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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 616 में से

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पृष्ठ 109

९४ चरकसंहिता [अ० ७
षट्पञ्चाशत् प्रत्यङ्गानि षट्स्वङ्गेषूपानिबद्धानि यानि यान्यपरिसं-
ख्यातानि पूर्वमङ्गेषु परिसंख्यायमानेषु तानि तान्यन्यैः पर्यायैरिह
प्रकाश्य व्याख्यातानि भवन्ति । तद्यथा—द्वे जङ्घापिण्डिके, द्वे ऊरु
पिण्डिके, द्वौ स्फिचौ द्वौ वृषणौ, एक शेफ, द्वे उखे, द्वौ वङ्क्षणौ, द्वौ
कुकुन्दरौ, एकं बस्तिशीर्ष, एकमुदर, द्वौ स्तनौ, द्वौ भुजौ१, द्वे बाहु-
पिण्डिके, चिबुकमेक, द्वावोष्ठौ, द्वे सृक्किण्यौ, द्वौ दन्तवेष्टकौ, एकं तालु,
एका गलशुण्डिका, द्वे उपजिह्विके, एका गोजिह्विका, द्वौ गण्डौ,
द्वे कर्णशष्कुलिके, द्वौ कर्णपुत्रकौ, द्वे अक्षिकूटे, चत्वारि अक्षिवर्त्मानि,
द्वे अक्षिकनीनिके, द्वे भ्रुवौ, एकोऽवटुः, चत्वारि पाणिपादहृदयानि ॥१४॥
प्रत्यंग ५६ हैं । ये प्रत्यंग उपरोक्त छः अगों मे सम्बद्ध है । आगे कहे
जाने वाले ५६ प्रत्यग पूर्वोक्त हाथ आदि छः पूर्व गिने हुए अङ्ग से सम्बद्ध है,
उन असख्य प्रत्यंगों को अन्य अन्य पर्यायों से कहा जाता है जैसे—दो जंघा
की पिण्डिकायें, दो टागों की पिण्डिकाये, दो नितम्ब (कूल्हे), दो वृषण, एक
लिंग, कक्षा के पार्श्वों में दो कक्षाये, दो वक्षण (काखे), दो कुकुन्दर (नितम्ब
के ऊपर उन्नत भाग), एक बस्ति का शीर्ष, एक उदर, दो स्तन, कण्ठ के
पार्श्व मे स्थित दो कठिन भाग, दो बाहु-पिण्डिकाये, एक ठोडा, दो ओठ, दो
सृक्किणी (ओठो के प्रान्त), दो मसूड़े, एक तालु, एक गलशुण्डी, दो उपजि-
ह्विका, एक गोजिह्विका, दो गण्ड, दो कर्ण-शष्कुली, दो कर्णपुत्रक (कान का
लटकन), दो अक्षिकूट, चार आख के पलक, दो आख की कनीनिका, दो भ्रुवे,
एक अवटु (घाटा), पाव और हाथ के चार तलुवें, ये ५६ प्रत्यग है ॥१४॥
नव महान्ति छिद्राणि-सप्त शिरसि, द्वे चाधः, एतावद् दृश्यं शक्य-
मभिनिर्देष्टुम् ॥ १५ ॥
नौ महान् छिद्र हैं। जैसे—सात शिर में (दो आख, दो कान, दो नाक
और एक मुख) और दो छिद्र अधोभाग में (गुदा और उपस्थ के) । ये त्वग्
आदि प्रायः सब आखों से दीखते हैं। इनको स्पष्ट बतलाया जा सकता है ॥१५॥
अनिर्देश्यमतः परं तर्क्यमेव । तद्यथा—नव स्नायुशतानि, सप्त
सिराशतानि, द्वे धमनीशते, चत्वारि पेशीशतानि, सप्तोत्तरं मर्मशत,
द्वे पुनः संधिशते, एकोनत्रिंशत्सहस्राणि२ नव च शतानि षट्पञ्चाश-
त्कानि सिराधमनीनामणुशःप्रविभज्यमानानां मुखाग्रपरिमाणं, तावन्ति
१. 'द्वौ श्लेष्मभुवौ' इति च पाठः ।
२ 'एकोनत्रिंशत्' इति च पाठः ।