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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 616 में से

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पृष्ठ 79

६४ चरकसंहिता [ अ० ४
उत्पन्न करने वाले बीज का कोई एक भाग का भी कोई अंश दूषित होता है,
तथा पुरुष-शरीर को बनाने वाले भागों का एक अंश दूषित हो जाता है, तब
पुरुष के समान बहुत सी आकृति वाला, जो वास्तव में पुरुष नहीं होता ऐसे
'तृण पूलिक' नामक सन्तान को उत्पन्न करता है । इसको पुरुष व्यापत् कहते हैं,
[ क्योंकि यह पुरुष से प्राप्त होने वाले और पुरुष शरीर को बनाने वाले बीजांश-
दोष से गर्भ में विघ्न आता है ] ॥ ३१ ॥
एतेन मातृजानां पितृजानां चावयवानां विकृतिव्याख्यानेन सात्म्य-
जानां रसजानां सत्त्वजानां चावयवानां विकृतिर्व्याख्याता ॥ ३२ ॥
इस प्रकार माता पिता से उत्पन्न होने वाले अवयवों की विकृति के वर्णन
से सात्म्य, रस और सत्त्व इन से होने वाली अवयवों की विकृति का भी वर्णन
हुआ जान लेना चाहिए ॥ ३२ ॥
निर्विकारः परस्त्वात्मा सर्वभूतानां निर्विशेषः । सत्त्वशरीरयोस्तु
विशेषाद्विशेषोपलब्धिः ॥ ३३ ॥
गर्भ आत्मजन्य भी है, परन्तु इस कारण से गर्भ में विकार उत्पन्न नहीं
होता । क्योंकि श्रेष्ठ आत्मा निर्विकार ( विकार-रहित ) है । वह सब प्राणियों में
समान रूप से रहता है । मन और शरीर की विशेषता से इसे सुख-दुःख आदि
का विशेष ज्ञान होता है ॥ ३३ ॥
तत्र त्रयस्तु शरीरदोषाः वातपित्तश्लेष्माणः, ते शरीरं दूषयन्ति ।
द्वौ पुनः सत्त्वदोषौ रजस्तमश्च, तौ सत्त्वं दूषयतः । ताभ्यां च सत्त्व-
शरीराभ्यां दुष्टाभ्यां विकृतिरुपजायते, नोपजायते चाप्रदुष्टाभ्याम् ॥३४॥
शरीर के तीन दोष होते हैं, वात, पित्त और कफ । ये दोष शरीर को दूषित
करते हैं । मन के दो दोष हैं रज और तम । ये दोनों मन ( सत्त्व ) को दूषित
करते हैं । इन दोनों—मन और शरीर के दुष्ट होने से विकार उत्पन्न होता है
और इनके दूषित न होने से विकृति भी नहीं होता ॥ ३४ ॥
तत्र शरीरं योनिविशेषाच्चतुर्विधमुक्तमग्रे ॥ ३५ ॥
प्रथम 'खुड्डीका अध्याय' में कह चुके हैं कि योनि भेद से यह शरीर चार
प्रकार का ( जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज ) है ॥ ३५ ॥
त्रिविधं खलु सत्त्वं - शुद्धं, राजसं, तामसमिति । तत्र शुद्धमदोष-
माख्यातं कल्याणांशत्वात्, राजसं सदोषमाख्यात रोषांशत्वात्, तथा
तामसमपि सदोषमाख्यात मोहांशत्वात् ॥ ३६ ॥