चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ चरकसंहिता [ अ० ४
(शब्द, स्पर्श, रूप), जल में चार गुण (शब्द, स्पर्श, रूप और रस) और
पृथ्वी में पाच गुण (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) उत्पन्न करता है।]
इसी प्रकार शरीर में गुण उत्पन्न करने में प्रवृत्त होने पर भी सब से प्रथम
आकाश के गुण को ही उत्पन्न करता है, इसके पीछे क्रम से स्पष्ट गुणवाले
वायु आदि भूतों को उत्पन्न करता है। भूतों के गुणों का ग्रहण बहुत ही थोड़े
समय मे हो जाता है। [जिस प्रकार सूर्य कान्तमणि में सूर्य की किरणें आती हुई
नहीं दीखतीं, परन्तु रूई तिनके के जलने से किरणो का आना प्रतीत होता है,
उसी प्रकार शरीर के अन्दर भूतों के कार्य से इनके गुणों का तथा चेतना धातु
का अनुमान होता है] ॥ ६ ॥
स तु सर्वगुणवान् गर्भत्वमापन्नः प्रथमे मासि समूर्च्छितः सर्वधा-
तुकलनीकृतः खेटभूतो भवत्यव्यक्तविग्रहः सदसद्भूताङ्गावयवः ॥१०॥
द्वितीये मासि घनः संपद्यते- पिण्ड पेश्यर्बुदं वा, तत्र घनः
[पिण्डः] पुरुषः, स्त्री पेशी, अर्बुदं नपुंसकम् ॥ ११ ॥
तृतीये मासि सर्वेन्द्रियाणि सर्वाङ्गावयवाश्च योगपद्येनाभिनिर्व-
र्त्तन्ते ॥ १२ ॥
गर्भ का प्रथम रूप खेट-सव गुणों वाला यह चेतना धातु गर्भ रूप में
होकर प्रथम मास में मूर्च्छित, निश्चेष्ट, गतिरहित अव्यक्त, सम्पूर्ण धातुओं वाला,
श्लेष्मा के पिण्ड के समान होता है, उस समय उसका शरीर अस्पष्ट रूप अंगों
वाला होता है, उस समय उसके अंग पृथक् २ नहीं बने होते। उस समय
उसका नाम 'खेट' होता है।
घन-दूसरे मास में यह गर्भ रूप धातु कठिन, पिण्ड गोल माठ के आकार
का वा पेशी-लम्बो मास पेशी के समान वा अर्बुद-गोल और ऊची गांठ
के समान बन जाता है। इन में से घन (पिण्ड) रूप हो तो पुरुष, पेशी हो तो
स्त्री, अर्बुद हो तो नपुंसक होता है। तीसरे मास में सम्पूर्ण इन्द्रिया और शिर
आदि सब अंग तथा आमाशय आदि अवयव एक साथ बनने लगते हैं ॥१२॥
तत्रास्य केचिदङ्गावयवा मातृजादीनवयवान् विभज्य पूर्वमुक्ता
यथावत्, महाभूतविकारप्रविभागेन त्विदानीमस्य तांश्चैवाङ्गावयवान्
कांश्चित्पर्यायान्तरेणापरांश्चानुव्याख्यास्यामः - मातृजादयोऽप्यस्य महा-
भूतविकारा एव। तत्रास्याऽऽकाशात्मकं - शब्दः श्रोत्रं लाघवं सौक्ष्म्यं
विवेकश्च । वाय्वात्मकं-स्पर्शः स्पर्शनं रौक्ष्यं प्रेरणं धातुव्यूहनं चेष्टाश्च
शारीर्यः । अग्न्यात्मकं- रूप दर्शनं प्रकाशः पक्तिरौष्ण्यं च । अबात्मकं