तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 29, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३
तासु हि सुखकृत्सु विद्या- | उनके सुखप्रद होनेपर ही ज्ञान-
श्रवणधारणोपयोगा अप्रतिबन्धे- | के श्रवण, धारण और उपयोग
| निर्विघ्नतासे हो सकेंगे—इसलिये ही
न भविष्यन्तीति तत्सुखकर्तृत्वं | 'शं नो भवतु' आदि मन्त्रद्वारा
| उनकी सुखावहताके लिये प्रार्थना
प्रार्थ्यते शं नो भवत्विति । | की जाती है ।
ब्रह्म विविदिषुणा नमस्कार- | अब ब्रह्मके जिज्ञासुद्वारा ब्रह्म-
| विद्याके विघ्नोंकी शान्तिके लिये
वन्दनक्रिये वायुविषये ब्रह्म- | वायुसम्बन्धी नमस्कार और वन्दन
विद्योपसर्गशान्त्यर्थं क्रियेते । सर्व- | किये जाते हैं । समस्त कर्मोंका
| फल वायुके ही अधीन होनेके
क्रियाफलानां तदधीनत्वाद् | कारण ब्रह्म वायु है । उस
ब्रह्म वायुस्तस्मै ब्रह्मणे नमः । | ब्रह्मको मैं नमस्कार अर्थात् प्रह्वीभाव
| ( विनीतभाव ) करता हूँ । यहाँ
प्रह्वीभावं करोमीति वाक्यशेषः । | 'करोमि' यह क्रिया वाक्यशेष है ।
नमस्ते तुभ्यं हे वायो नमस्क- | हे वायो ! तुम्हें नमस्कार है—मैं
| तुम्हें नमस्कार करता हूँ—इस प्रकार
रोमीति । परोक्षप्रत्यक्षाभ्यां | यहाँ परोक्ष और प्रत्यक्षरूपसे वायु
| ही कहा गया है ।
वायुरेवाभिधीयते । |
किं च त्वमेव चक्षुराद्यपेक्ष्य | इसके सिवा क्योंकि बाह्य चक्षु
| आदिकी अपेक्षा तुम्हीं समीपवर्ती—
बाह्यं संनिकृष्टमव्यवहितं प्रत्यक्षं | अव्यवहित अर्थात् प्रत्यक्ष ब्रह्म हो
| इसलिये तुम्हींको मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म
ब्रह्मासि यस्मात्तस्मात्त्वामेव | कहूँगा । तुम्हींको ऋत अर्थात् शास्त्र
| और अपने कर्त्तव्यानुसार बुद्धिमें
प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं | सम्यक्रूपसे निश्चित किया हुआ
यथाशास्त्रं यथाकर्तव्यं बुद्धौ | अर्थ कहूँगा; क्योंकि वह [ ऋत ]
सुपरिनिश्चितमर्थं तदपि त्वद- |
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri