गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
कण्डिका ७ ॥ प्राण ही ऋतुयाज हैं, ऋतुयाजों में अनुवषट् न करे ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ७ ३७१
सर्वमायुरेत्यस्मिंल्लोक आध्नोत्याप्नोत्यमृतत्वमक्षितं स्वर्गे लोके । ते वा एते प्राणा
एव, यदृतुयाजाः । तस्मादनवानं ततो यजन्ति प्राणानां सन्तत्यै । सन्तता इव हीमे
प्राणाः । अथो ऋतवो वा ऋतुयाजाः । सथ्स्थानुवषट्कारः । योऽत्रानुवषट्
कुर्य्यात्, असथ्स्थितानृतून् संस्थापयेत् । यस्तं तत्र ब्रूय त्, असथ्स्थितानृतून् सम-
तिष्ठिपत्१ दुःखमनुभविष्यतीति, शश्वत्तथा स्यात् ॥ ७ ॥
कण्डिका ७ ॥ प्राण ही ऋतुयाज हैं, ऋतुयाजों में अनुवषट् न करे ॥
( प्राणाः वै ऋतुयाजाः ) प्राण ही ऋतुयाज [ ऋतुओं के लिये यज्ञ ] हैं ।
( यत् यत् ऋतुयाजैः चरन्ति, प्राणान् एव तत् यजमाने दधति ) इसलिये जो
ऋतुयाजों से वे यज्ञ करते हैं, प्राणों [ प्राण, अपान, व्यान ] को ही उससे यजमान
में धारण करते हैं । ( षट् ऋतुना इति यजन्ति, प्राणम् एव तत् यजमाने दधति )
छह [ ऋत्विज् लोग ]—ऋतु के साथ [ ऋतुना—इन मन्त्रों के लिये देखो यजु० २१ ।
२३-२८ ] इससे वे यज्ञ करते हैं, प्राण [ भीतर जाने वाले वायु ] को ही उससे यजमान
में धारण करते हैं । ( चत्वारः ऋतुभिः यजन्ति, अपानम् एव तत् यजमाने दधति )
चार [ ऋत्विज् ]—ऋतुओं से [ ऋतुभिः—इसके लिये देखो यजु० १४ । ७ ]—वे यज्ञ
करते हैं, अपान [ बाहर जाने वाले वायु ] को ही उससे यजमान में धारण करते हैं ।
( द्विः ऋतुना इति उपरिष्टात्, व्यानम् एव तत् यजमाने दधति ) दो [ ऋत्विज् ]—
ऋतु से [ ऋतुना-ऊपर देखो ]—इससे पीछे से [ यज्ञ करते हैं ], व्यान [ शरीर में फैले हुये
वायु ] को ही उससे यजमान में वे धारण करते हैं । ( सः च सम्भृतः असुः त्रेधा
विहृतः, प्राणः अपानः व्यानः इति ) और वह अच्छे प्रकार पुष्ट किया हुआ प्राण तीन
प्रकार से विहार वाला है—प्राण, अपान और व्यान । ( ततःअन्यत्र गुणितः तथा आह )
इस [ ग्रन्थ ] से दूसरे [ ऐतरेय आदि ] में यह कहा गया है—ऐसा वह [ ब्रह्मवादी ]
कहता है । ( यजमानः सर्वम् आयुः एति, अस्मिन् लोके स्वर्गे लोके आध्नोति,
अक्षितम् अमृतत्वम् आप्नोति ) यजमान [ उससे ] पूर्ण आयु पाता है और इस लोक में
स्वर्ग लोक के बीच समृद्ध होता है, और अक्षय अमरपन पाता है । ( ते वै एते प्राणाः एव,
यत् ऋतुयाजाः ) वे ही यह प्राण हैं, जो ऋतुयाज हैं । ( तस्मात् अनवानं ततः
प्राणानां सन्तत्यै यजन्ति ) इसलिये श्वास न लंकर उसके पीछे प्राणों की निरन्तरता के
लिये वे यज्ञ करते हैं । ( सन्तताः इव हि इमे प्राणाः ) क्योंकि लगातार फैले हुये ही
यह प्राण हैं । ( अथो ऋतवः वै ऋतुयाजाः ) फिर ऋतुयें ही ऋतुयाज हैं । ( अनुवषट्-
कारः संस्था ) अनुवषट्कार [ पीछे से बोला गया वषट् ] समाप्ति है । ( यः अत्र
७-( चरन्ति ) अनुतिष्ठन्ति ( दधति ) स्थापयन्ति ( षट् ) षट्संख्याकाः
ऋत्विजः ( द्विः ) द्वौ ( उपरिष्टात् ) पश्चात् ( असुः ) प्राणः ( सम्भृतः ) सम्यक्
पोषितः ( विहृतः ) विविधं प्राप्तः ( अनवानम् ) नञ् + अव+अन प्राणने—
घञ् । द्वितीयान्तं यथा भवति तथा । उच्छ्वासमकृत्वा ( सन्तत्यै ) अविच्छेदाय ।
१. पू० सं० 'यः' इत्यधिकः पाठः ॥ सम्पा० ॥
३७२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ७
अनुवषट् कुर्यात्, असंस्थितान् ऋतून् संस्थापयेत् ) जो यहां [ ऋतुयाज में ] अनुवषट्
करे, बिना समाप्त हुये ऋतुओं को वह रोक देवे । ( यः तं तत्र ब्रूयात्, असंस्थितान्
ऋतून् समतिष्ठिपत् दुःखम् अनुभविष्यति इति ) जो उस [ अनुवषट्कार ] को वहां
बोले और बिना पूरे हुये ऋतुओं को रोक देवे, वह दुःख ही पावेगा । ( शश्वत् तथा
स्यात् ) [ इसलिये यह नियम ] सदा वैसा [ अनुवषट् बिना ] होवे ॥ ७ ॥
भावार्थः-मनुष्य प्राण, अपान और व्यान की गतियों से बल और पराक्रम बढ़ाकर
सब ऋतुओं को उपयोगी बनावें ॥ ७ ॥
विशेषः १-इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० २ । २६ से मिलाओ ॥
विशेषः २-( षडतुना ) के स्थान पर ( षडृतुना ) और ( समतिष्ठिठ ) के
स्थान पर ( समतिष्ठि१पत् ) पद ऐ० ब्रा० २ । २६ । में है, पहिला पद शुद्ध कर
दिया है ॥
विशेषः ३-प्रतीक वाले मन्त्रों में से एक एक अर्थ सहित लिखा जाता है-
१-वसन्तेन ऋतुना देवा वसवस्त्रिवृता स्तुताः । रथन्तरेण तेजसा
हविरिन्द्रे वयो दधुः-यजु० २१ । २३ ॥ ( त्रिवृता ) तीनों काल में वर्तमान
( वसन्तेन ऋतुना ) वसन्त ऋतु के साथ ( स्तुताः ) स्तुति किये गये ( देवाः )
दिव्य गुण वाले ( वसवः ) पृथिवी आदि आठ वसु वा प्रथम कक्षा वाले विद्वान् लोग
( रथन्तरेण ) रथ से तरने वाले ( तेजसा ) तीक्ष्ण स्वरूप से ( इन्द्रे ) सूर्य के प्रकाश
में ( हविः ) देने योग्य ( वयः ) आयु बढ़ाने हारे वस्तु को ( दधुः ) धारण करें ॥
२-सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्देवैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा-
नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा ।
सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्वसुभिः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा-
नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा ।
सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजू रुद्रैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा-
नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा ।
सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्रादित्यैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा-
नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा ।
सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्विश्वैर्देवैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा-
नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा-यजु० १४ । ७ ॥
[ हे स्त्री वा पुरुष ! ] ( ऋतुभिः ) वसन्त आदि ऋतुओं के साथ ( सजूः ) एक सी
प्रीति वा सेवा वाला, ( विधाभिः ) विविध प्रकार धारण करने वाले जलों के साथ
( सन्तताः ) अविच्छिन्नाः । निरन्तराः ( संस्था ) समाप्तिः ( असंस्थितान् )
असमाप्तान् ( संस्थापयेत् ) उपरमयेत् ( शश्वत् ) सदा । अवश्यम् ॥
१. जर्मन सं. में भी यही पाठ है अतः हमने कण्डिका में ऐसा ही रख दिया है ॥ सम्पा० ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ७ १७३
सजूः ) एक सी प्रीति वाला, ( देवैः ) अच्छे गुणों के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला
, देवैः ) दिव्य सुख देने वाले ( वयोधायैः ) जीवन आदि वा गायत्री छन्दों से सम्बन्ध
वाले प्राणों के साथ ( सजूः ) एकसी प्रीति वाला [ तू हो ], ( वैश्वानराय ) सम्पूर्ण
पदार्थों को प्राप्त कराने वाली ( अग्नये ) अग्नि विद्या के लिए ( त्वा त्वा ) तुझको तुझ
को ( अध्वर्यू ) हिंसा रहित गृहाश्रम आदि यज्ञ के चाहने वाले ( अश्विना ) सब विद्याओं
में व्यापक अध्यापक और उपदेशक दोनों (इह) यहां जगत् में (सादयताम्) स्थापित करें ।
[ हे स्त्री वा पुरुष ! ] ( ऋतुभिः ) वसन्त आदि ऋतुओं के साथ ( सजूः ) एक सी
प्रीति वा सेवा वाला (विधाभिः ) विविध वस्तुओं को धारण कराने वाली प्राणों की
चेष्टाओं के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला, (वसुभिः) अग्नि आदि आठ वसुओं के
साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला; (देवैः ) विजय चाहने वाले (वयोधायैः ) विज्ञानों
से सम्बन्ध युक्त विद्वानों के साथ (सजूः ) एक सी प्रीति वाला [ तू हो ], (वैश्वानराय )
सब जगत् के चलाने वाले (अग्नये ) विज्ञान के लिए (त्वा त्वा ) तुझको तुझको
( अध्वर्यू ) हिंसारहित गृहाश्रम आदि यज्ञ के चाहने वाले (अश्विना ) सब विद्याओं में
व्यापक अध्यापक और उपदेशक दोनों ( इह ) यहां [जगत् में] (सादयताम्) स्थापित करें ।
[ हे स्त्री वा पुरुष ! ] ( ऋतुभिः ) वसन्त आदि ऋतुओं के साथ ( सजूः ) एक सी
प्रीति वा सेवा वाला ( विधाभिः ) विविध वस्तुओं को धारण कराने वाली प्राणों की
चेष्टाओं के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला, (रुद्रैः) [ प्राण, अपान, व्यान, उदान,
समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और जीव, इन ग्यारह ] रुद्रों के साथ ( सजूः )
एक सी प्रीति वाला, ( देवैः ) व्यापार कुशल ( वयोधायैः ) वेद आदि शास्त्रों को जताने
के प्रबन्ध करने वालों के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला [ तू हो ], ( वैश्वानराय )
सब नरों के सुखसाधक ( अग्नये ) सब शास्त्रों के विज्ञान के लिये ( त्वा त्वा ) तुझको
तुझको ( अध्वर्यू ) हिंसारहित गृहाश्रम आदि यज्ञ के चाहने वाले ( अश्विना ) सब
विद्याओं में व्यापक अध्यापक और उपदेशक दोनों ( इह ) यहां [ जगत् में ] ( सादय-
ताम् ) स्थापित करें ।
[ हे स्त्री वा पुरुष ! ] ( ऋतुभिः ) वसन्त आदि ऋतुओं के साथ ( सजूः ) एक सी
प्रीति वा सेवा वाला ( विधाभिः ) विविध प्रकार सत्य धारण कराने वाली क्रियाओं के
साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला, (आदित्यैः) वर्ष के बारह महीनों के साथ ( सजूः )
एक सी प्रीति वाला, ( देवैः ) तेजस्वी ( वयोधायैः ) पूर्ण विद्या के विज्ञान और
प्रचार के प्रबन्ध करने वालों के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला [ तू हो ] ( वैश्वा-
नराय ) सब नरों के पूर्ण सुख साधने वाले (अग्नये ) पूर्ण विज्ञान के लिये ( त्वा त्वा )
तुझको तुझको ( अध्वर्यू ) हिंसारहित गृहाश्रम आदि यज्ञ के चाहने वाले ( अश्विना )
सब विद्याओं में व्यापक अध्यापक और उपदेशक दोनों ( इह ) यहां [ जगत् में ] ( साद-
यताम् ) स्थापित करें ।
[ हे स्त्री वा पुरुष ! ] ( ऋतुभिः ) क्षण आदि सब काल अवयवों के साथ ( सजूः )
एक सी प्रीति वा सेवा वाला ( विधाभिः ) सब सुखों में व्यापक क्रियाओं के साथ ( सजूः )