चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] शारीरस्थानम् ६६
वरुण, कुबेर, गन्धर्व इनके सत्त्व के अनुसार क्रम से शुद्ध सत्त्व के सात भेद
हैं। दैत्य, पिशाच, राक्षस, सर्प, प्रेत और शकुनि इनके सत्त्व के अनुसार राजस
सत्त्व के छः भेद हैं। पशु, मत्स्य और वनस्पति इनके सत्त्व के अनुसार तामस
सत्त्व के तीन भेद हैं। किस प्रकार से इन सत्त्वों के अनुसार प्राणियों के साथ
बर्त्ताव हो, इसका दिग्दर्शन करा दिया है। इस प्रकार से प्रतिज्ञानुसार यह
गर्भावक्रान्ति प्रकरण सम्पूर्ण रूप से कह दिया है। इसमें जानने के प्रयोजन,
गर्भकारक भावों के अनुष्ठान, गर्भ के नाश करने वाले कारणों को इस अध्याय
से सम्पूर्ण रूप से कह दिया है ॥५७॥
तत्र श्लोकाः—निमित्तमात्मा प्रकृतिर्वृद्धिः कुक्षौ क्रमेण च ।
वृद्धिहेतुश्च गर्भस्य पञ्चार्थाः शुभसञ्ज्ञिताः ॥ ५८ ॥
अजन्मनि च यो हेतुर्विनाशे विकृतावपि ।
इमांस्त्रीनशुभान् भावानाहुर्गर्भविघातकान् ॥५९॥
शुभाशुभसमाख्यातानष्टौ भावानिमान् भिषक् ।
सर्वथा वेद यः सर्वान् स राज्ञः कर्तुमर्हति ॥६०॥
अवाप्त्युपायान् गर्भस्य स एव ज्ञातुमर्हति ।
ये च गर्भविघातोक्ता भावांस्तांश्चाप्युदारधीः ॥६१॥
गर्भ के लिये पाच बातें शुभ है—गर्भ का कारण, आत्मा, प्रकृति, बुद्धि
और गर्भ का कुक्षि में बढने का कारण। ये पाच अर्थ गर्भ के लिये शुभ कहाते
हैं। गर्भ के न होने मे कारण, गर्भ के विनाश में तथा विकार में कारण ये तीन
बातें गर्भ को नाश करनेवाले 'अशुभ' कहे जाते हैं। जो वैद्य इन शुभ-अशुभ
रूपी आठों बातों को भली प्रकार से जानता है, वह राजा की चिकित्सा करने
योग्य है। उदार, विशाल बुद्धिवाले वैद्य को गर्भ की रक्षा वा प्राप्ति के उपाय
तथा गर्भ के नाश करनेवाले कारण भी जानने चाहिये ॥५८-६१॥
इत्यग्निवेश कृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने महतीगर्भाव-
क्रान्तिशारीर नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
पञ्चमोऽध्यायः ।
अथातः पुरुषविचयं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'पुरुषविचय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥