तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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[वाम स्तम्भ / मूल संस्कृत भाष्य]
अथानन्तरमध्ययनलक्षणवि-
धानस्य, अतो यतोऽत्यर्थं ग्रन्थ-
भाविता बुद्धिर्न शक्यते सहसार्थ-
ज्ञानविषयेऽवतारयितुमित्यतः
संहिताया उपनिषदं संहिताविषयं
दर्शनमित्येतद्ग्रन्थसंनिकृष्टामेव
व्याख्यास्यामः; पञ्चस्वधिकरणे-
ष्वाश्रयेषु ज्ञानविषयेष्वित्यर्थः ।
कानि तानीत्याह—अधिलोकं
लोकेष्वधि यद्दर्शनं तदधिलोकम् ।
तथाधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रज-
मध्यात्ममिति । ता एताः पञ्च-
विषया उपनिषदो लोकादिमहा-
वस्तुविषयत्वात्संहिताविषयत्वाच्च
महत्यश्च ताः संहिताश्च महा-
संहिता इत्याचक्षते कथयन्ति
वेदविदः ।
अथ तासां यथोपन्यस्ताना-
मधिलोकं दर्शनमुच्यते । दर्शन-
[दक्षिण स्तम्भ / हिन्दी अनुवाद]
'अथ' अर्थात् पहले कहे हुए
अध्ययनरूप विधानके अनन्तर,
'अतः'—क्योंकि ग्रन्थके अध्ययनमें
अत्यन्त आसक्त की हुई बुद्धिको
सहसा अर्थज्ञान [ को ग्रहण करने ]
में प्रवृत्त नहीं किया जा सकता,
इसलिये हम ग्रन्थकी समीपवर्तिनी
संहितोपनिषद् अर्थात् संहिता-
सम्बन्धिनी दृष्टिकी पाँच अधिकरण
—आश्रय अर्थात् ज्ञानके विषयोंमें
व्याख्या करेंगे [ तात्पर्य यह कि
वर्णोंके विषयमें पाँच प्रकारके
ज्ञान बतलावेंगे ] ।
वे पाँच अधिकरण कौन-से हैं ?
सो बतलाते हैं—'अधिलोक'—जो
दर्शन लोकविषयक हो उसे अधिलोक
कहते हैं । इसी प्रकार अधिद्यौतिष,
अधिविद्य, अधिप्रज और अध्यात्म
भी समझने चाहिये । ये पञ्चविषय-
सम्बन्धिनी उपनिषदें लोकादि महा-
वस्तुविषयिणी और संहितासम्बन्धिनी
हैं; इसलिये वेदवेत्तालोग इन्हें महती
संहिता अर्थात् 'महासंहिता'
कहकर पुकारते हैं ।
अब ऊपर बतलायी हुई उन (पाँच
प्रकारकी उपासनाओं) मेंसे पहले
अधिलोक-दृष्टि बतलायी जाती है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri