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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 588, कुल 616 में से

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पृष्ठ 588

६०४ चरकसंहिता [ अ० १५
तस्यान्नं पच्यते दुःखं हृल्लासच्छर्द्यरोचकाः ।
आस्योपदेहमाधुर्यकासष्ठीवनपीनसाः ॥ ६८ ॥
हृदयं मन्यते स्त्यानमुदरं स्तिमितं गुरु ।
दुष्टो मधुर उद्गारः सदनं स्त्रीष्वहर्षणम् ॥ ६९ ॥
भिन्नामश्लेष्मसंसृष्टगुरुवर्चःप्रवर्तनम् ।
अकृशस्यापि दौर्बल्यमालस्यं च कफात्मके ॥ ७० ॥
लक्षण—रोगी का अन्न कठिनाई से पचता है, उसको जीमचलाना, वमन,
अरुचि रहती है । लार से मुख लिपा सा रहता है, मुख मे मीठापन रहता है,
खासी, बहुत थूक का आना, नाक मे प्रतिश्याय ( जुकाम ) रहता है । रोगी
हृदय को रुका हुआ या भारी मानता है, उदर स्तिमित ( जकड़ा ) वा भारी
प्रतीत होता है । उद्गार दूषित और मधुर होता है, शरीर के अगों मे शिथिलता
रहती है, स्त्रियो के सहयोग मे मैथुन की इच्छा जागृत नही होती । रोगी का
मल फटा हुआ ( छिछलेदार ), आम ( कच्चा ) और कफ युक्त तथा भारी
होता है । बिना कृशता के भी शरीर मे दुर्बलता का अनुभव होता है, शरीर मे
आलस्य रहता, काम करने को दिल नही चाहता ॥ ६८-७० ॥
यश्चाग्निः पूर्वमुद्दिष्टो रोगानीके चतुर्विधः ।
तं चापि ग्रहणीदोष समवर्जं प्रचक्ष्महे ॥ ७१ ॥
रोगानीक [ विमानस्थान अ० ६ ] अध्याय मे जो चार प्रकार के अग्नि
बतलाई है, उनमे भी समाग्नि को छोड कर शेष तीन ( विषम, मन्द और
तीक्ष्णाग्नि ) अग्नियो को ग्रहणी दोष ही कहते हैं । वायु से विषमाग्नि, कफ से
मन्दाग्नि और पित्त से तीक्ष्णाग्नि होता है ॥ ७१ ॥
पृथग्वातादिनिर्दिष्टहेतुलिङ्गसमागमे ।
त्रिदोषं निर्दिशेत्तेषां—
( ४ ) सन्निपातजन्य ग्रहणी—जिस स्थान पर वातजन्य, पित्तजन्य और
कफजन्य ग्रहणियो के कारण और लक्षण एकत्र मिलित दिखाई देने हो उसको
सन्निपातजन्य ग्रहणी समझना चाहिये १ ।
१ अतीसार और ग्रहणी मे भेद करना चाहिये । यथा—
सामं शकृन्निरामं वा जीर्णे येनातिसार्यते ।
सोऽतिसारोऽतिसरणादाशुकारी स्वभावतः ॥
साम सान्नम्जीर्णेऽन्ने जीर्णे पक्व तु नैव वा ।
अकस्माद् वा गुरुर्बद्धमकस्माच्छिथिल मुहुः ॥