चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
५० चरकसंहिता [ अ० ३
कानों से ही शब्दों को सुनता है, अपनी नासिका से गन्धों को पहिचानता है,
अपनी ही रसना से रसों को पहिचानता है, अपनी ही त्वचा से स्पर्श करता है,
अपनी बुद्धि से जानने योग्य बातों को जानता है, इस कारण से जड़ आदि
माता पिता से उत्पन्न सन्तान पूर्ण रूप से पिता के समान नहीं होती तो प्रतिज्ञा-
हानि दोष आता है । क्योंकि ऐसा मानने से आत्मा इन्द्रियो के रहते ज्ञानी और
न रहते अज्ञानी हो जाता है । इस प्रकार आत्मा में ज्ञानी और अज्ञानी ये
दोनों गुण होने सम्भव हों वह आत्मा विकार-प्रकृतिवाला हो जायेगा, परन्तु
आत्मा ‘निर्विकार’ कहा जाता है । यदि चक्षु आदि इन्द्रियों से युक्त होने पर
आत्मा विषयों को जानता है, तो वह निरिन्द्रिय अवस्था में ( चक्षु आदि के
अभाव में ) अज्ञानी बनेगा । अज्ञ होने से अपने उत्पत्ति का कारण भी नहीं हो
सकेगा । कारण न होने से आत्मा की सत्ता भी नहीं रही । इसलिये ‘आत्मा’
यह वचन कहना अर्थरहित शब्दमात्र ही रह जाता है ॥ २२ ॥
आत्रेय उवाच—पुरस्तादेतत्प्रतिज्ञातं—सत्त्वं जीवस्पृक् शरीरेणा-
भिसंबध्नातीति, तस्मात्तु समुदायात्मकः सन् गर्भो मनुष्यविग्रहेण
जायते, मनुष्यो मनुष्यप्रभव इत्युच्यते । तद्वक्ष्यामः-॥ २३ ॥
भगवान् आत्रेय ने कहा—प्रथम यह कहा है कि सत्त्वसंज्ञक मन जीव
आत्मा को स्पृक्शरीर के साथ का सम्बन्ध कराता है, क्योंकि समुदाय द्वारा
उत्पन्न गर्भ मनुष्य रूप से बनता है, मनुष्य से मनुष्य ही उत्पन्न होता कहा
जाता है, उसकी व्याख्या करते हैं ॥ २३ ॥
भूताना चतुर्विधा योनिर्भवति—जरायुवाण्डस्वेदोद्भिदः । तासा
खलु चतसृणामपि योनीनामेकैका योनिरपरिसंख्येयभेदा भवति, भूता-
नामाकृतिविशेषापरिसंख्येयत्वात् । तत्र जरायुजानामण्डजाना च प्राणि-
नामेते गर्भकरा भावा यां या योनिमापद्यन्ते तस्यां तस्यां योनौ तथा-
तथारूपा भवन्ति, तद्यथा कनक-रजत-ताम्र-त्रपु-सीसकान्यासिच्यमा-
नानि तेषु तेषु मधूच्छिष्टविग्रहेषु। ते यदा मनुष्यबिम्बमापद्यन्ते तदा
मनुष्यविग्रहेण जायन्ते, तस्मात्समुदायात्मकः सन् गर्भो मनुष्यविग्र-
हेण जायते, मनुष्यो मनुष्यप्रभव इत्युच्यते, तयोनित्वात् ॥ २४ ॥
प्राणियों की योनि चार प्रकार की है । जरायु, अण्ड, स्वेद और उद्भिद्
इन चारों प्रकार की योनियों में एक एक योनि के असख्य भेद हैं, क्योंकि प्राणी
की आकृतियों के भेद असख्य हैं ।
इन में जरायुज तथा अण्डज प्राणियों के गर्भोत्पादक शुक्र, शोणित आदि
पदार्थ जिस जिस योनि में पहुचते हैं, उसी उसी योनि में उसी उसी रूप के हो
अ० ३ ] शारीरस्थानम् ५१
अ० ३ ] शारीरस्थानम् ५१
जाते हैं । जिस प्रकार पिघल हुए सोना, चादी, ताम्बा, सीसा आदि मोम से
लिप्त मिट्टी के साचे में डालने पर उसी मोम के आकार के पदार्थ बन जाते
हैं, उसी प्रकार मनुष्य के साचे में ढल कर वह मनुष्य रूप के होजाते हैं । इस
कारण से समुदाय से उत्पन्न होने वाला गर्भ मनुष्य रूप में उत्पन्न होता है ।
मनुष्य योनि से उत्पन्न होने से मनुष्य को मनुष्यसे उत्पन्न हुआ कहते हैं ॥२४॥
यच्चोक्तं —यदि च मनुष्यो मनुष्यप्रभवः कस्मान्न जडादिभ्यो
जाताः पितृसदृशरूपा भवन्तीति, तत्रोच्यते-यस्य यस्य ह्यङ्गावयवस्य
बीजे बीजभाग उपतप्तो भवति तस्य तस्याङ्गावयवस्य विकृतिरुपजायते,
नोपजायते चानुपतापात्, तस्मादुभयोपपत्तिरप्यत्र, सर्वस्य चात्मजानी-
न्द्रियाणि, तेषां भावाभावहेतुर्दैव, तस्मान्नैकान्तता जडादिभ्यो जाताः
पितृसदृशरूपा भवन्ति ॥ २५ ॥
और जो यह कहा है कि यदि मनुष्य मनुष्य से उत्पन्न होता है, तो जड़
बुद्धि माता पिता की सन्तान इनके समान जड़बुद्धि क्यों नहीं होती, इसका
उत्तर यह है—शुक्र-शोणित रूप बीज में जिस जिस अवयव का बीज भाग
दूषित रहता है, उसी उसी अवयव में विकृति उत्पन्न हो जाती है । बीज भाग
के दूषित न होने से नहीं होती । इसलिये जड़त्व और अजड़त्व अन्धत्व और
अनन्धत्व दोनों ही बातों का होना सम्भव है। सब प्राणियों की इन्द्रिया आत्म-
कर्म से बनती हैं। इन इन्द्रियों के होने से भाव और न होने से अभाव में दैव
कारण होता है । इस कारण से जड़बुद्धि आदि माता पिता से उत्पन्न सन्तान
अवश्य ही पिता के समान हो, यह आवश्यक नहीं। वे कभी सदृश होते और
कभी नहीं होते हैं ॥ २५ ॥
न चात्मा सत्त्विन्द्रियेष्वसत्सु वा भवत्यज्ञः, न ह्यसत्त्वः कदाचि-
दात्मा; सत्त्वविशेषाच्चोपलभ्यते ज्ञानविशेष इति ॥ २६ ॥
इन्द्रियों के होने पर आत्मा ज्ञानी होता है, यह भी ठीक नहीं है अथवा
इन्द्रियों के न होने पर अज्ञानी रहता है, यह भी नही । क्योंकि आत्मा कभी
भी सत्त्वरहित नहीं रहता । सत्त्व ( मन ) की विशेषता से ज्ञान विशेष प्राप्त
होता है। इसलिये आत्मा का मन के साथ सदा सम्बन्ध रहने पर बाह्य इन्द्रियों
के अभाव में भी नित्य ज्ञान होता रहता है । यही आत्म-ज्ञान है ॥ २६ ॥
भवन्ति चात्र ।
न कर्तुरिन्द्रियाभावात्कार्यज्ञानं प्रवर्तते ।
यैः क्रिया वर्तते या तु सा बिना तैर्न वर्तते ॥ २७ ॥
५२ चरकसंहिता [ अ० ३
जानन्नपि मृदोऽभावात्कुम्भकृन्न प्रवर्तते।
श्रूयतां चेदमध्यात्ममात्मज्ञानबलं महत् ॥ २८ ॥
कर्त्ता को इन्द्रियों के अभाव से बाह्य विषयों का ज्ञान नहीं होता। जो
क्रिया जिन भावों के द्वारा उत्पन्न होती है, उन भावों के बिना वह क्रिया भी
नहीं होती। जिस प्रकार घड़े को बनाने की विधि जानने वाला कुम्हार भी,
मिट्टी न हो तो घड़ा नहीं बना सकता, इसी प्रकार बाह्य विषय का ज्ञान भी,
इन्द्रियों न हों तो नहीं होता। इसलिये इन्द्रियों के न होने से आत्मा का ज्ञानी
होने का गुण नष्ट नहीं होता। इस महान् आत्मज्ञान के महान् बल रूप
अध्यात्म ज्ञान को सुनो ॥ २७-२८ ॥
इन्द्रियाणि च सङ्क्षिप्य मनः संगृह्य चञ्चलम् ।
प्रविश्याध्यात्ममात्मज्ञः स्वे ज्ञाने पर्यवस्थितः ॥ २९ ॥
सर्वत्रावहितज्ञानः सर्वभावान् परीक्षते।
गृह्णीष्व चेदमपरं भरद्वाज विनिर्णयम् ॥ ३० ॥
निवृत्तेन्द्रियवाक्चेष्टः सुप्तः स्वप्नगतान् यदा।
विषयान् सुखदुःखे च वेत्ति नाज्ञोऽप्यत. स्मृत ॥ ३१ ॥
इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटा कर, चंचल स्वभाव वाले मन को आत्मा
से अतिरिक्त विषयों से खींच कर आत्मा में प्रविष्ट करने पर आत्मा आत्मज्ञान
में स्थित होता है। इस अवस्था में वह सब प्रकार के ज्ञान में बे-रोकटोक जा
सकता है, इसी से विना इन्द्रियों के भी सब विषयों को देख लेता है। हे भरद्वाज !
इसलिये इस तत्त्व को भी निश्चय रूप से ग्रहण करो। जिस समय इन्द्रिया, वाणी,
चेष्टायें आदि सब शान्त होती हैं, और सोया हुआ पुरुष स्वप्नावस्था में बाह्य
सुख दुःखों को जानता है, तो भी आत्मा को अज्ञ नहीं कहते। तब भी वह
ज्ञानवान् ही रहता है ॥ २९-३१ ॥
आत्मज्ञानादृते चैकं ज्ञानं किंचिन्न वर्तते।
नह्येको वर्तते भावो वर्तते नाप्यहेतुकः ॥ ३२ ॥
तस्माज्ज्ञः प्रकृतिश्चात्मा द्रष्टा कारणमेव च।
सर्वमेतद्भरद्वाज ! निर्णीतं जहि संशयम् ॥ ३३ ॥ इति ॥
आत्म-ज्ञान- आत्मा को छोड़ कर मनोजन्य या इन्द्रियजन्य ज्ञान अकेला
उत्पन्न नहीं हो सकता। सब अवस्थाओं मे ज्ञान का कारण आत्मा ही है,
क्योंकि असहाय वस्तु अकेली नहीं रह सकती और न बिना कारण के उत्पन्न
हो सकती है। समाधि और स्वप्नावस्था दोनों मे आत्मा ही ज्ञान का कारण
अ० ४ ] शारीरस्थानम् ५३
है। इसलिये आत्मा ज्ञानी है, आत्मा ही प्रकृति ( विकार नहीं ) है, वही सब
कार्यों का देखनेवाला और कारण है। हे भरद्वाज ! आत्मा का ज्ञानी होना
आदि सब बातों का निर्णय कर दिया। अब संशय को छोड़ दो ॥ ३२-३३ ॥
तत्र श्लोकौ— हेतुर्गर्भस्य निर्वृत्तौ वृद्धौ जन्मनि चैव यः ।
पुनर्वसुमतिर्या च भरद्वाजमतिश्च या ॥ ३४ ॥
प्रतिज्ञाप्रतिषेधश्च विशदश्चाऽऽत्मनिर्णयः ।
गर्भावक्रान्तिमुद्दिश्य खुड्डीकां तत् प्रकाशितम् ॥ ३५ ॥
गर्भ के जन्म, निवृत्ति और वृद्धि में जो कारण हैं, उस सम्बन्ध में भगवान्
आत्रेय का जो मत है और जो भरद्वाज मुनि का मत है, भरद्वाज की प्रतिज्ञा
का दोष आदि पुनर्वसु कृत स्थित आत्म-निर्णय, ये सब बातें इस खुड्डीका
गर्भावक्रान्ति नामक अध्याय में भगवान् आत्रेय ने कह दी हैं ॥ ३४-३५ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने खुड्डीकागर्भावक्रान्ति-
शारीरं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः ।
अथातो महती गर्भावक्रान्ति शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'महती गर्भावक्रान्ति' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
यतश्च गर्भः संभवति, यस्मिंश्च गर्भसंज्ञा, यद्विकारश्च गर्भो, यया
चानुपूर्व्याभिनिर्वर्त्तते कुक्षौ, यश्चास्य वृद्धिहेतुः, यतश्चास्याऽजन्म भवति,
यतश्च जायमानः कुक्षौ विनाशं प्राप्नोति, यतश्च कार्त्स्न्येनाविनश्यन्वि-
कृतिमापद्यते, तदनुव्याख्यास्यामः ॥ ३ ॥
जिन कारणों से गर्भ होता है, जिनसे कि इसकी गर्भ संज्ञा होती है, जिन
विकारों का परिणाम गर्भ है, जिस अनुक्रम से गर्भाशय या माता के कोख में
गर्भ बनता है, जो इस गर्भ की वृद्धि के कारण हैं, जिन कारणों से इसका जन्म
नहीं होता, जिन कारणों से कोख में उत्पन्न होकर भी नष्ट हो जाता है और
जिन कारणों से गर्भ सम्पूर्ण रूप से नष्ट न होकर विकृति को प्राप्त हो जाता है,
अब उनका वर्णन करेंगे ॥ ३ ॥
५४ चरकसंहिता [अ० ४
मातृजः पितृज आत्मजः सात्म्यजो रसजः सत्त्वज इत्येतेभ्यो भावेभ्यः
समुदितेभ्यो गर्भः संभवति। तस्य येऽवयवा यतो यतः संभवतः
संभवन्ति तान्विभज्य मातृजादीनवयवान् पृथक्पृथगुक्तमग्रे ॥ ४ ॥
माता, पिता, आत्मा, सात्म्य, रस, सत्त्व इन छ भावों के समुदाय से गर्भ
बनता है। इस गर्भ के जो जो अवयव जिस जिस पदार्थ से उत्पन्न होते हैं,
उन सब माता आदि पदार्थों को पृथक् पृथक् रूप मे विभाग करके प्रथम कह
चुके हैं ॥ ४ ॥
शुक्रशोणितजीवसंयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भसंज्ञा भवति ॥ ५ ॥
जिस समय गर्भाशय में शुक्र, शोणित और जीव (आत्मा) का संयोग
होता है, उस समय इनकी 'गर्भ' संज्ञा होती है ॥ ५ ॥
गर्भस्तु खल्वन्तरिक्ष-वाय्वग्नि-तोय-भूमि-विकारश्चेतनाधिष्ठान
भूतः। एवमनयैव युक्त्या पञ्चमहाभूतविकारसमुदायात्मका गर्भश्चेत-
नाधात्वधिष्ठानभूतः, स ह्यस्य षष्ठो धातुरुक्तः ॥ ६ ॥
गर्भ आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी इन पंच महाभूतों के विकार
तथा चेतना इन छः धातुओं का अधिष्ठान अर्थात् आश्रय है। इस प्रकार से
यह ५च महाभूतो के विकार से बना गर्भ चेतना (आत्मा) धातु का आश्रय
होता है। यही चेतना (आत्मा) इस गर्भ का छठा धातु कहाता है। [धारण
करने से 'धातु' कहाता है। आत्मा गर्भ को धारण करता है, इसलिये इसे भी
'धातु' शब्द से कहा है।] ॥ ६ ॥
यथा चाऽऽनुपूर्व्याऽभिनिर्वर्तते कुक्षौ तदनुव्याख्यास्यामः-गते पुराणे
रजसि नवे चावस्थिते,पुनः शुद्धस्नानां स्त्रियमव्यापन्न-योनि-शोणित-गर्भा-
शयामृतुमतीमाचक्ष्महे, तया सह तथाभूतया यदा पुमानव्यापन्नबीजो
मिश्रीभाव गच्छति तस्य हर्षोदीरितः पर शरीरधात्वात्मा शुक्रभूतोऽ-
ङ्गादङ्गात्सभवति, स तथा हर्षभूतेनात्मनोदीरितश्चाधिष्ठितश्च बीजरूपो
धातुः पुरुषशरीरादभिनिष्पत्योचितेन पथा गर्भाशयमनुप्रविश्याऽऽर्तवे-
नाभिसंसर्गमेति ॥ ७ ॥
गर्भाशय में जिस क्रम से गर्भ का विकास होता है उसका वर्णन करते हैं-
पुराने ऋतुकाल के क्रम से संचित रज के निवृत्त होने और नये रज के उप-
स्थित होने पर स्नान क्रिया द्वारा शुद्ध हुई, रोग रहित योनि, आर्तव और गर्भा-
शयवाली स्त्री को हम 'ऋतुमती' कहते हैं। इस ऋतुमती स्त्री के साथ रोग-
रहित बीजवाला पुरुष जिस समय संयोग करता है, उस समय हर्ष के कारण
अ० ४] शारीरस्थानम् ५५
अ० ४] शारीरस्थानम् ५५
शरीर का श्रेष्ठ धातुस्वरूप शुक्र शरीर के प्रत्येक अंग से उत्पन्न होता है। वह
हर्ष के कारण उत्पन्न तथा हर्ष के ही द्वारा प्रेरित होकर आत्मा का आश्रय भूत
यह बीज रूप धातु पुरुष के शरीर से बाहर आकर उचित मार्ग से गर्भाशय में
प्रवेश करके आर्तव के साथ मिलता है ॥ ७ ॥
तत्र पूर्वं चेतनाधातुः सत्वकरणो गुणग्रहणाय प्रवर्तते । स हि
हेतुः कारणं निमित्तमक्षरं कर्ता मन्ता वेदिता बोद्धा द्रष्टा धाता ब्रह्मा
विश्वकर्मा विश्वरूपः पुरुषः प्रभवोऽव्ययो नित्यो गुणी ग्रहणं प्रधान-
मव्यक्तं जीवो ज्ञः पुद्गलश्चेतनावान्विभुर्भूतात्मा चेन्द्रियात्मा
चान्तरात्मा चेति ॥ ८ ॥
सबसे प्रथम मन के साधनवाला चेतना-धातु गुण को ग्रहण करने के लिये
प्रवृत्त होता है। उसी चेतना धातु को हेतु, कारण, निमित्त, अक्षर, कर्त्ता,
मन्ता, वेदिता, बोद्धा, द्रष्टा, धाता, ब्रह्मा, विश्वकर्मा, विश्वरूप, पुरुष, प्रभव,
अव्यय, नित्य, गुणी (गुणवान्), ग्रहण (मूर्त्ता को ग्रहण करने वाला), प्रधान,
अव्यक्त, जीव, ज्ञ, पुद्गल, चेतनावान्, विभु, भूतात्मा, इन्द्रियात्मा और अन्त-
रात्मा इन पर्यायों से कहते हैं ॥ ८ ॥
स गुणोपादानकालेऽन्तरिक्षं पूर्वतरमन्येभ्यो गुणेभ्य उपादत्ते;
यथा प्रलयात्यये सिसृक्षुर्भूतान्यक्षरभूतः सत्त्वापादानः पूर्वतरमाकाशं
सृजति, ततः क्रमेण व्यक्ततरगुणान्धातृन्वाय्वादींश्चतुरः, तथा देह-
ग्रहणेऽपि प्रवर्तमानः पूर्वतरमाकाशमेवोपादत्ते, ततः क्रमेण व्यक्ततर-
गुणान्धातूनवाय्वादींश्चतुरः, सर्वमपि तु खल्वेतद् गुणोपादानमणुना
कालेन भवति ॥ ९ ॥
वह चेतना धातु गुणों के उत्पत्ति काल में अन्य वायु आदि गुणों से पूर्व,
सब से प्रथम अन्तरिक्ष का ग्रहण करता है। क्योकि प्रलय के अनन्तर सृष्टि
के प्रारम्भ में सृष्टि को बनाने की इच्छा वाला प्रधान, अक्षर, पुरुष, सत्त्व को
लेकर सब से प्रथम आकाश को बनाता है। इसके बाद क्रम से अधिक
व्यक्त गुणों वाले वायु आदि चार धातुओं को उत्पन्न करता है। उसी
प्रकार देह के ग्रहण करने के अवसर में भी प्रवृत्त हुआ आत्मा सबसे पूर्व
आकाश को ही ग्रहण करता है, फिर क्रम से उससे अधिक स्पष्ट गुणों
वाले वायु आदि चार धातुओं को लेता है। इनके गुणों का पूर्ण रीति से
ग्रहण करना बहुत थोड़े समय मे ही हो जाता है। [इस प्रकार आकाश
में एक गुण, वायु में दो गुण (शब्द, स्पर्श), अग्नि में तीन गुण
५६ चरकसंहिता [ अ० ४
(शब्द, स्पर्श, रूप), जल में चार गुण (शब्द, स्पर्श, रूप और रस) और
पृथ्वी में पाच गुण (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) उत्पन्न करता है।]
इसी प्रकार शरीर में गुण उत्पन्न करने में प्रवृत्त होने पर भी सब से प्रथम
आकाश के गुण को ही उत्पन्न करता है, इसके पीछे क्रम से स्पष्ट गुणवाले
वायु आदि भूतों को उत्पन्न करता है। भूतों के गुणों का ग्रहण बहुत ही थोड़े
समय मे हो जाता है। [जिस प्रकार सूर्य कान्तमणि में सूर्य की किरणें आती हुई
नहीं दीखतीं, परन्तु रूई तिनके के जलने से किरणो का आना प्रतीत होता है,
उसी प्रकार शरीर के अन्दर भूतों के कार्य से इनके गुणों का तथा चेतना धातु
का अनुमान होता है] ॥ ६ ॥
स तु सर्वगुणवान् गर्भत्वमापन्नः प्रथमे मासि समूर्च्छितः सर्वधा-
तुकलनीकृतः खेटभूतो भवत्यव्यक्तविग्रहः सदसद्भूताङ्गावयवः ॥१०॥
द्वितीये मासि घनः संपद्यते- पिण्ड पेश्यर्बुदं वा, तत्र घनः
[पिण्डः] पुरुषः, स्त्री पेशी, अर्बुदं नपुंसकम् ॥ ११ ॥
तृतीये मासि सर्वेन्द्रियाणि सर्वाङ्गावयवाश्च योगपद्येनाभिनिर्व-
र्त्तन्ते ॥ १२ ॥
गर्भ का प्रथम रूप खेट-सव गुणों वाला यह चेतना धातु गर्भ रूप में
होकर प्रथम मास में मूर्च्छित, निश्चेष्ट, गतिरहित अव्यक्त, सम्पूर्ण धातुओं वाला,
श्लेष्मा के पिण्ड के समान होता है, उस समय उसका शरीर अस्पष्ट रूप अंगों
वाला होता है, उस समय उसके अंग पृथक् २ नहीं बने होते। उस समय
उसका नाम 'खेट' होता है।
घन-दूसरे मास में यह गर्भ रूप धातु कठिन, पिण्ड गोल माठ के आकार
का वा पेशी-लम्बो मास पेशी के समान वा अर्बुद-गोल और ऊची गांठ
के समान बन जाता है। इन में से घन (पिण्ड) रूप हो तो पुरुष, पेशी हो तो
स्त्री, अर्बुद हो तो नपुंसक होता है। तीसरे मास में सम्पूर्ण इन्द्रिया और शिर
आदि सब अंग तथा आमाशय आदि अवयव एक साथ बनने लगते हैं ॥१२॥
तत्रास्य केचिदङ्गावयवा मातृजादीनवयवान् विभज्य पूर्वमुक्ता
यथावत्, महाभूतविकारप्रविभागेन त्विदानीमस्य तांश्चैवाङ्गावयवान्
कांश्चित्पर्यायान्तरेणापरांश्चानुव्याख्यास्यामः - मातृजादयोऽप्यस्य महा-
भूतविकारा एव। तत्रास्याऽऽकाशात्मकं - शब्दः श्रोत्रं लाघवं सौक्ष्म्यं
विवेकश्च । वाय्वात्मकं-स्पर्शः स्पर्शनं रौक्ष्यं प्रेरणं धातुव्यूहनं चेष्टाश्च
शारीर्यः । अग्न्यात्मकं- रूप दर्शनं प्रकाशः पक्तिरौष्ण्यं च । अबात्मकं
अ० ४ ] शारीरस्थानम् ५७
रसो रसन शत्य मार्दवः स्नेहः क्लेदश्च । पृथिव्यात्मक गन्धो घ्राण
गौरवं स्थैर्यं मूर्तिश्च ॥ १३ ॥
गर्भ के अंग और अवयवों में से कुछ अवयव जो कि माता आदि से उत्पन्न
होते हैं, प्रथम कह चुके हैं । उन प्रथम कहे हुए अवयवों को भी अब दूसरे
प्रकार से महाभूतों का प्रविभाग करते हुए क्रम से प्राप्त तथा अन्य न कहे हुए
अंगों ( अवयवों ) का भी वर्णन करेंगे ।
माता आदि से उत्पन्न होने वाले गर्भ के अवयव भी पांचों महाभूतों के
विकार ही हैं । इनमें इस गर्भ के शब्द, श्रोत्र, लघुता, अति सूक्ष्मता और
विवेक ये अश आकाश से उत्पन्न होते हैं। वायु से स्पर्श, त्वचा, रूक्षता,
प्रेरण, धातु रचना और शारीरिक चेष्टायें उत्पन्न होती हैं । अग्नि से रूप, चक्षु,
प्रकाश, पाचन और उष्णिमा ये अंश उत्पन्न होते हैं । जल से रस, रसना,
शीतलता, कोमलता, स्नेह और क्लेद ये अंश उत्पन्न होते है । पृथिवी से गन्ध,
नासिका, भारीपन, स्थिरता ओर कठिनता ये अंश उत्पन्न होते हैं ॥ १३ ॥
एवमयं लोकसमितः पुरुषः । यावन्तो हि लोके भावविशेषास्ता-
वन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे, तावन्तो लोके, इति बुधास्त्वेवं द्रष्टु-
मिच्छन्ति ॥ १४ ॥
पुरुष की लोकतुल्यता—इस प्रकार पाच महाभूतों के विकारो से बना होने
के कारण यह पुरुष लोक समित अर्थात् लोक के तुल्य है । लोक में जितने भी
आध्यात्मिक अथवा अहंकार आदि भौतिक पदार्थ विशेष हैं, उतने ही सब
पदार्थ इस पुरुष मे भी हैं और जितने भाव ( पदार्थ ) पुरुष में हैं, उतने ही
इस लोक में हैं । इस प्रकार से लोक और पुरुष की समानता ज्ञानी पुरुष
देखना चाहते है ॥ १४ ॥
एवमस्येन्द्रियाण्यङ्गावयवाश्च यौगपद्येनाभिनिर्वर्तन्ते, अन्यत्र तेभ्यो
भावेभ्यो येऽस्य जातस्योत्तरकालं जायन्ते, तद्यथा—दन्ता व्यञ्जनानि
व्यक्तीभावः, तथायुक्तानि चापराणि, एषा प्रकृतिः, विकृति पुनरतोऽ-
न्यथा । सन्ति खल्वस्मिन् गर्भे केचिच्च नित्या भावाः, सन्ति चानित्याः
केचित् । तस्य य एवाङ्गावयवाः सन्तिष्ठन्ते, त एव स्त्रीलिङ्गं पुंल्लिङ्गं
नपुंसकलिङ्गं वा बिभ्रति । ततः स्त्रीपुरुषयोर्ये वैशेषिका भावाः प्रधान-
संश्रया गुणसंश्रयाश्च, तेषां यतो भूयस्त्वं ततोऽन्यतरभावः । तद्यथा—
क्लैव्यं भीरुत्वमवैशारद्यमनवस्थानमधोगुरुत्वमसहनन शैथिल्यं मार्दवं
५८ चरकसंहिता [ अ० ४
तथायुक्तानि चापराणि स्त्रीकराणि, अतो विपरीतानि पुरुषकराणि, उभ-
यभागावयवा नपुंसककराणि ॥ १५ ॥
इस प्रकार से इस गर्भ की इन्द्रिया, अंग और अवयव एक साथ बनने
प्रारम्भ हो जाते है। परन्तु जो पदार्थ इस गर्भ की उत्पत्ति के पीछे बनते
हैं, वे गर्भ में बनने आरम्भ नहीं होते । जैसे-दात, व्यञ्जन, (मूँछ, दाढ़ी
आदि) शुक्र और रज की उत्पत्ति तथा स्थूल मास आदि ये देर में उत्पत्ति के
पीछे बनने प्रारम्भ होते हैं। यह तो मनुष्य की प्रकृति अर्थात् स्वभाव है और
इसके विपरीत जब कभी दात आदि गर्भ में ही बन जाते हैं, तब यह विकृति
कहाती है। इस गर्भ में कुछ पदार्थ नित्य होते हैं। जो जब तक शरीर रहता
है तब तक रहते हैं जमे-हाथ, पाँव आदि और कुछ भाव अनित्य हैं जो
शरीर के साथ सदा नहीं रहते जैसे-दान आदि । इस गर्भ मे शरीर के
साथ जो अग या अवयव रहते हैं वे ही अवयव स्त्रीलिंग पुरुपलिंग या नपुंसक-
लिंग के लक्षणों को धारण करते हैं। इनमें स्त्री और पुरुष के लक्षणों में ज-
विशेष लक्षण भेदक होते हैं, वे प्रधान या मुख्य होते हैं, जिन गुणों की प्रथा-
नता वा अधिकता रहती है, वही विशेष लिंग या चिह्न बनते हैं। अधिकता न
रहने पर वे विपरीत होते हैं। जैसे-क्लीवता, भीरुत्व, मोह, चंचलता, कटि से
निचले भाग का भारी होना, शरीर का संगठित न होना, शिथिलता, कोमलता
तथा स्तन आदि, अन्य जन्म के उपरान्त होने वाले लक्षणों का होना, स्त्रीलिंग
की उत्पत्ति में कारण है। इन लक्षणों से विपरीत लक्षणों का होना पुरुष की
उत्पत्ति मे कारण है। दोनों प्रकार के अवयव वा लक्षण नपुंसक की उत्पत्ति
में कारण हैं॥ १५ ॥
तस्य यत्कालमेवेन्द्रियाणि सन्तिष्ठन्ते, तत्कालमेवास्य चेतसि वेदना
निबन्धं प्राप्नोति, तस्मात्तदा प्रभृति गर्भः स्पन्दते प्रार्थयते च, तद्द्वै-
हृद्य्यमाचक्षते वृद्धा । मातृजं चास्य हृदय मातृहृदयेनाभिसम्बद्धं
भवति रसवाहिनीभि संवाहिनीभिः, तस्मात्तयोस्ताभिर्भक्तिः संप-
द्यते। तच्चैव कारणमवेक्षमाणा न द्वैहृद्य्यस्य विमानितं गर्भमिच्छन्ति
कर्तु, विमानने ह्यस्य दृश्यते विनाशो विकृतिर्वा, समानयोगक्षेमा हि
माता तदा गर्भेण केषुचिदर्थेषु । तस्मात्प्रियहिताभ्यां गर्भिणीं विशेषेणो-
पचरन्ति कुशलाः ॥ १६ ॥
गर्भ की इन्द्रिया जिस समय बनती है, उसी समय चित्त में सुख दुःख के
ज्ञान का सम्बन्ध भी हो जाता है। इसलिये तब से लेकर गर्भ स्पन्दन (गति)
अ० ४ ] शारीरस्थानम् ५६
किया करता है, वह नाना वस्तुओं की याचना करता है। अतः ज्ञानी पुरुष उस
समय माता के शरीर में 'द्वैहृदय्य' अर्थात् दो हृदय बने बतलाते हैं। इस गर्भ का
हृदय माता से बनता है, गर्भ का हृदय गर्भ का पोषण करने वाली रसवाहिनी
नाड़ियों द्वारा माता के हृदय के साथ सम्बन्धित रहता है। इसलिये माता और
गर्भ की इच्छा रसवाहिनी नाड़ी द्वारा मिली रहती है। उस समय माता की इच्छा
गर्भ की इच्छा होती है। इसी कारण को देख कर विद्वान् लोग गर्भवती माता
की इच्छा का व्याघात करना उचित नहीं जानते। इस माता की इच्छा का
विनाश करने मे गर्भ की मृत्यु अथवा गर्भ मे विकार आ जाता है। कुछ बातों
में माता और गर्भ का योग और क्षेम (सुख और रक्षा आदि) समान होता
है। इसलिये कुशल पुरुष प्रिय और हितकारक उपचारों से गर्भिणी का विशेष
रूप मे उपचार करते हैं ॥१६॥
तस्या गर्भापन्नेद्वैहृदय्यस्य च विज्ञानार्थं लिङ्गानि समासेनोपदे-
क्ष्यामः। उपचारसाधन ह्याज्ञाने दोषः । ज्ञानं च लिङ्गतः । तस्मा-
दिष्टो लिङ्गोपदेशः । आर्तवादर्शनमास्यसंस्रवणमन्नाभिलाषश्छर्दिर-
रोचकोऽम्लकामता च विशेषेण श्रद्धाप्रणयनं चोच्चावचेषु भावेषु गुरु-
गात्रत्वं चक्षुषोग्लानिः स्तनयोः स्तन्यमोष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च कार्ण्य-
मत्यर्थं श्वयथुः पादयोरीषल्लोमराड्युद्गमो योन्याश्च चाटालत्वमिति
गर्भे पर्यागते रूपाणि र्भवन्ति ॥ १७॥
दो हृदयो के लक्षण—स्त्री के गर्भ स्थिर हो जाने और उसके द्वैहृदय्य
अर्थात् दो हृदय हो जाने को पहचानने के लिये सक्षेप में लक्षण कहते हैं।
लक्षणो का ज्ञान होने से ही परिचर्य्या ठीक २ प्रकार से होती है। विशेष लक्षणों
से ही ज्ञान हो सकता है। इसलिये लक्षणों का उपदेश करना आवश्यक है।
जैसे—आर्त्तव का दिखाई न देना, मुख से पानी बहना, भोजन में अनिच्छा,
वमन (प्रात काल मे विशेष), अरुचि, खटाई की विशेष इच्छा, नाना खाद्य
पदार्थों में इच्छा, शरीर में भारीपन, आँखों में ग्लानि, स्तनों में दूध, ओठ
और चूचकों के चारों ओर खूब गहरे काले रग का निक्षेप होना, पावो मे थोड़ा
थोड़ा सूजन, शरीर में रोमांच, योनि में फैलाव ये गर्भ के आने के उपरान्त
(दो-हृदय होने) के लक्षण हैं ॥१७॥
सा यद्यदिच्छेत्तत्तदस्य दद्यादन्यत्र गर्भोपघातकरेभ्यो भावेभ्यः।
उस समय गर्भिणी जो जो वस्तु चाहे वह वह इसको देनी चाहिये, परन्तु
गर्भ को हानि पहुचानेवाले कोई पदार्थ नहीं देना चाहिये।
६० चरकसंहिता [ अ० ४
गर्भोपघातकरास्त्विमे भावाः । तद्यथा—सर्वमतिगुरूष्णतीक्ष्णं
दारुणाश्च चेष्टाः । इमांश्चान्यानुपदिशन्ति वृद्धाः-देवतारक्षोऽनुचरपरि-
रक्षणार्थं न रक्तानि वासांसि बिभृयान्न मदकराणि चाद्यान्यभ्यवहरेन्न
यानमधिरोहेन्न मांसमश्नीयात्सर्वेन्द्रियप्रतिकूलांश्च भावान् दूरतः परि-
वर्जयेद्यच्चान्यदपि किंचिल्स्त्रियो विद्युः ॥ १८ ॥
ये नीचे लिखी बातें गर्भ का नाश करनेवाली हैं। जैसे—बहुत गुरु,
बहुत गरम और बहुत तीक्ष्ण सब पदार्थ ओर दारुण दु खदायी चेष्टायें गर्भ को
हानि पहुँचाने वाला है। वृद्ध, ज्ञानी पुरुष नीचे लिखी बातों को भी गर्भ को
हानि करने वाली बतलाते हैं। जैसे—देवों और राक्षसों के भृत्यों से बचने के
लिये गर्भिणी लाल वस्त्रों को न पहिने, मद करने वाले खाद्य पदार्थों को न
खावे, सवारी पर न चढ़े, मांस नहीं खावे, इन्द्रियों के प्रतिकूल सब बातों को
दूर से ही छोड़ देवे। इनके अतिरिक्त और भी जिन २ बातों को वृद्ध स्त्रियो
बतलावे उनको भी त्याग देव । [ जैसे—कुए में झाँकना, कोठे पर ऊँचा
चढ़ना, नदी का तैरना आदि ] ॥१८॥
तीव्राया तु खलु प्रार्थनायां काममहितमप्यस्यै हितेनोपहितं दद्या-
त्प्रार्थनाविनयनार्थामति । प्रार्थनासंधारणाद्धि वायुः कुपितोऽन्त. शरीर-
मनुचरन् गर्भस्यापद्यमानस्य विनाशं वैरूप्यं वा कुर्यात् ॥ १९ ॥
तीव्र माग होने पर अहितकारक वस्तु भी हितकारक पदार्थ के साथ गर्भिणी
को देनी चाहिये। जिससे कि माग या इच्छा या चाह को आघात न पहुँचे ।
क्योंकि इच्छा का विघात होने से वायु कुपित होकर शरीर के अन्दर फिरता हुआ
गर्भ को नाश वा विकृत कर देता है ॥१९॥
चतुर्थे मासि स्थिरत्वमापद्यते गर्भः, तस्मात्तदा गर्भिणी गुरुगात्रत्व-
मधिकमापद्यते विशेषेण ॥ २० ॥
चतुर्थ मास मे गर्भ स्थिर हो जाता है। इसलिये तब से गर्भिणी का शरीर
भारी हाने लगता है ॥२०॥
पञ्चमे मासि गर्भस्य मासशोणितोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो
मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी कार्श्यमापद्यते विशेषेण ॥ २१ ॥
पाचवे मास में गर्भ के अन्दर अन्य मासों की अपेक्षा मास और रक्त का
अधिक सञ्चय होता है। इसलिये इस मास में गर्भिणी विशेष कमजोर हा
जाती है ॥ २१ ॥
अ० ४ ] शारीरस्थानम् ६१
षष्ठे मासि गर्भस्य बलवर्णोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः ।
तस्मात्तदा गर्भिणी बलवर्णहानिमापद्यते विशेषेण ॥ २२ ॥
छठे महिने में और मासों की अपेक्षा गर्भ में बल और वर्ण की वृद्धि विशेष
रूप से होती है । इसलिये इस मास में गर्भिणी के अन्दर बल और वर्ण की
विशेष हानि होती है ॥ २२ ॥
सप्तमे मासि गर्भः सर्वैर्भावैराप्याय्यते, तस्मात्तदा गर्भिणी सर्वो-
त्कारैः क्लान्ततमा भवति ॥ २३ ॥
सातवें मास मे गर्भ मे मास, रक्त आदि सब पदार्थ एक साथ बढ़ते हैं ।
इसलिये इस मास में गर्भिणी के अन्दर मास, रक्त आदि सब प्रकार से घट
जाते हैं, अतः वह सब प्रकार से कृश हो जाती है ॥ २३ ॥
अष्टमे मासि गर्भश्च मातृतो गर्भतश्च माता रसवाहिनीभिः संवा-
हिनीभिर्मुहुरोजः परस्परत आददातेग र्भस्यासंपूर्णत्वात्, तस्मात्तदा
गर्भिणी मुहुर्मुहुर्मुदा युक्ता भवति मुहुर्मुहुश्च ग्लाना तथा गर्भः, तस्मा-
त्तदा गर्भस्य जन्म व्यापत्तिमद्भवत्योजसोऽनवस्थितत्वात्, त चैवमभि-
समीक्ष्याष्टमं मासमगण्यमित्याचक्षते कुशलाः ॥ २४ ॥
आठवे मास में रस को ले जाने वाली रसवाहिनी नाड़ियों द्वारा ओज माता
से गर्भ में और गर्भ से माता मे बार बार कभी इधर कभी उधर परस्पर आता
जाता रहता है । क्योंकि इस समय गर्भ असम्पूर्ण रहता है । इसलिये इस समय
गर्भिणी बार बार प्रसन्न और बार बार म्लान होती है । इसी प्रकार गर्भ भी
बार बार प्रसन्न और बार बार म्लान होता है । जिस समय ओज माता मे रहता
है तब माता प्रसन्न और गर्भ म्लान और जब ओज गर्भ में रहता है उस समय
गर्भ प्रसन्न और माता म्लान रहती है । इसलिये ओज के स्थिर न होने से
गर्भ का जन्म आपत्तिजनक होता है । इस मास में जन्मा हुआ गर्भ निश्चित
रूप में जीवित उत्पन्न नही होता । गर्भ में ओज हो तब यदि गर्भ बाहर आये
तो बालक जीवित बाहर आता है, परन्तु माता की मृत्यु होना सम्भव है ।
यदि ओज माता में हो तब गर्भ बाहर आये तो मृत बालक बाहर आता है ।
इस दृष्टि से ज्ञानी पुरुष आठवे मास को गर्भिणी के सामने नही गिनते । क्योंकि
यदि इसी मास की उत्पत्ति को गर्भिणी सुन ले तो सम्भवतः डर जाये । इस
भय के कारण वायु कुपित होकर गर्भ का नाश कर सकता है ॥ २४ ॥
तस्मिन्नेकदिवसातिक्रान्तेऽपि नवमं मासमुपादाय प्रसवकाळ-
मित्याहुरादशमान्मासात्, एतावान्कालः, परं कुक्षाववस्थानं गर्भस्य ॥२५॥
एवमनयाऽनुपूर्व्याऽभिनिर्वर्तते कुक्षौ ॥ २६ ॥
आठवें मास के व्यतीत होने पर एक दिन चढने पर नवम मास से लेकर
दस वें मास तक के समय तक 'प्रसव-काल' कहते हैं । [ सुश्रुत मे बारहवें मास
तक प्रसव काल माना है । साधारणत. २८० दिन के पश्चात् प्रसव काल होता
है ] । इसके उपरान्त गर्भ का कुक्षि मे अधिक समय रहना दोषयुक्त, रोग
आदि के कारण जानना चाहिये । इस प्रकार उपरोक्त क्रम से गर्भ कुक्षि म
बनता ओर वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ २५-२६ ॥
मात्रादीनां तु खलु गर्भकराणां भावानां संपदस्तथा वृत्तस्य सौष्ठ-
वान्मातृतश्चैवापस्नेहोपस्वेदाभ्यां कालपरिणामात्स्वभावसंसिद्धेश्च कुक्षौ
वृद्धिं प्राप्नोति ॥ २७ ॥
गर्भ की वृद्धि के कारण—गर्भ को बनाने वाले माता-पिता आदि कारणों
के उत्तम होने से, आचार की श्रेष्ठता मे, उपस्नेह तथा उपस्वेद [ शरीर की
गरमी जैसे की पक्षियों के शरीर की गरमी से अण्डे पोषित होते हैं ] इन
गुणों से, काल के परिणाम से और स्वभाव से ही गर्भ गर्भाशय से बढता है ॥२७॥
मात्रादीनां तु खलु गर्भकराणां भावानां व्यापत्तिनिमित्तमस्या जन्म
भवति ॥ २८ ॥
ये त्वस्य कुक्षौ वृद्धिहेतुसमाख्याता भावास्तेषां विपर्ययादुदरे विना-
शमापद्यतेऽथवाऽप्यचिरजातः स्यात् ॥ २९ ॥
गर्भ को बनाने वाले माता पिता आदि कारणों के दूषित होने से गर्भ का
जन्म नहीं होता । जो पदार्थ गर्भाशय मे गर्भ की वृद्धि मे कारण बतलाये हैं, इन
के विपरीत होने से गर्भ या तो पेट मे नष्ट हो जाता है, अथवा समय से पूर्व
उत्पन्न हो जाता है ॥ २८-२६ ॥
गर्भविकृति के कारण—
यतस्तु कार्त्स्न्येनाविनश्यन्विकृतिमापद्यते तदनुव्याख्यास्यामः—
यदा स्त्रिया दोषप्रकोपणोक्तान्यासेवमानायाः दोषाः प्रकुपिताः शरीरमु-
पसर्पन्तः शोणितगर्भाशयावुपपद्यन्ते न तु कार्त्स्न्येन शाणितगर्भाशयो
दूषयन्ति तदेयं गर्भं लभते स्त्री । यदा गर्भस्य तस्य मातृजानामवय-
वानामन्यतमोऽवयवो विकृतिमापद्यते एकोऽथवाऽनेके । यस्य यस्य
ह्यवयवस्य बीजे बीजभागे वा दोषाः प्रकोपमापद्यन्ते, तं तमवयवं
विकृतराविशति, यदा ह्यस्याः शोणिते गर्भाशयबीजभागः प्रदोषमाप-
द्यते, तदा वन्ध्यां जनयति । यदा पुनरस्याः शोणिते गर्भाशयबीजभा-
गावयवः प्रदोषमापद्यते, तदा पूतिप्रजां जनयति । यदा त्वस्याःशोणिते
गर्भाशयबीजभागावयवः स्त्रीकराणां च शरीरबीजभागानामेकदेशः
प्रदोषमापद्यते, तदा स्त्र्याकृतिभूयिष्ठामस्त्रियं वान्ता १ नाम जनयति ।
ता स्त्रीव्यापदमाचक्षते ॥ ३० ॥
जिस प्रकार गर्भ सम्पूर्ण रूप से नष्ट न होकर विकृति को प्राप्त हो जाता है,
उसका वर्णन करते हैं—जिस समय दोषो को प्रकुपित करने वाले कारणो का
सेवन करती हुई स्त्री में प्रकुपित हुए दोष शरीर में फैल कर रक्त और गर्भाशय
मे पहुंच जाते हैं, परन्तु सम्पूर्ण रूप से रक्त और गर्भाशय को दूषित नहीं करते,
उस समय यदि स्त्री को गर्भ रह जाये तो माता से उत्पन्न होने वाले गर्भ के
अवयवों में से किसी एक में अथवा बहुतों में विकार उत्पन्न हो जाता है।
जिस जिस अवयव के बीज में अथवा बीज के एक भाग मे दोष प्रकुपित होते
हैं, तब उस उस अवयव में विकृति उत्पन्न हो जाता है। जिस समय स्त्री के
रक्त में गर्भाशय का बीज ( उत्पत्ति कारण ) भाग दूषित हो जाता है, तब तब
संतान वन्ध्या ( बांझ ) उत्पन्न होती है और जब स्त्री का रक्त या गर्भाशय के
बीज का एक भाग दूषित होता है, तब 'पूति प्रजा' ( सडे अगों वाली ) सन्तान
उत्पन्न होती है। जिस समय स्त्री का रक्त और गर्भाशय के बीज का एक भाग
तथा स्त्री को बनाने वाले शरीर के बीजभागों का एक भाग दूषित हो जाता है,
तब स्त्री के लक्षणों वाली ( उपस्थ, स्तन आदि लक्षणों से युक्त ) परन्तु अस-
म्पूर्ण लक्षणों वाली 'रान्ता' या बार्त्ता नाम की प्रजा को उत्पन्न करते हैं।
इसको स्त्री व्यापत् अर्थात् स्त्री के आर्तव दोष से उत्पन्न व्यापत्ति वा स्त्री शरीर
की रचना में होने वाली हानि कहते हैं ॥ ३० ॥
एवमेव यदा पुरुषस्य बीजे बीजभाग प्रकोषमापद्यते, तदा वन्ध्यं
जनयति । यदा पुनरस्य बीजे बीजभागावयवः प्रदोषमापद्यते तदा
पूतिप्रजा जनयति । यदा त्वस्य बीजे बीजभागावयवः पुरुषकराणां च
शरीरबीजभागानामेकदेशः प्रदोषमापद्यते, तदा पुरुषाकृतिभूयिष्ठमपु-
रूप तृणपूलिक नाम जनयति, ता पुरुषव्यापदमाचक्षते ॥ ३१॥
इसी प्रकार पुरुष के बीज में बीज का भाग दोष युक्त होता है, तब
पुरुष वन्ध्य को उत्पन्न करता है और जब पुरुष के बीज मे पुरुष का
उत्पन्न करने वाले बीज का एकभाग दूषित होता है तब 'पूति प्रजा' अर्थात्
दुर्गन्धयुक्त अगो वाली सतान उत्पन्न होती है और जब पुरुष के बीज को
१ 'वार्ता नाम' इति च पाठः ।
६४ चरकसंहिता [ अ० ४
उत्पन्न करने वाले बीज का कोई एक भाग का भी कोई अंश दूषित होता है,
तथा पुरुष-शरीर को बनाने वाले भागों का एक अंश दूषित हो जाता है, तब
पुरुष के समान बहुत सी आकृति वाला, जो वास्तव में पुरुष नहीं होता ऐसे
'तृण पूलिक' नामक सन्तान को उत्पन्न करता है । इसको पुरुष व्यापत् कहते हैं,
[ क्योंकि यह पुरुष से प्राप्त होने वाले और पुरुष शरीर को बनाने वाले बीजांश-
दोष से गर्भ में विघ्न आता है ] ॥ ३१ ॥
एतेन मातृजानां पितृजानां चावयवानां विकृतिव्याख्यानेन सात्म्य-
जानां रसजानां सत्त्वजानां चावयवानां विकृतिर्व्याख्याता ॥ ३२ ॥
इस प्रकार माता पिता से उत्पन्न होने वाले अवयवों की विकृति के वर्णन
से सात्म्य, रस और सत्त्व इन से होने वाली अवयवों की विकृति का भी वर्णन
हुआ जान लेना चाहिए ॥ ३२ ॥
निर्विकारः परस्त्वात्मा सर्वभूतानां निर्विशेषः । सत्त्वशरीरयोस्तु
विशेषाद्विशेषोपलब्धिः ॥ ३३ ॥
गर्भ आत्मजन्य भी है, परन्तु इस कारण से गर्भ में विकार उत्पन्न नहीं
होता । क्योंकि श्रेष्ठ आत्मा निर्विकार ( विकार-रहित ) है । वह सब प्राणियों में
समान रूप से रहता है । मन और शरीर की विशेषता से इसे सुख-दुःख आदि
का विशेष ज्ञान होता है ॥ ३३ ॥
तत्र त्रयस्तु शरीरदोषाः वातपित्तश्लेष्माणः, ते शरीरं दूषयन्ति ।
द्वौ पुनः सत्त्वदोषौ रजस्तमश्च, तौ सत्त्वं दूषयतः । ताभ्यां च सत्त्व-
शरीराभ्यां दुष्टाभ्यां विकृतिरुपजायते, नोपजायते चाप्रदुष्टाभ्याम् ॥३४॥
शरीर के तीन दोष होते हैं, वात, पित्त और कफ । ये दोष शरीर को दूषित
करते हैं । मन के दो दोष हैं रज और तम । ये दोनों मन ( सत्त्व ) को दूषित
करते हैं । इन दोनों—मन और शरीर के दुष्ट होने से विकार उत्पन्न होता है
और इनके दूषित न होने से विकृति भी नहीं होता ॥ ३४ ॥
तत्र शरीरं योनिविशेषाच्चतुर्विधमुक्तमग्रे ॥ ३५ ॥
प्रथम 'खुड्डीका अध्याय' में कह चुके हैं कि योनि भेद से यह शरीर चार
प्रकार का ( जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज ) है ॥ ३५ ॥
त्रिविधं खलु सत्त्वं - शुद्धं, राजसं, तामसमिति । तत्र शुद्धमदोष-
माख्यातं कल्याणांशत्वात्, राजसं सदोषमाख्यात रोषांशत्वात्, तथा
तामसमपि सदोषमाख्यात मोहांशत्वात् ॥ ३६ ॥
अ० ४ ] ५ शारीरस्थानम् ६५
अ० ४ ] ५ शारीरस्थानम् ६५
तेषां तु त्रयाणामपि सत्त्वानामेकैकस्य भेदाग्रमपरिसंख्येयं तरतम-
योगाच्छरीर-योनि-विशेषेभ्यश्चान्योन्यानुविधानत्वाच्च । शरीरमपि
सत्त्वमनुविधीयते, सत्त्वं च शरीरं । तस्मात्कतिचिच्च सत्त्वभेदाननू-
कसाद्दश्याभिनिर्देशेन निदर्शनार्थमनुव्याख्यामः ॥ ३७ ॥
सत्त्व ( मन ) तीन प्रकार का है । शुद्ध, राजस और तामस । इनमें शुद्ध
( सात्त्विक ) दोषरहित है, क्योंकि यह शुभ ( कल्याण ) कामना का अंश है ।
राजस दोष युक्त है ? क्योंकि वह रोष का अंश है । तामस भी दोष युक्त है
क्योकि वह मोह का अंश है । इन तीनों सत्त्वों में से एक एक के भेद तर,
तम, योग से शरीरविशेष, योनि विशेष और एक दूसरे में परस्पर मे मिले होने
से असख्य हा जाते है । शरीर भी सत्त्व ( मन ) के अनुसार होता है और
मन शरीर के अनुसार होता है । इनमे से कुछ भेदों की तुल्यता दिखाते हुए
यहा पर दृष्टान्त रूप में बतलाते है ॥ ३६-३७ ॥
तद्यथा—शुचिं सत्याभिसंधं जितात्मानं सविभागिनं ज्ञान-विज्ञा-
न-वचन-प्रतिवचन-शक्ति-सपन्नं स्मृतिमन्तं काम-क्रोध-लोभ-मान-
मोहेर्ष्या-हर्षामर्षोपेतं समं सर्वभूतेषु ब्राह्मं विद्यात् ॥ ३८ ॥
सात्त्विक चित्तो के सात भेद—( १ ) ब्राह्म—पवित्र, सत्य प्रतिज्ञावाला,
जितात्मा, सम्पत्ति और सत्फल को अन्यों में बाटकर भोगने वाला, ज्ञान-
विज्ञान, वचन-प्रतिवचन की शक्ति से युक्त, स्मृतिमान्, काम, क्रोध,
लोभ, अभिमान, मोह, ईर्ष्या, हर्ष और क्रोध से रहित, सब प्राणियों में सम
बुद्धि रखने वाला हो उसे ब्राह्म प्रकृति जाने ॥ ३८ ॥
इज्याध्ययन-व्रत-होम-ब्रह्मचर्य-परमतिथिव्रतमुपशान्त-मद-मान—
राग-द्वेष-मोह-लोभ-रोषं प्रतिभा-वचन-विज्ञानोपधारण-शक्ति-संपन्नमार्षं
विद्यात् ॥ ३९ ॥
( २ ) आर्ष—जो यज्ञ करने वाला, अध्ययनशील, व्रत का पालक होम-
शील ब्रह्मचर्य का पालक, अतिथि का पूजक, मद, मान राग, द्वेष, मोह, लोभ
और रोष से रहित, प्रतिभा से युक्त वचन, विज्ञान, उपधारण इन शक्तियों से
सम्पन्न पुरुष हो उसको आर्ष चित्त वाला जाने ॥ ३९ ॥
ऐश्वर्यवन्तमादेयवाक्यं यज्वानं शूरमोजस्विनं तेजसोपेतमक्लि-
ष्टकर्माणं दीर्घदर्शिनं धर्मार्थकामाभिरतमैन्द्रं विद्यात् ॥ ४० ॥
( ३ ) ऐन्द्र—जो ऐश्वर्यवान्, ग्रहण करने योग्य वाक्य वाला, यज्ञ करने
वाला, शूर, ओजस्वी, तेज से युक्त, साहसिक ( बुरे, दूसरे पर आघात पहुँचाने
६६ चरकसंहिता [ अ० ४
वाले) क्रूर कर्मों को न करने वाला, दूरदर्शी, धर्म, अर्थ और काल दत्तचित्त
पुरुष को 'ऐन्द्र' समझे ॥ ४० ॥
लेखास्थवृत्तं प्राप्तकारिणमसंप्रहार्यमुत्थानवन्तं स्मृतिमन्तमैश्वर्य-
लम्भिनं व्यपगतराग-द्वेष-मोहं याम्यं विद्यात् ॥ ४१ ॥
(४) याम्य—जो कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की मर्यादा के भीतर रहनेवाला,
प्राप्तकारी, ( अवसर के अनुसार काम करने वाला ), असंप्रहार्य अर्थात् जिस
पर कोई प्रहार न कर सके वा जिसकी मार रोकी न जा सके, उन्नतिशील,
स्मृतिमान्, ऐश्वर्य्यशील, राग, द्वेष, मोह से रहित पुरुष हो उसको 'याम्य'जाने ४१
शूरं धीरं शुचिमशुचिद्वेषिणं यज्वानमम्भोविहार-रतिमक्लिष्टकर्माणं
स्थानकोपप्रसादं वारुणं विद्यात् ॥ ४२ ॥
( ५ ) वारुण—जो शूरवीर, धीर, पवित्र ओर मैलेपन से द्वेष करनेवाला
यज्ञ करने वाला, जल क्रीड़ा मे रत, क्लिष्ट कर्मों से भिन्न सुख से होने वाले
कर्मों को करने वाला, उचित स्थान में कोप तथा प्रसाद करने वाला पुरुष हो
उसको 'वारुण जाने ॥ ४२ ॥
स्थान मानोपभोगपरिवारोपसपन्नं सुखविहारं धर्मार्थकामनित्यं
शुचिं व्यक्तकोपप्रसादं कौबेरं विद्यात् ॥ ४३ ॥
( ६ ) कौवेर—जो स्थान, मान, उपभोग, सामग्री, परिवार ( कुटुम्ब )
से युक्त, नित्य धर्म, अर्थ और काम में तत्पर, पवित्र सुखपूर्वक विहार विनोद
करने वाला, उचित स्थान पर कोप और प्रसन्नता प्रकट करने वाला पुरुष हो
उसको 'कौवेर' प्रकृति का जाने ॥ ४३ ॥
प्रिय-नृत्य गीत-वादित्रोल्लापक-श्लोकाख्यायिकेतिहास-पुराणेषु कुशलं
गन्ध-माल्यानुलेप-नव-वसन-स्त्रीविहार-नित्यमनसूयकं गान्धर्वं विद्यात्
( ७ ) गान्धर्व—जो नृत्य, गीत, बाजे, स्तोत्र, श्लोक, आख्यायिका,
इतिहास, पुराणों को पसन्द करने वाला, इनमें कुशल, सुगन्ध, माला, अनु-
लेपन, वस्त्र, स्त्रियों के साथ विहार करने वाला, अनिन्द्य पुरुष हो उसको
'गान्धर्व' जाने ॥ ४४ ॥
इत्येवं शुद्धस्य सत्त्वस्य सप्तविधं भेदांशं विद्यात्कल्याणांशत्वात्,
संयोगात्तु ब्राह्ममत्यन्तशुद्धं व्यवस्येत् ॥ ४५ ॥
ये शुद्ध सत्त्व के सात भेद हैं, ये शुभ या कल्याण के अंश है। इसके संयोग
होने से 'ब्राह्म' को ही सब से अधिक शुद्ध निर्दोष जाने ॥ ४५ ॥
राजस सत्त्व के ६ भेद—
शूरं चण्डमसूयकमैश्वर्यवन्तमौपधिकं रौद्रमननुक्रोशमात्मपूजक-
मासुरं विद्यात् ॥ ४६ ॥
(१) आसुर—जो शूरवीर, प्रचण्ड, दूसरे की निन्दा करने वाला,
ऐश्वर्यशाली, छल कपट करने वाला, रुद्र के तुल्य कोप से शत्रुओं को रुलाने
वाला, भयकर, दूसरों पर दया न करने वाला, अपनी ही बड़ाई चाहने वाला,
आत्माभिमानी हो उसको 'आसुर' जाने ॥ ४६ ॥
अमर्षणमनुबन्धकोपं छिद्रप्रहारिणं क्रूरमाहारातिमात्ररुचिमा
मिषप्रियतमं स्वप्नायासबहुलमर्षुं राक्षसं विद्यात् ॥ ४७ ॥
(२) राक्षस—जो असहनशील, कारण से कुपित होने वाला, छिद्र अर्थात्
शत्रु के कमजोर स्थान पर चोट करने वाला, क्रूर, भोजन में अधिक रुचि रखने
वाला, मांस का बहुत प्यारा, खूब सोने और खूब परिश्रम करने वाला, ईर्ष्या-
शील हो उसको 'राक्षस' चित्त वाला जाने ॥ ४७ ॥
महालसं(शनं) स्त्रैण स्त्रीरहस्काममशुचि शुचिद्वेषिणं भीरु भीषयि-
तारं विकृत-विहाराहार-शीलं पैशाचं विद्यात् ॥ ४८ ॥
(३) पैशाच—जो बहुत खाने वाला, स्त्री के समान स्वभाव का, स्त्रियों
के साथ एकान्त मे रहने की इच्छावाला, अपवित्र, शुद्धता वा स्वच्छता से द्वेष
करनेवाला, भीरु, दूसरों को डरानेवाला, विकृत आहार और विकृत विहार
वाला हो उसको 'पैशाच' स्वभाव का जाने ॥ ४८ ॥
क्रुद्धं शूरमक्रुद्धं भीरु तीक्ष्णमायासबहुलं संत्रस्तगोचरमाहारविहा-
रपरं सार्पं विद्यात् ॥ ४९ ॥
(४) सार्प—जो क्रोधित होने पर शूर और अक्रोधित होने पर भीरु, तीखे
स्वभाव का, परिश्रम करनेवाला, भययुक्त स्थानों मे भी दीखनेवाला और
आहार विहार करने वाला हो उस पुरुष को 'सार्प' स्वभाव का जाने ॥ ४९ ॥
आहारकाममतिदुःखशीलाचारोपचारमसूयकमसंविभागिनमतिलो
लुपमकर्मशीलं प्रैतं विद्यात् ॥ ५० ॥
(५) प्रैत—जो सदा भोजन की इच्छा करने वाला, बहुत दुःखकारी
शील और आचार और उपचार से युक्त, निन्दा करने वाला, दूसरों को अपने
धन में से भाग न देने वाला, बहुत लोभी, कर्म न करने वाला पुरुष हो उसको
'प्रैत' अर्थात् प्रेत स्वभाव का जाने ॥ ५० ॥
अनुषक्तकाममजस्रमाहार-विहार-परमनवस्थितममर्षिणमसंचयं-
शाकुणं विद्यात् ॥ ५१ ॥
६८ चरकसंहिता [ अ० ४
इत्येवं खलु राजसस्य सत्त्वस्य षड्विध भेदांशं विद्याद्रोषांशत्वात् ५२
( ६ ) शाकुन—जो कामो मे फसा हुआ, निरन्तर आहार-विहार मे रित,
चञ्चल, असहनशील, सचय न करने वाला पुरुष हो उसको 'शाकुन' जाने ।
इस प्रकार से रोष अर्थात् क्रोध के अश होने से राजस सत्त्व के ये छः
भेद जाने ॥ ५१-५२ ॥
तामस के तीन प्रकार—
निरलंकरिष्णुमधमवेशं जुगुप्सिताचाराहार-मैथुन-पर स्वप्नशीलं
पाशवं विद्यात् ॥ ५३ ॥
( १ ) पाशव—जो शरीर को अलकृत करने की इच्छा न रखने वाला,
अपवित्रस्वभाव, निन्दितआचार और भोजनवाला, मैथुनकामी, सोने के
स्वभाववाला पुरुष हो उसको 'पाशव' प्रकृति का जाने ॥ ५३ ॥
भीरुमबुधमाहारलुब्धमनवस्थितमनुषक्त-काम-क्रोध सरणशीलं
तोयकाम मात्स्य विद्यात् ॥ ५४ ॥
( २ ) मात्स्य—जो डरपाक, अज्ञानी, भोजन का लोभी, अस्थिरचित्त,
चंचल, काम और क्रोध में फसा हुआ, भ्रमणशील, पानी की अधिक चाह
करनेवाला हो उसको 'मात्स्य' प्रकृति का जाने ॥ ५४ ॥
अलसं केवलमभिनिविष्टमाहारे सर्वबुद्ध्या हीनं वानस्पत्यं विद्यात् ५५
इत्येव खलु तामसस्य सत्त्वस्य त्रिविध भेदाश विद्यान्मोहांशत्वात् ५६
( ३ ) वानस्पत्य—जो आलसी, केवल भोजन मे ही दत्तचित्त, सब प्रकार
के ज्ञान वा बुद्धि से रहित जड़ पुरुष हो उसको 'वानस्पत्य' अर्थात् स्थावर
प्रकृति का जाने । इस प्रकार से मोह का अश होने से तामस सत्त्व के
तीन भेद हैं ॥ ५५-५६ ॥
इत्यपरिसंख्येयभेदानां खलु त्रयाणामपि सत्त्वानां भेदैकदेशो
व्याख्यातः, शुद्धस्य सत्त्वस्य सप्तविधो ब्रह्मर्षि-शक्र-वरुण-यम-कुबेर-
गन्धर्व-सत्त्वानुकारेण, राजसस्य षड्विधो दैत्य-राक्षस-पिशाच-सर्प-प्रेत-
शकुनि-सत्त्वानुकारेण, तामसस्य त्रिविधः पशु-मत्स्य-वनस्पति-सत्त्वा-
नुकारेण । कथं च यथासत्त्वमुपचारः स्यादिति । केवलश्वायमुद्देशो
यथोद्देशमभिनिर्दिष्टो भवति गर्भावक्रान्तिसंप्रयुक्तः। तस्यार्थस्य विज्ञाने
सामर्थ्यं—गर्भकरणा च भावानामनुसमाधिर्विघातश्च विघातकरणा
भावानामिति ॥५७॥
इस प्रकार से तीनों प्रकार के सत्त्वों (चित्तों) के असंख्य भेद होने पर
भी कुछ भेदों के कुछ अंश की व्याख्या कर दी है। ब्रह्म, ऋषि, शक्र, यम,
अ० ५ ] शारीरस्थानम् ६६
अ० ५ ] शारीरस्थानम् ६६
वरुण, कुबेर, गन्धर्व इनके सत्त्व के अनुसार क्रम से शुद्ध सत्त्व के सात भेद
हैं। दैत्य, पिशाच, राक्षस, सर्प, प्रेत और शकुनि इनके सत्त्व के अनुसार राजस
सत्त्व के छः भेद हैं। पशु, मत्स्य और वनस्पति इनके सत्त्व के अनुसार तामस
सत्त्व के तीन भेद हैं। किस प्रकार से इन सत्त्वों के अनुसार प्राणियों के साथ
बर्त्ताव हो, इसका दिग्दर्शन करा दिया है। इस प्रकार से प्रतिज्ञानुसार यह
गर्भावक्रान्ति प्रकरण सम्पूर्ण रूप से कह दिया है। इसमें जानने के प्रयोजन,
गर्भकारक भावों के अनुष्ठान, गर्भ के नाश करने वाले कारणों को इस अध्याय
से सम्पूर्ण रूप से कह दिया है ॥५७॥
तत्र श्लोकाः—निमित्तमात्मा प्रकृतिर्वृद्धिः कुक्षौ क्रमेण च ।
वृद्धिहेतुश्च गर्भस्य पञ्चार्थाः शुभसञ्ज्ञिताः ॥ ५८ ॥
अजन्मनि च यो हेतुर्विनाशे विकृतावपि ।
इमांस्त्रीनशुभान् भावानाहुर्गर्भविघातकान् ॥५९॥
शुभाशुभसमाख्यातानष्टौ भावानिमान् भिषक् ।
सर्वथा वेद यः सर्वान् स राज्ञः कर्तुमर्हति ॥६०॥
अवाप्त्युपायान् गर्भस्य स एव ज्ञातुमर्हति ।
ये च गर्भविघातोक्ता भावांस्तांश्चाप्युदारधीः ॥६१॥
गर्भ के लिये पाच बातें शुभ है—गर्भ का कारण, आत्मा, प्रकृति, बुद्धि
और गर्भ का कुक्षि में बढने का कारण। ये पाच अर्थ गर्भ के लिये शुभ कहाते
हैं। गर्भ के न होने मे कारण, गर्भ के विनाश में तथा विकार में कारण ये तीन
बातें गर्भ को नाश करनेवाले 'अशुभ' कहे जाते हैं। जो वैद्य इन शुभ-अशुभ
रूपी आठों बातों को भली प्रकार से जानता है, वह राजा की चिकित्सा करने
योग्य है। उदार, विशाल बुद्धिवाले वैद्य को गर्भ की रक्षा वा प्राप्ति के उपाय
तथा गर्भ के नाश करनेवाले कारण भी जानने चाहिये ॥५८-६१॥
इत्यग्निवेश कृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने महतीगर्भाव-
क्रान्तिशारीर नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
पञ्चमोऽध्यायः ।
अथातः पुरुषविचयं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'पुरुषविचय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥