चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
स्थानसंस्थानलिङ्गानि साध्यासाध्यविनिश्चयः ॥ २५० ॥
५८८ चरकसंहिता [अ० १४
जो खान पान वायु का अनुलोमन न करे, अग्नि को न बढाये तथा निदान
कारणों मे जिसकी गणना की गई है, वह सब अर्श-रोगी के लिये अपथ्य है।
वह उनका सेवन कदापि न करे ॥ २४६ ॥
तत्र श्लोकाः-अर्शसा द्विविधं जन्म पृथगायतननि च ।
स्थानसंस्थानलिङ्गानि साध्यासाध्यविनिश्चयः ॥ २५० ॥
अभ्यङ्गाः स्वेदनं धूमाः सावगाहाः प्रलेपनाः ।
शोणितस्यावसेकश्च योगा दीपनपाचनाः ॥ २५१ ॥
पानान्नविधिरुग्र्यश्च वातवर्चोऽनुलोमनः ।
योगाः संशमनीयाश्च सर्पींषि विविधानि च ॥ २५२ ॥
बस्तयस्तक्रयोगाश्च वरारिष्टाः सशर्कराः ।
शुष्काणामर्शसा शस्ताः स्राविणा लक्षणानि च ॥ २५३ ॥
द्विविधं सानुबन्धाना तेषां चेष्टं यदौषधम् ।
रक्तसंग्रहणाः क्वाथाः पेयाश्च विविधात्मकाः ॥ २५४ ॥
स्नेहाहारविधिश्चाग्र्यो योगाश्च प्रतिसारणाः ।
प्रक्षालनावगाहाश्च प्रदेहाः सेचनानि च ॥ २५५ ॥
अतिवृत्तस्य रक्तस्य विधातव्यं यदौषधम् ।
तत्सर्वमिह निर्दिष्टं गुदजानां चिकित्सिते ॥ २५६ ॥
उपसहार-दो प्रकार के अर्श-रोग की उत्पत्ति, पृथक् पृथक् इनके कारण,
स्थान, आकृति, लक्षण, साध्य-असाध्य, अभ्यग, स्वेदन, धूम प्रयोग, अवगाहन,
प्रलेप, रक्त का अवसेक, दीपन-पाचन योग, वायु और मल की अनुलोमक
खान पान विधि, सशमनीय योग, नाना प्रकार के घृत, बस्तिया, तक्र-प्रयोग,
शुष्क अर्श रोगियो के लिये हितकारी शर्करारिष्ट, अरिष्ट, रक्तस्राव रोगियो के
लक्षण, दो प्रकार का (वायु ओर कफ का) अनुबन्ध इनमे जो चिकित्सा
योग्य नहीं है, रक्तसग्राहक प्रयोग, नाना प्रकार की पेया, स्नेहपान विधि, खान-
पान की श्रेष्ठ विधि, परिपेक, अवगाहन, प्रदेह, प्रतिसारण, रक्त के अति
स्राव होने पर जो क्रिया करनी चाहिये, यह सब इस अर्श-रोग-चिकित्सा मे
कह दिया है ॥ २५०-२५६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थानेऽ-
र्शश्चिकित्सित नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५८६
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५८६
पञ्चदशोऽध्यायः
अथातो ग्रहणीचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ग्रहणी-चिकित्सा की व्याख्या करते हैं। भगवान् आत्रेय ने
ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
आयुर्वर्णो बलं स्वास्थ्यमुत्साहोपचयौ प्रभा ।
ओजस्तेजोऽग्नयः प्राणाश्चोक्ता देहाग्निहेतुकाः ॥ ३ ॥
आयु, वर्ण, बल, स्वास्थ्य, उत्साह, उपचय (पुष्टि), प्रभा, ओज, तेज,
अग्निया और प्राण इन सब की स्थिति का कारण देह की जाठर अग्नि ही है १॥३॥
शान्तेऽग्नौ म्रियते युक्ते चिरं जीवत्यनामयः ।
रोगी स्याद्विकृते मूलमग्निस्तस्मान्निरुच्यते ॥ ४ ॥
अग्नि के शान्त होने पर प्राणी मर जाता है और अग्नि के युक्त अर्थात्
समभाव मे रहने पर प्राणी देर तक नीरोग रह कर जीता है। अग्नि के विकृत
होने (मन्द या तीक्ष्ण अथवा विषम हो जाने) पर मनुष्य रोगी हो जाता है।
इसलिये देहाग्नि को आयु, वर्ण, बल आदि का प्रधान कारण कहा जाता है ॥४॥
यदन्नं देहधात्वोजोबलवर्णादिपोषकम् ।
तत्राग्निर्हेतुराहारान्न ह्यपक्वाद्रसादयः ॥ ५ ॥
जो अन्न (भुक्त द्रव्य) देह के धातु, ओज, बल, वर्ण आदि का पोषक
है, वहा पर भी यही अग्नि कारण है। क्योकि बिना पचे आहार से रस-आदि
धातुओं की उत्पत्ति नही होती ॥ ५ ॥
अन्नमादानकर्मा तु प्राणः कोष्ठं प्रकर्षति ।
तद्द्रवैर्भिन्नसंघातं स्नेहेन मृदुतां गतम् ॥ ६ ॥
समानेनावधूतोऽग्निरुदीर्यः पवनेन तु ।
काले भुक्तं समं सम्यक् पचत्यायुर्विवृद्धये ॥ ७ ॥
आहार की परिपाक-विधि—आदान (ग्रहण करना) कर्म वाला प्राण
वायु अन्न को कोष्ठ (आमाशय) मे ले जाता है। यह अन्न द्रव-समूहों से
(क्लेदक कफ के द्रव भाग से) मिल कर छिन्न भिन्न होकर टुकड़े २ हो जाता
१. गीता—अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥
५६० चरकसंहिता [ अ० १५
है और स्नेह द्वारा ( क्लेदक-कफ के स्निग्ध भाग के कारण ) यह अन्न कोमल
हो जाता है । उचित काल मे समयोग अर्थात् उचित मात्रा मे खाये हुए इस
मृदु आहार को समान नामक वायु से प्रज्वलित जाठर अग्नि आयु की वृद्धि के
लिये भली प्रकार से पचाता है १ ॥ ६-७ ॥
एवं रसमलायान्नामाशयस्थमधःस्थितः ।
पचत्यग्निर्यथा स्थाल्यामोदनायाम्बुतण्डुलम् ॥ ८ ॥
अन्नस्य भुक्तमात्रस्य षड्रसस्य प्रपाकतः ।
मधुरात्प्राक् कफोद्भावात्फेनभूत उदीर्यते ॥ ९ ॥
परं तु पच्यमानस्य विदग्धस्याम्लभावतः ।
आशयाच्च्यवमानस्य पित्तमच्छमुदीर्यते ॥ १० ॥
जिस प्रकार पतीली मे रक्खे जल और चावलो को नीचे जलती हुई अग्नि
पका कर भात मे बदल देती है, उसी प्रकार यह जाठराग्नि आमाशय मे स्थित
आहार को पका कर ( जीर्ण करके ) रस और मल मे बदल देती है । आहार
के प्रसाद भाग से रस बनता और शेष मल बन जाता है २ ।
खाते समय ही छ. रस वाले अन्न के प्रथम पाक काल मे सबसे पूर्व मधुर
रस ( माधुर्य ) उत्पन्न होता है । [ थूक का 'टाईलीन' भोजन के निशास्ता
भाग को शर्करा मे बदल देता है ] । इससे झाग के समान कफ उत्पन्न होता
है । पीछे से पचता हुआ यह अन्न विदग्ध होकर ( आमाशय मे पहुच कर
आमाशयिक रस की क्रिया होने पर ) अम्ल-भाव मे परिणत हो जाता है ।
यह अम्लभूत अन्न जब आमाशय से निकल कर पच्यमानाशय ( ग्रहणी के
आन्त्र भाग ) में आता है तब स्वच्छ पित्त बढता है ३ ॥ ८-१० ॥
१. आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा ऊष्मा वायुः क्लेद
स्नेहः काल. समयोगश्चेति ( चक्र० ) ।
२. कई आचार्य अन्न के पाक से तीन भागों की उत्पत्ति मानते हैं, स्थूल,
सूक्ष्म और मल-भाग । जिस प्रकार गन्ने के रस को पकाने से उस पर बार-बार
मलाई आती है, इसी प्रकार धातुओं के अग्नि द्वारा परिपाक होने पर अन्न के
तीन भाग हो जाते हैं । ( १ ) सूक्ष्म भाग अगली धातु मे जाता है और
( २ ) स्थूल भाग उसी धातु का पोषण करता है । ( ३ ) मल भाग बाहर हो
जाता है । अन्त मे शुक्राग्नि के पाक से स्थूल और सूक्ष्म दो ही भाग बनते हैं
मल भाग नही रहता है ।
३. पच्यमानाशय में आहार रस की क्रिया क्षारीय बन जाती है । इसमे
अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ५६१
अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ५६१
पक्वाशयं तु प्राप्तस्य शोष्यमाणस्य वह्निना ।
परिपिण्डितपक्वस्य वायुः स्यात्कटुभावतः ॥ ११ ॥
जिस समय भुक्त आहार पित्ताशय मे पहुंचता है और वहा पर अग्नि के
द्वारा सुखाया जाता है तब पानी (द्रव) के सूख जाने से यह पक कर पिण्डित
बन जाता है । इसके कटु-भाव से इस समय वायु की वृद्धि होती है । क्योकि
पच्यमानाशय मे आहार रस, आत्र रस, क्लोमरस तथा पित्ताशय के पित्त के
मिलने से कटु बन जाता है, इसलिये अब वायु की वृद्धि होती है (क्योंकि कटु
रस वायु को बढाता है) ॥ ११ ॥
अन्नमिष्टं ह्युपकृतमिष्टैर्गन्धादिभिः पृथक् ।
देहे प्रीणाति गन्धादीन् प्राणादीनिन्द्रियाणि च ॥ १२ ॥
इष्ट गन्ध आदि से युक्त प्रिय और हितकर अन्न शरीर मे पृथक् २ गन्ध
आदि गुण घ्राण आदि इन्द्रियों को पृथक् २ तर्पण करता है । अर्थात् स्वादु
और हितकर अन्न के पार्थिव आदि भाग अपने अपने गुणों से अपनी अपनी
इन्द्रियो का तर्पण करते हैं ॥ १२ ॥
भौमाप्याग्नेयवायव्याः पञ्चोष्माणः सनाभसाः ।
पञ्चाहारगुणान्स्वान् स्वान्पार्थिवादीन्पचन्ति हि ॥ १३ ॥
भौम, आप्य, आग्नेय, वायव्य और नाभस से पाच प्रकार की ऊष्माए
आहार के अपने अपने पार्थिव आदि पाच प्रकार के गुणो का पाक करती है
(पार्थिव आदि अपने अपने गुणों को बढाती है) ॥ १३ ॥
यथास्वैरेव पुष्यन्ते देहे द्रव्यगुणाः पृथक्¹ ।
पार्थिवाः पार्थिवानेव शेषाः शेषांश्च कृत्स्नशः ॥ १४ ॥
अन्न भी पाचभौतिक है, शरीर भी पाचभौतिक है । जाठराग्नि के द्वारा
जब अन्न का पाक होता है उस समय भौम अग्नि अपने पार्थिव गुण को बढाती
है, आप्य अग्नि जलीय गुण को, वायव्य अग्नि वायु गुण को, आग्नेय अग्नि
अग्नि गुण का और नाभस्य अग्नि आकाश गुण को बढाती है । क्योकि शरीर
मे द्रव्यों के गुण पृथक् २ अपने २ अंशो से ही पुष्ट होते हैं । पार्थिव गुण पा-
र्थिव गुणों को ही सम्पूर्ण रूप मे पुष्ट करते हैं और आप्य आदि शेष अश अपने
अम्ली-क्रिया नही रहती क्योंकि पित्त, क्लोम रस, आत्र रस इसको क्षारीय बना
देते हैं इससे कटु हो जाता है । बृहदान्त्र मे पानी का शोषण होने से मल कठोर
हो जाता है ।
१ 'यथास्वं-स्व च पुष्यन्ति देहद्रव्यगुणाः पृथक्' इति ।
५८२ चरकसंहिता [ अ० १५
अपने आप्य आदि गुणो को ही पोषण देते है। यथा—गुरु, खर, कठिन आदि
पार्थिव गुण है, ये गुण शरीर के गुरु, खर, कठिन आदि भावो को ही बढाएगे
गुरु आहार से शरीर मे गुरुता ही आयगी, खर आहार से शरीर मे खरता की ही
वृद्धि होगी ॥ १४ ॥
सप्तभिर्देहधातारो धातवो द्विविधं पुनः¹ ।
यथास्वमग्निभिः पाकं यान्ति किट्टप्रसादतः ॥ १५ ॥
देह का धारण करने वाले सात धातु अपनी २ अग्नियो द्वारा दो प्रकार के
पाक को प्राप्त होते है। (१) किट्ट और (२) प्रसाद ॥ १५ ॥
रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदस्ततोऽस्थि च ।
अस्थ्नो मज्जा ततः शुक्लं शुक्राद् गर्भः प्रसादजः² ॥ १६ ॥
प्रसादज धातु—रस से रक्त, रक्त से मास, मास से मेद, मेद से अस्थि,
अस्थि से मज्जा, मज्जा से शुक्र और शुक्र से गर्भ की उत्पत्तिहोती है³ ।
(१) खलेकपोतन्याय—दाना बिखेर देने पर जिस प्रकार से बहुत से
कबूतर आकर बैठते हे और दूर या निकट जाने की अपेक्षा स्वय चुग कर चल
पड़ते है उसी प्रकार से एक ही काल मे सब धातुओ का पोषण आहार रस से
होता है। (२) केदार-कुल्या-न्याय—अर्थात् रस ही उत्तरोत्तर धातुओ को
आप्लावित करता है। जिस प्रकार कुल्या (खेत की नाली), प्रथम क्यारी को
सींच कर अगली क्यारी मे चली जाती है इसी प्रकार से रस भी आगे जाता है।
(३) क्षीर-दधिन्याय—जिस प्रकार से सम्पूर्ण दूध दही मे बदल जाता है,
इसी प्रकार से सम्पूर्ण रस रक्त रूप मे परिणत होता है, रक्त मास में इसी
तरह। (४) उत्तरोत्तर धातुओ की वृद्धि—पूर्व धातु रस उत्तर धातु रक्त को
बढ़ाता है। रस का प्रसाद भाग (सूक्ष्म भाग) रक्त को बढ़ाता है, रक्त का
प्रसाद (सूक्ष्म भाग) मास को बढ़ाता है इसी प्रकार मे आगे ॥१६॥
रसात्स्तन्यं स्त्रिया रक्तमसृजः कण्डराः सिराः ।
मांसाद्वसा त्वचः षट् च मेदसः स्नायुसंभवः ॥ १७ ॥
उपधातु—रस से स्त्रियों मे स्तन्य (दूध) और आर्तव तथा रक्त से कण्ड-
राये और शिराये (नाड़िया), मास से वसा और छः त्वचाये और मेद से
स्नायु की उत्पत्ति होती है ॥१७॥
१ ‘द्विविधाश्च पुनःपुनः’ इति । २ ‘प्रजापते’ इति च पाठः ।
३. धातुओं की उत्पत्ति प्रसाद भाग से ही है। रस से अगले धातु किस
प्रकार बनते हैं, इसमे तीन मत हैं।
अ० १५ ] ३८ चिकित्सितस्थानम् ५६३
अ० १५ ] ३८ चिकित्सितस्थानम् ५६३
किट्टमन्नस्य विण्मूत्रं रसस्य तु कफोऽसृजः ।
पित्तं मांसस्य खमला मलः स्वेदस्तु मेदसः ॥ १८ ॥
स्यात्किट्टं केशलोमाऽस्थ्नो मज्ज्ञः स्नेहोऽक्षिविट्त्वचाम् ।
प्रसादकिट्टे धातूनां पाकादेवं द्विधच्छतः १ ॥ १६ ॥
भुक्त अन्न का किट्ट (मल) मल और मूत्र है। रस का किट्ट कफ, रक्त
का किट्ट पित्त, मास का किट्ट कान आदि इन्द्रियो का मैल, मेद का किट्ट स्वेद,
अस्थियो का किट्ट केश ओर लोम, मज्जा का किट्ट त्वचा का स्नेह भाग और
आखों का मैल । शुक्र से मलिन भाग नही बनता ।
इस प्रकार धातुओ का पाक दो प्रकार का होता है एक प्रसाद रूप में
और दूसरा किट्ट रूप मे ॥१८-१९॥
परस्परोपसंस्तम्भा धातुस्नेहपरम्परा ।
वृष्यादीना प्रभावस्तु पुष्णाति बलमाशु हि ॥ २० ॥
प्रसाद और किट्ट ये दोना परस्पर एक दूसर के स्तम्भक हैं, इसी लिये
धातु-समता को परम्परा चलती जाती है वृष्य आदि पदार्थों का प्रभाव तो शीघ्र
ही शरीर मे बल का पोषण करता है २ ॥२०॥
षडभिः केचिदहोरात्रैरिच्छन्ति परिवर्तनम् ।
संतत्या भोज्यधातूनां परिवृत्तिस्तु चक्रवत् ३ ॥ २१ ॥
कई आचार्य छः अहोरात्र (२४ x ६ = १४४ घण्टों) मे धातुओं का परि-
वर्त्तन मानते है। अर्थात् रस-धातु छ• दिन मे वीर्य रूप में बदलता है। पोष्य
रस आदि धातुओ का चक्र के समान निरन्तर परिवर्त्तन होता रहता है ४ ।
१. 'पाकादेव विधः स्मृतः' इति वा पाठः ।
२ देखिये सूत्रस्थान अ० २८ मे—"ते सर्व एव धातवो मलाख्याः प्रसा-
दाख्याश्च रसमलाभ्या पुष्यन्तः स्वमानमनुवर्त्तन्ते इत्यादि ।" (क) वृष्य वाजी-
करण द्रव्य अपने प्रभाव से शीघ्र बल, ध्वज-प्रहर्ष उत्पन्न करते हैं। जैसे कि
कहा भी है—"वाजीकरणास्त्वोषधयः स्वबलगुणोत्कर्षाद् विरेचनवदुपयुक्ताः शुक्रं
शीघ्रं विरेचयन्ति ॥ ३ अतः पर क्वचित् पुस्तकेषु २२-३५ श्लोकाः पठ्यन्ते ।
४. कई आचार्य ( पराशर आदि ) आठवे दिन शुक्र की उत्पत्ति मानते
हैं । यथा—आहारोपभोगदिनात् श्वः रसत्वं, तृतीयेऽह्नि रक्तत्वं, चतुर्थेऽह्नि
मांसता, मेदस्त्वं पञ्चमे, षष्ठे त्वस्थित्वं, सप्तमे मज्जता, अष्टमे शुक्रता नियमेन
भवति । (क) सुश्रुत में एक मास के अन्दर शुक्नोत्पत्ति मानी है। यथा—
'तत्र रसगतो धातु अहरहन्नृच्छतीयतो रसः । स खलु त्रीणि त्रीणि कला-
५६४ चरकसंहिता [ अ० १५
[ चक्रपाणि की मान्यता है कि धातुओ के परिवर्त्तन का कोई समय
निश्चित नही है। जिस प्रकार एक बलवान् पुरुष यदि जल-चक्र को घुमाये
तो पानी जल्दी निकल आता है और कमजोर घुमावे तो देर मे निकलता है।
इसी प्रकार से तीव्र अग्नि दूध आदि वृष्य पदार्थ शीघ्रता से बल को उत्पन्न कर
देते है। मन्दाग्नि हो तो देर मे शुक्रादि बनते है। सुश्रुत ने भी शब्द-सन्तान,
अर्चिः सन्तान और जल सन्तान का उदाहरण देकर इसको स्पष्ट किया है¹।
जिस प्रकार शब्द-परम्परा, जल परम्परा और अर्चि (प्रभा) परम्परा क्रमश
मध्य, मन्द, तीक्ष्ण रूप मे बहती है, इसी प्रकार से धातु परिवर्त्तन भी न्यूना-
धिक काल मे होता रहता है। जल-सन्तान के दृष्टान्त से कभी एक मास तक
भी रस का शुक्र बनना कहा है। शब्द के दृष्टान्त से न अतिशीघ्र और न अति-
विलम्ब से शुक्रोत्पत्ति होती है। ये सब दृष्टान्त चक्रदृष्टान्त से ही गतार्थ
हो जाते है² ]॥२१॥
इत्युक्तवन्तमाचार्य शिष्यस्त्विदमचोदयत् ।
रसाद्रक्तं विसदृशात्कथं देहेऽभिजायते ॥ २२ ॥
रसस्य च न रागो³ऽस्ति स कथं याति रक्तताम् ।
सहस्राणि पञ्चदश च कला एकैकस्मिन् धाताववतिष्ठन्ते, एवं मासेन रसः शुक्री-
भवति, स्त्रीणा चार्त्तवम्।'
इसलिये किसी ने कहा है—
'केचिदाहुरहोरात्रात् षड्रात्रादपरे परे।
मासेन याति शुक्रत्वमन्न पाक्रमादिति ॥'
१. सुश्रुत मे—स शब्दार्त्तिर्जेलसन्तानवदणुना विशेषेणानुधावत्येव शरीरं
केवलम् ।
२ तत्र दृष्टान्तेन तु परिवृत्तिः कालानियम दर्शयति। तथा चक्र पानीयोद्ध-
रणार्थं नियुक्त वाह्यमान बाहुबलप्रकर्षात् कदाचिद् आश्वेव प्रवर्त्तते कदाचिद्
बाहुबलप्रकर्षात् चिरेण । एव धातवोऽपि अग्न्यादिसौष्ठवात् शीघ्रमेव परिवर्त्तन्ते ।
अग्न्यादिवैगुण्ये चिरेण वर्त्तन्ते इति । एव सुश्रुतेनापि 'स शब्दार्त्तिर्जेलसतान-
वदणुविशेषेणानुधावत्येव शरीर केवलम्।' इत्यत्र कृष्णात्रेयेण रसपरिणामोऽपि
अग्न्यादिभेदेन प्रकृष्टाप्रकृष्टकालज उक्त एव । तत्रहि जलसतानदृष्टान्तेन चिरेण
मासपर्यन्तेन शुक्रतापत्ती रसस्योक्त। । शब्दसतानदृष्टान्तेन तु नातिशीघ्र नाति-
चिराच्च शुक्रोत्पत्तिरुक्ता। अर्चिःसतानदृष्टान्तेन तु नातिशीघ्रं नचिराच्च शुक्रोत्पत्ति-
र्भवति । तदेतत् सकलं चक्रदृष्टान्तेन गृहीतं ज्ञेयम् ॥ ] ३. 'रगोऽस्ति 'इति वा ।
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५६५
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५६५
द्रवद्रक्तात्स्थिरं मांसं कथं तज्जायते नृणाम् ॥ २३ ॥
द्रवधातोः स्थिरान् मांसान्मेदसः संभवः कथम् १।
श्लक्ष्णाभ्या मासमेदोभ्यां खरत्वं कथमस्थिषु ॥ २४ ॥
खरेष्वस्थिषु मज्जा च केन स्निग्धो मृदुस्तथा ।
मज्जश्च परिणामेन यदि शुक्रं प्रवर्तते ॥ २५ ॥
सर्वदेहगतं शुक्रं प्रवदन्ति मनीषिणः ।
तथाऽस्थिमध्ये मज्जश्च शुक्रं भवति देहिनाम् ॥ २६ ॥
छिद्रं न दृश्यतेऽस्थ्नां च तन्निःसरति वा कथम् ।
जब भगवान् आचार्य इस प्रकार से कह चुके तब शिष्य अग्निवेश ने पूछा
हे भगवन् ! इस शरीर मे रक्त के समान रस नही होता, फिर रस से रक्त
बनता है यह कैसे ? रस मे कोई रग या लालिमा नही है, फिर वह लाल कैसे हो
जाता है । द्रवरूप रक्त से कठिन मास-वस्तु किस प्रकार से पुरुषों मे बन जाती
है । स्निग्ध चिकने मास और मेद से अस्थियो मे खरता कैसे उत्पन्न हो जाती
हे ? खुरदरी अस्थियो मे स्निग्ध और कोमल मज्जा कैसे आ जाती है ? और यदि
मज्जा के परिणाम से ही शुक्र बनता है, तो बुद्धिमान लोग शुक्र को सम्पूर्ण
देह मे व्याप्त क्यो कर बतलाते है ? अस्थियो के मध्य मे और मज्जा मे भी
शुक्र रहता है, परन्तु अस्थियो मे कोई छिद्र दिखाई नही देता, फिर वह उनसे
कैसे निकलता है ॥ २२-२६- ॥
एवमुक्तस्तु शिष्येण गुरुः प्राहैदमुत्तरम् ॥ २७ ॥
तेजो रसानां सर्वेषा मनुजानां यदुच्यते ।
पित्तोष्मणः स रागेण रसो रक्तत्वमृच्छति ॥ २८ ॥
शिष्य अग्निवेश के इस प्रकार पूछने पर भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया
कि सब मनुष्यों मे जो रसों का तेज है, उससे तथा पित्त की उष्णिामा के राग
के कारण यह रस रक्तता को प्राप्त करता है ।
[ रसों का तेज ही पित्त है । क्योकि सुश्रुत मे कहा है—पित्त से अतिरिक्त
और कोई अग्नि इस शरीर मे उपलब्ध नही होती । इसलिये रस रक्त की अग्नि
से ही परिपाक होने पर रक्तवर्ण हो जाता है । जैसा कि सुश्रुत मे कहा है—
यकृत् और प्लीहा में पहुंच कर यह रस रक्तवर्ण हो जाता है ] ॥ २७-२८ ॥
वाय्वम्बु२ तेजसा रक्तमूष्मणा चाभिसंयुतम् ।
स्थिरतां प्राप्य मांसं स्यात्स्वोष्मणा पक्वमेव तत्३ ॥ २९ ॥
१. 'रसात् रक्तात् तथा मांसान्मेदस' श्चेतता कथम्' इति च । २. 'वाय्वग्नि-
तेजसा' इति च । ३ 'स्थिरतो प्राप्य शौक्ल्य च मेदो देहेऽभिजायते' इति च ।
५६६ चरकसंहिता [ अ० १५
स्वतेजोऽम्बुगुणस्निग्धोद्रिक्तं मेदोऽभिजायते ।
पृथिव्यग्न्यनिलादीनां संघातः स्वोष्मणा१ कृतः ॥ ३० ॥
खरत्वं प्रकरोत्यस्य जायतेऽस्थि ततो नृणाम् ।
करोति तत्र सौषिर्यमस्थ्नां मध्ये समीरणः ॥ ३१ ॥
मेदसस्तानि पूर्यन्ते स्नेहो मज्जा ततः स्मृतः ।
यस्मान्मज्जस्तु यः स्नेहः शुक्रं संजायते ततः ॥ ३२ ॥
यह रक्त वायु, जल, तेज और उष्णिमा से मिल कर स्थिरता को प्राप्त
करके मांस रूप हो जाता है। यही मांस अपनी उष्णिमा से पक कर अपने मांस
के तेजोगुण और जलीय गुण की स्निग्धता के बढ़ने पर मेदरूप हो जाता है।
इसी मेद की उष्णिमा से पृथिवी, अग्नि, वायु आदि का संघात होकर यह मेद
खर (कठिन) हो जाता है, जिससे मनुष्यों की अस्थियां बनती हैं। इन
अस्थियों के मध्य में वायु छिद्र उत्पन्न कर देता है। यह छिद्र-भाग मेद से
भर जाते हैं। उससे स्नेह रूप मज्जा उत्पन्न होती है। इस मज्जा का जो स्नेह-
भाग है, उससे शुक्र की उत्पत्ति होती है ॥ २६-३२ ॥
वाय्वाकाशादिभिर्भावैः सौषिर्यं जायतेऽस्थिषु ।
तेन स्रवति तच्छुक्रं नवात्कुम्भादिवोदकम् ॥ ३३ ॥
स्रोतोभिः स्यन्दते देहात्समन्ताच्छुक्रवाहिभिः ।
वायु, आकाश आदि के कारण अस्थियों में सच्छिद्रता होती है। इन छिद्रों
से शुक्र ऐसे ही टपकता है, जैसे नये घड़े से जल टपकता है ॥ ३३ ॥
हर्षोद्दारितं वेगात्सङ्कल्पाच्च मनोभवात् ॥ ३४ ॥
विलीनं घृतवद् व्यायामोष्मणा स्थानविच्युतम् ।
बस्तौ संभृत्य निर्याति स्थलान्निम्नमिवोदकम् ॥ ३५ ॥
यह उत्पन्न शुक्र इन्द्रिय की उत्तेजना और काम-संकल्प के कारण उत्पन्न
हुए प्रहर्ष (उत्तेजना) से प्रेरित होकर सम्पूर्ण शरीर से शुक्रवाही-स्रोतों द्वारा
वेग से आता है। जिस प्रकार ऊंचे स्थान से जल नीचे की ओर बहकर निकल
जाता है, उसी प्रकार (योनि सङ्घर्ष आदि रूप) व्यायाम से उत्पन्न उष्णिमा
से घी के समान द्रवीभूत होकर तथा अपने स्वाभाविक स्थान से खिसक कर
वीर्य बस्तिदेश में एकत्र होकर मूत्रमार्ग से निकल जाता है२ ॥ ३४-३५ ॥
१. 'श्लेष्मणा' इति च । २. सुश्रुत मे भी कहा है—
'जिस प्रकार दूध में घी और गन्ने के रस में गुड़ छिपा रहता है इसी प्रकार
पुरुषों के शरीर में शुक्र को समझें, वह सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है।'
अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ५६७
अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ५६७
व्यानेन रसधातुर्हि विक्षेपोचितकर्मणा ।
युगपत्सर्वतोऽजस्रं देहे विक्षिप्यते सदा ॥ ३६ ॥
विक्षेप करने वाला व्यान-वायु रस धातु को सम्पूर्ण शरीर मे सब ओर एक
साथ समस्त शरीर मे फैला देता है ॥ ३६ ॥
क्षिप्यमाणः खवैगुण्याद्रसः सज्जति यत्र सः ।
तस्मिन् विकारान् कुरुते विवर्षमिव १ तोयदः ॥ ३७ ॥
निरन्तर गति करता हुआ यह रस स्रोतो के विकारों के कारण जहा कहीं
भी रुक जाता है वही पर रोगो का उत्पन्न कर देना है । जिस प्रकार वायु द्वारा
वेग से जाते हुए बादल जहा कहीं भी रुक जाते है वहाँ पर बरसने लगते हैं ।
उसी प्रकार रस के रुकने से रोग उत्पन्न होते है । [ रस शब्द का अर्थ ही गति
वाला है, जो प्रतिदिन प्रतिक्षण चलता रहता है वह 'रस' कहाता है ] ॥३७॥
दोषाणामपि चैवं स्यात्तत्र देशे प्रकोपणम् ।
फैलने वाले दोषो का भी जहा पर इसी प्रकार से रुकाव (स्थान, संश्रय)
हो जाता है, वही पर प्रकोप (रोग) हो जाता है२ ।
इति भौतिकधात्वन्नपक्तॄणां कर्म भाषितम् ॥ ३८ ॥
यह भौतिक अग्नि, वात्वग्नि और अन्न पाचक अग्नि के कर्मों का उपदेश
कर दिया ॥ ३८ ॥
अन्नस्य पक्ता सर्वेषां पक्तॄणामधिपो ३ मतः ।
तन्मूलास्ते हि तद्वृद्धिक्षयवृद्धिक्षयात्मकाः ॥ ३६ ॥
तस्मात्तं विधिवद्युक्तैरन्नपानेन्धनैर्हितैः ।
पालयेत्प्रयतस्तस्य स्थितौ ह्यायुर्बलस्थितिः ॥ ४० ॥
यो हि भुक्ते विधि मुक्त्वा ग्रहणीदोषजान् गदान् ।
स लौल्याल्लभते शीघ्रं वक्ष्यन्तेऽतः परं तु ये ॥ ४१ ॥
द्व्यङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधः ।
मूत्रस्रोतःपथाच्छुक्रं पुरुषस्य प्रवर्त्तते ॥
कृत्स्नदेहाश्रितं शुक्रं प्रसन्नमनसस्तथा ।
स्त्रीषु व्यायच्छतश्चापि हर्षात् तत्सम्प्रवर्त्तते ॥ सु० शा० ४ ॥
१. “करोति विकृतिं चात्र खे वर्षमिव” इति वा ।
२ सुश्रुत में—“कुपिताना हि दोषाणां शरीरे परिधावताम् ।
यत्र सगः स्ववैगुण्याद् व्याधिस्तत्रोपजायते ॥”
३. 'मधिको' इति पाठान्तरम् ।
५६८ चरकसंहिता [ अ० १५
इन तीनो प्रकार की अग्नियो में से प्रधान अग्नि१ अन्न का पाचक जाठ-
राग्नि ही है। इस जाठराग्नि पर ही शेष अग्नियां निर्भर है। इस जाठराग्नि के
बढ़ने पर ये बढते हैं और इसके घटने पर ये घट जाते है। इसलिये मनुष्य को
चाहिये कि प्रयत्नपूर्वक विधि से अति हितकारी अन्नपान रूपी इन्धन के द्वारा
इस जाठराग्नि की सदा रक्षा करे। क्योकि इसी अन्न-पाचक जाठराग्नि की स्थिति
पर बल और आयु की स्थिति निर्भर है। जो मनुष्य विधि का त्याग करके
आहार का सेवन करते हे, वे लोभवश ग्रहणी के दोष से उत्पन्न होने वाले
रोगो से पीड़ित होते है। [ ग्रहणी दोष से उत्पन्न होने वाले चार प्रकार के रोगा
का वर्णन आगे करेग ] ॥ ३६-४१ ॥
अभोजनादजीर्णातिभोजनाद्विषमाशनात् ।
असात्म्यगुरुशीतातिरूक्षसंदुष्टभोजनात् ॥ ४२ ॥
विरेकवमनस्नेहविभ्रमाद् व्याधिकर्शनात् ।
देशकालर्तुवैषम्याद् वेगानां च विधारणात् ॥ ४३ ॥
दुष्यत्यग्निः स दुष्टोऽन्नं न तत्पचति लघ्वपि ।
अपच्यमानं शुक्तत्वं यात्यन्नं विषतां च तत् ॥ ४४ ॥
अजीर्ण के सामान्य कारण—भोजन न करने से ( उपवास से ),
अजीर्ण मे ( प्रथम भोजन के जीर्ण न होने पर ) भोजन करने से, अति-
भोजन से, विषमाशन से ( बहुत थोड़ा या अकाल मे भोजन से ), असात्म्य
भोजन से, गुरु, शीत भोजन अथवा अति भोजन से, दूषित ( बासी या दूषित )
भोजन से, विरेचन, वमन अथवा स्नेह क विधिपूर्वक प्रयोग न करने से, किसी
रोग के कारण कृशता या निर्बलता हो जाने मे, देश, काल अथवा ऋतु की
विषमता से, मल, मूत्र आदि के उपस्थित वेगो को रोकने से अग्नि दूषित हो
जाती है। यह दूषित अग्नि थोडे से भी आहार का परिपाक नही करता । परि-
पाक न होने से अन्न शुक्त अर्थात् अम्लीभाव से युक्त हो जाता है तथा इसमें
विष के गुण आ जाते है। अर्थात् अपरिपक्व अन्न मृत्यु का भी कारण हो
सकता है२ ॥ ४२-४४ ॥
१ 'भौतिकाः पञ्च, धात्वग्नयः सप्त, अन्नपक्ता एकः । अग्नयः इति भूताग्नयः
पञ्च, धात्वग्नयः सप्त इति द्वादशाग्नयः ।' इति च चक्रः० ॥
२ अन्यत्र भी कहा है—
मूर्च्छा प्रलापो वमथुः प्रसेकः सदन भ्रमः ।
उपद्रवा भवन्त्येते मरणं चाप्यजीर्णतः ॥
अ० १५ ] चिकित्तिसस्थानम् ५६६
अ० १५ ] चिकित्तिसस्थानम् ५६६
तस्य लिङ्गमजीर्णस्य विष्टम्भः सदनं तथा ।
शिरसो रुक् च मूर्च्छा च भ्रमः पृष्ठकटिग्रहः ॥ ४५ ॥
जृम्भाऽङ्गमर्दस्तृष्णा च ज्वरश्छर्दिः प्रवाहणम् ।
अरोचकोऽविपाकश्च ।
सामान्य लक्षण—विष्टम्भ ( अन्नका कोष्ठ मे रुका रहना ), सदन ( शिथि-
लता ), शिर मे दर्द, मूर्च्छा, भ्रम, पीठ मे वेदना, कमर मे दर्द, जम्भाई का
आना, अङ्गों मे पीड़ा, प्यास, ज्वर, वमन, प्रवाहण ( बार-बार पतला मल
आना ), अरुचि और अविपाक ( भोजन का ठीक पाक न होना ) ये अजीर्ण
के सामान्य लक्षण है ॥ ४५-॥
घोरमन्नविषं च तत् ॥ ४६ ॥
संसृज्यमानं पित्तेन दाहं तृष्णा मुखामयान् ।
जनयत्यम्लपित्तं च पित्तजांश्चापरान् गदान् ॥ ४७ ॥
यक्ष्मपीनसमेहादीन्कफजान्कफसङ्गतः ।
करोति वातसंसृष्टं वातजांश्चापरान् गदान् १ ॥ ४८ ॥
मूत्ररोगांश्च मूत्रस्थं कुक्षिरोगान् शकृद्गतम् ।
रसादिभिश्च संसृष्टं कुर्याद्रोगान् रसादिजान् ॥ ४६ ॥
यह अन्न अब भयानक विष के समान हो जाता है। जिस समय यह अन्न-
विष पित्त के साथ मिल जाता है, तब जलन, प्यास तथा मुख के रोगों को ओर
अम्लपित्त को तथा पित्तजन्य अन्य विकारो को उत्पन्न करता है२ ।
कफ के साथ मिल कर यह अन्न-विष यक्ष्मा३, पीनस, प्रमेह आदि कफजन्य
रोगा को उत्पन्न करता है ।
यह अन्नविष वायु के साथ मिल कर विष्टम्भ आदि पूर्व कहे लक्षणो के
साथ वात से उत्पन्न शूल, अफ़ारा आदि अन्य अनेक रागों को उत्पन्न करता है ।
१. 'वातजांश्च गदान् बहून्' इति वा । २ अम्ल-पित्त के लक्षण दूसरे ग्रन्थ
मे इस प्रकार हैं—'अविपाकक्लमत्क्लेदतिक्ताम्लोद्गारगौरवैः ।
हृत्कण्ठदाहरुचिमिश्चाम्लपित्त विनिर्दिशेत् ॥'
भोजन का न पकना, क्लान्ति होना, वमन की सी इच्छा, खट्टे डकार,
भारीपन, हृदय और गले मे जलन और भोजन की अनिच्छा आदि लक्षणों से
अम्ल-पित्त को जाने ।
३. यक्ष्मा-रोग त्रिदोषज होता है तो भी स्रोतो के रुकने पर कफ ही मुख्य
उपद्रव उत्पन्न करता है इसलिये उसको कफजन्य कहा है ( चक्र० ) ।
६०० चरकसंहिता [अ० १५
यह अन्न-विष मूत्र मे स्थित होकर मूत्रसम्बन्धी रोगों को, मल मे आश्रित
होकर उदर रोगों को, रस, रक्त आदि धातुओ मे आश्रित होकर रस आदि से
उत्पन्न होने वाले रोगों को उत्पन्न करता है१ ॥ ४६-४९ ॥
विषमो धातुवैषम्यं करोति विषमं पचन्।
तीक्ष्णो मन्धेन्धनो धातून्विशोषयति पावकः॥ ५०॥
विषम अग्नि अन्न का पाक विषम रूप मे करके धातुओ मे भी विषमता
उत्पन्न कर देता है। तीक्ष्णाग्नि को यदि आहार रूप इन्धन न मिले तो वह
धातुओं को ही सुखाने लगता है ॥५०॥
युक्तं भुक्तवतो युक्तो धातुसाम्यं समं पचन्।
दुर्बलो विदहत्यान्नं तद्यात्यूर्ध्वमधोऽपि वा॥ ५१॥
युक्त अर्थात् समाग्नि, हित और मात्रा मे खाये युक्त आहार को समता से
परिपाक करके धातुओं को समानावस्था मे रखता है। दुर्बल अग्नि अन्न को
विदग्ध करता है, यह विदग्ध अन्न या तो ऊर्ध्वमार्ग से (वमन के रूप मे)
निकल जाता है या अधोमार्ग, गुदा द्वार से विरेचन के रास्ते मलरूप मे
बाहर होता है॥ ५१॥
अधस्तु पक्वमामं वा प्रवृत्तं ग्रहणीगदः।
उच्यते सर्वमेवान्नं प्रायो ह्यस्य विदह्यते॥ ५२॥
जब विदग्ध अन्न पके वा कच्चे मल के रूप मे नीचे के गुदा-मार्ग से
निकलता है, तब उसको 'ग्रहणी' रोग कहते है। इस ग्रहणी-रोग मे सब प्रकार
का अन्न प्रायः विदग्ध हो जाता है। रोगी स्निग्ध, रूक्ष, गुरु या लघु जो भी
कुछ खाता है वह सब विदग्ध हो जाता है ॥५२॥
अतिसृष्टं विबद्धं वा द्रवं तदुपवेश्यते।
तृष्णारोचकवैरस्यप्रसेकतमकान्वितः॥ ५३॥
शूनपादकरः सास्थिपर्वरुक् छर्दनं ज्वरः।
लोहाम२गन्धिस्तिक्ताम्ल उद्गारश्चास्य जायते॥ ५४॥
ग्रहणी के लक्षण—ग्रहणी के रोगी का मल बहुत पतला अथवा बंधा हुआ
या पानी के समान द्रवरूप होता है। रोगी को प्यास, अरुचि, मुख मे विरसता,
मुख मे थूक का बहुत आना और तमक-श्वास रहता है। रोगी के हाथ-पाय पर
१ रोगो के लिये देखिये चरक सूत्रस्थान अ० २८ ॥
२. 'लोहाम' इति पाठान्तरम् । 'लोहानुगन्धि' शब्द का अर्थ 'लोहे के
समान गन्ध' यह अर्थ आयुर्वेदाचार्य जयदेवजी ने किया है।
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०१
सूजन हो जाती है। अस्थियो तथा पोरुओ मे दर्द रहता है। रोगी को वमन
और ज्वर रहता है। रोगी को जो डकार (उद्गार) आते है उनमे रक्त की सी
गन्ध रहती है, ये उद्गार तिक्त (कटु) और अम्ल रससे युक्त होते हैं १॥५३-५४॥
पूर्वरूपं तु तस्येदं तृष्णाऽऽलस्यं बलक्षयः ।
विदाहोऽन्नस्य पाकश्च चिरात्कायस्य गौरवम् ॥ ५५ ॥
ग्रहणी के पूर्वरूप - प्यास, आलस्य, बल की क्षीणता, अन्न का विदाह
होना, अन्न का देर मे पचना और शरीर मे भारीपन प्रतीत होना ये ग्रहणी-रोग
के पूर्वरूप हैं ॥ ५५ ॥
अग्न्याधिष्ठानमन्नस्य ग्रहणाद् ग्रहणी मता ।
नाभेरुपरि सा ह्यग्निवलोपस्तम्भवृंहिता ॥ ५६ ॥
अपक्वं धारयत्यन्नं पक्कं सृजति पार्श्वतः ।
दुर्बलाग्निबलाद् दुष्टा त्वाममेव २ विमुञ्चति ॥ ५७॥
ग्रहणी का स्थान और निरुक्ति-ग्रहणी का स्थान अग्नि का आश्रय स्थान है।
वह अन्न को ग्रहण करती है इस कारण इस को 'ग्रहणी' कहते है। यह ग्रहणी
भाग नाभि से ऊपर कोष्ठ मे स्थित है। वहा पर यह ग्रहणी अग्नि के बल की
सहायता से स्थित और पुष्ट होकर आमाशय से आये कच्चे (अपरिपक्व) अन्न
को धारण करती है और दूसरे पके हुए अन्न को (क्षुद्र आतो मे) त्याग करती
हैं। जब अग्नि दुर्बल होती है तो दुष्ट हुई ग्रहणी अपक्व अन्न को नही पचाती।
वैसे का वेसे ही न पचे हुए अन्न को वह ग्रहणी इस मार्ग से त्याग करने
लगती है ३ ॥ ५६-५७ ॥
१. सुश्रुत में कहा भी है-
एकश. सर्वशश्चैव दौषैर्व्यर्थमूर्च्छितै. ।
सा दुष्टा बहुशो भुक्तमाममेव विमुञ्चति ॥
पक्कं वा सरुज पूति मुहुर्बद्धं मुहुर्द्रवम् ।
ग्रहणीरोगमाहुस्त आयुर्वेदाविदो जना. ॥
२. 'दुर्बलाग्न्यबलाद्दुष्टादाममेव' इति च पाठः ।
३. ग्रहणी भाग पर क्लोम रस, पित्ताशय का पित्त और आतों का क्षारीय
रस आकर मिलते हैं। जिनकी सहायता से आमाशय से श्वेत रस (काईंल)
के रूप में आया-अपक्व आहार रस मिल कर पक्कावस्था मे आता है ! जिस
समय ग्रहणी भाग निर्बल हो जाता है उस समय उपरोक्त रस भोजन के साथ
नहीं मिलते, जिससे वह अपक्कावस्था मे ही आतों मे चला जाता है । ये सब
हेतुं लिङ्गं चिकित्सां च शृणु तस्य पृथक् पृथक् ॥ ५८ ॥
६०२ चरकसंहिता [अ० १५
वातात्पित्तात्कफाच्च स्यात्तद्रोगस्त्रिभ्य एव च१ ।
हेतुं लिङ्गं चिकित्सां च शृणु तस्य पृथक् पृथक् ॥ ५८ ॥
ग्रहणी रोग के भेद—ग्रहणी-रोग चार प्रकार का है (१) वातजन्य, (२)
पित्तजन्य, (३) कफजन्य और (४) सन्निपातजन्य,। अब इन चारों के
कारण, लक्षण और चिकित्सा पृथक् सुनो ॥ ५८ ॥
कटुतिक्तकषायातिरूह्क्षशीताल्प२ भोजनैः ।
प्रमिताशनात्याध्ववेगनिग्रहमैथुनैः ॥ ५६ ॥
मारुतः कुपितो वह्नि संछाद्य कुरुते गदान्३ ।
(१) वातजन्य ग्रहणी—कटु, तिक्त, कषाय, अति रूक्ष, अति शीत,
अति अल्प भोजन से, मात्रा से न्यून भोजन से, अनशन (उपवास) से बहुत
अधिक यात्रा या परिश्रम से, मल मूत्रादि के वेगो को रोकने से तथा अति
मैथुन से कुपित हुआ वायु अग्नि का छाद कर उसको मन्द करके अनेक रोगों
को उत्पन्न करता है ॥ ५६- ॥
तस्यान्नं पच्यते दुःखं शुक्तपाकं खराङ्गता ॥ ६० ॥
कण्ठास्यशोषः क्षुत्तृष्णा तिमिरं कर्णयोः स्वनः ।
पार्श्वोरुवंक्षणग्रीवारुजोऽभीक्ष्णं विसूचिका ॥ ६१ ॥
हृत्पीडा कार्श्यदौर्बल्यं वैरस्यं परिकर्तिका ।
गृद्धिः सर्वरसानां च मनसः सदं तथा ॥ ६२ ॥
जीर्णे जीर्यति चाध्मानं भुक्ते स्वास्थ्यमुपैति च ।
स वातगुल्महृद्रोगप्लीहाशङ्की च मानवः ॥ ६३ ॥
चिराद् दुःखं द्रवं शुष्कं तन्वामं शब्दफेनवत् ।
पुनः पुनः सृजेद्वर्चः कासश्वासार्दितोऽनिलात् ॥ ६४ ॥
रस अग्नि गुण वाले अर्थात् क्षारीय होते है इसलिये ग्रहणी को अग्नि का आश्रय
स्थान कहा है। इसी अग्नि पर ग्रहणी आश्रित है अर्थात् इन रसों के आने ही
से उसका 'ग्रहणी' नाम सार्थक होता है। जैसा कि सुश्रुत मे कहा है—
षष्ठी पित्ता धरा नाम या कला परिकीर्त्तिता ।
पक्वामाशयमध्यस्था ग्रहणी सा प्रकीर्त्तिता
ग्रहण्या बलमग्निर्हि स चापि ग्रहणीं श्रितः ।
तस्मात्सदूषिते वह्नौ ग्रहणी सम्प्रदुष्यति ॥ सु० उ० अ० ४० ॥
१. 'वातात् पित्तात् कफात्सर्वाद् ग्रहणीदोष उच्यते' इति पाठान्तरम् ।
२ 'शीतल' इति वा पाठः ।
३. 'करोति कुपितो मन्दमग्निं संछाद्य मारुतः' इति पाठान्तरम् ।
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०३
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०३
लक्षण—वातजन्य ग्रहणी मे अन्न का परिपाक बहुत कठिनता से होता है ।
पकने पर अन्न शुक्त (अम्लीभाव) हो जाता है। अगों मे रूक्षता, कर्कशता आ
जाती है । गला और मुख सूखा रहता है, भूख और प्यास बढ जाती है,
आखो के सामने अन्धेरा आता या दृष्टि मन्द हो जाती है, कानो मे गुजार
रहती है, पासो मे, जघाओ मे, वक्षण और ग्रीवा मे दर्द रहती है बार बार
विसूचिका अर्थात् पतला मल तथा वमन आने की शिकायत रहती है । हृदय
मे ( आमाशय के कौड़ी भाग पर ) वेदना, दुर्बलता, कृशता मुख मे विरसता
और कोष्ठ मे कर्तन के समान वदना होती ह । मधुर आदि सब रसो की खान
का वाह रोगी करता है, मानसिक शिथिलता आ जाती है । भोजनके जीर्ण होजाने
पर या जीर्णावस्था मे आध्मान (अफरा) होता है । भोजनके करने पर रोगी को
स्वास्थ्य का अनुभव होता है । रोगी को वातगुल्म, हृदयरोग और प्लीहा-रोग
कॊ आशका नीं रहती है ।
रोगी बड़ी कठिनाई से बहुत देर मे पतला, शुष्क, पानी के समान, कच्चा,
शब्द और झाग मिले मल का बार-बार त्याग करता है । रोगी को खासी और
श्वास की शिकायत रहती है ॥ ६०–६४ ॥
कट्वजीर्णाविदाह्यम्लक्षाराद्यैः पित्तमुल्बणम् ।
अभिमालावयदन्ति जलं तप्तमिवानलम् ॥ ६५ ॥
(२) पैत्तिक-ग्रहणी—कटु, अजीर्ण, विदाही, अम्ल तथा क्षार आदि के सेवन
बढा हुआ पित्त अग्नि को आप्लावित करके उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे
गरम पानी अग्नि को शान्त कर देता ह । पित्त-प्रकोपक वस्तुओ से पित्त मे
उष्णिमा और द्रवाश दोनो बढते है । द्रवाश के कारण अग्नि बुझ जाती है ॥६५॥
सोऽजीर्णं नीलपीताभं पीताभः सार्यते द्रवम् ।
पूत्यम्लोद्गारहृत्कण्ठदाहारुचितृडर्दितः ॥ ६६ ॥
लक्षण—रोगी का वर्ण पीला या नीला सा हो जाता है उसका मल पीला
तथा पानी जैसा पतला होता है । रोगी का उद्गार ( डकार ) दुर्गन्धयुक्त और
खट्टा होता है, हृदय और गले मे जलन होती है । रोगी का अरुचि और प्यास
सताती है ॥ ६६ ॥
गुर्वतिस्निग्धशीतादिभोजनादतिभोजनात् ।
भुक्तमात्रस्य च स्वप्नाद्धन्त्यग्निं कुपितः कफः ॥ ६७ ॥
( ३ ) कफजन्यग्रहणी—गुरु, शीत, अति स्निग्ध भोजन के सेवन से
अथवा अतिभोजन से, और भोजन के उपरान्त तुरन्त सो जाने से कुपित हुआ
कफ अग्नि को नष्ट करता है ॥ ६७ ॥
६०४ चरकसंहिता [ अ० १५
तस्यान्नं पच्यते दुःखं हृल्लासच्छर्द्यरोचकाः ।
आस्योपदेहमाधुर्यकासष्ठीवनपीनसाः ॥ ६८ ॥
हृदयं मन्यते स्त्यानमुदरं स्तिमितं गुरु ।
दुष्टो मधुर उद्गारः सदनं स्त्रीष्वहर्षणम् ॥ ६९ ॥
भिन्नामश्लेष्मसंसृष्टगुरुवर्चःप्रवर्तनम् ।
अकृशस्यापि दौर्बल्यमालस्यं च कफात्मके ॥ ७० ॥
लक्षण—रोगी का अन्न कठिनाई से पचता है, उसको जीमचलाना, वमन,
अरुचि रहती है । लार से मुख लिपा सा रहता है, मुख मे मीठापन रहता है,
खासी, बहुत थूक का आना, नाक मे प्रतिश्याय ( जुकाम ) रहता है । रोगी
हृदय को रुका हुआ या भारी मानता है, उदर स्तिमित ( जकड़ा ) वा भारी
प्रतीत होता है । उद्गार दूषित और मधुर होता है, शरीर के अगों मे शिथिलता
रहती है, स्त्रियो के सहयोग मे मैथुन की इच्छा जागृत नही होती । रोगी का
मल फटा हुआ ( छिछलेदार ), आम ( कच्चा ) और कफ युक्त तथा भारी
होता है । बिना कृशता के भी शरीर मे दुर्बलता का अनुभव होता है, शरीर मे
आलस्य रहता, काम करने को दिल नही चाहता ॥ ६८-७० ॥
यश्चाग्निः पूर्वमुद्दिष्टो रोगानीके चतुर्विधः ।
तं चापि ग्रहणीदोष समवर्जं प्रचक्ष्महे ॥ ७१ ॥
रोगानीक [ विमानस्थान अ० ६ ] अध्याय मे जो चार प्रकार के अग्नि
बतलाई है, उनमे भी समाग्नि को छोड कर शेष तीन ( विषम, मन्द और
तीक्ष्णाग्नि ) अग्नियो को ग्रहणी दोष ही कहते हैं । वायु से विषमाग्नि, कफ से
मन्दाग्नि और पित्त से तीक्ष्णाग्नि होता है ॥ ७१ ॥
पृथग्वातादिनिर्दिष्टहेतुलिङ्गसमागमे ।
त्रिदोषं निर्दिशेत्तेषां—
( ४ ) सन्निपातजन्य ग्रहणी—जिस स्थान पर वातजन्य, पित्तजन्य और
कफजन्य ग्रहणियो के कारण और लक्षण एकत्र मिलित दिखाई देने हो उसको
सन्निपातजन्य ग्रहणी समझना चाहिये १ ।
१ अतीसार और ग्रहणी मे भेद करना चाहिये । यथा—
सामं शकृन्निरामं वा जीर्णे येनातिसार्यते ।
सोऽतिसारोऽतिसरणादाशुकारी स्वभावतः ॥
साम सान्नम्जीर्णेऽन्ने जीर्णे पक्व तु नैव वा ।
अकस्माद् वा गुरुर्बद्धमकस्माच्छिथिल मुहुः ॥
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०५
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०५
भेषजं शृण्वतः परम् ॥ ७२ ॥
ग्रहणीमाश्रितं दोषं विदग्धाहारमूर्च्छितम् ।
सविष्टम्भप्रसेकार्तिविदाहारुचिगौरवैः ॥ ७३ ॥
आमलिङ्गान्वितं ज्ञात्वा सुखोष्णेनाम्बुनोद्धरेत् ।
फलानां वा कषायेण पिप्पलीसर्षपैस्तथा ॥ ७४ ॥
अब ग्रहणी-रोग की चिकित्सा सुनो—
( १ ) आम दोष मे चिकित्सा—जिस समय आहार विदग्ध होता हो,
विष्टम्भ ( मल का अवरोध ), मुख से लाला-स्राव, पीड़ा, विदाह, अरुचि और
भारीपन हो उस समय ग्रहणी मे आश्रित दोषो को आम के लक्षणो से युक्त
समझना चाहिये । १इसके लिये ( १ ) रोगी को गरम सुहाते पानी से वमन
कराना चाहिये । अथवा ( २ ) मैनफल के क्वाथ से या पिप्पली और सरसो के
क्वाथ से वमन कराना चाहिये । या ( ३ ) मैनफल क क्वाथ मे ही पिप्पली और
सरसो का कल्क मिला कर वमन कराना चाहिये ॥ ७२-७४ ।
लीनं पक्वाशयस्थं वाप्यामं स्राव्यं सदीपनैः ।
शरीरानुगते सामे रसे लंघनपाचनम् ॥ ७५ ॥
( २ ) यदि आम-दोष कोष्ठ मे लीन ( छिपा या व्याप्त ) हो अथवा
पक्वाशय ( आतो मे ) मे पहुचा हो तो दीपनीय ओषधियो से रोगी को विरेचन
देकर इस आम को निकालना चाहिये और यदि आम सम्पूर्ण शरीर मे (अपक्वा-
वस्था मे) व्याप्त हो जाये तो रोगी को लंघन और पाचन देने चाहियें ॥ ७५ ॥
विशुद्धामाशयायास्मै पञ्चकोलादिभिः शृतम् ।
दद्यात् पेयादि लघ्वन्नं पुनर्योगांश्च दीपनान् ॥ ७६ ॥
( ३ ) जिस समय रोगी का आमाशय शुद्ध हो जाये तब पञ्चकोल ( पिप्पली,
पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और सोठ ) और दीपनीय ओषधियो से साधित
पेयादि लघु अन्न देने चाहिये और अन्य दीपनीय-योगो का प्रयोग करना चाहिये ७६
ज्ञात्वा तु परिपक्वामं मारुतग्रहणीगदम् ।
दीपनीययुतं सर्पिः पाययेताल्पशो भिषक् ॥ ७७ ॥
१ चिरकृद् ग्रहणी दोषः सञ्चाच्चोपवेशयेत् ॥ अ० स० ।
अतिसार मे मल अत्यधिक और साम तथा निराम बार-बार आता है । जब
अन्न पचता नही तब ग्रहणी मे मल साम और भुक्त अन्न से युक्त होता है और
जब अन्न पच जाता है तब मल पका हुआ आता है या आता ही नही । इसमे
मल बिना कारण ही बधा और बिना कारण ही शिथिल आता है ।
६०६ चरकसंहिता [ अ० १५
(४) वातजन्य ग्रहणी मे पेया और दीपनीय योगो से जब आम का परि-
पाक हो जाये तब वैद्य को चाहिये कि सूत्रस्थान मे कहे ( चतुर्थ ) दीपनीय
औषधियो से साधित घृत को थोड़ा थोड़ा करके देवे ।। ७७ ।।
किञ्चित्सन्धुक्षिते त्वग्नौ सक्तविण्मूत्रमारुतम् ।
द्वयहं त्र्यहं वा संस्नेह्य स्विन्नाभ्यक्तं१ निरूहयेत् ॥ ७८ ॥
(५) घृत के प्रयोग से जब अग्नि कुछ प्रदीप्त हो जाये तो यदि रोगी के
मल, मूत्र ओर आयु रुके हो तो दो या तीन दिन घृत पान कराना चाहिये और
रोगी को स्वेदन तथा तैल का अभ्यग देकर आस्थापन कराना चाहिये ॥ ७८ ॥
तत ऐरण्डतैलेन सर्पिषा तैलवकेन वा ।
सक्षारेणानिले शान्ते स्रस्तदोषं विरेचयेत् ॥ ७६ ॥
( ६ ) इस प्रकार से जब वायु शान्त हो जाये और दोष ढीले हो
जाएँ तब एरण्ड तैल से अथवा यवक्षारयुक्त तिल्वक घृत से रोगी को विरेचन
देना चाहिये ॥ ७६ ॥
शुद्धं रूक्षाशयं बद्धवर्चसं चानुवासयेत् ।
दीपनीयाम्लवातघ्नसिद्धतैलेन मात्रया ॥ ८० ॥
( ७ ) रोगी के आशय और पक्वाशय जब शुद्ध हो जाये, तथा कोष्ठ या
आशयों मे रूक्षता अनुभव होने पर, मल के बँध जाने पर अनुवासन देना
चाहिये । इसके लिये दीपनीय अम्ल तथा वात-नाशक ओषधियों से तैल सिद्ध
करके मात्रा मे अनुवासन देना चाहिये ॥ ८० ॥
निरूढं च विरिक्तं च सम्यक् चैवानुवासितम् ।
लध्वन्नप्रतिसंयुक्तं२ सर्पिरभ्यासयेत्पुनः ॥ ८१ ॥
जब रोगी को निरूह बस्ति, विरेचन और अनुवासन भली प्रकार से दिये
जा चुके तब पेया आदि लघु अन्न का भोजन करने वाले रोगी को घृत का पुन.
धीरे धीरे अभ्यास कराना चाहिये ॥ ८१ ॥
द्वे पञ्चमूले सरलं देवदारु सनागरम् ।
पिप्पलीं पिप्पलीमूलं चित्रकं हस्तिपिप्पलीम् ॥ ८२ ॥
शणबीजं यवान्कोलान्कुलत्थान्सुरभींस्तथा ।
पाचयेदारनालेन दध्ना सौवीरकेण वा ॥ ८३ ॥
चतुर्भागावशेषेण पचेत्तेन घृताढकम् ।
१. 'द्वित्रीण्यहानि सस्नेहं स्नेहाभ्यक्त' इति पाठान्तरम् ।
२. 'सभुक्तः' इति पाठान्तरम् ।
अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ६०७
अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ६०७
स्वर्जिकायावशूकाख्यौ क्षारौ दत्त्वा च युक्तितः ॥ ८४ ॥
सैन्धवौद्भिदसामुद्रबिडाना रोमकस्य च ।
ससौवर्चलपाक्याना भागान्द्विपलिकान्पृथक् ॥ ८५ ॥
विनीय चूर्णितान् सिद्धात्ततो द्वे द्वे पले पिबेत् ।
करोत्यग्निबलं वर्णं वातघ्नं भुक्तपाचनम् ॥ ८६ ॥
इति दशमूलाद्यं घृतम् ।
(८) दशमूलाद्य घृत—क्वाथार्थ, दोनो पञ्चमूल (बिल्व की छाल, अरणी
का छाल, सोनापाठा की छाल, गम्भारी की छाल, पाढल की छाल, छोटी कटेरी,
बड़ी कटेरी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, गोखरू), सरल काष्ठ, देवदारु, सोंठ,
पिप्पली, पिप्पलीमूल, गजपिप्पली, सन के बीज, जौ, बेर, कुलत्थी, सुरभी
(रास्ना) ये मिलित द्रव्य १६ पल, आरनाल (काजी) या दही (दही का
मस्तु) अथवा सौवीरक काजी इनमे से कोई एक १२८ पल लेकर क्वाथ करना
चाहिये। जब चतुर्थांश शेष रह जाये तब गाय का घृत एक आढक लेकर घृत
सिद्ध करना चाहिये। जब घृत सिद्ध होने के लगभग हो तो इसमे सर्जक्षार और
यवक्षार का थोड़ी मात्रा मे प्रक्षेप देना चाहिये। फिर सैन्धा नमक, उद्भेद
नमक, सामुद्र नमक, बिड् नमक, रोमक (साभर) नमक, सचल नमक, पाक्य
(पांशुज) नमक, प्रत्येक का दो दो पल चूर्ण लेकर इसमे मिला देना चाहिये।
इसमे से दो दो पल घृत पीना चाहिये। यह घृत अग्नि, बल और वर्ण को
बढाता है, वायु को नष्ट करता है और खाये हुए आहार को पचाता है १।
नमक आदि को कल्क रूप मे प्रक्षेप करके भी घृतपाक किया जा सकता
है और विशेषतया गुण भी इसी विधि से पाक करने मे आता है। इसलिये
कल्क रूप मे इनका प्रक्षेप देना चाहिये ॥ ८२-८६ ॥
त्र्यूषणत्रिफलाकल्के बिल्वमात्रे गुडात्पले ।
सर्पिषोऽष्टपलं पक्त्वा मात्रा मन्दानिलः पिबेत् ॥ ८७ ॥
इति त्र्यूषणाद्यं घृतम् ।
१. जतुकर्ण ने सर्जक्षार और यवक्षार की मात्रा दो दो पल कही है।
द्वौ क्षारौ सप्त लवण दापयेद् द्विपलोन्मितम् ॥
अष्टाग-संग्रह मे यह पाठ थोड़े अन्तर से है। यथा—
'द्विपञ्चमूलपञ्चकोलसरलसुरदारुसुरभिगजपिप्पलीशणबीजकोलकुलत्थान्मस्तुना-
रनालेन वा पाचयेत् । तेन पादावशेषेण पञ्चलवणद्विक्षाराम्लबदरयुक्तं
सर्पिर्विपक्वम्।'