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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 581, कुल 616 में से

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पृष्ठ 581

अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ५६७
व्यानेन रसधातुर्हि विक्षेपोचितकर्मणा ।
युगपत्सर्वतोऽजस्रं देहे विक्षिप्यते सदा ॥ ३६ ॥
विक्षेप करने वाला व्यान-वायु रस धातु को सम्पूर्ण शरीर मे सब ओर एक
साथ समस्त शरीर मे फैला देता है ॥ ३६ ॥
क्षिप्यमाणः खवैगुण्याद्रसः सज्जति यत्र सः ।
तस्मिन् विकारान् कुरुते विवर्षमिव १ तोयदः ॥ ३७ ॥
निरन्तर गति करता हुआ यह रस स्रोतो के विकारों के कारण जहा कहीं
भी रुक जाता है वही पर रोगो का उत्पन्न कर देना है । जिस प्रकार वायु द्वारा
वेग से जाते हुए बादल जहा कहीं भी रुक जाते है वहाँ पर बरसने लगते हैं ।
उसी प्रकार रस के रुकने से रोग उत्पन्न होते है । [ रस शब्द का अर्थ ही गति
वाला है, जो प्रतिदिन प्रतिक्षण चलता रहता है वह 'रस' कहाता है ] ॥३७॥
दोषाणामपि चैवं स्यात्तत्र देशे प्रकोपणम् ।
फैलने वाले दोषो का भी जहा पर इसी प्रकार से रुकाव (स्थान, संश्रय)
हो जाता है, वही पर प्रकोप (रोग) हो जाता है२ ।
इति भौतिकधात्वन्नपक्तॄणां कर्म भाषितम् ॥ ३८ ॥
यह भौतिक अग्नि, वात्वग्नि और अन्न पाचक अग्नि के कर्मों का उपदेश
कर दिया ॥ ३८ ॥
अन्नस्य पक्ता सर्वेषां पक्तॄणामधिपो ३ मतः ।
तन्मूलास्ते हि तद्वृद्धिक्षयवृद्धिक्षयात्मकाः ॥ ३६ ॥
तस्मात्तं विधिवद्युक्तैरन्नपानेन्धनैर्हितैः ।
पालयेत्प्रयतस्तस्य स्थितौ ह्यायुर्बलस्थितिः ॥ ४० ॥
यो हि भुक्ते विधि मुक्त्वा ग्रहणीदोषजान् गदान् ।
स लौल्याल्लभते शीघ्रं वक्ष्यन्तेऽतः परं तु ये ॥ ४१ ॥
द्व्यङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधः ।
मूत्रस्रोतःपथाच्छुक्रं पुरुषस्य प्रवर्त्तते ॥
कृत्स्नदेहाश्रितं शुक्रं प्रसन्नमनसस्तथा ।
स्त्रीषु व्यायच्छतश्चापि हर्षात् तत्सम्प्रवर्त्तते ॥ सु० शा० ४ ॥
१. “करोति विकृतिं चात्र खे वर्षमिव” इति वा ।
२ सुश्रुत में—“कुपिताना हि दोषाणां शरीरे परिधावताम् ।
यत्र सगः स्ववैगुण्याद् व्याधिस्तत्रोपजायते ॥”
३. 'मधिको' इति पाठान्तरम् ।