चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] शरीरस्थानम् ७७
अ० ५ ] शरीरस्थानम् ७७
ज्योति शुद्ध, स्थिर और प्रसन्न होकर जलती है, उसी प्रकार इन्द्रियों से असक्त
आत्मा में नियमित सत्त्व शुद्ध स्थिर होकर प्रकाशित होता है ॥११-१३॥
शुद्धसत्त्वस्य या शुद्धा सत्या बुद्धिः प्रवर्त्तते ।
यया भिनत्त्यतिबलं महामोहमयं तमः ॥ १४॥
सर्वभावस्वभावज्ञो यया भवति निस्पृहः ।
योगं यया साधयते सांख्यः संपद्यते यया ॥ १५॥
यया नोपैत्यहङ्कारं नोपास्ते कारणं यया ।
यया नालम्बते किञ्चित्सर्वं संन्यस्यते यया ॥ १६॥
याति ब्रह्म यया नित्यमजरः शान्तमक्षरम् १ ।
विद्या सिद्धिर्मतिर्मेधा प्रज्ञा ज्ञानं च सा मता ॥ १७॥
शुद्ध सत्त्व से जो निर्मल सत्य बुद्धि उत्पन्न होती है, जिस बुद्धि के द्वारा
अति बलवान् महा मोहयुक्त अन्धकार का नाश करता है, जिसके द्वारा सब
पदार्थों के स्वभाव को जानता है, जिसके द्वारा वह निःस्पृह बनता है, जिसके
द्वारा विषयों से हटे मन को आत्मा में लगाकर 'योग' करता है और जिस बुद्धि
के द्वारा वह तत्त्वज्ञानी बनता है । जिसके द्वारा वह अहङ्कार के वश नहीं होता,
जिसके द्वारा सुख दुःख के कारणों का सेवन नहीं करता, जिसके द्वारा कहीं भी
आश्रय-स्थान नहीं बनाता, जिसके कारण सब कुछ त्याग करता है, जिसके
द्वारा नित्य, अजर, शान्त, अव्यय ब्रह्म-मोक्ष को प्राप्त करता है, उसी बुद्धि को
विद्या, सिद्धि, मति, मेधा अर्थात् प्रज्ञा और ज्ञान नाम से कहते हैं ॥१४-१७॥
लोके विततमात्मानं लोकं चाऽऽत्मनि पश्यतः ।
परावरदृशः शान्तिर्ज्ञानमूला न नश्यति ॥ १८॥
लोक में अपने आत्मा को, तथा अपने आत्मा में लोक को देखनेवाले, तथा
परमात्मा और अवर प्रकृति (प्रधान प्रकृति) आदि को देखनेवाले पुरुष में
ज्ञान के द्वारा उत्पन्न हुई शान्ति कभी नष्ट नहीं होती ॥१८॥
पश्यतः सर्वभावान् हि २ सर्वावस्थासु सर्वदा ।
ब्रह्मभूतस्य संयोगो न शुद्धस्योपपद्यते ॥ १९॥
सब अवस्थाओं में, सब भावों पदार्थों को देखते हुए इनमें राग और द्वेष
न करने से समबुद्धि रहने के कारण ब्रह्म रूप हुए शुद्ध सत्त्व के साथ [धर्म और
अधर्म का] संयोग नहीं होता ॥१९॥
१. शान्तमव्ययम् इति च पाठ ।
२ 'सर्व भूतानि' इति च पाठः ।
७८ चरकसंहिता [ अ० ६
नाऽऽत्मनः कारणाभावाल्लिङ्गमप्युपलभ्यते ।
स सर्वकारणत्यागान्मुक्त इत्यभिधीयते ॥ २० ॥
मुक्त पुरुष के इन्द्रिय आदि करण न होने से मुक्त पुरुष का कोई लक्षण
नहीं मिलता । इस मुक्तात्मा पुरुष के साथ मन, इन्द्रिय आदि करणों का योग
नहीं होता, इसीलिये उसको 'मुक्त' कहते हैं ॥२०॥
विपापं विरजः शान्तं परमक्षरमव्ययम् ।
अमृतं ब्रह्म निर्वाणं पर्यायैः शान्तिरुच्यते ॥ २१ ॥
एतत्तत्सौम्य ! विज्ञानं यज्ज्ञात्वा मुक्तसंशयाः ।
मुनयः प्रशमं जग्मुर्वीत-मोह-रजः-स्पृहाः ॥ २२ ॥
विपाप ( पापरहित ), विरज ( रजोगुण से रहित ), शान्त, पर, अक्षर,
अव्यय, अमृत, ब्रह्म, निर्वाण, शान्ति इत्यादि पर्यायों से मोक्ष को कहते हैं ।
हे सौम्य ! जिस विज्ञान को जान कर संशय, मोह, रज और स्पृहा से रहित
होकर मुनि लोगों ने शान्ति प्राप्त की है वह यही विज्ञान है ॥ २२ ॥
तत्र श्लोकौ-सप्रयोजनमुद्दिष्टं लोकस्य पुरुषस्य च ।
सामान्यं मूलमुत्पत्तौ निवृत्तौ मार्ग एव च ॥ २३ ॥
शुद्धसत्त्वसमाधानं सत्या बुद्धिश्च नैष्ठिकी ।
विचये पुरुषस्योक्ता निष्ठा च परमर्षिणा ॥ २४ ॥
लोक और पुरुष की समानता, इस समानता का प्रयोजन, उत्पत्ति का
कारण, निवृत्ति का मार्ग, शुद्ध सत्त्व का रूप, मोक्षसाधक सत्यबुद्धि और मोक्ष
का रूप, यह सब परमऋषि आत्रेय ने इस 'पुरुष विचय' अध्याय में कह
दिया है ॥ २३-२४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने पुरुष-
विचयशारीरं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः ।
अथातः शरीरविचय शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'शरीर-विचय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
अ० ६ ] शारीरस्थानम् ७६
शरीरविचयः शरीरोपकारार्थमिष्यते भिषग्विद्यया, ज्ञात्वा हि
शरीरतत्त्वं शरीरोपकारकरेषु भावेषु ज्ञानमुत्पद्यते । तस्माच्छरीरवि-
चयं प्रशंसन्ति कुशलाः ॥ ३ ॥
शरीर का विचय अर्थात् रचनाविज्ञान (प्रविभाग रूप से ज्ञान) शरीर के
उपकार के लिये आवश्यक है । शरीर का यथार्थ तत्त्व जान कर ही शरीर के
लिये उपयोगी पदार्थों में ज्ञान उत्पन्न होता है। इसलिये बुद्धिमान् शरीर के
रचनाविज्ञान को श्रेष्ठ बतलाते हैं ॥ ३ ॥
तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पञ्चभूतविकारसमुदायात्मकं
समयोगवाहि । यदा ह्यस्मिन् शरीरे धातवो वैषम्यमापद्यन्ते तदा
क्लेशं विनाशं वा प्राप्नोति । वैषम्यगमनं हि पुनर्धातूनां वृद्धि ह्रास-
गमनमकार्त्स्न्येन प्रकृत्या च ॥ ४ ॥
इसमें शरीर शब्द से अभिप्राय आत्मा (चेतना) के आश्रय स्थान, पञ्च
महाभूतों के विकारों का समुदाय तथा धातुओं के उचित प्रमाण में (समयोग
में) मेल को धारण करने वाला शरीर है । जिस समय इस शरीर के भीतर रस,
रक्त आदि धातु विषम हो जाते हैं, उस समय शरीर में क्लेश होता है, अथवा
शरीर विनष्ट हो जाता है। धातुओं में सम्पूर्ण रूप में अथवा एकांश में वृद्धि
और ह्रास होना 'धातुओं का विषम होना' कहाता है ॥ ४ ॥
यौगपद्येन तु विरोधिनां धातूनां वृद्धिह्रासौ भवतः । यद्धि यस्य
धातोर्वृद्धिकरं तत्ततो विपरीतगुणस्य धातोः प्रत्यवायकरं संपद्यते ॥५॥
उपयुक्त भैषज्य से परस्पर विरोधी धातुओं की वृद्धि और ह्रास एक साथ
होता है। जो औषध जिस धातु की वृद्धि करने वाली है वह औषध उस धातु
से विपरीत गुणवाली धातु में ह्रास करती है। [जैसे-दूध, कफ और शुक्र
आदि की वृद्धि करता है साथ ही अपने से विरोधि गुणवाले पित्त और रक्त
का ह्रास भी करता है। कहीं २ सजातीय होकर गुण विपरीत होने से धातु का
ह्रास करता है जैसे-गोमूत्र द्रव होकर भी कटु उष्ण है वैसे कफ-
नाशक भी है ] ॥ ५ ॥
तदेवं तस्माद्भेषजं सम्यगवचार्यमाणं युगपन्न्यूनातिरिक्तानां धातूनां
साम्यकरं भवति । अधिकमपकर्षति, न्यूनमाप्याययति ॥ ६ ॥
इसलिये भली प्रकार से प्रयोग की हुई औषध एक समय में ही न्यून तथा
बढ़ी हुई धातुओं को समान करती है और बढ़ी हुई धातु को कम करती है और
कम हुए धातु को बढ़ाती है ॥ ६ ॥
८० चरकसंहिता [अ० ६
एतावदेव हि भेषज्यप्रयोगे फलमिष्टं स्वस्थवृत्तानुष्ठाने च यावद्धा-
तूनां साम्यं स्यात् । स्वस्था ह्यपि धातूनां साम्यानुग्रहार्थमेव कुशला
रसगुणानाहारविकारांश्च पर्यायेणेच्छन्त्युपयोक्तुं, सात्म्यसमाज्ञातानेक-
प्रकारभूयिष्ठांश्चोपयुञ्जानास्तद्विपरीतकरसमाज्ञातया चेष्टया सममिच्छ-
न्ति कर्तुम् ॥ ७॥
औषध प्रयोग तथा स्वस्थ-वृत्त के पालने का यही फल है कि धातुओं की
समानता रहे। बुद्धिमान् पुरुष स्वस्थ अवस्था में भी धातुओं मे समता रखने
के लिये मधुरादि रस, गुरु आदि गुणों को तथा यवागू आदि आहार के विकारों
का क्रम से उपयोग करते हैं। अर्थात् मधुर रस खाने से उत्पन्न हुए कफ की
वृद्धि को शान्त करने के लिये कटु रस आदि का उपयोग करते हैं। गुरु आदि
गुण के पदार्थों के सेवन के पीछे लघु गुण वाले पदार्थों का उपयोग, यवागू
( लप्सी ), आदि खा कर इसके पाक के लिये पेया आदि का उपयोग करते हैं,
यह क्रम है। सात्म्य ( अनुकूल ) रूप से जाने गये अनेक प्रकार के वा बहुत
से पदार्थों का उपयोग करते हुए उससे विपरीत गुण करनेवाली चेष्टा से पुनः
समान करने की इच्छा करते है । [ जमे—मधुर प्रकार के आहार को खाने से
मधुर के समान कफकी वृद्धि होने से कफ का क्षय करनेवाली विपरीत व्यायाम
क्रिया करते हैं। इससे समानता आ जाती है ] ॥ ७ ॥
देश-कालात्म-गुण-विपरीतानां हि कर्मणामाहारविकाराणा च
क्रियोपयोगः सम्यक् सर्वांतियोगसधारणमुदीर्णानां च गतिमतां साहसाना
च वर्जनं स्वस्थवृत्तमेतावद्धातूना साम्यानुग्रहार्थमुपदिश्यते ॥ ८ ॥
संक्षेप में स्वस्थवृत्त—देश विपरीत कर्म ( मरु देश में सोना ), काल विप-
रीत कर्म ( वसन्त में व्यायाम ), आत्म विपरीत कर्मों ( स्थूल शरीर मे व्यायाम,
जागरण आदि ) तथा आहार-विकारों की क्रियाओं का ठीक प्रकार से उपयोग,
काल, बुद्धि और इन्द्रियों के अर्थों के मिथ्यायोग ( अतियोग, मिथ्यायोग तथा
अयोग ) का परित्याग, गतिशील मल ( पाखाना ), आदि के उपस्थित बेगों
को न रोकना, साहसिक कर्मों का परित्याग करना यह स्वस्थवृत्त है। यह स्वस्थ-
वृत्त धातुओं की समानता के लिये हो उपदेश किया जाता है ॥ ८ ॥
धातवः पुनः शारीराः समानगुणैः समानगुणभूयिष्ठैर्वाऽप्याहारवि-
हारैरभ्यस्यमानैर्वृद्धिं प्राप्नुवन्ति, ह्रास तु विपरीतगुणैर्विपरीतगुणभू-
यिष्ठैर्वाऽप्यभ्यस्यमानैः ॥ ६ ॥
धातु अपने समान गुणों से तथा अपने अधिक समान गुणवाले आहार
विहार के निरन्तर सेवन करने से बढ़ते हैं और अपने विपरीत गुणों से तथा
अ० ६ ] ६ शारीरस्थानम् ८१
अपने अधिक विपरीत गुणवाले आहार-विहार के निरन्तर सेवन से शरीर के
धातु घटते हैं ॥ ६ ॥
तत्रेमे शरीरधातुगुणाः संख्यासामर्थ्यकराः । तद्यथा—गुरु-लघु-शी-
तोष्ण-स्निग्ध-रूक्ष-मन्द-तीक्ष्ण-स्थिर-सर-मृदु-कठिन-विशद-पिच्छिल-
श्लक्ष्ण-खर-सूक्ष्म-स्थूल-सान्द्र-द्रवाः।तेषु ये गुरुवस्ते गुरुभिराहारगुणैरभ्य-
स्यमानैराप्यायन्ते लघवाश्च ह्रसन्ति, लघवस्तु लघुभिराप्यायन्ते गुरु-
वश्च ह्रसन्ति । एवमेव सर्वधातुगुणानां सामान्ययोगाद् वृद्धिविपर्ययाद्
ह्रासः। एतस्मान्मासमाप्यायते मांसेन भूयन्तरमन्येभ्यः शरीरधातुभ्यः,
तथा लोहितं लोहितेन, मेदो मेदसा, वसा वसया, अस्थि तरुणास्थना,
मज्जा मऽज्ञा, शुक्रं शुक्रेण, गर्भस्त्वामगर्भेण ॥ १० ॥
शरीर धातुओं के गुण, सख्या ( गणना ), तथा सामर्थ्य करने वाले हैं।
जैसे—गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मन्द, तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु,
कठिन, विशद पिच्छिल, श्लक्षण, खर, स्थूल, सान्द्र और द्रव। इनमें जो गुण
गुरु हैं वे गुरु आहार के गुणों के निरन्तर सेवन करने से बढ़ते हैं और लघु
गुणों को घटाते हैं। जो लघु गुण हैं वे लघु आहार के गुणों से निरन्तर बढ़ते
हैं और गुरु गुणों को घटाते हैं। इसी प्रकार सब धातुओं के गुण अपने समान
गुणों के योग से बढ़ते हैं और अपने विपरीत गुणों से कम होते है। इसलिये
शरीरस्थ मास-धातु मास से अन्य सब शरीर धातुओं की अपेक्षा अधिक बढ़ता
है। इसी प्रकार रक्त, रक्त से अधिक बढ़ता है। मेद मेद से, वसा वसा से,
अस्थिया तरुणास्थियों से, मज्जा मज्जा से, शुक्र शुक्र से, गर्भ आमगर्भ से अधिक
बढता है ॥ १० ॥
यत्र त्वेवंलक्षणेन सामान्येन सामान्यवतामाहारविकाराणामसा-
निध्यं स्यात्, सनिहितानां वाऽप्ययुक्तत्वान्नोपयोगो घृणित्वादन्यस्माद्वा
कारणात्, स च धातुरभिवर्धयितव्यः स्यात् । तस्य ये समानगुणाः
स्युराहारविकारा असेव्याश्च, तत्र समानगुणभूयिष्ठानामन्यप्रकृतीनाम-
प्याहारविकाराणामुपयोगः स्यात् ।
तद्यथा—शुक्रक्षये क्षीरसर्पिषोरुपयोगो मधुर-स्निग्ध-समाख्यातानां
चापरेषामेव द्रव्याणा, मूत्रक्षये पुनरिक्षुरस-वारुणी मण्ड-द्रव-मधुराम्ल-
लवणोपक्लेदिनां, पुरीषक्षये कुल्माष-माष-कुष्कुण्डाज मध्य-यव शाक-
धान्याम्लानां, वातक्षये कटुक-तिक्त-कषाय-रूक्ष-लघु-शीतानां, पित्तक्ष-
येऽम्ल-लवण-कटुक-क्षारोष्ण-तीक्ष्णानां, श्लेष्मक्षये स्निग्ध-गुरु-मधुर-
८२ चरकसंहिता [ अ० ६
सान्द्र-पिच्छिलानां द्रव्याणाम् । कर्मापि च यद्यद्यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्त-
दासेव्यम् । एवमन्येषामपि शरीरधातूनां सामान्यविपर्ययाभ्यां वृद्धिह्रासौ
यथाकालं कार्यौ । इति सर्वधातूनामेकैकशोऽविशेषाश्च वृद्धिकराणि
व्याख्यातानि भवन्ति ॥ ११ ॥
समान गुणवाले विजातीय पदार्थो मे वृद्धि—जहा पर कि इस प्रकार के
लक्षणों वाले समान गुण के आहार विकारों का प्राप्त होना सम्भव न हो, अथवा
प्राप्त होने पर भी घृणा आदि के कारण अथवा धर्म आदि के कारण उपयोग
करने में बाधा पड़ती हो वहा पर विजातीय समान गुण के आहार-विकारों का
उपयोग करना चाहिये । जिससे कि इच्छित धातु [ जिसके लिये समान गुण
वाले आहार विकार घृणा अथवा धर्म के कारण असेव्य हैं उस धातु ] की वृद्धि
हो। जैसे—शुक्र का क्षय होने पर दूध और घी का उपयोग, तथा मधुर और
स्निग्ध विजातीय दूसरे पदार्थों का उपयोग करना । मूत्र का क्षय होने पर गन्ने
का रस, वारुणी, मण्ड तथा कुल्माष, उड़द, कुष्कुण्ड (साप की छतरी), बकरी
का मध्य भाग, जौ, शाक, धान्य और अम्ल आदि वस्तुओं का उपयोग करना
चाहिये । वात का क्षय होने पर कटु, तिक्त, कषाय, रूक्ष, लघु, शीत वस्तुओं
का उपयोग करना चाहिये । पित्त का क्षय होने पर अम्ल, लवण, कटु, क्षार
उष्ण, तीक्ष्ण वस्तुओं का और कफ का क्षय होने पर स्निग्ध, गुरु, मधुर, सान्द्र
और पिच्छिल द्रव्यों का उपयोग करना चाहिये । द्रव्यों की भाति धातु की वृद्धि
करनेवाले समान गुण के अचिन्त्य प्रभाव रूपी कर्म का भी उपयोग करना
चाहिये । इसी प्रकार से अन्य शरीर धातुओं को भी सामान्य और विपर्यय
द्वारा समयानुसार बढ़ाना अथवा घटाना चाहिये । इस प्रकार से सब धातुओं
के पृथक् पृथक् तथा समग्र रूप में वृद्धि तथा ह्रास के कारणों की व्याख्या कर
दी गई है ॥ ११ ॥
कात्स्न्र्येन शरीरवृद्धिकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा—काल-
योगः, स्वभावसंसिद्धिः, आहारसौष्ठवमविघातश्चेति । बलवृद्धिकरा-
स्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा—बलवत्पुरुषे देशे जन्म, बलवत्पुरुषे
काले च । सुखश्च कालयोगो, बीज-क्षेत्र-गुण संपच्चाऽऽहारसंपच्च, शरीरसं-
पच्च, सात्म्यसंपच्च, सत्त्वसंपच्च, स्वभावसंसिद्धिश्च, यौवनं च, कर्म च,
सहर्षश्चेति ॥ १२ ॥
निम्न बाते सम्पूर्ण रूप में सारे शरीर की वृद्धि करते है । जैसे—वृद्धिका-
रक यौवनादि का समय, स्वभाव, अर्थात् अदृष्ट के कारण वृद्धि, उत्तम
आहार और अभिघात (अतिव्यवाय या मनोविघात आदि का न होना ),
अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८३
अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८३
ये वस्तुऐ सम्पूर्ण शरीर में वृद्धि करती है। निम्न बाते शरीर में बल की
वृद्धि करती हैं। जैसे—बलवान् पुरुषों वाले देश में उत्पन्न होना, बलवान्
माता पिता मे, बलवान् काल हेमन्त या शिशिर में उत्पन्न होना ।
साधारण समय का योग, बीज, शुक्र, क्षेत्र, आर्त्तव और गर्भाशय के उत्तम गुण,
उत्तम गुणयुक्त आहार, उत्तम शरीर, उत्तम सात्म्य, उत्तम सत्त्व, स्वभाव से
सिद्धि अर्थात् स्वभावतः शरीर की अष्टविध उत्तम बढ़ती वा बल को उत्पन्न
करने वाले कर्म का सेवन, यौवनावस्था और व्यायाम आदि कर्म इनसे बल
उत्पन्न होता है ॥ १२ ॥
आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा—ऊष्मा वायु-
क्लेद स्नेहः कालः समयोगश्चेति । तत्र तु खल्वेषामूष्मादीनामाहारप-
रिणामकराणां भावानामिमे कर्मविशेषा भवन्ति । तद्यथा—ऊष्मा
पचति, वायुरपकर्षति, क्लेदः शैथिल्यमापादयति, स्नेहो मार्दव जनयति,
कालः पर्याप्तिमभिनिर्वर्त्तयति, समयोगस्त्वेषा परिणामधातुसाम्यकरः
संपद्यते ॥ १३ ॥
निम्न बाते आहार को पचाने वाली हैं। जैसे—उष्णिमा, वायु, क्लेद,
स्नेह, पाक काल और प्रकृति आदि आठ बातो का समयोग आहार सम्पत् को
उत्पन्न करता है। आहार को भली प्रकार पचाने में उष्णिमा आदि निम्नलि-
खित कार्य करते हैं। जैसे—उष्णिमा भोजन को पचाती है । वायु उष्णिमा से
दूर स्थित भोजन को उष्णिमा के पास लाता है । क्लेद शिथिलता को उत्पन्न
करता है। स्नेह कोमलता को पैदा करता है । समय तृप्ति को पैदा करता है ।
समयोग इनमें परिणाम तथा धातुओं की समता को उत्पन्न करता है ॥ १३ ॥
परिणामतस्त्वाहारास्थ गुणा शरीरगुणभावमापद्यन्ते यथास्वमवि-
रुद्धाः विरुद्धाश्च विहन्युर्विहताश्च विरोधिभिः शरीरम् ॥ १४ ॥
आहार के परिपाक होने पर भोजन के गुण अपने समान शरीर के गुणों
में बदल जाते हैं। जैसे—आहार का कठिन भाग मास, अस्थि आदि शरीर
के कठिन भाग का पोषण करता है और द्रव भाग रक्त आदि रूप में बदल
जाता है। शरीर गुणो के विरोधी आहार-गुण विरुद्ध गुणों को नष्ट करते हैं।
इस प्रकार से नष्ट हुए गुण शरीर को नष्ट कर देते हैं । [जैसे—दूध और
मछली आदि विरुद्ध आहार के कारण नष्ट हुए गुण शरीर को नष्ट कर देते हैं] ॥१४॥
शरीरधातवः पुनर्द्विविधाः संग्रहेण—मलभूताः, प्रसादभूताश्च ।
तत्र मलभूतास्ते ये शरीरस्य आबाधकराः स्युः । तद्यथा—शरीरच्छिद्रे-
षूपदेहाः पृथग्जन्मानो बहिर्मुखाः परिपक्वाश्च धातवः प्रकुपिताश्च वात-
८४ चरकसंहिता [ अ० ६
पित्तश्लेष्माणो ये चान्येऽपि केचिच्छरीरे तिष्ठन्तो भावाः शरीरस्योपघा-
तायोपपद्यन्ते सर्वांस्तान्मले संप्रचक्ष्महे, इतरांस्तु प्रसादे, गुर्वादींश्च
द्रवान्तान् गुणभेदेन, रसादींश्च शुक्रान्तान् द्रव्यभेदेन ॥ १५ ॥
संक्षेप से शरीर के धातु दो प्रकार के हैं। जैसे—मलरूप और प्रसाद रूप ।
इनमें जो शरीर में पीड़ा उत्पन्न करते हैं वे मलरूप हैं । जैसे—जन्म से पृथक्
या शरीर से बाहर निकलने वाले या शरीर के छिद्रों में लगे (जैसे—नाक का
मल आदि), पाक होकर पूय बने धातु (रक्त आदि), कुपित वात, पित्त, कफ
(बढे या घटे वातादि), इनके अतिरिक्त और भी जो वस्तुए शरीर मे रह कर
शरीर की नाशकारक होती हैं, उन सबको 'मल' शब्द से कहते हैं। इनसे भिन्न
वस्तुओ को 'प्रसाद' कहते हैं। गुरु से लेकर द्रव तक कहे गुणों को और रस से
लेकर शुक्र तक कहे द्रव्यों को भी प्रसाद-धातु कहते हैं ॥ १५ ॥
तेषां सर्वेषामेव वात-पित्त-श्लेष्माणो दुष्टा दूषयितारो भवन्ति
दोषस्वभावात्, वातादीनां पुनर्धातवन्तरे कालान्तरे प्रदुष्टाना विविधा-
शितपीतीयेऽध्याये विज्ञानान्युक्तानि । एतावत्येव दुष्टदोषगतिर्यावत्सं
स्पर्शहीनाच्छरीरधातूनाम् । प्रकृतिभूतानां खलु वातादीना फलमारोग्यं,
तस्मादेषा प्रकृतिभावे प्रयतितव्यं बुद्धिमद्भिः ॥ १६ ॥
अपने कारणों से कुपित हुए वात, पित्त, कफ इन सबों को दूषित कर
देते हैं। क्योकि दोष का स्वभाव (प्रकृति) ही दूषित करने का है। वात
आदि और रस आदि धातुओं के दूषित होने के लक्षण 'विविधाशित
पीतीय' अध्याय मे कह दिये हैं। दुष्ट हुए वात आदि की केश, श्मश्रु
आदि में गति नहीं है, क्योंकि इनमें त्वचा का स्पर्श नहीं है। जहा जहा पर
स्पर्शेन्द्रिय का सम्बन्ध है वहा वहा पर दूषित वात आदि की गति होती है।
प्रकृति मे रहते हुए वात आदि शरीर-धातुओ का फल 'आरोग्य' है। इसलिये
बुद्धिमानों को इनको प्रकृति मे रखने का प्रयत्न करना चाहिये ॥१६॥
भवति चात्र—सर्वदा सर्वथा सर्व शरीरं वेद यो भिषक् ।
आयुर्वेदं स कात्स्न्येन वेद लोकसुखप्रदम् ॥ १७॥ इति ॥
जो वैद्य सम्पूर्ण शरीर को भली प्रकार सब समयों में सब प्रकारों से जानता
है, वह लोक को सुख देने वाले आयुर्वेद को भी सम्पूर्ण रूप में जानता है ॥१७॥
तमेवमुक्तवन्त भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—श्रुतमेतद्यदुक्तं
भगवता शरीराधिकारे वचः, किन्तु खलु गर्भस्याङ्गं पूर्वमभिनिर्वर्तते
कुक्षौ, कुतोमुखः कथं वा चान्तर्गतस्तिष्ठति, किमाहारश्च वर्तयति
अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८५
अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८५
कथंभूतश्च निष्क्रामति, कैश्चायमाहारोपचारैर्जातः सद्यो हन्यते, जातस्तु
कैरव्याधिरभिवर्धते, किं चास्य देवादिप्रकोपनिमित्ता बिकाराः सम्भवन्ति,
आहोस्विन्न, किचास्य कालाकालमृत्योर्भावाभावयोर्भगवान्ध्यवस्यति,
किंवास्य परमायुः, कानि चास्य परमायुषो निमित्तानीति ॥ १८ ॥
गर्भ के सम्बन्ध में प्रश्न—इस प्रकार से उपदेश करते हुए भगवान् आत्रेय
को अग्निवेश ने कहा—हे भगवन् ! आपने शरीर के अधिकरण में जा कुछ
कहा वह सुन लिया । ( १ ) अब बतलाइये कि गर्भाशय मे गर्भ का प्रथम
कौन सा अंग बनता है ? (२) गर्भ का मुख किधर रहता है और (३) गर्भा-
शय के भीतर गर्भ किस स्थिति में रहता है ? ( ४ ) किस आहार से जीता है
और ( ५ ) किस प्रकार से बाहर आता है ? ( ६ ) किन २ प्रकार के आहार
उपचारां से उत्पन्न हुआ यह शीघ्र मर जाता है ? ( ७ ) उत्पन्न होकर नीरोग
अवस्था मे किन से बढ़ता है ? ( ८ ) क्या इस गर्भ को देवता आदि के प्रकोप
के कारण होनेवाले विकार होते हैं वा नहीं ? ( ६ ) क्या इस गर्भ में भी काल
मृत्यु और अकाल-मृत्यु के होने और न होने का भगवान् निश्चय करता है ।
(१०) इस गर्भ की परम आयु क्या है और (११) परमायु के क्या कारण हैं ॥१८॥
तमेवमुक्तवन्तमग्निवेशं भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच—पूर्वमुक्तमे-
तद् गर्भावक्रान्तौ यथाऽयमभिनिर्वर्तते कुक्षौ, यच्चास्य यदा संतिष्ठतेऽ-
ङ्गजातम् । विप्रतिपत्तिवादास्त्वत्र बहुविधा सूत्रकारिणामृषीणां सन्ति
सर्वेषां, तानपि निबोधोच्यमानान्—शिरः पूर्वमभिनिर्वर्तते कुक्षाविति
कुमारशिरा भरद्वाजः पश्यति, सर्वेन्द्रियाणां तदधिष्ठानमिति कृत्वा ।
हृदयमिति काङ्कायनो बाह्लीकभिषक्, चेतनाधिष्ठानत्वात् । नाभिरिति
भद्रकाप्यः, आहारागम इति कृत्वा । पक्वाशयगुदमिति भद्रशौनक,
मारुताधिष्ठानत्वात् । हस्तपादमिति वडिशः, तत्करणत्वात्पुरुषस्य ।
इन्द्रियाणीति जनको वैदेह, तान्यस्य बुद्धयधिष्ठानानोति कृत्वा । परो-
क्षत्वादचिन्त्यमिति मारीचि कश्यपः, सर्वाङ्गनिर्वृत्तिर्युगपदिति धन्व-
न्तरि, तदुपपन्नं सिद्धत्वात्, सर्वाङ्गानां तस्य हृदयं मूलमधिष्ठानं च
केषांचिद्भावानां, न च तस्मात्पूर्वाभिनिर्वृत्तिरेषा, तस्माद्धृदयप्रभृतीनां
सर्वाङ्गाना तुल्यकालाभिनिर्वृत्तिः । सर्वभावा ह्यन्योन्यप्रतिबद्धाः ।
तस्माद्यथाभूतं दर्शनं साधु ॥ १६ ॥
इस प्रकार से कहते हुए अग्निवेश को भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने कहा—
जिस प्रकार से गर्भ गर्भाशय में बढ़ता है यह बात पीछे 'गर्भावक्रान्ति' अध्याय
८६ चरकसंहिता [ अ० ६
में कह चुके हैं। इस गर्भ की अगरचना मे सूत्रकार ऋषियो के बहुत प्रकार
के मतभेद हैं । उन सब को भी सुनो—कुमारशिरा भरद्वाज का दर्शन है कि
गर्भाशय में गर्भ का प्रथम शिर बनता है, क्योंकि यही शिर सब इन्द्रियो का
आश्रय स्थान है । बाह्लीक भिक्कू काङ्कायन का मत यह है कि सबसे प्रथम हृदय
बनता है, क्योंकि हृदय ही चेतना का स्थान है। भद्रकाप्य का कथन है कि
सबसे प्रथम नाभि बनती है क्योकि आहार प्राप्ति का यहा मार्ग है । भद्रशौनक
का मत है कि प्रथम पक्वाशय, गुदा बनती है, क्योकि यही वायु का स्थान है।
बडिश का कथन है कि प्रथम हाथ पाव बनते हैं, क्योकि ये ही पुरुष के करण
(साधन) हैं। वैदेह जनक ऋषि का मत है कि इन्द्रियाँ सबसे प्रथम बनती
हैं, क्योंकि ये इन्द्रियाँ ही बुद्धि (ज्ञान) का आश्रय स्थान हैं। मारीचि कश्यप
का कहना है कि परोक्ष हान के कारण कौन सा अग प्रथम बनता है यह कुछ
नहीं कहा जा सकता, यह अचिन्त्य विषय है । धन्वन्तरि का मत है कि सब अग
एक साथ मे बनते है । यह बात ठीक भी है। ऐसा ही प्रमाणो से सिद्ध होता
है । गर्भ के सब अगों का तथा कुछ अन्य वस्तुओं का मूल आश्रयस्थान हृदय
है। इसलिये इस हृदय से पूर्व अन्य अग नहीं बन सकते । अतः हृदय आदि
सब अगो का निर्माण एक साथ में ही होता है । सब पदार्थ परस्पर एक दूसरे
के साथ सम्बन्धित हैं । इसलिये यह यथार्थ दर्शन (धन्वन्तरि का मत) ही
ठीक है ॥ १९ ॥
गर्भस्तु खलु मातुः पृष्ठाभिमुख ऊर्ध्वशिराः संकुच्याङ्गान्यस्ते
जरायुवृतः कुक्षौ ॥२०॥
गर्भाशय में गर्भ माता की पीठ की ओर मुख किये हुए रहता है। गर्भ
का शिर ऊपर (गर्भाशय के शिखर में) रहता है और अङ्ग सकुचित अवस्था
में रहते हैं ॥२०॥
व्यपगत-पिपासा-बुभुक्षस्तु खलु गर्भः परतन्त्रवृत्तिः, मातरमाश्रित्य
वर्तयत्युपस्नेहोपस्वेदाभ्या गर्भस्तु सदसद्भूताङ्गावयवः, तदनन्तर ह्यस्य
लोमकूपायनै रुपस्नेहः कश्चिन्नाभिनाड्ययनैः । नाभ्या ह्यस्य नाडी प्र-
सत्ता, सा नाभ्या चापरा, अपरा चास्य मातुः प्रसक्ता हृदये, मातृहृदयं
ह्यस्य तामपरामभिस्रववे सिराभिः स्यन्दमानाभिः, स तस्य रसो
बलवर्णकरः सपद्यते, स च सर्वरसवानाहारः स्त्रिया ह्यापन्नगर्भायास्त्रिधा
रसः प्रतिपद्यते स्वशरीरपुष्टये स्तन्याय गर्भवृद्धये च, स तेनाहारेणो-
पष्टब्ध परतन्त्रवृत्तिर्मातरमाश्रित्य वर्तयत्यन्तर्गतः ॥२१॥
अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८७
अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८७
गर्भ को भूख प्यास का अनुभव नही होता । वह तो माता के आश्रित
रहता है, इसी लिये पराधीन रहता है। जब तक अंगों का निर्माण नहीं होता,
वह माता के आश्रय मे ही उपस्नेहन, उपस्वेदन द्वारा जीता है इसके अनन्तर
अग प्रत्यग बन जाने पर लोम कूप के मार्गों से तथा नाभि नाड़ी के मार्ग से
उपस्नेहन लेता है । इस गर्भ की नाभि मे नाड़ी लगी होती है और यह नाड़ी
नाभि मे तथा अपरा मे लगी होता है । अपरा माता के हृदय ( गर्भाशय के
ऊर्ध्व शिखर ) मे लगी रहती है । माता का हृदय इस अपरा की बहती हुई
सिराओं द्वारा गर्भ तक पहुचता है [ माता के विचार इन सिराओ द्वारा बच्चे
मे आते है ] । माता का यह रस गर्भ में बल वर्ण को उत्पन्न करता है । वह
सब प्रकार के रसो से उत्पन्न होता है । जो गर्भवती स्त्री भोजन करती है, उसके
आहार रस के तीन भाग हो जाते हैं । ( १ ) गर्भिणी के शरीर की पुष्टि के लिये
( २ ) दूध के लिये और ( ३ ) गर्भ को बढाने के लिये । यह गर्भ इस आहार
के आश्रय से पराधीन होकर माता के ऊपर निर्भर रह कर गर्भाशय मे जीवन
धारण करता है । २१॥
स चोपस्थितकाले जन्मनि प्रसूति-मारुत-योगात्परिवृत्त्याऽवाक्शिरा
निष्क्रामत्यपत्यपथेन । एषा प्रकृतिः, विकृतिः पुनरतोऽन्यथा । परं
त्वतः स्वतन्त्रवृत्तिर्भवति ॥२२॥
प्रसव काल के समीप आने पर वायु के बल से शिर घूम कर नीचे की
ओर सन्तान निकलने के मार्ग में आ जाता है और योनिमार्ग से बाहर निकल
जाता है । यह तो प्रकृति है, इससे विपरीत अवस्था का नाम विकृति है। बाहर
आने पर गर्भ स्वतन्त्र रूप से जीवन धारण करता है ॥२२॥
तस्याऽऽहारोपचारौ जातिसूत्रीयोपदिष्टावविकारकरौ चाभिवृद्धि-
करौ भवतः । ताभ्यामेव च ( सेविताभ्या ) विषमाभ्यां जातः सद्यो
हन्येत तरुरिवाचिरव्यपरोपितो वातातापाभ्यामप्रतिष्ठितमूलः ॥ २३ ॥
स्वतन्त्र वृत्ति होने पर जातिसूत्रीय ( शारीरस्थान अ० ८ ) अध्याय में कहे
हुए आहार और उपचार इसकी वृद्धि करते हैं और किसी प्रकार का रोग या
विकार उत्पन्न नही करते । उत्पन्न हुआ शिशु आहार और उपचार के विषम
होने से शीघ्र ही ऐसे मर जाता है जैसे कि तत्काल लगा हुआ वृक्ष बिना जड़
पकड़े हुए वायु और धूप से शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥ २३ ॥
आप्तोपदेशादद्भुतरूपदर्शनात्समुत्थान-लिङ्ग-चिकित्सित-विशेषाच्चादो-
षप्रकोपानुरूपा देवादि-प्रकोप-निमित्ता विकाराः समुपलभ्यन्ते ॥ २४ ॥
ब्रह्मा आदि से प्रणीत कुमारतन्त्रों के आप्तोपदेश से, अमानुषीय बल, रूप
आदि आश्चर्यकारक बातों के देखने से, समुत्थान ( रोगोत्पत्ति ) के कारणों के
विशेष होने से, लक्षणों के विशेष तथा चिकित्सा में भेद होने से और दोष प्रकोप
से हुए रोगों के विपरीत वर्णवाले लक्षणो को देखने से ज्ञात होता है कि देव
आदि के प्रकोप से भी अनेक रोग गर्भ को होते हैं ॥ २४ ॥
कालाकालमृत्योस्तु खलु भावाभावयोरिदमध्यवसितं नः—यः
कश्चिन्म्रियते स काल एव म्रियते, न हि कालच्छिद्रमस्तीत्येके । तच्चा
सम्यक् , न ह्यच्छिद्रता सच्छिद्रता वा कालस्योपपद्यते, कालस्वलक्षण-
स्वभावात् ।
काल और अकाल मृत्यओं के होने न होने के विषय में हमारा यह निश्चित
सिद्धान्त है कि ‘जो कोई मरता है, वह काल में ही मरता है। कइयों का विचार
है कि काल में कोई छेद ( अवकाश ) नहीं है जो कि इस अवकाश को प्राप्त
करके मरे।' यह मत ठीक नहीं। काल में सच्छिद्रता या अच्छिद्रता नहीं है.
क्योंकि काल के अपने लक्षण मे सच्छिद्रता या अच्छिद्रता नहीं घटती ।
तथाऽऽहुरपरे—यो यदा म्रियते स तस्य नियतो मृत्युकालः। स
सर्वभूतानां सत्यः, समक्रियत्वादिति ।
दूसरे विचारकों का कथन है कि जो जब मरता है वह उसका निश्चित काल
होता है यह कालमृत्यु है । यह सब प्राणियों के लिये ठीक है, क्योकि काल
सब प्राणियों में समान क्रियावाला है । काल से सभी मरते हैं काल को किसी में
राग या द्वेष नहीं है ।
एतदपि च अन्यथाऽर्थग्रहणं, न हि कश्चिन्न म्रियत इति समक्रियः ।
काल पुनःरायुषः प्रमाणमधिकृत्योच्यते । यस्य चेष्टं यो यदा म्रियते तस्य
स नियतो मृत्युकाल इति, तस्य सर्वभावा यथास्वं नियतकाला भवि-
ष्यन्ति । तच्च नोपपद्यते—प्रत्यक्षं ह्यकालाहारवचनकर्मणां फलमनिष्टं
विपर्यये चेष्टम् । प्रत्यक्षतश्चोपलभ्यते खलु कालाकालव्यक्तितासु तास्व-
वस्थासु तं तमर्थमभिसमीक्ष्य । तद्यथा—कालोऽयमस्य तु व्याधेराहा-
रस्र्यौषधस्य प्रतिकर्मणो विसर्गस्य चाकालो वेति । लोकेऽप्येतद्भवति
काले देवो वर्षत्यकाले देवो वर्षति, काले शीतमकाले शीतं, काले तपत्य
काले तपति, काले पुष्पफलमकाले च पुष्पफलमिति । तस्मादुभयमस्ति
काले मृत्युरकाले च । नैकान्तिकं । यदि ह्यकाले मृत्युर्नस्यान्नियत-काल-
प्रमाणमायुः सर्वं स्यात् । एवं गते हिताहितज्ञानमकारणं स्यात्प्रत्यक्षानु-
अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८६
अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८६
मानोपदेशाश्चाप्रमाणानि स्युर्ये प्रमाणभूताः सर्वतन्त्रेषु, यैरायुष्यानायु-
ष्याणि चोपलभ्यन्ते । वाग्वस्तुमात्रमेतद्वादृषयो मन्यन्ते यदुच्यते—
नाकालमृत्युरस्तीति ॥ २५ ॥
यह भी पक्ष ठीक नहीं है। बिना काल के कोई नहीं मरता, इसलिये काल समान
क्रियावाला है। ऐसा कहना ठीक नही, क्योंकि यहां पर ‘काल’ शब्द आयु के
प्रमाण की अपेक्षा से कहा है। जो यह मानता है कि जो मनुष्य जब मरता है
वही उसका नियत मृत्युकाल है, उसके मत में मृत्यु से अतिरिक्त आहार, वचन
आदि भी सब नियत कालवाले हो जायेगे। परन्तु ये ऐसे नहीं होते, क्योंकि
यह प्रत्यक्ष है कि अकाल में किये भोजन तथा अकाल में कहे हुए वचन का फल
बुरा होता है और समय पर किये भोजन तथा समय पर कहे वचन का फल
अच्छा होता है और यह भी हम देखते है कि प्रत्येक अवस्था में काल और
अकाल का विचार करते हैं। जैसे—यह इस रोग का समय है, यह आहार
का समय है, यह औषध का समय है, यह प्रतिकर्म का काल है, यह विसर्ग
काल है। इसी प्रकार यह रोग का, भोजन का, औषध का, प्रतिकर्म का और
विसर्ग का समय नहीं है। लोक में भी ऐसा होता है। समय पर मेघ बरसता
है, अकाल में भी बादल बरसता है। काल में शीत और अकाल में भी शीत
होता है। काल में सूर्य तपता हे और अकाल में भी सूर्य तपता है। काल में
फूल फल होते हैं और अकाल में भी फूल फल होते हैं। इसलिये दोनों ही बाते
है, काल में भी मृत्यु है और अकाल में भी मृत्यु है एक ही बात ठीक नहीं
है। यदि अकाल में मृत्यु न हो तो सब पुरुषों की आयु का समय और मान
नियत होना चाहिये। इस प्रकार होने से हित अहित का ज्ञान निष्फल हो जाता
है। प्रत्यक्ष अनुमान, आप्तोपदेश जा कि सब तन्त्रों में प्रमाणभूत हैं वे सब
तथा आयुष्यकारक और अनायुष्यकारक सब बातें व्यर्थ हो जायेगी। ‘अकाल
मृत्यु नहीं है’ इस कथन को ऋषि लोग केवल कहने भर के लिये ही मानते हैं,
वास्तव में इसमें कुछ सार या सत्यता नही है ॥ २५ ॥
वर्षशतं खल्वायुषः प्रमाणमस्मिन् काले ॥ २६ ॥
तस्य निमित्तं प्रकृतिगुणात्मसम्पत्सात्म्योपसेवनं चेति ॥ २७ ॥
इस कलियुग में आयु का परिमाण सो साल है। इसका कारण उत्तम
प्रकृति, उत्तम गुण, उत्तम आत्मा और उत्तम सात्म्य का सेवन है। [उत्तम
प्रकृति जैसे—सम वात आदि प्रकृति का होना, उत्तम गुण जैसे—सार-सहनन
आदि का होना, उत्तम आत्मा के धर्म, दान, यज्ञ आदि] ॥ २६-२७ ॥
६० चरकसंहिता [ अ० ७
तत्र श्लोकाः—शरीरं यद्यथा तच्च वर्तते क्लिन्नमामयैः ।
यथा क्लेशं विनाशं च याति ये चास्य धातवः ॥ २८ ॥
वृद्धिह्रासौ यथा तेषां क्षीणानामौषधं च यत् ।
देहवृद्धिकरा भावा बलवृद्धिकराश्च ये ॥ २९ ॥
परिणामकरा भावा या च तेषां पृथक् क्रिया ।
मलाख्याः संप्रसादाख्या धातवः प्रश्न एव च ॥ ३० ॥
नवको निर्णयश्चास्य विधिवत्संप्रकाशितः ।
तथ्यः शरीरविचये शारीरे परमर्षिणा ॥ ३१ ॥
शरीर जिस प्रकार से रहता है, जिस प्रकार से क्लेश या विनाश को प्राप्त
होता है, शरीर के धातु, इन धातुओं की वृद्धि और ह्रास क्षीण धातुओं का
औषध, देह की वृद्धि करनेवाले और बल को बढ़ाने वाले कारण, परिणाम-
कारक भाव, इनकी पृथक् पृथक् क्रिया, मल और प्रसाद रूप धातु, नव प्रश्न
तथा इन प्रश्नों का समुचित निर्णय 'शरीर विचय' नामक अध्याय में परमर्षि
आत्रेय ने प्रकाशित किया है ॥ २८-३१ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरविचय-
शारीरं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः ।
अथातः शरीरसंख्याशारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'शरीरसंख्या' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
शरीरसंख्यामवयवशः (कृत्स्नं) शरीरं प्रविभज्य सर्व-शरीर-
संख्यान-प्रमाण-ज्ञान-हेतोर्भगवन्तमात्रेयमग्निवेशः पप्रच्छ ॥ ३ ॥
अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय से सम्पूर्ण शरीर की संख्या, परिमाण और
नाम आदि ज्ञान करने के लिये अवयव रूप में शरीर का विभाग करके शरीर
संख्या नाम शारीर प्रकरण के सम्बन्ध में प्रश्न किया—
तमुवाच भगवानात्रेयः—शृणु मत्तोऽग्निवेश ! सर्वशरीरमभिवक्षा-
णायथाप्रश्नमेकमना यथावत् ॥ ४ ॥
अ० ७ ] शरीरस्थानम् ६१
अ० ७ ] शरीरस्थानम् ६१
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश ! सम्पूर्ण शरीर के
प्रकरण को उपदेश करते हुए मुझ से अपने प्रश्न के अनुसार एकाग्र चित्त
होकर सुनो ॥ ४ ॥
शरीरे षट् त्वचः । तद्यथा—उदकधरा त्वग्बाह्या, द्वितीया त्वग-
सृग्धरा, तृतीया सिध्म-किलास-सम्भवाधिष्ठाना, चतुर्थी दद्रुकुष्ठसम्भवा-
धिष्ठाना, पञ्चम्यलजी-विद्रधी-सम्भवाधिष्ठाना, षष्ठी तु यस्यां छिन्नायां
ताम्यत्यन्ध इव च तमः प्रविशति, या चाप्यधिष्ठायारूषि जायन्ते पर्वसु
कृष्णरक्तानि स्थूलमूलानि दुश्चिकित्स्यतमानि येति षट् त्वचः । एताः
षडङ्गं शरीरमवतत्य तिष्ठन्ति ॥ ५ ॥
शरीर की छः त्वचाएं—शरीर में छ त्वचाएं हैं । जैसे—(१) बाह्य त्वचा
उदकधारा जिसमें जल रहता है । ( २ ) दूसरी त्वचा असृग्धारा जिसमें रुधिर
रहता है । ( ३ ) तीसरी त्वचा जो सिध्म, किलास आदि रोगों की उत्पत्ति का
आश्रय स्थान है । ( ४ ) चौथी त्वचा जो दद्रु ( दाद ) और कुष्ठ ( कोढ )
रोग का आश्रय है । ( ५ ) पाचवीं त्वचा जो अलजी और विद्रधिरोग का आश्र-
यभूमि है । ( ६ ) छठी त्वचा जिसके कटने पर पुरुष मूर्छित होता है और अन्धे
की भांति अन्धकार में घुसता है—उस कुछ नहीं दीखता और जिस त्वचा का
आश्रय लेकर अवयव सन्धियों में काले, लाल, स्थूल मूल वाले ऐसे व्रण उत्पन्न
होते हैं जिनकी चिकित्सा करना बहुत कठिन होता है । ये छः त्वचायें छ. अगों
वाले शरीर कोढके रहती हैं१ ॥ ५ ॥
तत्रायं शरीरस्याङ्गविभागः । तद्यथा—द्वौ बाहू, द्वे सक्थिनी, शिरो
ग्रीवं, अन्तराधिरिति षडङ्गमङ्गम् ॥ ६ ॥
शरीर के छः अग—शरीर के अगों का विभाग इस प्रकार से है जैसे—दो
बाहुए, दो टागें, शिर, ग्रीवा और बीच का मध्य भाग, ये छः अग हैं ॥ ६ ॥
त्रीणि २षष्ट्यधिकानि शतान्यस्थ्नां सह ३दन्तोलूखलनखैः ।
तद्यथा—द्वात्रिंशद्दन्ताः, द्वात्रिंशद्दन्तोलूखलानि, विंशतिर्नखाः विंशतिः
१ सुश्रुत में सात त्वचायें और ३०० अस्थिया मानीं हैं ।
२ षष्ठानि इति च पाठः ।
३ 'द्वात्रिंशद्दन्ताः, द्वात्रिंशद्दन्तोलूखलानि, विंशतिर्नखाः, षष्टिः पाणिपादाङ्गु-
ल्यस्थीनि, विंशतिः पाणिपादशलाका, चत्वारि पाणिपादशलाकाधिष्ठानानि, द्वे
पाष्ण्र्योरस्थिनी, चत्वारः पादयोर्गुल्फाः, द्वौ मणिकौ हस्तयोः, चत्वार्यरत्न्योरस्थीनि,
चत्वारि जङ्घयो., द्वे जानुकपालिके, द्वावूरुनलकौ, द्वौ बाहुनलकौ, द्वावंसौ, द्वे
६२ चरकसंहिता [ अ० ७
पाणिपादशलाकाः, चत्वार्यधिष्ठानान्येषां, चत्वारि पाणिपादपृष्ठानि,
षष्टिरङ्गुल्यस्थीनि, द्वे पाष्ण्योः, द्वे कूर्चाधः, चत्वारः पाण्यौर्मणिकाः,
चत्वारः पादयोर्गुल्फाः, चत्वार्यरत्न्योरस्थीनि, चत्वारि जङ्घयोः, द्वे
जानुनोः, द्वे कूर्परयोः, द्वे ऊर्वोः, द्वे बाह्वोः, सांसयोर्द्वे, द्वावक्षकौ, द्वे
तालुनी, द्वे श्रोणिफलके, एकं भगास्थि, पुसां मेढ्रास्थि एक, त्रिकसंश्रि-
तमेकं गुदास्थि, पृष्ठगतानि पञ्चत्रिंशत्, पञ्चदशास्थीनि ग्रीवायाँ, द्वे
जत्रुणी, एकं हन्वस्थि, द्वे हनुमूलबन्धने, द्वे ललाटे, द्वे अक्ष्णोः, गण्ड-
योर्द्वे, नासिकाया त्रीणि घोणाख्यानि, द्वयोः पार्श्वयोश्चतुर्विंशति पञ्ज-
रास्थीनि च पार्श्वकानि, तावन्ति चैषा स्थालिकान्यर्बुदाकाराणि तानि
द्विसप्ततिः, द्वौ शङ्खकौ, चत्वारि शिर कपालानि, वक्षसि सप्तदश, इति
त्रीणि षष्ट्यधिकानि शतान्यस्थ्नामिति ॥ ७ ॥
तीन सौ साठ हड्डिया—दात, दन्त कोशों और नखों को मिला कर
इस शरीर मे तीन सौ साठ अस्थिया हैं । जैसे—३२ दात,, ३२ दातो के उलू-
खल (कोश), २० नख, २० हाथ और पावों की शलाकाएं, ६० हाथ पाव
की अगुलियों की अस्थिया, ४ हाथ और पावों की पीठ की हड्डिया, ४ इन शला-
काओं के आश्रयस्थान । ६० अगुलियों की हड्डिया, २ पाष्णियों (एडियों) की,
२ कूर्चाध । ४ पावों में गुल्फ, २ हाथों के मणिक, ४ प्रकोष्ठ की अस्थियों,
४ टागो की अस्थिया, २ जानुकपाल, २ कूर्पर, २ जाघों की अस्थिया, २ बाहु
की अस्थिया, २ कन्धे की अस्थिया, २ असफलक, २ अक्षक, २ तालु की
अस्थिया, २ श्रोणिफलक (कूल्हे की हड्डिया), १ भगास्थि, १ पुरुषों के लिंग
की अस्थि, त्रिक (कूलहों) के नीचे का आश्रय रूप गुदा के पास १ अस्थि,
३५ पीठ की अस्थिया, १५ अस्थिया गर्दन में, २ जत्रु (हसली) की हड्डी, १
ठोड़ी की अस्थि, ठोड़ी के मूल में बाधने वाली २ अस्थि, ललाट की २ अस्थिया,
२ आँख की, २ कपोलों (गालों) की, ३ अस्थि नासिका में है जिनका नाम
'घोण' है, दोनों पाश्र्वों की २४ अस्थिया, पञ्जर की और पसलिया, उतने ही उनके
असफलके, द्वावक्षकौ, एक जत्रु, द्वे तालुषके, द्वे श्रोणिफलके, एक भगास्थि,
पञ्चचत्वारिंशत्पृष्ठगतान्यस्थीनि, पञ्चदश ग्रीवाया, चतुर्दशोरसि, द्वयोः पार्श्वयोश्च-
तुर्विंशतिः, पार्श्वयोस्तावन्ति चैव स्थालकानि, तावन्ति चैवस्थालकार्बुदानि, एक
हन्वस्थि, द्वे हनुमूलबन्धने, एकास्थि नासिकागण्डकूटललाट, द्वौ शङ्खौ, चत्वारि
शिरःकपालानीति, एव त्रीणि षष्ठानि शतान्यस्थ्ना सह दन्तनखेनेति' च पाठः ।
अ० ७ ] शरीरस्थानम् ६३
अ० ७ ] शरीरस्थानम् ६३
अर्बुद अर्थात् शंख प्रदेश मे २, शिर कपाल ४, वक्ष में १७, इस प्रकार से
३६० अस्थिया पूरी होती हैं । २४-२४ अर्बुद के २४ स्थालक हैं ये सब
मिलाकर ७२ हैं ॥ ७ ॥
पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि । तद्यथा-त्वग्, जिह्वा, नासिका, अक्षिणी,
कर्णौ च ॥ ८ ॥
इन्द्रियों के आश्रय पाच हैं। जैसे- त्वचा, जिह्वा, नासिका, दो आख
और दो कान ॥ ८ ॥
पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि । तद्यथा- स्पर्शन, रसन, घ्राणं, दर्शनं
श्रोत्रमिति ॥ ६ ॥
ये पाच बुद्धि इन्द्रिया हैं। जैसे-स्पर्श, रसन, घ्राण दर्शन और श्रोत्र ॥६॥
पञ्च कर्मेन्द्रियाणि । तद्यथा- हस्तौ, पादौ, पायुरुपस्थो, जिह्वा
चेति ॥ १० ॥
पाच कर्मेन्द्रिया हैं। यथा - दो हाथ, दो पाव, पायु ( गुदा ), उपस्थ
( लिंग ) और जिह्वा ॥१०॥
हृदय चेतनाधिष्ठानमेकम् ॥ ११ ॥
हृदय एक है, वह चेतना का स्थान है ॥११॥
दश प्राणायतनानि । तद्यथा- मूर्धा कण्ठो हृदयं नाभिः गुदं बस्ति-
रोजः शुक्र शोणितं मासमिति । तेषु षट् पूर्वाणि मर्मसंख्यातानि ॥१२॥
प्राण के आयतन स्थान दस है। यथा-मूर्द्धा ( सिर ), कण्ठ, हृदय,
नाभि, गुदा ( मलाशय ), बस्ति ( मूत्राशय ), ओज, शुक्र, रक्त और मास ।
इनमें प्रथम छ मर्म गिने जाते हैं॥ ॥१२॥
पञ्चदश कोष्ठाङ्गानि । तद्यथा - नाभिश्च, हृदयं च, क्लोम च, यकृच्च,
प्लीहा च, वृक्कौ च, बस्तिश्च, पुरीषाधारश्च, आमाशयश्च, पक्वाशयश्च,
उत्तरगुदं च, अधरगुदं च, क्षुद्रान्त्र च, स्थूलान्त्र च, वपावहनं चेति ॥१३॥
कोष्ठ के पन्द्रह अग है। जैसे- नाभि, हृदय, क्लोम, यकृत, प्लीहा, बुक्क
( वृक्क, गुर्दे ) बस्ति, पुराषाधार ( मलाशय ), आमाशय, पक्वाशय, उत्तर गुदा,
अधरगुदा, क्षुद्रान्त्र, बृहदान्त्र और वपावहन ॥ १३ ॥
❄ दश प्राणायतनीय अध्याय में - दो शंख, तीन मर्म, कण्ठ, रक्त, शुक्र,
ओज और गुदा ये दस गिने हैं। नाभि और मास के गिनने से ये भी मर्म
प्राणायतन मानने चाहियें। यहा पर शंख नहीं गिना ।
९४ चरकसंहिता [अ० ७
षट्पञ्चाशत् प्रत्यङ्गानि षट्स्वङ्गेषूपानिबद्धानि यानि यान्यपरिसं-
ख्यातानि पूर्वमङ्गेषु परिसंख्यायमानेषु तानि तान्यन्यैः पर्यायैरिह
प्रकाश्य व्याख्यातानि भवन्ति । तद्यथा—द्वे जङ्घापिण्डिके, द्वे ऊरु
पिण्डिके, द्वौ स्फिचौ द्वौ वृषणौ, एक शेफ, द्वे उखे, द्वौ वङ्क्षणौ, द्वौ
कुकुन्दरौ, एकं बस्तिशीर्ष, एकमुदर, द्वौ स्तनौ, द्वौ भुजौ१, द्वे बाहु-
पिण्डिके, चिबुकमेक, द्वावोष्ठौ, द्वे सृक्किण्यौ, द्वौ दन्तवेष्टकौ, एकं तालु,
एका गलशुण्डिका, द्वे उपजिह्विके, एका गोजिह्विका, द्वौ गण्डौ,
द्वे कर्णशष्कुलिके, द्वौ कर्णपुत्रकौ, द्वे अक्षिकूटे, चत्वारि अक्षिवर्त्मानि,
द्वे अक्षिकनीनिके, द्वे भ्रुवौ, एकोऽवटुः, चत्वारि पाणिपादहृदयानि ॥१४॥
प्रत्यंग ५६ हैं । ये प्रत्यंग उपरोक्त छः अगों मे सम्बद्ध है । आगे कहे
जाने वाले ५६ प्रत्यग पूर्वोक्त हाथ आदि छः पूर्व गिने हुए अङ्ग से सम्बद्ध है,
उन असख्य प्रत्यंगों को अन्य अन्य पर्यायों से कहा जाता है जैसे—दो जंघा
की पिण्डिकायें, दो टागों की पिण्डिकाये, दो नितम्ब (कूल्हे), दो वृषण, एक
लिंग, कक्षा के पार्श्वों में दो कक्षाये, दो वक्षण (काखे), दो कुकुन्दर (नितम्ब
के ऊपर उन्नत भाग), एक बस्ति का शीर्ष, एक उदर, दो स्तन, कण्ठ के
पार्श्व मे स्थित दो कठिन भाग, दो बाहु-पिण्डिकाये, एक ठोडा, दो ओठ, दो
सृक्किणी (ओठो के प्रान्त), दो मसूड़े, एक तालु, एक गलशुण्डी, दो उपजि-
ह्विका, एक गोजिह्विका, दो गण्ड, दो कर्ण-शष्कुली, दो कर्णपुत्रक (कान का
लटकन), दो अक्षिकूट, चार आख के पलक, दो आख की कनीनिका, दो भ्रुवे,
एक अवटु (घाटा), पाव और हाथ के चार तलुवें, ये ५६ प्रत्यग है ॥१४॥
नव महान्ति छिद्राणि-सप्त शिरसि, द्वे चाधः, एतावद् दृश्यं शक्य-
मभिनिर्देष्टुम् ॥ १५ ॥
नौ महान् छिद्र हैं। जैसे—सात शिर में (दो आख, दो कान, दो नाक
और एक मुख) और दो छिद्र अधोभाग में (गुदा और उपस्थ के) । ये त्वग्
आदि प्रायः सब आखों से दीखते हैं। इनको स्पष्ट बतलाया जा सकता है ॥१५॥
अनिर्देश्यमतः परं तर्क्यमेव । तद्यथा—नव स्नायुशतानि, सप्त
सिराशतानि, द्वे धमनीशते, चत्वारि पेशीशतानि, सप्तोत्तरं मर्मशत,
द्वे पुनः संधिशते, एकोनत्रिंशत्सहस्राणि२ नव च शतानि षट्पञ्चाश-
त्कानि सिराधमनीनामणुशःप्रविभज्यमानानां मुखाग्रपरिमाणं, तावन्ति
१. 'द्वौ श्लेष्मभुवौ' इति च पाठः ।
२ 'एकोनत्रिंशत्' इति च पाठः ।
अ० ७ ] शारीरस्थानम् ६५
अ० ७ ] शारीरस्थानम् ६५
चैव केश-श्मश्रु-लोमानीत्येतद्यथावत्संसंख्यात त्वक्प्रभृति दृश्यं, अतः पर
तर्क्यम् । एतदुभयमपि न विकल्प्यते प्रकृतिभावाच्छरीरस्य ॥ १६ ॥
इसके आगे जो देखी नहीं जा सकतीं, वा दिखलाई नहीं देतीं वे सब अनि
र्देश्य हैं। अतः उनको अनुमान द्वारा ही जाना जाता है। जैसे—९०० स्नायु,
७०० सिराये, २०० धमनियां, ४०० पेशिया, १०७ मर्म, २०० सन्धिया, २६-
६५६ सिरा-धमनियों के मुखो के अग्रभाग और इतने ही २६६५६ केश, श्मश्रु
और शरीर के बाल हैं। ये यहा ठीक २ प्रकार से गिना दिये गये। इनमे त्वचा
आदि दृश्य है। इसमे आगे सब अनुमान गम्य हैं। यह दृश्य और तर्क्य दोनों
प्रकार का मान शरीर के अविकृत होने से विकल्पित नहीं होता। शरीर के
विकृत होने पर त्वचा आदि का मान भी विकृत हो जाता है ॥ १६ ॥
यत्त्वञ्जलिमख्येयं तदुपदेक्ष्यामः, तत्पर प्रमाणमभिज्ञेयं, तच्च
वृद्धि ह्रास-योगि, तर्क्यमेव । तद्यथा—दशोदकस्याञ्जलयः शरीरे स्वेना-
ञ्जलिप्रमाणे न यत्तत् प्रच्यावमानं पुरीषमनुबध्नात्यतियोगेन तथा मूत्रं
रुधिरमन्यांश्च शरीरधातून, यत्तत् सर्वशरीरचरं बाह्याऽत्वग्बिभर्ति,
यत्तु त्वगन्तरे व्रणगतं लसीकाशब्द लभते, यच्चोष्मणाऽनुबद्ध लोमकू-
पेभ्यो निष्पतत्स्वेदशब्दमवाप्नोति, तदुदकं दशाञ्जलिप्रमाणम् । नवाञ्ज-
लयः पूर्वस्याऽऽहार-परिणाम-धातोर्यं त रस इत्याचक्षते, अष्टौ शोणि-
तस्य, सप्त पुरीषस्य, षट् श्लेष्मणः, पञ्च पित्तस्य, चत्वारो मूत्रस्य, त्रयो
वसायाः, द्वौ मेदसः, एको मज्ज्ञः, मस्तिष्कस्यार्धाञ्जलिः, शुक्रस्य ताव-
देव प्रमाणं, तावदेव श्लेष्मणश्चौजस इत्येतच्छरीरतत्त्वमुक्तम् ॥ १७ ॥
शरीर में जो वस्तु अञ्जलि से मापने योग्य है उसका वर्णन करते हैं।
इस परिणाम की वृद्धि या ह्रास भी अनुमान द्वारा ही जाना जाता है।
प्रत्येक मनुष्य की अपनी अञ्जलि की अपेक्षा से शरीर के अन्दर
उदक की मात्रा दस अञ्जलियां है। यह जल अधिक होने पर पुरीष के
साथ, मूत्र, रक्त और शरीर के अन्य धातुओं के साथ मिल कर बाहर आता
है और जो जल त्वचा के अन्दर व्रण मे पहुचाता है, उसे 'लसीका' कहते है
और जो जल शरीर की गरमी के साथ मिल कर लोम कूपों से निकलता है, उसे
'स्वेद' कहते हैं। यह सब जल दस अंजलि परिमाण है। आहार के प्रथम
परिणाम धातु रस की नौ अजलिया हैं। रक्त की आठ अजलियां हैं। मल की
सात, कफ की छः, पित्त की पाच, मूत्र की चार, वसा की तीन, मेद की दो
मज्जा की एक, मस्तिष्क की आधी अंजलि, शुक्र की भी आधी अंजलि और
९६ चरकसंहिता [ अ० ७
कफ और ओज की भी आधी २ अञ्जलि है। इस प्रकार से शरीर के
तत्त्व कह दिये ॥ १७ ॥
तत्र यद्विशेषतः स्थूलं स्थिरं मूर्तिमद् गुरु-खर-कठिनमङ्गं नखास्थि-
दन्तवेष्ट-मांस-चर्म-वर्चः-केश-श्मश्रु-लोम-कण्डरादि तत्पार्थिवं गन्धो
घ्राणं च, यद्-द्रव-सर-मन्द स्निग्ध-मृदु-पिच्छिलं रस-रुधिर-वसा-कफ-
पित्त-मूत्र स्वेदादि तदाप्यं रसो रसनं च । यत्पित्तमूष्मा यो या च भाः
शरीरे, तत्सर्वमाग्नेय रूपं दर्शनं च, यदुच्छ्वास-प्रश्वासोन्मेष-निमेषा-
कुञ्चन-प्रसारण-गमन-प्रेरण-धारणादि तद्वायवीयं स्पर्शः स्पर्शनं च, यद्वि-
विक्तमुच्यते महान्ति चाणूनि स्रोतांसि, तदान्तरीक्षं शब्दः श्रोत्रं च ।
यत्प्रयोक्तृ तत्प्रधानं बुद्धिर्मनश्चेति शरीरावयवसंख्या यथास्थूलभेदेनाव-
यवानां निर्दिष्टा ॥ १८ ॥
शरीर में जो अंग विशेषत स्थूल, स्थिर, कठिन, गुरु, खर, कठोर हैं,
नख, अस्थि, दन्तवेष्ट मास, चर्म, वर्चस्, केश, श्मश्रु, लोम, कण्डरा आदि
यह तथा गन्ध और नासिका यह सब पार्थिव अग हैं। जो भाग द्रव, सर,
मन्द, स्निग्ध, मृदु, पिच्छिल, रस, रुधिर, बसा, कफ, पित्त, मूत्र, स्वेद आदि
तथा रस और जिह्वा यह सब जलीय अश हैं। जो पित्त, गरमी, शरीर में जो
कान्ति रूप और आख है वह अग्न के अश हैं। जो उच्छ्वास, प्रश्वास,
उन्मेष निमेष, आकुञ्चन, प्रसारण, गमन, प्रेरण, धारण आदि कर्म तथा स्पर्श और
त्वचा हैं, यह सब वायु के अश है। शरीर में जो छेद महान् या सूक्ष्म हैं, ये
सब प्रकार के स्रोतस्; शब्द और कान हैं यह आकाश के अश हैं। जो इनका
प्रयोग करता है, वह प्रधान बुद्धि और मन हैं यह शरीर के अवयवों की सख्या
स्थूल दृष्टि भेद में अवयवों की सख्या कह दी गई है ॥ १८ ॥
शरीरावयवास्तु परमाणुभेदेनापरिसंख्येया भवन्त्यतिबहुत्वाद्-
तिसौक्ष्म्यादतीन्द्रियत्वाच्च । तेषां सयोगविभागे परमाणूनां कारणं
वायु. कर्म स्वभावश्च ॥ १९ ॥
शरीर के अवयव परमाणु भेद से असख्य हैं। क्योकि बहुत अधिक हैं,
वे अति सूक्ष्म होने से वा अतीन्द्रिय होने से असख्य हैं। शरीर के इन परमा-
णुओं के संयोग और विभाग में कारण वायु, कर्म और स्वभाव है ॥ १९ ॥
तदेतच्छरीरं संख्यातमनेकावयवं दृष्टमेकत्वेन सङ्गः, पृथक्त्वेनाप-
वर्गः। तत्र प्रधानमसक्तं सर्वसन्ताननिवृत्तौ निवर्त्तत इति ॥ २० ॥