तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
ॐ
तत्सद्ब्रह्मणे नमः
तैत्तिरीयोपनिषद्
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
सर्व्वाशाध्वान्तनिर्मुक्तं सर्व्वाशाभास्करं परम्।
चिदाकाशावतंसं तं सद्गुरुं प्रणमाम्यहम्॥
शान्तिपाठ
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा ।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।
नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।
त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि ।
सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु । अवतु
माम्। अवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
शिक्षावल्ली
शिक्षावल्ली
—•1•|००|•1•—
प्रथम अनुवाक
सम्बन्ध-भाष्य
यस्माज्जातं जगत्सर्वं यस्मिन्नेव प्रलीयते ।
येनेदं धार्यते चैव तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥ १ ॥
जिससे सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, जिसमें ही यह लीन होता है
और जिसके द्वारा यह धारण किया जाता है उस ज्ञानस्वरूपको मेरा
नमस्कार है ।
यैरिमे गुरुभिः पूर्वं पदवाक्यप्रमाणतः ।
व्याख्याताः सर्ववेदान्तास्तान्नित्यं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ २ ॥
पूर्वकालमें जिन गुरुजनोंने पद, वाक्य और प्रमाणोंके विवेचनपूर्वक
इन सम्पूर्ण वेदान्तों (उपनिषदों) की व्याख्या की है उन्हें मैं सर्वदा
नमस्कार करता हूँ ।
तैत्तिरीयकसारस्य मयाचार्यप्रसादतः ।
विस्पष्टार्थरुचीनां हि व्याख्येयं संप्रणीयते ॥ ३ ॥
जो स्पष्ट अर्थ जाननेके इच्छुक हैं उन पुरुषोंके लिये मैं श्रीआचार्यकी
कृपासे तैत्तिरीयशाखाके सारभूत इस उपनिषद्की व्याख्या करता हूँ ।
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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५
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नित्यान्यधिगतानि कर्माण्यु- | सञ्चित पापोंका क्षय ही जिनका
उपक्रमः पात्तदुरितक्षयार्था- | मुख्य प्रयोजन है ऐसे नित्यकर्मोंका
नि, काम्यानि च | तथा सकाम पुरुषोंके लिये विहित
फलार्थिनां पूर्वस्मिन्ग्रन्थे । इदानीं | काम्यकर्मोंका इससे पूर्ववर्ती ग्रन्थमें
[ अर्थात् कर्मकाण्डमें ] परिज्ञान हो
कर्मोपादानहेतुपरिहाराय ब्रह्म- | चुका है । अब कर्मानुष्ठानके
कारणकी निवृत्तिके लिये ब्रह्मविद्याका
विद्या प्रस्तूयते । | आरम्भ किया जाता है ।
कर्महेतुः कामः स्यात् । | कामना ही कर्मकी कारण हो
आत्मविदेवाप्त- प्रवर्तकत्वात् । आ- | सकती है; क्योंकि वही उसकी
कामो भवति प्रवर्तक है । जो लोग पूर्णकाम हैं
सकामानां हि कामा- | उनकी कामनाओंका अभाव होनेपर
भावे स्वात्मन्यवस्थानात् प्रवृत्त्य- | स्वरूपमें स्थिति हो जानेसे कर्ममें
प्रवृत्ति होनी असम्भव है । आत्म-
नुपपत्तिः । आत्मकामित्वे चाप्त- | दर्शनकी कामना पूर्ण होनेपर
कामता; आत्मा हि ब्रह्म; | ही पूर्णकामता [ की सिद्धि ] होती
है; क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है और
तद्विदो हि परप्राप्तिं वक्ष्यति । | ब्रह्मवेत्ताको ही परमात्माकी प्राप्ति
अतोऽविद्यानिवृत्तौ स्वात्मन्य- | होती है ऐसा आगे [ श्रुति ]
वस्थानं परप्राप्तिः । “अभयं | बतलायेगी । अतः अविद्याकी निवृत्ति
होनेपर अपने आत्मामें स्थित हो
प्रतिष्ठां विन्दते” ( तै० उ० २ । | जाना ही परमात्माकी प्राप्ति है;
७ । १) “एतमानन्दमयमात्मा- | जैसा कि “अभय पद प्राप्त कर लेता
है” “[ उस समय ] इस आनन्द-
नमुपसंक्रामति” ( तै० उ० २ । | मय आत्माको प्राप्त हो जाता है”
८ । १२) इत्यादिश्रुतेः । | इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है ।
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१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
काम्यप्रतिषिद्धयोरनारम्भा- | पूर्व०—काम्य और निषिद्ध कर्मों-
(मीमांसकमत- दारब्धस्य चोप- | का आरम्भ न करनेसे, प्रारब्ध कर्मों-
समीक्षा) भोगेन क्षयान्नित्या- | का भोगद्वारा क्षय हो जानेसे तथा
| नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे प्रत्यवायका
नुष्ठानेन प्रत्यवायाभावाद्यत्नत | अभाव हो जानेसे अनायास ही
एव स्वात्मन्यवस्थानं मोक्षः । | अपने आत्मामें स्थित होनारूप मोक्ष
| प्राप्त हो जायगा; अथवा 'स्वर्ग'
अथवा निरतिशयायाः प्रीतेः | शब्दवाच्य आत्यन्तिक प्रीति कर्म-
स्वर्गशब्दवाच्यायाः कर्महेतु- | जनित होनेके कारण कर्मसे ही
| मोक्ष हो सकता है—यदि ऐसा माना
त्वात्कर्मभ्य एव मोक्ष इति चेत् । | जाय तो ?
न; कर्मानैकत्वात् । अने- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि कर्म
कानि ह्यारब्धफलान्यनारब्ध- | तो बहुत-से हैं । अनेकों जन्मान्तरोंमें
| किये हुए ऐसे अनेकों विरुद्ध फलवाले
फलानि चानेकजन्मान्तरकृतानि | कर्म हो सकते हैं जिनमेंसे कुछ तो
विरुद्धफलानि कर्माणि सम्भवन्ति। | फलोन्मुख हो गये हैं और कुछ अभी
अतस्तेष्वनारब्धफलानामेकस्मि- | फलोन्मुख नहीं हुए हैं । अतः उनमें
| जो कर्म अभी फलोन्मुख नहीं हुए
ञ्जन्मन्युपभोगक्षयासम्भवाच्छेष- | हैं उनका एक जन्ममें ही क्षय होना
कर्मनिमित्तशरीरारम्भोपपत्तिः । | असम्भव होनेके कारण उन अवशिष्ट
| कर्मोंके कारण दूसरे शरीरका
कर्मशेषसद्भावसिद्धिश्च "तद्य इह | आरम्भ होना सम्भव ही है ।
रमणीयचरणाः" ( छा० उ० | “इस लोकमें जो शुभ कर्म करनेवाले
५।१०।७) “ततः शेषेण” | हैं [ उन्हें शुभयोनि प्राप्त होती है ]”
| “[ उपभोग किये कर्मोंसे ] बचे हुए
(आ०ध० २।२।२।३, गो० | कर्मोंद्वारा [ जीवको आगेका शरीर
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अनु० १] शाङ्करभाष्यार्थ १७
स्मृ० ११) इत्यादिश्रुतिस्मृति- | प्राप्त होता है]" इत्यादि सैकड़ों
शतेभ्यः । | श्रुति-स्मृतियोंसे अवशिष्ट कर्मके
| सद्भावकी सिद्धि होती ही है ।
इष्टानिष्टफलानामनालब्धानां | पूर्व०-इष्ट और अनिष्ट दोनों
| प्रकारके फल देनेवाले सञ्चित कर्मों-
क्षयार्थानि नित्यानीति चेत् ? | का क्षय करनेके लिये ही नित्यकर्म
| हैं-ऐसी बात हो तो ?
न; अकरणे प्रत्यवायश्रव- | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि उन्हें
| न करनेपर प्रत्यवाय होता है-ऐसा
णात् । प्रत्यवायशब्दो ह्यनिष्ट- | सुना गया है। 'प्रत्यवाय' शब्द
| अनिष्टका ही सूचक है। नित्य-
विषयः । नित्याकरणनिमित्तस्य | कर्मोंके न करनेके कारण जो
प्रत्यवायस्य दुःखरूपस्यागामिनः | आगामी दुःखरूप प्रत्यवाय होता है
| उसका नाश करनेके लिये ही
परिहारार्थानि नित्यानीत्यभ्युप- | नित्यकर्म हैं-ऐसा माना जानेके
| कारण वे सञ्चित कर्मोंके क्षयके लिये
गमान्नानारब्धफलकर्मक्षयार्थानि । | नहीं हो सकते।
यदि ना़मानारब्धकर्मक्षया- | और यदि नित्यकर्म, जिनका
| फल अभी आरम्भ नहीं हुआ है उन
र्थानि नित्यानि कर्माणि तथा- | कर्मोंके क्षयके लिये हों भी तो भी
| वे अशुद्ध कर्मका ही क्षय करेंगे,
प्यशुद्धमेव क्षपयेयुर्न शुद्धम् । | शुद्धका नहीं; क्योंकि उनसे तो
विरोधाभावात् । न हीष्टफलस्य | उनका विरोध ही नहीं है। जिनका
| फल इष्ट है उन कर्मोंका तो शुद्ध-
कर्मणः शुद्धरूपत्वान्नित्यैर्विरोध | रूप होनेके कारण नित्यकर्मोंसे
उपपद्यते । शुद्धाशुद्धयोर्हि विरो- | विरोध होना सम्भव ही नहीं है।
| विरोध तो शुद्ध और अशुद्ध कर्मोंका
धो युक्तः । | ही होना उचित है।
तै० उ० ३-४-
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१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
न च कर्महेतूनां कामानां │ इसके सिवा कर्मकी हेतुभूत
ज्ञानाभावे निवृत्त्यसंभवादशेष- │ कामनाओंकी निवृत्ति भी ज्ञानके
│ अभावमें असम्भव होनेके कारण
कर्मक्षयोपपत्तिः । अनात्मविदो │ उन (नित्यकर्मों) के द्वारा सम्पूर्ण
│ कर्मोंका क्षय होना सम्भव नहीं है;
हि कामोऽनात्मफलविषयत्वात् । │ क्योंकि अनात्मफलविषयिणी होनेके
│ कारण कामना अनात्मवेत्ताको ही
स्वात्मनि च कामानुपपत्तिर्नित्य- │ हुआ करती है । आत्मामें तो कामना-
│ का होना सर्वथा असम्भव है; क्योंकि
प्राप्तत्वात् । स्वयं चात्मा परं │ वह नित्यप्राप्त है । और यह तो कहा
│ ही जा चुका है कि स्वयं आत्मा ही
ब्रह्मेत्युक्तम् । │ परब्रह्म है ।
नित्यानां चाकरणमभावस्ततः │ तथा नित्यकर्मोंका न करना तो
│ अभावरूप है, उससे प्रत्यवाय होना
प्रत्यवायानुपपत्तिरिति । अतः │ असम्भव है । अतः नित्यकर्मोंका न
पूर्वोपचितदुरितेभ्यः प्राप्यमाणा- │ करना यह पूर्वसञ्चित पापोंसे प्राप्त
│ होनेवाली प्रत्यवायक्रियाका ही
याः प्रत्यवायक्रियाया नित्याकरणं │ लक्षण है । इसलिये “अकुर्वन्
लक्षणमिति “अकुर्वन्विहितं कर्म” │ विहितं कर्म” इस वाक्यके
│ ‘अकुर्वन्’ पदमें ‘शतृ’ प्रत्ययका
(मनु० ११।४४) इति शतृ- │ होना अनुचित नहीं है । अन्यथा
│ अभावसे भावकी उत्पत्ति सिद्ध होने-
र्नानुपपत्तिः । अन्यथाभावाद्भा- │ के कारण सभी प्रमाणोंसे विरोध हो
वोत्पत्तिरिति सर्वप्रमाणव्याकोप │ जायगा । अतः ऐसा मानना सर्वथा
│ अयुक्त है कि [ कर्मानुष्ठानसे ]
इति । अतोऽयत्नतः स्वात्मन्य- │ अनायास ही आत्मस्वरूपमें स्थिति
वस्थानमित्यनुपपन्नम् । │ हो जाती है ।
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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९
यच्चोक्तं निरतिशयप्रीतेः स्वर्ग-
शब्दवाच्यायाः कर्मनिमित्तत्वा-
त्कर्मारब्ध एव मोक्ष इति, तन्न;
नित्यत्वान्मोक्षस्य । न हि नित्यं
किञ्चिदारभ्यते लोके यदारब्धं
तदनित्यमिति । अतो न कर्मा-
रब्धो मोक्षः ।
विद्यासहितानां कर्मणां नि-
त्यारम्भसामर्थ्यमिति चेत् ?
न; विरोधात् । नित्यं चा-
रभ्यत इति विरुद्धम् ।
यद्विनष्टं तदेव नोत्पद्यत इति ।
प्रध्वंसाभाववन्नित्योऽपि मोक्ष
आरभ्य एवेति चेत् ?
न; मोक्षस्य भावरूपत्वात् ।
प्रध्वंसाभावोऽप्यारभ्यत इति
न संभवति; अभावस्य
विशेषाभावाद्विकल्पमात्रमेतत् ।
और यह जो कहा कि 'स्वर्ग'
शब्दसे कही जानेवाली निरतिशय
प्रीति कर्मनिमित्तक होनेके कारण
मोक्ष कर्मसे ही आरम्भ होनेवाला है;
सो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि
मोक्ष नित्य है और किसी भी नित्य
वस्तुका आरम्भ नहीं किया जाता;
लोकमें जिस वस्तुका भी आरम्भ
होता है वह अनित्य हुआ करती
है; इसलिये मोक्ष कर्मारब्ध नहीं है ।
पूर्व०-ज्ञानसहित कर्मोंमें तो
नित्य मोक्षके आरम्भ करनेकी भी
सामर्थ्य है ही ?
सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि ऐसा
माननेसे विरोध आता है, मोक्ष नित्य
है और उसका आरम्भ किया जाता
है-ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है।
पूर्व०-जो वस्तु नष्ट हो जाती
है वही फिर उत्पन्न नहीं हुआ
करती, अतः प्रध्वंसाभावके समान
नित्य होनेपर भी मोक्षका आरम्भ
किया ही जाता है। ऐसा मानें तो ?
सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि मोक्ष
तो भावरूप है । प्रध्वंसाभाव भी
आरम्भ किया जाता है यह
संभव नहीं; क्योंकि अभावमें
कोई विशेषता न होनेके कारण यह
तो केवल विकल्प ही है। भावका
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२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[Header]
२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[वाम स्तम्भ / Left Column - संस्कृत मूल एवं भाष्य]
भावप्रतियोगी ह्यभावः ।
यथा ह्यभिन्नोऽपि भावो घट-
पटादिभिर्विशेष्यते भिन्न इव
घटभावः पटभाव इति; एवं
निर्विशेषोऽप्यभावः क्रिया-
गुणयोगाद्द्रव्यादिवद्विकल्प्यते ।
न ह्यभाव उत्पलादिवद्विशेषण-
सहभावी । विशेषणवत्त्वे भाव
एव स्यात् ।
विद्याकर्मकर्तृनित्यत्वाद्विद्या-
कर्मसन्तानजनितमोक्षनित्यत्व-
मिति चेत् ?
न; गङ्गास्रोतोवत्कर्तृत्वस्य
दुःखरूपत्वात् । कर्तृत्वोपरमे च
मोक्षविच्छेदात् । तस्मादविद्या-
कामकर्मोपादानहेतुनिवृत्तौ स्वा-
त्मन्यवस्थानं मोक्ष इति । स्वयं
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column - हिन्दी अनुवाद]
प्रतियोगी ही 'अभाव' कहलाता
है । जिस प्रकार भाव वस्तुतः
अभिन्न होनेपर भी घट-पट आदि
विशेषणोंसे भिन्नके समान घटभाव,
पटभाव आदि रूपसे विशेषित किया
जाता है इसी प्रकार अभाव
निर्विशेष होनेपर भी क्रिया और
गुणके योगसे द्रव्यादिके समान
विकल्पित होता है । कमल आदि
पदार्थोंके समान अभाव विशेषणके
सहित रहनेवाला नहीं है । विशेषण-
युक्त होनेपर तो वह भाव ही हो
जायगा ।
पूर्व०-विद्या और कर्म इनका
कर्ता नित्य होनेके कारण विद्या
और कर्मके अविच्छिन्न प्रवाहसे
होनेवाला मोक्ष नित्य ही होना
चाहिये । ऐसा मानें तो ?
सिद्धान्ती-नहीं, गङ्गाप्रवाहके
समान जो कर्तृत्व है वह तो दुःख-
रूप है । [अतः उससे मोक्षकी प्राप्ति
नहीं हो सकती, और यदि उसीसे
मोक्ष माना जाय तो भी ] कर्तृत्वकी
निवृत्ति होनेपर मोक्षका विच्छेद हो
जायगा । अतः अविद्या, कामना
और कर्म-इनके उपादान कारणकी
निवृत्ति होनेपर आत्मस्वरूपमें स्थित
हो जाना ही मोक्ष है-यह सिद्ध
[Footer]
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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
चात्मा ब्रह्म । तद्विज्ञानादविद्या- | होता है । तथा स्वयं आत्मा ही ब्रह्म
| है और उसके ज्ञानसे ही अविद्याकी
निवृत्तिरिति ब्रह्मविद्यार्थोपनिष- | निवृत्ति होती है; अतः अब ब्रह्म-
| ज्ञानके लिये उपनिषद्का आरम्भ
दारभ्यते । | किया जाता है ।
उपनिषदिति विद्योच्यते; | अपना सेवन करनेवाले पुरुषोंके
उपनिषच्छब्द- तच्छीलिनां गर्भज- | गर्भ, जन्म और जरा आदिका निशातन
निरुक्तिः | ( उच्छेद ) करने या उनका अवसादन
न्मजरादिनिशात- | ( नाश ) करनेके कारण 'उपनिषद्'
नात्तदवसादनाद्वा ब्रह्मणो वोप- | शब्दसे विद्या ही कही जाती है ।
| अथवा ब्रह्मके समीप ले जानेवाली
निगमयितृत्वादुपनिषण्णं वास्यां | होनेसे या इसमें परम श्रेय ब्रह्म
| उपस्थित है इसलिये [ यह विद्या 'उप-
परं श्रेय इति । तदर्थत्वाद्- | निषद्' है ] । उस विद्याके ही लिये
ग्रन्थोऽप्युपनिषत् । | होनेके कारण ग्रन्थ भी 'उपनिषद्' है ।
शीक्षावल्लीका शान्तिपाठ
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा ।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो
ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव
प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं
वदिष्यामि । तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् ।
अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥
[ प्राणवृत्ति और दिनका अभिमानी देवता ] मित्र ( सूर्यदेव )
हमारे लिये सुखकर हो । [ अपानवृत्ति और रात्रिका अभिमानी ] वरुण
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२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
हमारे लिये सुखावह हो । [ नेत्र और सूर्यका अभिमानी देवता ] अर्यमा
हमारे लिये सुखप्रद हो । बलका अभिमानी इन्द्र तथा [ वाक् और
बुद्धिका अभिमानी देवता ] बृहस्पति हमारे लिये शान्तिदायक हो ।
तथा जिसका पादविक्षेप ( डग ) बहुत विस्तृत है वह [ पादाभिमानी
देवता ] विष्णु हमारे लिये सुखदायक हो । ब्रह्म [ रूप वायु ] को
नमस्कार है । हे वायो ! तुम्हें नमस्कार है । तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो ।
अतः तुम्हींको मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा । तुम्हींको ऋत ( शास्त्रोक्त निश्चित
अर्थ ) कहूँगा और [ क्योंकि वाक् और शरीरसे सम्पन्न होनेवाले कार्य
भी तुम्हारे ही अधीन हैं इसलिये ] तुम्हींको मैं सत्य कहूँगा । अतः तुम
[ विद्यादानके द्वारा ] मेरी रक्षा करो तथा ब्रह्मका निरूपण करनेवाले
आचार्यकी भी [ उन्हें वक्तृत्व-सामर्थ्य देकर ] रक्षा करो । मेरी रक्षा करो
और वक्ताकी रक्षा करो । आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक
तीनों प्रकारके तापोंकी शान्ति हो ॥ १ ॥
शं सुखं प्राणवृत्तेरहश्चाभि- | प्राणवृत्ति और दिनका अभिमानी
मानी देवतात्मा मित्रो नोऽस्माकं | देवता मित्र हमारे लिये शं सुखरूप
भवतु । तथैवापानवृत्ते रात्रेश्चाभि- | हो । इसी प्रकार अपानवृत्ति और
| रात्रिका अभिमानी देवता वरुण,
मानी देवतात्मा वरुणः । चक्षु- | नेत्र और सूर्यमें अभिमान करनेवाला
ष्यादित्ये चाभिमान्यर्थमा । | अर्यमा, बलमें अभिमान करनेवाला
बल इन्द्रः । वाचि बुद्धौ च | इन्द्र, वाणी और बुद्धिका अभिमानी
| बृहस्पति तथा उरुक्रम अर्थात्
बृहस्पतिः । विष्णुरुरुक्रमो वि- | विस्तीर्ण पादविक्षेपवाला पादाभिमानी
स्तीर्णक्रमः पादयोरभिमानी । | देवता विष्णु-इत्यादि सभी अध्यात्म-
एवमाध्यात्मदेवताः शं नः । | देवता हमारे लिये सुखदायक हों ।
| 'भवतु' ( हों ) इस क्रियाका सभी
भवत्विति सर्वत्रानुषङ्गः । | वाक्योंके साथ सम्बन्ध है ।
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न भविष्यन्तीति तत्सुखकर्तृत्वं | 'शं नो भवतु' आदि मन्त्रद्वारा
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३
तासु हि सुखकृत्सु विद्या- | उनके सुखप्रद होनेपर ही ज्ञान-
श्रवणधारणोपयोगा अप्रतिबन्धे- | के श्रवण, धारण और उपयोग
| निर्विघ्नतासे हो सकेंगे—इसलिये ही
न भविष्यन्तीति तत्सुखकर्तृत्वं | 'शं नो भवतु' आदि मन्त्रद्वारा
| उनकी सुखावहताके लिये प्रार्थना
प्रार्थ्यते शं नो भवत्विति । | की जाती है ।
ब्रह्म विविदिषुणा नमस्कार- | अब ब्रह्मके जिज्ञासुद्वारा ब्रह्म-
| विद्याके विघ्नोंकी शान्तिके लिये
वन्दनक्रिये वायुविषये ब्रह्म- | वायुसम्बन्धी नमस्कार और वन्दन
विद्योपसर्गशान्त्यर्थं क्रियेते । सर्व- | किये जाते हैं । समस्त कर्मोंका
| फल वायुके ही अधीन होनेके
क्रियाफलानां तदधीनत्वाद् | कारण ब्रह्म वायु है । उस
ब्रह्म वायुस्तस्मै ब्रह्मणे नमः । | ब्रह्मको मैं नमस्कार अर्थात् प्रह्वीभाव
| ( विनीतभाव ) करता हूँ । यहाँ
प्रह्वीभावं करोमीति वाक्यशेषः । | 'करोमि' यह क्रिया वाक्यशेष है ।
नमस्ते तुभ्यं हे वायो नमस्क- | हे वायो ! तुम्हें नमस्कार है—मैं
| तुम्हें नमस्कार करता हूँ—इस प्रकार
रोमीति । परोक्षप्रत्यक्षाभ्यां | यहाँ परोक्ष और प्रत्यक्षरूपसे वायु
| ही कहा गया है ।
वायुरेवाभिधीयते । |
किं च त्वमेव चक्षुराद्यपेक्ष्य | इसके सिवा क्योंकि बाह्य चक्षु
| आदिकी अपेक्षा तुम्हीं समीपवर्ती—
बाह्यं संनिकृष्टमव्यवहितं प्रत्यक्षं | अव्यवहित अर्थात् प्रत्यक्ष ब्रह्म हो
| इसलिये तुम्हींको मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म
ब्रह्मासि यस्मात्तस्मात्त्वामेव | कहूँगा । तुम्हींको ऋत अर्थात् शास्त्र
| और अपने कर्त्तव्यानुसार बुद्धिमें
प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं | सम्यक्रूपसे निश्चित किया हुआ
यथाशास्त्रं यथाकर्तव्यं बुद्धौ | अर्थ कहूँगा; क्योंकि वह [ ऋत ]
सुपरिनिश्चितमर्थं तदपि त्वद- |
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२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
धीनत्वात्त्वामेव वदिष्यामि । | तुम्हारे ही अधीन है । वाक् और
सत्यमिति स एव वाक्कायाभ्यां | शरीरसे सम्पादन किया जानेवाला
संपाद्यमानः, सोऽपि त्वदधीन | वह अर्थ ही सत्य कहलाता है, वह
एव संपाद्य इति त्वामेव सत्यं | भी तुम्हारे ही अधीन सम्पादन किया
वदिष्यामि । | जाता है; अतः तुम्हींको मैं सत्य
| कहूँगा ।
तत्सर्वात्मकं वाय्वाख्यं ब्रह्म | वह वायुसंज्ञक सर्वात्मक ब्रह्म
मयैवं स्तुतं सन्मां विद्यार्थिनम- | मेरेद्वारा इस प्रकार स्तुति किये
वतु विद्यासंयोजनेन । तदेव | जानेपर मुझ विद्यार्थीको विद्यासे
ब्रह्म वक्तारमाचार्यं वक्तृत्व- | युक्त करके रक्षा करे । वही ब्रह्म
सामर्थ्यसंयोजनेनावतु । अवतु | वक्ता आचार्यको वक्तृत्वसामर्थ्यसे
मामवतु वक्तारमिति पुनर्वचन- | युक्त करके उसकी रक्षा करे । मेरी
| रक्षा करे और वक्ताकी रक्षा करे-इस
मादरार्थम् । ॐ शान्तिः शान्तिः | प्रकार दो बार कहना आदरके लिये
शान्तिरिति त्रिवचनमाध्यात्म- | है । 'ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः'—
काधिभौतिकाधिदैविकानां विद्या- | ऐसा तीन बार कहना विद्याप्राप्तिके
| आध्यात्मिक, आधिभौतिक और
प्राप्त्युपसर्गाणां प्रशमार्थम् ॥१॥ | आधिदैविक विघ्नोंकी शान्तिके
| लिये है ॥ १ ॥
इति शीक्षावल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥
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द्वितीय अनुवाक
शीक्षाकी व्याख्या
अर्थज्ञानप्रधानत्वादुपनिषदो | उपनिषद् अर्थज्ञानप्रधान है
[ अर्थात् अर्थज्ञान ही इसमें मुख्य
है ], अतः इस ग्रन्थके अध्ययनका
ग्रन्थपाठे यत्नोपरमो मा भूदिति
प्रयत्न शिथिल न हो जाय— इसलिये
पहले शीक्षाध्याय आरम्भ किया
शीक्षाध्याय आरभ्यते— | जाता है—
शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् ।
साम सन्तानः । इत्युक्तः शीक्षाध्यायः ॥ १ ॥
हम शीक्षाकी व्याख्या करते हैं । [ अकारादि ] वर्ण, [ उदात्तादि ]
स्वर, [ ह्रस्वादि ] मात्रा, [ शब्दोच्चारणमें प्राणका प्रयत्नरूप ] बल, [ एक
ही नियमसे उच्चारण करनारूप ] साम तथा सन्तान ( संहिता ) [ ये ही
विषय इस अध्यायसे सीखे जाने योग्य हैं ] । इस प्रकार शीक्षाध्याय
कहा गया ॥ १ ॥
शिक्षा शिक्ष्यतेऽनयेति वर्णा- | जिससे वर्णादिका उच्चारण सीखा
जाय उसे ‘शिक्षा’ कहते हैं अथवा
द्युच्चारणलक्षणम् । शिक्ष्यन्त | जो सीखे जायें वे वर्ण आदि ही
शिक्षा हैं । शिक्षाको ही ‘शीक्षा’
इति वा शिक्षा वर्णादयः ।
कहा गया है । [ शीक्षाशब्दमें
शिक्षैव शीक्षा । दैर्घ्यं छान्दसम् । | ईकारका ] दीर्घत्व वैदिक प्रक्रियाके
अनुसार है । उस शीक्षाकी हम
तां शीक्षां व्याख्यास्यामो विस्प-
व्याख्या करते हैं अर्थात् उसका
ष्टमा समन्तात्कथयिष्यामः । | सर्वतोभावसे स्पष्ट वर्णन करते हैं ।
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२६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[संस्कृत-भाष्यम्]
चक्षिङो वा ख्याञादिष्टस्य
व्याङ्पूर्वस्य व्यक्तवाक्कर्मण एत-
द्रूपम् ।
तत्र वर्णोऽकारादिः, स्वर
उदात्तादिः, मात्रा ह्रस्वाद्याः, बलं
प्रयत्नविशेषः, साम वर्णानां मध्य-
मवृत्त्योच्चारणं समता, सन्तानः
सन्ततिः संहितेत्यर्थः । एष हि
शिक्षितव्योऽर्थः । शिक्षा यस्मिन्न-
ध्याये सोऽयं शीक्षाध्याय इत्येव-
मुक्त उदितः । उक्त इत्युपसं-
हारार्थः ॥ १ ॥
[हिन्दी-अनुवाद]
'व्याख्यास्यामः' यह पद 'वि' और 'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'चक्षिङ्' धातुके स्थानमें वैकल्पिक 'ख्याञ्' आदेश करनेसे निष्पन्न होता है । इसका अर्थ स्पष्ट उच्चारण है ।
तहाँ अकारादि वर्ण, उदात्तादि स्वर, ह्रस्वादि मात्राएँ, [ वर्णोंके उच्चारणमें ] प्रयत्नविशेषरूप बल, वर्णोंको मध्यम वृत्तिसे उच्चारण करनारूप साम अर्थात् समता तथा सन्तान—सन्तति अर्थात् संहिता—यही शिक्षणीय विषय है । शिक्षा जिस अध्यायमें है उस इस शिक्षा-अध्यायका इस प्रकार कथन यानी प्रकाशन कर दिया गया । यहाँ 'उक्तः' पद उपसंहारके लिये है ॥ १ ॥
इति शीक्षावल्ल्यां द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥
तृतीय अनुवाक
पाँच प्रकारकी संहितोपासना
अधुना संहितोपनिषदुच्यते— | अब संहितासम्बन्धिनी उपनिषत्
( उपासना ) कही जाती है—
सह नौ यशः । सह नौ ब्रह्मवर्चसम् । अथातः
सꣳहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः । पञ्चस्वधिकरणेषु ।
अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम् । ता
महासꣳहिता इत्याचक्षते । अथाधिलोकम् । पृथिवी
पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । आकाशः संधिः ॥ १ ॥
वायुः संधानम् । इत्यधिलोकम् । अथाधि-
ज्यौतिषम् । अग्निः पूर्वरूपम् । आदित्य उत्तररूपम् ।
आपः संधिः । वैद्युतः संधानम् । इत्यधिज्यौतिषम् । अथा-
धिविद्यम् । आचार्यः पूर्वरूपम् ॥ २ ॥
अन्तेवास्युत्तररूपम् । विद्या संधिः । प्रवचनꣳ-
संधानम् । इत्यधिविद्यम् । अथाधिप्रजम् । माता पूर्व-
रूपम् । पितोत्तररूपम् । प्रजा संधिः । प्रजननꣳसंधानम् ।
इत्यधिप्रजम् ॥ ३ ॥
अथाध्यात्मम् । अधरा हनुः पूर्वरूपम् । उत्तरा
हनुरुत्तररूपम् । वाक्संधिः । जिह्वा संधानम् । इत्य-
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२८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
२८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
ध्यात्मम् । इतीमा महासꣳहिता य एवमेता महासꣳहिता
व्याख्याता वेद । संधीयते प्रजया पशुभिः । ब्रह्मवर्चसे-
नान्नाद्येन सुवर्गेण लोकेन ॥ ४ ॥
हम [ शिष्य और आचार्य ] दोनोंको साथ-साथ यश प्राप्त हो
और हमें साथ-साथ ब्रह्मतेजकी प्राप्ति हो । [ क्योंकि जिन पुरुषोंकी
बुद्धि शास्त्राध्ययनद्वारा परिमार्जित हो गयी है वे भी परमार्थतत्त्वको समझनेमें
सहसा समर्थ नहीं होते, इसलिये ] अब हम पाँच अधिकरणोंमें
संहिताकी * उपनिषद् [ अर्थात् संहितासम्बन्धिनी उपासना ] की
व्याख्या करेंगे । अधिलोक, अधिज्योतिष, अधिविद्य, अधिप्रज और
अध्यात्म—ये ही पाँच अधिकरण हैं । पण्डितजन उन्हें महासंहिता
कहकर पुकारते हैं । अब अधिलोक ( लोकसम्बन्धी ) दर्शन ( उपासना )
का वर्णन किया जाता है—संहिताका प्रथम वर्ण पृथिवी है, अन्तिम वर्ण
द्युलोक है, मध्यभाग आकाश है ॥ १ ॥ और वायु सन्धान ( उनका
परस्पर सम्बन्ध करनेवाला ) है [ अधिलोक-उपासकको संहितामें इस
प्रकार दृष्टि करनी चाहिये ]—यह अधिलोक दर्शन कहा गया । इसके
अनन्तर अधिज्योतिष दर्शन कहा जाता है—यहाँ संहिताका प्रथम वर्ण
अग्नि है, अन्तिम वर्ण द्युलोक है, मध्यभाग आप ( जल ) है और विद्युत्
सन्धान है [ अधिज्योतिष-उपासकको संहितामें ऐसी दृष्टि करनी
चाहिये ]—यह अधिज्योतिष दर्शन कहा गया । इसके पश्चात् अधिविद्य
दर्शन कहा जाता है—इसकी संहिताका प्रथम वर्ण आचार्य
है ॥ २ ॥ अन्तिम वर्ण शिष्य है, विद्या सन्धि है और प्रवचन ( प्रश्नोत्तर-
रूपसे निरूपण करना ) सन्धान है [—ऐसी अधिविद्य-उपासकको दृष्टि
- 'संहिता' शब्दका अर्थ सन्धि या वर्णोंका सामीप्य है । भिन्न-भिन्न
वर्णोंके मिलनेपर ही शब्द बनते हैं; उनमें जब एक वर्णका दूसरे वर्णसे योग होता
है तो उन पूर्वोत्तर वर्णोंके योगको 'सन्धि' कहते हैं और जिस शब्दोच्चारण-सम्बन्धी
प्रयत्नके योगसे सन्धि होती है उसे 'सन्धान' कहा जाता है ।
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अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
करनी चाहिये ] । यह विद्यासम्बन्धी दर्शन कहा गया । इससे आगे
अधिप्रज दर्शन कहा जाता है—यहाँ संहिताका प्रथम वर्ण माता है,
अन्तिम वर्ण पिता है, प्रजा ( सन्तान ) सन्धि है और प्रजनन ( ऋतु-
कालमें भार्यागमन ) सन्धान है [—अधिप्रज-उपासकको ऐसी दृष्टि करनी
चाहिये ] । यह प्रजासम्बन्धी उपासनाका वर्णन किया गया ॥ ३ ॥
इसके पश्चात् अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—इसमें संहिताका प्रथम
वर्ण नीचेका हनु ( नीचेके होठसे ठोडीतकका भाग ) है, अन्तिम वर्ण
ऊपरका हनु ( ऊपरके होठसे नासिकातकका भाग ) है, वाणी सन्धि है
और जिह्वा सन्धान है [—ऐसी अध्यात्म-उपासकको दृष्टि करनी चाहिये ] ।
यह अध्यात्मदर्शन कहा गया । इस प्रकार ये महासंहिताएँ कहलाती हैं ।
जो पुरुष इस प्रकार व्याख्या की हुई इन महासंहिताओंको जानता है
[ अर्थात् इस प्रकार उपासना करता है ] वह प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज,
अन्न और स्वर्गलोकसे संयुक्त किया जाता है । [ अर्थात् उसे इन सबकी
प्राप्ति होती है ] ॥ ४ ॥
तत्र संहिताद्युपनिषत्परिज्ञा- | उस संहितादि उपनिषद्
[ अर्थात् संहितादिसम्बन्धिनी
ननिमित्तं यद्यशः प्रार्थ्यते तन्ना- | उपासना ] के परिज्ञानके कारण
जिस यशकी याचना की जाती है
वावयोः शिष्याचार्ययोः सहैवा- | वह हम शिष्य और आचार्य दोनोंको
साथ-साथ ही प्राप्त हो । तथा
स्तु । तन्निमित्तं च यद्ब्रह्मवर्चसं | उसके कारण जो ब्रह्मतेज होता है
तेजस्तच्च सहैवास्त्विति शिष्य- | वह भी हम दोनोंको साथ-साथ ही
मिले—इस प्रकार यह कामना शिष्य-
वचनमाशीः । शिष्यस्य ह्यकृतार्थ- | का वाक्य है; क्योंकि अकृतार्थ
होनेके कारण शिष्यके लिये ही
त्वात्प्रार्थनोपपद्यते नाचार्यस्य । | प्रार्थना करना सम्भव भी है—
आचार्यके लिये नहीं; क्योंकि वह
कृतार्थत्वात् । कृतार्थो ह्याचार्यो | कृतार्थ होता है । जो पुरुष कृतार्थ
होता है वही आचार्य कहलाता है ।
नाम भवति । |
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३० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
३० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[वाम स्तम्भ / मूल संस्कृत भाष्य]
अथानन्तरमध्ययनलक्षणवि-
धानस्य, अतो यतोऽत्यर्थं ग्रन्थ-
भाविता बुद्धिर्न शक्यते सहसार्थ-
ज्ञानविषयेऽवतारयितुमित्यतः
संहिताया उपनिषदं संहिताविषयं
दर्शनमित्येतद्ग्रन्थसंनिकृष्टामेव
व्याख्यास्यामः; पञ्चस्वधिकरणे-
ष्वाश्रयेषु ज्ञानविषयेष्वित्यर्थः ।
कानि तानीत्याह—अधिलोकं
लोकेष्वधि यद्दर्शनं तदधिलोकम् ।
तथाधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रज-
मध्यात्ममिति । ता एताः पञ्च-
विषया उपनिषदो लोकादिमहा-
वस्तुविषयत्वात्संहिताविषयत्वाच्च
महत्यश्च ताः संहिताश्च महा-
संहिता इत्याचक्षते कथयन्ति
वेदविदः ।
अथ तासां यथोपन्यस्ताना-
मधिलोकं दर्शनमुच्यते । दर्शन-
[दक्षिण स्तम्भ / हिन्दी अनुवाद]
'अथ' अर्थात् पहले कहे हुए
अध्ययनरूप विधानके अनन्तर,
'अतः'—क्योंकि ग्रन्थके अध्ययनमें
अत्यन्त आसक्त की हुई बुद्धिको
सहसा अर्थज्ञान [ को ग्रहण करने ]
में प्रवृत्त नहीं किया जा सकता,
इसलिये हम ग्रन्थकी समीपवर्तिनी
संहितोपनिषद् अर्थात् संहिता-
सम्बन्धिनी दृष्टिकी पाँच अधिकरण
—आश्रय अर्थात् ज्ञानके विषयोंमें
व्याख्या करेंगे [ तात्पर्य यह कि
वर्णोंके विषयमें पाँच प्रकारके
ज्ञान बतलावेंगे ] ।
वे पाँच अधिकरण कौन-से हैं ?
सो बतलाते हैं—'अधिलोक'—जो
दर्शन लोकविषयक हो उसे अधिलोक
कहते हैं । इसी प्रकार अधिद्यौतिष,
अधिविद्य, अधिप्रज और अध्यात्म
भी समझने चाहिये । ये पञ्चविषय-
सम्बन्धिनी उपनिषदें लोकादि महा-
वस्तुविषयिणी और संहितासम्बन्धिनी
हैं; इसलिये वेदवेत्तालोग इन्हें महती
संहिता अर्थात् 'महासंहिता'
कहकर पुकारते हैं ।
अब ऊपर बतलायी हुई उन (पाँच
प्रकारकी उपासनाओं) मेंसे पहले
अधिलोक-दृष्टि बतलायी जाती है ।
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अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
[संस्कृत-भाष्य]
क्रमविवक्षार्थोऽथशब्दः सर्वत्र ।
पृथिवी पूर्वरूपं पूर्वो वर्णः पूर्व-
रूपम् । संहितायाः पूर्वे वर्णे
पृथिवीदृष्टिः कर्तव्येत्युक्तं भवति ।
तथा द्यौः उत्तररूपमाकाशोऽन्त-
रिक्षलोकः संधिर्मध्यं पूर्वोत्तर-
रूपयोः संधीयेते अस्मिन्पूर्वोत्तर-
रूपे इति । वायुः संधानम् ।
संधीयतेऽनेनेति संधानम् । इत्य-
धिलोकं दर्शनमुक्तम् । अथाधि-
ज्यौतिषमित्यादि समानम् ।
इतीमा इत्युक्ता उपप्रदर्श्यन्ते ।
यः कश्चिदेवमेता महासंहिता
व्याख्याता वेदोपास्ते । वेदेत्यु-
पासनं स्याद्विज्ञानाधिकारात्
“इति प्राचीनयोग्योपास्स्व” इति
च वचनात् । उपासनं च यथा-
[हिन्दी-भाष्यार्थ]
यहाँ दर्शनक्रम बतलाना इष्ट होनेके कारण 'अथ' शब्दकी सर्वत्र अनुवृत्ति करनी चाहिये । पृथिवी पूर्वरूप है । यहाँ पूर्ववर्ण ही पूर्वरूप कहा गया है । इससे यह बतलाया गया है कि संहिता (सन्धि) के प्रथम वर्णमें पृथिवीदृष्टि करनी चाहिये । इसी प्रकार द्युलोक उत्तररूप (अन्तिम वर्ण) है, आकाश अर्थात् अन्तरिक्ष सन्धि—पूर्व और उत्तररूपका मध्य है अर्थात् इसमें ही पूर्व और उत्तररूप एकत्रित किये जाते हैं । वायु सन्धान है । जिससे सन्धि की जाय उसे सन्धान कहते हैं । इस प्रकार अधिलोक दर्शन कहा गया । इसीके समान 'अथाधिज्यौतिषम्' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ भी समझना चाहिये ।
'इति' और 'इमाः' इन शब्दोंसे पूर्वोक्त दर्शनोंका परामर्श किया जाता है । जो कोई इस प्रकार व्याख्या की हुई इस महासंहिताको जानता अर्थात् उपासना करता है—यहाँ उपासनाका प्रकरण होनेके कारण 'वेद' शब्दसे उपासना समझना चाहिये जैसा कि 'इति प्राचीनयोग्योपास्स्व'¹ इस आगे (१ । ६ । २ में) कहे जानेवाले वचनसे सिद्ध होता है ।
१. हे प्राचीनयोग्य शिष्य ! इस प्रकार तू उपासना कर ।
३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
शास्त्रं तुल्यप्रत्ययसन्ततिरसंकीर्णा
चातत्प्रत्ययैः शास्त्रोक्तालम्बन-
विषया च । प्रसिद्धश्चोपासन-
शब्दार्थो लोके गुरुमुपास्ते
राजानमुपास्त इति । यो हि
गुर्वादीन्सन्ततमुपचरति स उपास्त
इत्युच्यते । स च फलमाप्नोत्यु-
पासनस्य । अतोऽत्रापि च य
एवं वेद संधीयते प्रजादिभिः
स्वर्गान्तैः । प्रजादिफलान्याप्नो-
तीत्यर्थः ॥१–४॥
शास्त्रानुसार समान प्रत्ययके प्रवाहका
नाम 'उपासना' है। वह प्रवाह विजा-
तीय प्रत्ययोंसे रहित और शास्त्रोक्त
आलम्बनको आश्रय करनेवाला होना
चाहिये । लोकमें 'गुरुकी उपासना
करता है' 'राजाकी उपासना करता है'
इत्यादि वाक्योंमें 'उपासना' शब्दका
अर्थ प्रसिद्ध ही है । जो पुरुष गुरु
आदिकी निरन्तर परिचर्या करता
है वही 'उपासना करता है' ऐसा
कहा जाता है । वही उस उपासना-
का फल भी प्राप्त करता है । अतः
इस महासंहिताके सम्बन्धमें भी जो
पुरुष इस प्रकार उपासना करता है
वह [ मन्त्रमें बतलाये हुए ] प्रजासे
लेकर स्वर्गपर्यन्त समस्त पदार्थोंसे
सम्पन्न होता है, अर्थात् प्रजादिरूप
फल प्राप्त करता है ॥ १–४ ॥
इति शीक्षावल्ल्यां तृतीयोऽनुवाकः ॥ ३ ॥