तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
२४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
चेतनावान् । अन्नस्यैव वा परा- | चेतनावान् कर्ता हूँ । अथवा परार्थ
र्थस्यान्नादार्थस्य सतोऽनेकात्म- | यानी अन्नादके लिये होनेवाले अन्नका
कस्य परार्थ्येन हेतुना संघात- | जो परार्थ्यरूप हेतुके कारण ही अनेकात्मक है, मैं संघात करनेवाला
कृत् । त्रिरुक्तिर्विस्मयत्वख्याप- | हूँ । मूलमें जो तीन बार कहा गया है
नार्था । | वह विस्मयत्व प्रकट करनेके लिये है ।
अहमस्मि भवामि । प्रथमजाः | मैं इस ऋत—सत्य यानी मूर्त्ता-
प्रथमजः प्रथमोत्पन्न ऋतस्य | मूर्त्तरूप जगत्का 'प्रथमजा'—प्रथम
सत्यस्य मूर्त्तामूर्त्तस्यास्य जगतः । | उत्पन्न होनेवाला (हिरण्यगर्भ) हूँ।
देवेभ्यश्च पूर्वम् । अमृतस्य नाभि- | मैं देवताओंसे पहले होनेवाला और
रमृतत्वस्य नाभिम्र्मध्यं मत्संस्र्थ- | अमृतका नाभि यानी अमरत्वका
मममृतत्वं प्राणिनामित्यर्थः । | मध्य (केन्द्रस्थान) हूँ; अर्थात् प्राणियोंका अमृतत्व मेरेमें स्थित है ।
यः कश्चिन्मा मामन्नमन्नार्थि- | जो कोई अन्नरूप मुझे अन्नार्थियों-
भ्यो ददाति प्रयच्छत्यन्नात्मना | को दान करता है अर्थात् अन्नात्म-
ब्रवीति स इदित्यमेवमविनष्टं | भावसे मेरा वर्णन करता है वह इस प्रकार अविनष्ट और यथार्थ
यथाभूतमावा अवतीत्यर्थः । यः | अन्नस्वरूप मेरी रक्षा करता है।
पुनरन्यो मामदत्त्वार्थिभ्यः काले | किन्तु जो समय उपस्थित होनेपर
प्राप्तेऽन्नमत्ति तमन्नमदन्तं भक्ष- | अन्नार्थियोंको मेरा दान न कर स्वयं ही अन्न भक्षण करता है उस
यन्तं पुरुषमहमन्नमेव संप्रत्यद्मि | अन्न भक्षण करनेवाले पुरुषको मैं
भक्षयामि । | अन्न ही खा जाता हूँ।
अत्राहैवं तर्हि बिभेमि सर्वा- | इसपर कोई वादी कहता है—
यदि ऐसी बात है तब तो मैं
सर्वात्मत्वप्राप्तिरूप मोक्षसे डरता हूँ;
त्मत्वप्राप्तेर्मोक्षादस्तु संसार एव | इससे तो मुझे संसारहीकी प्राप्ति
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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २४७
[वाम भाग / संस्कृत मूल एवं भाष्य]
यतो मुक्तोऽप्यहमन्नभूत आद्यः
स्यामन्नस्य ।
एवं मा भैषीः संव्यवहार-
विषयत्वात्सर्वकामाशनस्य अती-
त्यायं संव्यवहारविषयमन्नान्ना-
दादिलक्षणमविद्याकृतं विद्यया
ब्रह्मत्वमापन्नो विद्वांस्तस्य नैव
द्वितीयं वस्त्वन्तरमस्ति यतो
बिभेत्यतो न भेतव्यं मोक्षात् ।
एवं तर्हि किमिदमाह-अह-
मन्नमहमन्नाद इति ? उच्यते-यो-
ऽयमन्नान्नादादिलक्षणः संव्यव-
हारः कार्यभूतः स संव्यवहार-
मात्रमेव न परमार्थवस्तु । स
एवंभूतोऽपि ब्रह्मनिमित्तो ब्रह्म-
व्यतिरेकेणासन्निति कृत्वा ब्रह्म-
विद्याकार्यस्य ब्रह्मभावस्य स्तुत्य-
र्थमुच्यते । अहमन्नमहमन्नमह-
मन्नम् । अहमन्नादोऽहमन्नादो-
ऽहमन्नाद इत्यादि । अतो भया-
[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद]
हो [ यही अच्छा है ]; क्योंकि
मुक्त होनेपर मैं भी अन्नभूत होकर
अन्नका भक्ष्य होऊँगा ।
सिद्धान्ती—ऐसे मत डरो, क्योंकि
सब प्रकारके भोगोंको भोगना यह
तो व्यावहारिक ही है । विद्वान् तो
ब्रह्मविद्याके द्वारा इस अविद्याकृत
अन्न-अन्नादरूप व्यावहारिक विषय-
का उल्लङ्घन कर ब्रह्मत्वको प्राप्त हो
जाता है । उसके लिये कोई दूसरी
वस्तु ही नहीं रहती, जिससे कि
उसे भय हो । इसलिये तुझे मोक्षसे
नहीं डरना चाहिये ।
यदि ऐसी बात है तो 'मैं अन्न
हूँ, मैं अन्नाद हूँ' ऐसा क्यों कहा
है--ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता
है-यह जो अन्न और अन्नादरूप
कार्यभूत व्यवहार है वह व्यवहार-
मात्र ही है—परमार्थवस्तु नहीं है ।
वह ऐसा होनेपर भी ब्रह्मका कार्य
होनेके कारण ब्रह्मसे पृथक् असत्
ही है—इस आशयको लेकर ही
ब्रह्मविद्याके कार्यभूत ब्रह्मभावकी
स्तुतिके लिये 'मैं अन्न हूँ, मैं अन्न
हूँ, मैं अन्न हूँ; मैं अन्नाद हूँ, मैं
अन्नाद हूँ, मैं अन्नाद हूँ' इत्यादि कहा
जाता है । इस प्रकार अविद्याका
नाश हो जानेके कारण ब्रह्मभूत