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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 575, कुल 616 में से

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पृष्ठ 575

अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ५६१
पक्वाशयं तु प्राप्तस्य शोष्यमाणस्य वह्निना ।
परिपिण्डितपक्वस्य वायुः स्यात्कटुभावतः ॥ ११ ॥
जिस समय भुक्त आहार पित्ताशय मे पहुंचता है और वहा पर अग्नि के
द्वारा सुखाया जाता है तब पानी (द्रव) के सूख जाने से यह पक कर पिण्डित
बन जाता है । इसके कटु-भाव से इस समय वायु की वृद्धि होती है । क्योकि
पच्यमानाशय मे आहार रस, आत्र रस, क्लोमरस तथा पित्ताशय के पित्त के
मिलने से कटु बन जाता है, इसलिये अब वायु की वृद्धि होती है (क्योंकि कटु
रस वायु को बढाता है) ॥ ११ ॥
अन्नमिष्टं ह्युपकृतमिष्टैर्गन्धादिभिः पृथक् ।
देहे प्रीणाति गन्धादीन् प्राणादीनिन्द्रियाणि च ॥ १२ ॥
इष्ट गन्ध आदि से युक्त प्रिय और हितकर अन्न शरीर मे पृथक् २ गन्ध
आदि गुण घ्राण आदि इन्द्रियों को पृथक् २ तर्पण करता है । अर्थात् स्वादु
और हितकर अन्न के पार्थिव आदि भाग अपने अपने गुणों से अपनी अपनी
इन्द्रियो का तर्पण करते हैं ॥ १२ ॥
भौमाप्याग्नेयवायव्याः पञ्चोष्माणः सनाभसाः ।
पञ्चाहारगुणान्स्वान् स्वान्पार्थिवादीन्पचन्ति हि ॥ १३ ॥
भौम, आप्य, आग्नेय, वायव्य और नाभस से पाच प्रकार की ऊष्माए
आहार के अपने अपने पार्थिव आदि पाच प्रकार के गुणो का पाक करती है
(पार्थिव आदि अपने अपने गुणों को बढाती है) ॥ १३ ॥
यथास्वैरेव पुष्यन्ते देहे द्रव्यगुणाः पृथक्¹ ।
पार्थिवाः पार्थिवानेव शेषाः शेषांश्च कृत्स्नशः ॥ १४ ॥
अन्न भी पाचभौतिक है, शरीर भी पाचभौतिक है । जाठराग्नि के द्वारा
जब अन्न का पाक होता है उस समय भौम अग्नि अपने पार्थिव गुण को बढाती
है, आप्य अग्नि जलीय गुण को, वायव्य अग्नि वायु गुण को, आग्नेय अग्नि
अग्नि गुण का और नाभस्य अग्नि आकाश गुण को बढाती है । क्योकि शरीर
मे द्रव्यों के गुण पृथक् २ अपने २ अंशो से ही पुष्ट होते हैं । पार्थिव गुण पा-
र्थिव गुणों को ही सम्पूर्ण रूप मे पुष्ट करते हैं और आप्य आदि शेष अश अपने
अम्ली-क्रिया नही रहती क्योंकि पित्त, क्लोम रस, आत्र रस इसको क्षारीय बना
देते हैं इससे कटु हो जाता है । बृहदान्त्र मे पानी का शोषण होने से मल कठोर
हो जाता है ।
१ 'यथास्वं-स्व च पुष्यन्ति देहद्रव्यगुणाः पृथक्' इति ।