चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 97, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ चरकसंहिता [ अ० ६
सान्द्र-पिच्छिलानां द्रव्याणाम् । कर्मापि च यद्यद्यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्त-
दासेव्यम् । एवमन्येषामपि शरीरधातूनां सामान्यविपर्ययाभ्यां वृद्धिह्रासौ
यथाकालं कार्यौ । इति सर्वधातूनामेकैकशोऽविशेषाश्च वृद्धिकराणि
व्याख्यातानि भवन्ति ॥ ११ ॥
समान गुणवाले विजातीय पदार्थो मे वृद्धि—जहा पर कि इस प्रकार के
लक्षणों वाले समान गुण के आहार विकारों का प्राप्त होना सम्भव न हो, अथवा
प्राप्त होने पर भी घृणा आदि के कारण अथवा धर्म आदि के कारण उपयोग
करने में बाधा पड़ती हो वहा पर विजातीय समान गुण के आहार-विकारों का
उपयोग करना चाहिये । जिससे कि इच्छित धातु [ जिसके लिये समान गुण
वाले आहार विकार घृणा अथवा धर्म के कारण असेव्य हैं उस धातु ] की वृद्धि
हो। जैसे—शुक्र का क्षय होने पर दूध और घी का उपयोग, तथा मधुर और
स्निग्ध विजातीय दूसरे पदार्थों का उपयोग करना । मूत्र का क्षय होने पर गन्ने
का रस, वारुणी, मण्ड तथा कुल्माष, उड़द, कुष्कुण्ड (साप की छतरी), बकरी
का मध्य भाग, जौ, शाक, धान्य और अम्ल आदि वस्तुओं का उपयोग करना
चाहिये । वात का क्षय होने पर कटु, तिक्त, कषाय, रूक्ष, लघु, शीत वस्तुओं
का उपयोग करना चाहिये । पित्त का क्षय होने पर अम्ल, लवण, कटु, क्षार
उष्ण, तीक्ष्ण वस्तुओं का और कफ का क्षय होने पर स्निग्ध, गुरु, मधुर, सान्द्र
और पिच्छिल द्रव्यों का उपयोग करना चाहिये । द्रव्यों की भाति धातु की वृद्धि
करनेवाले समान गुण के अचिन्त्य प्रभाव रूपी कर्म का भी उपयोग करना
चाहिये । इसी प्रकार से अन्य शरीर धातुओं को भी सामान्य और विपर्यय
द्वारा समयानुसार बढ़ाना अथवा घटाना चाहिये । इस प्रकार से सब धातुओं
के पृथक् पृथक् तथा समग्र रूप में वृद्धि तथा ह्रास के कारणों की व्याख्या कर
दी गई है ॥ ११ ॥
कात्स्न्र्येन शरीरवृद्धिकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा—काल-
योगः, स्वभावसंसिद्धिः, आहारसौष्ठवमविघातश्चेति । बलवृद्धिकरा-
स्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा—बलवत्पुरुषे देशे जन्म, बलवत्पुरुषे
काले च । सुखश्च कालयोगो, बीज-क्षेत्र-गुण संपच्चाऽऽहारसंपच्च, शरीरसं-
पच्च, सात्म्यसंपच्च, सत्त्वसंपच्च, स्वभावसंसिद्धिश्च, यौवनं च, कर्म च,
सहर्षश्चेति ॥ १२ ॥
निम्न बाते सम्पूर्ण रूप में सारे शरीर की वृद्धि करते है । जैसे—वृद्धिका-
रक यौवनादि का समय, स्वभाव, अर्थात् अदृष्ट के कारण वृद्धि, उत्तम
आहार और अभिघात (अतिव्यवाय या मनोविघात आदि का न होना ),