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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 261 में से

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पृष्ठ 38

३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

शास्त्रं तुल्यप्रत्ययसन्ततिरसंकीर्णा
चातत्प्रत्ययैः शास्त्रोक्तालम्बन-
विषया च । प्रसिद्धश्चोपासन-
शब्दार्थो लोके गुरुमुपास्ते
राजानमुपास्त इति । यो हि
गुर्वादीन्सन्ततमुपचरति स उपास्त
इत्युच्यते । स च फलमाप्नोत्यु-
पासनस्य । अतोऽत्रापि च य
एवं वेद संधीयते प्रजादिभिः
स्वर्गान्तैः । प्रजादिफलान्याप्नो-
तीत्यर्थः ॥१–४॥

शास्त्रानुसार समान प्रत्ययके प्रवाहका
नाम 'उपासना' है। वह प्रवाह विजा-
तीय प्रत्ययोंसे रहित और शास्त्रोक्त
आलम्बनको आश्रय करनेवाला होना
चाहिये । लोकमें 'गुरुकी उपासना
करता है' 'राजाकी उपासना करता है'
इत्यादि वाक्योंमें 'उपासना' शब्दका
अर्थ प्रसिद्ध ही है । जो पुरुष गुरु
आदिकी निरन्तर परिचर्या करता
है वही 'उपासना करता है' ऐसा
कहा जाता है । वही उस उपासना-
का फल भी प्राप्त करता है । अतः
इस महासंहिताके सम्बन्धमें भी जो
पुरुष इस प्रकार उपासना करता है
वह [ मन्त्रमें बतलाये हुए ] प्रजासे
लेकर स्वर्गपर्यन्त समस्त पदार्थोंसे
सम्पन्न होता है, अर्थात् प्रजादिरूप
फल प्राप्त करता है ॥ १–४ ॥

इति शीक्षावल्ल्यां तृतीयोऽनुवाकः ॥ ३ ॥