चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] ६ शारीरस्थानम् ८१
अपने अधिक विपरीत गुणवाले आहार-विहार के निरन्तर सेवन से शरीर के
धातु घटते हैं ॥ ६ ॥
तत्रेमे शरीरधातुगुणाः संख्यासामर्थ्यकराः । तद्यथा—गुरु-लघु-शी-
तोष्ण-स्निग्ध-रूक्ष-मन्द-तीक्ष्ण-स्थिर-सर-मृदु-कठिन-विशद-पिच्छिल-
श्लक्ष्ण-खर-सूक्ष्म-स्थूल-सान्द्र-द्रवाः।तेषु ये गुरुवस्ते गुरुभिराहारगुणैरभ्य-
स्यमानैराप्यायन्ते लघवाश्च ह्रसन्ति, लघवस्तु लघुभिराप्यायन्ते गुरु-
वश्च ह्रसन्ति । एवमेव सर्वधातुगुणानां सामान्ययोगाद् वृद्धिविपर्ययाद्
ह्रासः। एतस्मान्मासमाप्यायते मांसेन भूयन्तरमन्येभ्यः शरीरधातुभ्यः,
तथा लोहितं लोहितेन, मेदो मेदसा, वसा वसया, अस्थि तरुणास्थना,
मज्जा मऽज्ञा, शुक्रं शुक्रेण, गर्भस्त्वामगर्भेण ॥ १० ॥
शरीर धातुओं के गुण, सख्या ( गणना ), तथा सामर्थ्य करने वाले हैं।
जैसे—गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मन्द, तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु,
कठिन, विशद पिच्छिल, श्लक्षण, खर, स्थूल, सान्द्र और द्रव। इनमें जो गुण
गुरु हैं वे गुरु आहार के गुणों के निरन्तर सेवन करने से बढ़ते हैं और लघु
गुणों को घटाते हैं। जो लघु गुण हैं वे लघु आहार के गुणों से निरन्तर बढ़ते
हैं और गुरु गुणों को घटाते हैं। इसी प्रकार सब धातुओं के गुण अपने समान
गुणों के योग से बढ़ते हैं और अपने विपरीत गुणों से कम होते है। इसलिये
शरीरस्थ मास-धातु मास से अन्य सब शरीर धातुओं की अपेक्षा अधिक बढ़ता
है। इसी प्रकार रक्त, रक्त से अधिक बढ़ता है। मेद मेद से, वसा वसा से,
अस्थिया तरुणास्थियों से, मज्जा मज्जा से, शुक्र शुक्र से, गर्भ आमगर्भ से अधिक
बढता है ॥ १० ॥
यत्र त्वेवंलक्षणेन सामान्येन सामान्यवतामाहारविकाराणामसा-
निध्यं स्यात्, सनिहितानां वाऽप्ययुक्तत्वान्नोपयोगो घृणित्वादन्यस्माद्वा
कारणात्, स च धातुरभिवर्धयितव्यः स्यात् । तस्य ये समानगुणाः
स्युराहारविकारा असेव्याश्च, तत्र समानगुणभूयिष्ठानामन्यप्रकृतीनाम-
प्याहारविकाराणामुपयोगः स्यात् ।
तद्यथा—शुक्रक्षये क्षीरसर्पिषोरुपयोगो मधुर-स्निग्ध-समाख्यातानां
चापरेषामेव द्रव्याणा, मूत्रक्षये पुनरिक्षुरस-वारुणी मण्ड-द्रव-मधुराम्ल-
लवणोपक्लेदिनां, पुरीषक्षये कुल्माष-माष-कुष्कुण्डाज मध्य-यव शाक-
धान्याम्लानां, वातक्षये कटुक-तिक्त-कषाय-रूक्ष-लघु-शीतानां, पित्तक्ष-
येऽम्ल-लवण-कटुक-क्षारोष्ण-तीक्ष्णानां, श्लेष्मक्षये स्निग्ध-गुरु-मधुर-