ही; 'अचीरम्' में
णा आत्मनो मम, किमित्याह—दीर्घ ईकार वैदिक प्रक्रियाके अनुसार
वासांसि वस्त्राणि मम गावश्चहै । अथवा चिरं ( चिरकालतक )
गाश्चेति यावत्, अन्नपाने चआत्मनः—मेरे लिये करनेवाली, क्या
सर्वदैवमादीनि कुर्वाणा श्रीर्याकरनेवाली ? सो बतलाते हैं—मेरे वस्त्र,
तां ततो मेधानिर्वर्तनात्परमा-गौ और अन्न-पान इन्हें जो श्री सदा
वहानय । अमेधसो हि श्रीरन-ही करनेवाली है उसे, बुद्धि प्राप्त
र्थायैवेति ।करानेके अनन्तर तू मेरे पास ला; क्योंकि बुद्धिहीनके लिये तो लक्ष्मी अनर्थका ही कारण होती है ।
किंविशिष्टाम् । लोमशामजाव्या-किन विशेषणोंसे युक्त श्रीको
दियुक्तामन्यैश्च पशुभिः संयुक्ता-लावे ? लोमश अर्थात् भेड़-बकरी
मावहेत्यधिकारादोङ्कार एवाभि-आदि ऊनवालोंके सहित और अन्य
संबध्यते । स्वाहा स्वाहाकारोपशुओंसे युक्त श्रीको ला । यहाँ 'आवह' क्रियाका अधिकार होनेके कारण [ उसके कर्ता ] ओंकारसे ही सम्बन्ध
होमार्थमन्त्रान्तज्ञापनार्थः । आ-है । स्वाहा—यह स्वाहाकार होमार्थ मन्त्रोंका अन्त सूचित करनेके लिये
यन्तु मामिति व्यवहितेन सं-है । [ 'आ मायन्तु ब्रह्मचारिणः' इस वाक्यमें ] 'आयन्तु माम्' इस प्रकार
बन्धः । ब्रह्मचारिणो विमायन्तु'आ' का व्यवधानयुक्त 'यन्तु' शब्दसे सम्बन्ध है । [ इसी प्रकार मेरे प्रति ]
प्रमायन्तु दमायन्तु शमायन्वित्-ब्रह्मचारीलोग निष्कपट हों । वे प्रमा-
त्यादि ॥१-२॥को धारण करें, इन्द्रिय-निग्रह करें, मनोनिग्रह करें, इत्यादि ॥ १-२ ॥