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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

१५८ चरकसंहिता [ अ० ५
पराजय हो, दोनों जूतों को खो देवे, या धूल या चमड़े पर गिरे, स्वप्न में हर्ष
हो, क्रोधित पितरों से धिक्कारा जावे, दात, चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, देवता, दिया
या आख अथवा पर्वत को गिरता देखे, या उनका नष्ट होना अथवा फटना
आदि स्वप्न में देखे, लाल फूलों से भरा जगल देखे, वध करने अथवा अन्य
पाप कर्म के स्थान या चिता मे या गाढे अन्धकार मे घुसे, नीद में लाल माला
पहिन कर, जोर से हंसता हुआ, नगा होकर दक्षिण दिशा में जावे, बन्दरों से
युक्त घने जंगल मे जावे तो ये स्वप्न रोगियो को विनाश या भारी कष्ट के
लिये होते है ।
कषाय, भगर्वे वस्त्र पहिने, उग्र, नगे, दण्ड धारण किये, काले लाल आँखों
वाले ऐसे अशुभ मनुष्यों का दर्शन, काली, पापी, अनाचारी, लम्बे बाल, नख
और स्तनों वाली, लाल माला तथा लाल वस्त्र पहिने हुई ऐसी स्त्री का दर्शन
कालनिंशा के समान है ( ये सब दारुण, भयकर स्वप्न है, जिनको देख कर
रोगी मर जाता है। नीरोग मनुष्य यदि इस प्रकार के स्वप्न देखे तो उसका
जीवन सन्देह में पड़ जाता है। इस प्रकार के अशुभ स्वप्नों को देख कर कोई
विरला ही बचता है) ॥२७-४०॥
मनोवहानां पूर्णत्वादोषैस्तैर्बलवत्तरैः ।
स्रोतसा दारुणान् स्वप्नान् काले पश्यति दारुणे ॥ ४१ ॥
नातिप्रसुप्तः पुरुषः सफलानफलानपि ।
इन्द्रियेशेन मनसा स्वप्नान् पश्यत्यनेकधा ॥ ४२ ॥
स्वप्न दर्शन का कारण- जिस समय कुपित हुए तीनों वात आदि दोष
शरीर के मनोवह स्रोतों को भर देते हैं, उस समय मनुष्य को शुभ या
अशुभ स्वप्नों का दर्शन होता है। जिस समय मनुष्य पूर्ण गहरी नींद में नहीं
होता है, उस समय सफल या निष्फल होने वाले अनेक स्वप्नों को इन्द्रियों के
स्वामी चित्त के द्वारा देखा करता है ॥ ४१-४२ ॥
दृष्टं श्रुतानुभूतं च प्रार्थितं कल्पितं तथा ।
भाविकं दोषजं चैव स्वप्नं सप्तविध विदु ॥ ४३ ॥
स्वप्न के भेद-स्वप्न सात प्रकार के हैं। जैसे- (१) दृष्ट, आख से
देखा, (२) श्रुत, कान से सुना, (३) अनुभूत, शेष इन्द्रियों से जाना, (४)
प्रार्थित, देवता से मागा या चाहा हुआ (५) कल्पित, मन से कल्पना किया,
(६) भाविक, भावी शुभ अशुभ फल का सूचक, (७) दोषज, तीव्र वात
आदि दोष से उत्पन्न ये सात प्रकार के स्वप्न हैं ॥ ४३ ॥

अ० ६ ] इन्द्रियस्थानम् १५६

अ० ६ ] इन्द्रियस्थानम् १५६
तत्र पञ्चविधं पूर्वमफलं भिषगादिशेत् ।
दिवास्वप्नमतिह्रस्वमतिदीर्घं तथैव च ॥ ४४ ॥
दृष्टः प्रथमरात्रे यः स्वप्नः सोऽल्पफलो भवेत् ।
न स्वपेद्यः पुनर्द्दष्ट्वा स सद्यः स्यान्महाफलः ॥ ४५ ॥
अकल्याणमपि स्वप्नं दृष्ट्वा तत्रैव यः पुनः ।
पश्येत्सौम्यं शुभाकारं तस्य विद्याच्छुभं फलम् ॥ ४६ ॥
इनमें से प्रथम पाच प्रकार के स्वप्नों को वैद्य व्यर्थ या निष्फल समझें ।
इसी प्रकार दिन का स्वप्न तथा रात में आया बहुत छोटा या बहुत बड़ा स्वप्न
व्यर्थ होता है । रात्रि के प्रथम भाग में जो स्वप्न आता है, वह भी निष्फल
होता है । जिस स्वप्न को देख कर फिर नींद न आये, वह स्वप्न शीघ्र ही बड़े
फल को देनेवाला होता है । जो मनुष्य पहिले तो अशुभ स्वप्न को देखे, फिर
इसी प्रसङ्ग में सौम्य और शुभ स्वप्न को देख ले तो इस स्वप्न का शुभ फल
समझना चाहिये ॥ ४४-४६ ॥
तत्र श्लोकः—पूर्वरूपाण्यथ स्वप्नान् य इमान्वेत्ति दारुणान् ।
न स मोहादसाध्येषु कर्माण्यरभते भिषक् ॥ ४७ ॥
जो वैद्य इन पूर्वरूपों को तथा भयानक स्वप्नों को जानता है, वह कभी भी
आलस्यवश प्रमाद से असाध्य अवस्था में चिकित्सा कर्म आरम्भ नहीं
करता ॥ ४७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने
पूर्वरूपीयमिन्द्रिय नाम पञ्चमोऽध्यायः ।
षष्ठोऽध्यायः
अथातः कतमानि शारीरीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
पूर्वरूपों के अनन्तर भावी व्याधि के आश्रय स्थानों के अरिष्ट लक्षण बतलाने
के लिये 'कतमानि-शारीरीय' इन्द्रिय अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
कतमानि शरीराणि व्याधिमन्ति महामुने ।
यानि वैद्यः परिहरेद्येषु कर्म न सिध्यति ॥ ३ ॥

१६० चरकसंहिता [ अ० ६
अग्निवेश ने पूछा—हे महामुने ! वे कौन से रोगी शरीर हैं, जिनमें
चिकित्सा कर्म सफल नही होता, जिनको वैद्य छोड़ दे और चिकित्सा न करे ॥३॥
इत्यात्रेयोऽग्निवेशेन प्रश्न पृष्टः सुदुर्बचम् ।
आचचक्षे यथा तस्मै भगवांस्तन्निबोधत ॥ ४ ॥
इस प्रकार अग्निवेश के प्रश्न पूछने पर भगवान् आत्रेय ने उसे उपदेश
किया, उसको आप भी सुनो और जानो ॥ ४ ॥
यस्य वै भाषमाणस्य रुजत्यूर्ध्वमुरो भृशम् ।
अन्नं च च्यवते भुक्तं स्थित चापि न जीर्यति ॥ ५ ॥
बलं च हीयते यस्य तृष्णा चाभिप्रवर्धते ।
जायते हृदि शूल च तं भिषक् परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
हिक्का गम्भीरजा यस्य शोणितं चातिसार्यते ।
न तस्मै भेषजं दद्यात्स्मरन्नात्रेयशासनम् ॥ ७ ॥
आनाहश्चातिसारश्च यमेतौ दुर्बलं नरम् ।
व्याधितं विशतो रोगौ दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ८ ॥
आनाहश्चैव तृष्णा च यमेतौ दुर्बल नरम् ।
विशतो विजहत्येनं प्राणा नातिचिरान्न्ररम् ॥ ६ ॥
( १ ) जिस पुरुष के बोलते समय छाती के ऊपर का भाग बहुत दर्द करे,
खाया हुआ अन्न पेट में न ठहरे ओर पेट में गया हुआ अन्न न पचे, जिसका
बल दिन प्रति दिन कम हो रहा है और प्यास बढ़ती जा रही है, तथा हृदय में
में वेदना होती है, ऐसे रोगी को वैद्य छोड़ देवे ।
( २ ) भगवान् आत्रेय के उपदेश को स्मरण रख-कर जिस रोगी को नाभि
प्रदेश से हिचकी उत्पन्न हो और जिसको रक्तातिसार हो, इन दोनों को औषध
नहीं दे ।
( ३ ) जिस निर्बल रोगी को आनाह ( पेट का फूलना ) और अतिसार
( पहले पानी वाले दस्त ) रोग उत्पन्न हो जायें, उसका जीना कठिन है ।
( ४ ) जिस निर्बल रोगी को आनाह ( पेट का अफारा ) और तृष्णा रोग
उत्पन्न हो जाता है, वह शीघ्र ही प्राणों को छोड़ देता है ॥ ५-६ ॥
ज्वरः पौर्वाह्निको यस्य शुष्ककासश्च दारुणः ।
[ ज्वरो यस्यापराह्ने तु श्लेष्मकासश्च दारुणः । ]
बलमांसविहीनस्य यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ १० ॥

अ० ६ ] ११ इन्द्रियस्थानम् १६१

अ० ६ ] ११ इन्द्रियस्थानम् १६१
( ५ ) जिस रोगा को दिन के पूर्वभाग मे ज्वर आता है, तथा भयंकर
सूखी खासी हो [ वा जिसको दिन के उत्तर भाग में ज्वर आवे और बलगमदार
खासी का भयंकर वेग हो ] और शरीर में बल और मास क्षीण हो गये हो, ऐसा
रोगी प्रेत के समान मरा हुआ ही है ॥ १० ॥
यस्य मूत्रं पुरीषं च ग्रथितं संप्रवर्तते ।
निरूष्मणो जठरिणः श्वसनो न स जीवति ॥ ११ ॥
( ६ ) जिस उदर-रोगी का मल और मूत्र घना ( गाठ सा ), तथा ठण्डा
होता है ? वह रोगी सास लेता हुआ भी नहीं जीना ॥ ११ ॥
श्वयथुर्यस्य कुक्षिस्या हस्तपादं विसर्पति ।
ज्ञातिसंघ स सक्लेशय तेन रोगेण हन्यते ॥ १२ ॥
श्वयथुर्यस्य पादस्थस्तथा स्रस्ते च पिण्डिके ।
सीदतश्चाप्युभे शङ्खे तं भिषक्परिवर्जयेत् ॥ १३ ॥
शूनहस्तं शूनपादं शूनगुह्योदरं नरम् ।
हीनवर्णबलाहारमौषधैर्नोपपादयेत् ॥ १४ ॥
( ७ ) जिस पुरुष की कोख (उदर) में शोथ उत्पन्न होकर हाथ, पाव की
आर फलने लगता है, वह भाई बन्धुओं को बहुत कष्ट देकर मरता है, वह स्वयं
भा बहुत दुःख भोगता है और अन्त मे मरता है।
( ८ ) जिस रोगी के पाओं में शोथ उत्पन्न हो, पिण्डलियां ढीली पड़ जायें
तथा दोनों शंख प्रदेश दब जाये, वैद्य ऐसे रोगी की चिकित्सा नहीं करे ।
( ९ ) जिस रोगी के हाथ, पाव, गुह्य प्रदेश ( लिङ्ग ) तथा पेट सूज जायें
और वर्ण, बल और आहार क्षीण हो जाये, वैद्य ऐसे रोगी को औषध न
देवे ॥ १२-१४॥
उरोयुक्तो बहुश्लेष्मा नीलः पीतः सलोहितः ।
सततं ष्ठीवते यस्य दूरात्तं परिवर्जयेत् ॥ १५ ॥
हृष्टरोमा सान्द्रमूत्रः शूनः कासज्वरार्दितः ।
क्षीणमांसो नरो दूराद्भव्यो वैद्येन जानता ॥ १६ ॥
त्रय. प्रकुपिता यस्य दोषाः कष्टामिलक्षिताः ।
कृशस्य बलहीनस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् ॥ १७ ॥
ज्वरातिसारौ शोफान्ते श्वयथुर्वा तयोः क्षये ।
दुर्बलस्य विशेषेण नरस्यान्ताय जायते ॥ १८ ॥

१६२ चरकसंहिता [ अ० ६

(१०) जिसकी छाती में सचित हुआ बहुत कफ नीले पीले रक्त के साथ
निरन्तर निकलता रहता है, ऐसे रोगी को दूर से ही छोड़ दे।
(११) जिसका मूत्र गाढा हो, शरीर पर रोमाच हो अगों पर सूजन आ
जाये खासी और ज्वर से पीड़ित शरीर का मास क्षीण हो गया हो, ऐसे रोगी
को वैद्य जान बूझ कर दूर से ही छोड दे।
(१२) जिस कृश, बलहीन पुरुष के तीनों दोष कुपित होकर भिन्न २
पीड़ा के कारण हो उस पुरुष की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। [ कही 'कोष्ठा
भिलक्षिताः' पाठ है, वहा अर्थ है—तीनो दोष कोठे में देखे जायें ]।
(१३) जिस निर्बल मनुष्य को सूजन के पीछे ज्वर और अतिसार हों,
अथवा ज्वर और अतिसार के पीछे जिसको सूजन हो जाय, वह उसकी मृत्यु
का कारण होता है ॥ १५-१८ ॥
पाण्डुरश्च कृशोऽत्यर्थं तृष्णयाऽभिपरीप्लुतः ।
डम्बरी कुपितोच्छ्वासः प्रत्याख्येयो विजानता ॥ १९ ॥
(१४) पाण्डु रोगी, अति कृश, अत्यन्त प्यास से पीड़ित हो, डम्बरी
अर्थात् जिसकी आखें स्थिरता से घूर कर देखें और जिसका श्वास कुपित हो,
ऐसा रोगी भी जवाब देने योग्य है, चिकित्सा के लिये अयोग्य है ॥ १९ ॥
हनुमन्याग्रहस्तृष्णा बलह्रासोऽतिमात्रया ।
प्राणाश्चोरसि वर्तन्ते यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ २० ॥
ताम्यत्यायच्छते शर्म न किञ्चिदपि विन्दति ।
क्षीणमांसबलाहारो मुमूर्षुरचिरान्नरः ॥ २१ ॥
(१५) जिस रोगी को हनुग्रह (जबाड़ी का बन्द होना), मन्याग्रह
(गर्दन की मन्या नामक शिराओं का अकड़ना), तृष्णा और शक्ति का अति
ह्रास हो, तथा जिसकी छाती में सास रुक रहे हों, ऐसे रोगी को छोड़ देना चाहिये।
(१६) जिस रोगी में बेहोशी रहती हो, जिसको किसी भी प्रकार चैन न
पडती हो, जिस रोगी के मास, बल और आहार क्षीण हो गये हों वह रोगी
जल्दी ही मर जाता है ॥ २०-२१ ॥
विरुद्धयोनयो यस्य विरुद्धोपक्रमा भृशम् ।
वर्धन्ते दारुणा रोगाः शीघ्रं शीघ्रं स हन्यते ॥ २२ ॥
बलं विज्ञानमारोग्य ग्रहणी मांसशोणितम् ।
एतानि यस्य क्षीयन्ते क्षिप्रं क्षिप्रं स हन्यते ॥ २३ ॥

अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६३

अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६३
विकारा यस्य वर्धन्ते प्रकृतिः परिहीयते ।
सहसा सहसा तस्य मृत्युर्हरति जीवितम् ॥ २४ ॥
(१७) जिसके शरीर में विरोधी कारणों से रोग उत्पन्न हुए हों और
जिनकी चिकित्सा परस्पर विपरीत पड़े और रोग बड़े वेग से बढ़े वह शीघ्र ही
मर जाता है।
(१८) जिस रोगी का बल, ज्ञान, आरोग्य, ग्रहणी मास और रक्त क्षीण
हो गये हों, वह रोगी शीघ्र ही मर जाता है।
(१९) जिस रोगी का आरोग्य दिन पर दिन घट रहा हो, तथा प्रकृति
स्वभाव (अथवा जन्म की 'कफ प्रकृति' आदि प्रकृति) बदलती जा रही हो
उस रोगी के जीवन को मृत्यु एकाएक हर लेता है ॥ २२-२४ ॥
तत्र श्लोकः-इत्येतानि शरीराणि व्याधिमन्ति विवर्जयेत् ।
न ह्येषु धीराः पश्यन्ति सिद्धिं काञ्चिदुपक्रमात् ॥ २५ ॥
वर्णन किये हुए इन रोगी शरीरो का परित्याग करे, क्योंकि इनमें चिकित्सा
करने से विद्वान् लोग कुछ लाभ नहीं देखते ॥ २५ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने कतमानि
शरीरीयमिन्द्रियं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः
अथातः पन्नरूपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे छाया-प्रतिच्छाया के विनाश रूप अरिष्ट को बतलाने के लिये
'पन्नरूपीय इन्द्रिय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। जैसा भगवान् आत्रेय
ने कहा था ॥ १-२ ॥
दृष्ट्वा यस्य विजानीयात्पन्नरूपां कुमारिकाम् ।
प्रतिच्छायामयीमक्ष्णोर्नैनमिच्छेच्चिकित्सितुम् ॥ ३ ॥
ज्योत्स्नायामातपे दीपे सलिलादर्शयोरपि ।
अङ्गेषु विकृता यस्य च्छाया प्रेतस्तथैव सः ॥ ४ ॥
छिन्ना भिन्नाकुला छाया हीना वाऽप्यधिकाऽपि वा ।
नष्टा तन्वी द्विधा छिन्ना विशिरा विकृता च या ॥ ५ ॥

१६४ चरकसंहिता [ अ० ७
एताश्चान्याश्च याः काश्चित्प्रतिच्छाया विगर्हिताः ।
सर्वा मुमूर्षतां ज्ञेया न चेल्लक्ष्यनिमित्तजाः ॥ ६ ॥
( १ ) जिस रोगी मनुष्य की प्रतिबिम्ब छाया दूसरे मनुष्य की आंख की
पुतली में अथवा अन्य की प्रतिबिम्ब रूप छाया जिस रोगी मनुष्य की पुतली में
पड़ना बन्द हो जाये वैद्य ऐसे पुरुष की चिकित्सा करने की इच्छा न करे। जिस
मनुष्य को चांदनी, धूप, दीपक के प्रकाश, पानी और शीशे (दर्पण) में अपनी
छाया और प्रतिबिम्ब में विकृति दिखाई दे, वह प्रेत के समान होता है। जिस
मनुष्य को अपनी छाया छिन्न-भिन्न, अनिश्चित प्रतिबिम्ब वाली, हीन, अथवा
अधिक, नष्ट, पतली दो भागों में विभक्त बिगड़ी हुई, बिना शिरोभाग के दीखने
वाली तथा अन्य निन्दित दूसरी सब प्रतिच्छाया मरने वालों की जाननी चाहिये
बशर्ते ये प्रतिच्छाया किसी कारण से उत्पन्न न हुई हों ॥ ३-६ ॥
सस्थानेन प्रमाणेन वर्णेन प्रभया तथा ।
छाया विवर्तते यस्य स्वस्थोऽपि प्रेत एव सः ॥ ७ ॥
जिस स्वस्थ पुरुष की छाया, संस्थान (आकृति) प्रमाण (लम्बाई चौड़ाई)
वर्ण (रंग) और प्रभा (कान्ति) में अन्य प्रकार की हो जाती है, वह पुरुष
प्रेत के समान है ॥ ७ ॥
संस्थानमाकृतिर्ज्ञेया सुषमा विषमा च या ।
संस्थान—संस्थान का अर्थ है आकृति। वह आकृति दो प्रकार की होती
है। (१) सुषमा और (२) विषमा।
मध्यसल्पं महच्चोक्तं प्रमाणं त्रिविधं नृणाम् ॥ ८ ॥
प्रमाण तीन प्रकार का है। (१) मध्य, (२) अल्प और (३) महान् ॥८॥
प्रतिप्रमाणसस्थाना जलादर्शातपादिषु ।
छाया या सा प्रतिच्छाया-
प्रतिच्छाया—प्रमाण और संस्थान के अनुकूल जो छाया जल, दर्पण या
धूप आदि में दीखती है, उसको 'प्रतिच्छाया' कहते हैं।
छाया वर्णप्रभाश्रया ॥ ९ ॥
खादीना पञ्च पञ्चानां छाया विविधलक्षणाः ।
नाभसी निर्मला नीला सस्नेहा सप्रभेव च ॥ १० ॥
रूक्षा श्यावाऽरुणा या तु वायवी सा हतप्रभा ।
विशुद्धरक्ता त्वाग्नेयी दीप्ताभा दर्शनप्रिया ॥ ११ ॥

अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६५
शुद्धवैदूर्यविमला सुस्निग्धा चाम्भसी मता ।
स्थिरा स्निग्धा घना श्लक्ष्णा श्यामा श्वेता च पार्थिवी ॥१२॥
वायवी गर्हिता त्वासा चतस्रः स्युः शुभोदयाः ।
वायवी तु विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा ॥ १३ ॥
छाया—वर्ण प्रभा के साथ रहती है । आकाश आदि पाच महाभूतों के
अनुसार छाया भी पाच प्रकार की होती है, क्योंकि शरीर भी पाच महाभूतों से
मिल कर बना है । इसलिये इन महाभूतों की छाया भी पाच प्रकार की पड़ती
है । इनमें आकाश की छाया निर्मल, नीली, स्नेह और प्रभा (कान्ति) से युक्त
होती है । वायु की छाया रूक्ष, श्याम, लाल और कान्तिहीन होती है । अग्नि की
छाया शुद्ध लाल, दीप्त कान्ति, देखने मे आखों को प्रिय और जल की छाया
शुद्ध वैदूर्य के समान साफ, निर्मल, स्निग्ध होती है । पृथिवी की छाया स्थिर,
स्निग्ध, घन, श्लक्ष्ण, श्याम ( सावली ) काली और श्वेत होती है । इनमें
वायवी छाया निन्दित, नाशकारक और अत्यन्त कष्टदायक होती है । शेष चार
छायाए सुखदायक होती हैं ॥ ६-१३ ॥
स्यात्तैजसी प्रभा सर्वा सा तु सप्तविधा स्मृता ।
रक्ता पीता सिता श्यावा हरिता पाण्डुराऽसिता ॥ १४ ॥
तासा याः स्युर्विकासिन्यः स्निग्धाश्च विपुलाश्च याः ।
ताः शुभा रूक्षमलिनाः संक्षिप्ताश्चाशुभोदयाः ॥ १५ ॥
वर्णमाक्रामति च्छाया भास्तु वर्णप्रकाशिनी ।
आसन्ना लक्ष्यते छाया भाः प्रकृष्टा प्रकाशते ॥ ॥ १६ ॥
नाच्छायो नाप्रभः कश्चिद्विशेषाञ्चिह्वयन्ति तु ।
नॄणां शुभाशुभोत्पत्ति काले छायाः प्रभाश्रयाः ॥ १७ ॥
प्रभा के सात प्रकार—सब प्रकार की प्रभाए तैजस हैं । यह प्रभा सात
प्रकार की हैं । यथा-लाल, पीली, श्वेत, काली, हरी, पाण्डुर ( धूसर ) और
असित ( एकदम काली ) । इनमें जो प्रभा विकासिनी ( फैलने वाली ),
स्निग्ध, और बड़ी हो, वे सब शुभ फलदायक हैं। जो रूक्ष मलिन और सक्षिप्त
( सकुचित ) हैं ये सब अशुभ फल दायक है ।
छाया—छाया से अक्रान्त होने पर वर्ण उपलब्ध नहीं होता । प्रभा वर्ण
को प्रकाशित करती है । छाया समीप से देखी जाती है [ यथा चित्र की छाया
समीप से दीखती है ], प्रभा दूर से खूब चमकती है [ यथा, मणि, मुक्ता
आदि की प्रभा दूर से दीखती है ] । कोई भी मनुष्य एकाएक छायाहीन या

१६६ चरकसंहिता [ अ० ७
प्रभाहीन नहीं हो सकता । मृत्यु के समीप आने पर प्रभा पर आश्रित छाया
मनुष्य के शुभाशुभ को प्रकाशित कर देती है ॥ १४-१७ ॥
कामलाक्ष्णोर्मुखं पूर्णं गण्डयोर्युक्तमासता ।
संत्रासश्चोष्णगात्रं च यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ १८ ॥
उत्थाप्यमानः शयनात्प्रमोहं याति यो नरः।
मुहुर्मुहुर्न सप्ताहं स जीवति विकुत्थन ॥ १६ ॥
( १ ) जिस रोगी की आंखे कामला रोगी के समान पीली, मुख से लार
गिरना, गण्डस्थल गालों पर मास की वृद्धि ( गालों पर मास की अधिकता )
हो जिसको देखकर डर लगे, और शरीर में उष्णता हो, ऐसे रोगी को त्याग दे,
उसकी चिकित्सा स्वीकार न करे । ( २ ) जो रोगी प्रातःकाल विस्तरे से उठते
समय मूर्च्छित हो जाता हो, और बार बार अपना शोखो मारता रहे या निरन्तर
गालिया बोले वा बड़बड़ावे वह सात दिन में मर जाता है ॥ १८-१६ ॥
संसृष्टा व्याधयो यस्य प्रतिलोमानुलोमगाः ।
व्यापन्ना ग्रहणी प्रायः सोऽर्धमास न जीवति ॥ २० ॥
उपरुद्धस्य रोगेण कर्षितस्याल्पमश्नतः ।
बहुमूत्रपुरीषं स्याद्यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ २१ ॥
दुर्बलो बहु भुक्ते यः प्राग्भुक्तादन्नमातुरः ।
अल्पमूत्रपुरीषश्च यथा प्रेतस्तथैव सः॥ २२॥
इष्टं च गुणसंपन्नमन्नमश्नाति यो नरः ।
शश्वच्च बलवर्णाभ्यां हीयते न स जीवति ॥ २३ ॥
( ३ ) जिस रोगी में प्रतिलोमगामी और अनुलोमगामी दोनों प्रकार के
रोग मिले हुए हों, और जिस की ग्रहणी दूषित हो, ( अन्नपाक होना बन्द हो
जाये ) वह पन्द्रह दिन से अधिक नहीं जीता । (४) रोग से पीडित दुर्बल व्यक्ति
तथा थोड़ा खाने पर जिसको मल ओर मूत्र अधिक परिमाण में आये, वह रोगी
त्याज्य है । ( ५ ) जो रोगी निर्बल होकर पहिले की अपेक्षा अधिक भोजन
करे, जिसको मल और मूत्र कम परिमाण में आता हो, वह प्रेत के समान है ।
(६) जो रोगी मन चाहा और गुणकारी अन्न को खाये, तो भी, बल और वर्ण
निरन्तर क्षीण होता जाये, वह नहीं बचता ॥ २०-२३ ॥
प्रकूजति प्रश्वसिति शिथिलं चातिसार्यते ।
बलहीनः पिपासार्तः शुष्कास्यो न स जीवति ॥ २४ ॥

अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६७

अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६७
ह्रस्वं च यः प्रश्वसिति व्याविद्धं स्पन्दते च यः ।
मृतमेव तमात्रेयो व्याचचक्षे पुनर्वसुः ॥ २५ ॥
ऊर्ध्वं च यः प्रश्वसिति श्लेष्मणा चाभिभूयते ।
हीनवर्णबलाहारो यो नरो न स जीवति ॥ २६ ॥
( ७ ) जो रोगी कराहै, ऊचा-गहरा सास ले और पतला मल प्रवाहित करे,
बल से क्षीण, प्यास से पीड़ित हो, मुख सूखता हो, ऐसा रोगी नहीं बचता ।
( ८ ) जिस रोगी का श्वास बहुत अल्प होगया है, और जिसका हृदय
कुटिल अनियमित रूप से स्पन्दन ( धड़कन ) करता है, ऐसे रोगी को आत्रेय
पुनर्वसु ने मृतक तुल्य ही कहा है ।
( ६ ) जो रोगी ऊंचा गहरा श्वास ले जिस में कफ का भी प्रकोप हो और
जिसके बल, वर्ण और आहार कम हो गये हों वह मनुष्य नहीं बचता ॥ २६ ॥
ऊर्ध्वाग्रे नयने यस्य मन्ये चानतकम्पने ।
बलहीनः पिपासातः शुष्कास्यो न स जीवति ॥ २७ ॥
यस्य गण्डावुपचितौ ज्वरकासो च दारुणो ।
शूली प्रद्वेष्टि चाप्यन्नं तस्मिन् कर्म न सिध्यति ॥ २८ ॥
व्यावृत्तमूर्धाजिह्वास्यो भ्रुवौ यस्य च विच्युते ।
कण्टकैश्चाचिता जिह्वा यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ २६ ॥
( १० ) जिस रोगी की आंखे ऊपर को चढ़ गईं, मन्या सिरायें निरन्तर
कापे, जो बलहीन और पिपासा से पीड़ित हो, जिसका मुख सूखता हो वह रोगी
नहीं बचता ।
( ११ ) जिस रोगी के गण्डस्थल ऊंचे, मोटे फूले हों, जिसको ज्वर और
खांसी विकट हो, सारे पेट में शूल चलते हों, जो अन्न से द्वेष करता हो, ऐसे
रोगी में चिकित्सा सफल नहीं होती ।
( १२ ) जिस रोगी के मूर्धा ( तालु ) जीभ और मुख फट गये हों, भौंहें
टेड़ी पड़ गई हो, जीभ कांटो से भरी हो वह रोगी मृत के समान है ॥२७-२६॥
शेफश्चात्यर्थमुत्सिक्तं निःसृतौ वृषणौ भृशम् ।
अतश्चैव विपर्यासो विकृत्या प्रेतलक्षणम् ॥ ३० ॥
( १३ ) जिसका लिंग इन्द्रिय एकदम अन्दर घुस जाये और अण्डकोश
बहुत बाहर निकल आये ( बढ़ जाये ), अथवा इसके विपरीत लिंग आगे
निकल आये और अण्डकोश अन्दर घुस जाये इस प्रकार के विकार से रोगीको
मृत के समान ही जानना चाहिये ॥ ३० ॥

१६८ चरकसंहिता [ अ० ८
निचितं यस्य मांसं स्यात्त्वगस्थि चैव दृश्यते ।
क्षीणस्यानशनतस्तस्य मासमायुः परं भवेत् ॥ ३१ ॥
(१४) जिस रोगी का मांस क्षीण होजावे, शरीर में केवल त्वचा का ही
अस्थिपञ्जर दीखे क्षीण तथा भोजन न खाने वाला, ऐसा रोगी एक मास से
अधिक नहीं जीता ॥ ३१ ॥
तत्र श्लोकः—इदं लिङ्गमरिष्टाख्यमनेकमभिजज्ञिवान् ।
आयुर्वेदविदित्याख्यां लभते कुशलो जन ॥ ३२ ॥
जो कुशल पुरुष इन कहे हुए अरिष्ट लक्षणों को भली प्रकार जानता-पह-
चानता है, वही कुशल पुरुष 'आयुर्वेद-वित्' इस उपाधि को प्राप्त करता है ॥३२॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने पन्नरूपी-
मिन्द्रिय नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः
अथातोऽवाक्शिरसीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'पाव ऊपर शिर नीचे किये' छाया आदि के अरिष्ट बतलाने
के लिये अवाक् शिरसीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
अवाक्शिरा वा जिह्मा वा यस्य वा विशिरा भवेत् ।
जन्तो रूपप्रतिच्छाया नैनमिच्छेच्चिकित्सितुम् ॥ ३ ॥
जटीभूतानि पक्ष्माणि दृष्टिश्चापि निगृह्यते ।
यस्य जन्तोर्न तं धीरो भेषजेनोपपादयेत् ॥ ४ ॥
यस्य शूनानि वर्त्मानि न समायान्ति शुष्यतः ।
चक्षुषी चोपदिह्येते यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ ५ ॥
भ्रुवोर्वा यदि वा मूर्ध्नि सीमान्तावर्तकान् बहून् ।
अपूर्वान्कृतान् १व्यक्तान् दृष्ट्वा मरणमादिशेत् ॥ ६ ॥
त्र्यहमेतेन जीवन्ति लक्षणेनाऽऽतुरा नराः ।
अरोगाणां पुनस्त्वेतत्षड्रात्रं परमुच्यते ॥ ७ ॥
१. 'असजानकृतान्' इति च पाठः ।

शिर का भाग न दीखता हो, वैद्य उस रोगी की चिकित्सा न करे ।

अ० ८ ] इन्द्रियस्थानम् १६३

( १ ) जिस रोगी की छाया वा प्रतिबिम्ब के शिर नीचे और पाव ऊपर
( अवाक्-शिर ) हो, अथवा जिसकी छाया वा प्रतिबिम्ब कुटिल हो, या जिस में
शिर का भाग न दीखता हो, वैद्य उस रोगी की चिकित्सा न करे ।
( २ ) जिस रोगी की दोनों पलकों के रोम जटा के समान गुझला जाये
तथा आखें बन्द हो जायें, ऐसे रोगी का औषध से उपचार न करे, ऐसे को
औषध देना व्यर्थ होता है ।
( ३ ) जिस रोगी की आंखें, नाक, कान आदि मूज जायें और फिर अच्छी
न हों वा अपने स्थान में न समावे, तथा आले लिपसी जावें, वह रागी प्रेत
( मृत ) के समान होता है ।
( ४ ) जिस रोगी के भोहों में या शिर के बालों में चमत्कारिक सीमन्त
( माग जैसी रेखा ) या बहुत से भवर ( गोल चक्कर ) बिना बनाये, अकारण
ही आ जाये उसे मरणासन्न कहे ।
( ५ ) ये लक्षण यदि रोगी पुरुष में दीखे, तो वह तीन दिन मे अधिक
नहीं जीता, और यदि स्वस्थ पुरुष मे ये लक्षण हों तो वह छ रात से अधिक
नहीं जीता ॥ ३-७ ॥
आयम्योत्पाटितान् केशान् यो नरो नावबुध्यते ।
अनातुरो वा रोगी वा षड्रात्रं नानिवर्तते ॥ ८ ॥
यस्य केशा निरभ्यङ्गा दृश्यन्तेऽभ्यक्तसन्निभाः ।
उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
( ६ ) जो स्वस्थ या रोगी पुरुष शिर के बालों को खींचकर उखाड़ने पर
भी नहीं जाने वह छ दिन से अधिक नहीं जीता ।
( ७ ) शिर के बालों पर तैल न लगाने पर भी जिस रोगी के बालों मे तैल
की-सी चमक दिखाई दे, उसकी आयु समाप्त जान कर बुद्धिमान् पुरुष उसकी
चिकित्सा न करे ॥ ८-६ ॥
ग्लायतो नासिकावंशः पृथुत्वं यस्य गच्छति ।
अशूनः शूनसकाशः प्रत्याख्येय स जानता ॥ १० ॥
अत्यर्थविवृता यस्य यस्य चात्यर्थसंवृता ।
जिह्वा वा परिशुष्का वा नासिका न स जीवति ॥ ११ ॥
( ८ ) जिस रोगी का नासिका वश निर्बल होकर नम जाये, या बहुत मोटा
वा बड़ा हो जाये वास्तव में सूजन न होने पर सूजा हुआ लगे, वह रोगी
त्याज्य है । (९) जिस रोगी की नासिका बहुत फैल जाये या बहुत सकुचित, तग
हो जाये, कुटिल हो जाये वा सूख जाये वह रोगी अधिक नहीं जीता ॥१०-११॥

१७० चरकसंहिता [ अ० ८

मुखं शब्दश्रवावोष्ठौ शुक्लश्यावातिलोहितौ ।
विकृतौ यस्य वा नीलौ न स रोगाद्विमुच्यते ॥ १२ ॥
( १० ) जिस रोगी का मुख, दोनों कान और दोनों ओठ (विकार के
कारण) श्वेत, काले, लाल, वा नीले हो जाते हैं, वह रोग से मुक्त नहीं होता,
वह मर जाता है ॥ १२ ॥
अस्थिश्वता द्विजा यस्य पुष्पिताः पङ्कसंवृताः ।
विकृत्या न स रोगं तं विहायाऽऽरोग्यमश्नुते ॥ १३ ॥
( ११ ) जिस रोगी के दांत विकार से अस्थि के समान श्वेत, पुष्पित
अथवा कीचड़ या मैल से ढक जाते हैं, वह रोगी रोग से छूट कर कभी आरोग्य
लाभ नहीं करता ॥ १३ ॥
स्तब्धा निश्चेतना गुर्वी कण्टकापचिता भृशम् ।
श्यावा शुष्काऽथवा शूना प्रेतजिह्वा बिसर्पिणी ॥ १४ ॥
( १२ ) जिस रोगी की जीभ स्तब्ध, —जड़, कड़ी, चेतना रहित, भारी
और बहुत से कांटों से भर जाये, काली, लाल, सूखी या सूजी हुई अथवा
बाहर को निकल २ आवे, यह जिह्वा मृतपुरुष का लक्षण है ॥ १४ ॥
दीर्घमुच्छ्वस्य यो ह्रस्वं नरो निःश्वस्य ताम्यति ।
उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ १५ ॥
( १३ ) जोर से बाहर सांस फेंक कर जो रोगी अन्दर छोटा (थोड़ा वायु)
सांस लेता है, और सांस लेते समय कष्ट अनुभव करता या मूर्च्छित हो जाता है,
उस रोगी की आयु मरणासन्न समझकर उसे त्यागना चाहिये ॥ १५ ॥
हस्तौ पादौ च मन्ये च तालु चैवातिशीतलम् ।
भवत्यायुःक्षये क्रूरमथवाऽतिभवेन्मृदु ॥ १६ ॥
( १४ ) जीवन के नाश के समय हाथ, पाव, गले की नसे, तालु बहुत
ठण्डे या बहुत कठोर अथवा बहुत कोमल हो जाते हैं ॥ १६ ॥
घट्यञ्जानुना जानु पादावुद्यम्य पातयन् ।
योऽपास्यति मुहुर्वक्त्रमातुरो न स जीवति ॥ १७ ॥
( १५ ) जो रोगी घुटनों से घुटनों को रगड़ता है, पाव को ऊपर उठाकर
जमीन पर पटकता है, बार-बार मुख को इधर-उधर चलाता है वह रोगी
नहीं बचता ॥ १७ ॥
दन्तैश्छिन्दन्नखाग्राणि नखैश्छिन्दञ्छिरोरुहान् ।
काष्ठेन भूमिं बिलिखन्न रोगात्परिमुच्यते ॥ १८ ॥

अ० ८ ] इन्द्रियस्थानम् १७१

अ० ८ ] इन्द्रियस्थानम् १७१
दन्तान् खादति यो जाग्रदसान्ना विरुदन् हसन् ।
विजानाति न चेद् दुःखं न स रोगाद्विमुच्यते ॥ १६ ॥
मुहुर्हसन्मुहुः श्वेडङ्खट्यां पादेन हन्ति यः ।
उच्चैश्छिद्राणि विमृशन्नातुरो न स जीवति ॥ २० ॥
( १६ ) जो रोगी दांतों से नखो को काटता है, और नखों से बालों को
नोचता है और लकडी से भूमि पर कुरेदता है, वह रोगी रोग से नहीं बच
सकता । ( १७ ) जो रोगी जागता हुवा दांतों को कट कटाता है और वेमत-
लब जोर से रोता या हँसता हुआ दुःख का अनुभव नहीं करता, वह रोग से
मुक्त नहीं होता । (१८) जो रोगी क्षण मे हसता, क्षण मे रोता, बकवाद करता
है, पलंग पर पाव पटकता है, हाथों को ऊंचा करके नाक, कान, आख के
छिद्रों को स्पर्श करता है वह रोगी नहीं बचता ॥ १८–२० ॥
यैर्विन्दति पुरा भावै समेतैः परमा रतिम् ।
तैरेवारममाणस्य ग्लानोर्मरणमादिशेत् ॥ २१ ॥
( १९ ) जिन वस्तुओं से पहिले रोगी का विशेष प्रेम हो और पीछे उन्हीं
पदार्थों से वह द्वेष, घृणा प्रकट करते ऐसे रोगी की मृत्यु ही हुई बतलावे ॥२१॥
न बिभर्ति शिरोग्रीव न पृष्ठं भारमात्मन ।
न हनू पिण्डमास्यस्थमातुरस्य मुमूर्षतः ॥ २२ ॥
( २० ) जो रोगी अपनी गर्दन या शिर को, अथवा अपनी पीठ के भार
को न सम्भाल सके, जो मुख में स्थित ग्रास को जबड़ों मे न सम्भाल सकें,
( जबड़े खुले रहे ), वह रोगी नही बचता ॥ २२ ॥
सहसा ज्वरसन्तापस्तृष्णा मूर्च्छा बलक्षयः ।
विश्लेषणं च संधीना मुमूर्षोरुपजायते ॥ २३ ॥
गोसर्गे वदनाद्यस्य स्वेदः प्रचयवते भृशम् ।
लेपज्वरोपतप्तस्य दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ २४ ॥
( २१ ) मरणासन्न रोगी को एक दम से ज्वर, सन्ताप, प्यास, मूर्च्छा,
बलनाश, अर्थात् सन्धिया शिथिल हो जाती हैं । ( २२ ) लेप ज्वर ( प्रलेपक
ज्वर ), थोड़ी सी सर्दी से कफ ज्वर हो के रोगी के मुख पर यदि प्रातः काल के
समय बहुत पसीना आये, तो उसका बचना असम्भव है ॥ २४ ॥
नोपैति कण्ठमाहारो जिह्वा कण्ठमुपैति च ।
आयुष्यन्तं गते जन्तोर्बल च परिहीयते ॥ २५ ॥
( २३ ) जिस रोगी की आयु समाप्त हो जाती है, उसके गले में पहुचा

१७२ चरकसंहिता [ अ० ६
हुआ भोजन भी नीचे नहीं उतरता, और जीभ कण्ठभाग में आ लगती है तथा
बल नष्ट हो जाता है ॥ २५ ॥
शिरो विक्षिप्तते कृच्छ्रान्मुञ्चयित्वा प्रपाणिकौ ।
ललाटप्रस्रुतस्वेदो मुमूर्षुश्च्युतबन्धनः ॥ २६ ॥
( २४ ) जो रोगी बड़े कष्ट से पीड़ित होकर अपने दोनों कलाईयों या कोह-
नियों को छोड़कर शिर को इतना धुनता-पटकता है कि माथे से पसीना टपकने
लगे और सन्धिबन्ध ढील पड़ जायें वह रोगी मरने वाला होता है ॥ २६ ॥
तत्र श्लोकः ।
इमानि लिङ्गानि नरेषु बुद्धिमान्विभावयेतावहितो मुहुर्मुहुः ।
क्षणेन भूत्वा ह्युपयान्ति कानिचिन्न चाफल लिङ्गमहास्ति किंचन ॥२७॥
बुद्धिमान् मनुष्य को मरणोन्मुख रोगियों में होने वाले लक्षण खूब ध्यान से
देखने चाहियें । क्योंकि कितने लक्षण क्षणभर मे उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं,
इस प्रकरण में कहा एक भी लक्षण निष्फल नहीं ॥ २७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने अवाक्शिरसीय-
मिन्द्रिय नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
नवमोऽध्यायः
अथातो यस्य श्यावानिमित्तीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'श्याव-निमित्तीय' नामक इन्द्रिय-अध्याय का व्याख्यान करेंगे
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
यस्य श्यावे परिध्वस्ते हर्रिते चापि दर्शने ।
आपन्नो व्याधिरन्ताय ज्ञेयस्तस्य विजानता ॥ ३ ॥
( १ ) जिस रोगी की दोनों आखें काली, लाल रग की, नष्टप्राय, हरे रग
की हो जाये विद्वान् वैद्य उस रोगी की व्याधि प्राण नाश के लिये जाने ॥ ३ ॥
निःसंज्ञः परिशुष्कास्यः संविद्धो व्याधिभिश्च यः ।
उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ ४ ॥
हरिताश्च सिरा यस्य लोमकूपाश्च संवृताः ।
सोऽम्लाभिलाषी पुरुषः पित्तान्मरणमश्नुते ॥ ५ ॥

अ० ६ ] इन्द्रियस्थानम् १७३

अ० ६ ] इन्द्रियस्थानम् १७३
(२) जो रोगी अचेत हो, जिसका मुख सूखता हो, अनेक रोगों से
आक्रान्त हो उस, रोगी की आयु को समाप्त हुआ जान कर बुद्धिमान् मनुष्य
उसकी चिकित्सा न करे। (३) जिस रोगी की सिराये (त्वचा) हरी पड़
जाये, जिसके लोम छेद बन्द हो गये हों (पसीना नहीं आता हो), खट्टे रस
की चाह रखता हो ऐसा रोगी पित्त से ही मरता है ॥ ४-५ ॥
शरीरान्ताश्च शोभन्ते शरीरं चोपशुष्यति ।
बलं च हीयते यस्य राजयक्ष्मा हिनस्ति तम् ॥ ६॥
अंसाभितापो हिक्का च छर्दनं शोणितस्य च ।
आनाहः पार्श्वशूलं च भवत्यन्ताय शोषिणः ॥ ७ ॥
(४) जिस रोगी के हाथ पाव अच्छे दिखाई देते हैं, और शरीर
सूखता जाता है, शरीर का बल दिन पर दिन घटता जाता है वह रोगी राज
यक्ष्मा से मरता है। (५) जिस रोगी को हिचकी आवे और कन्धे भी दुखें,
रक्त का वमन हो, पेट में अफारा और पार्श्व मे तीव्र वेदना (शूल) हो, ये
लक्षण शोष-रोगी की मृत्यु के लिये होते हैं ॥ ६-७ ॥
वातव्याधिरपस्मरी कुष्ठी शोफी तथोदरी ।
गुल्मी च मधुमेही च राजयक्ष्मी च यो नरः ॥ ८ ॥
अचिकित्स्या भवन्त्येते बलमांसक्षये सति ।
अन्येष्वपि विकारेषु तान्भिषक्परिवर्जयेत् ॥ ६॥
विरेचनहतानाहो यस्तृष्णानुगतो नरः ।
विरिक्तः पुनराध्माति यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ १० ॥
पेयं पातुं न शक्नोति कण्ठस्य च मुखस्य च ।
उरसश्च विशुष्कताद्यो नरो न स जीवति ॥ ११ ॥
स्वरस्य दुर्बलीभावं हानिं च बलवर्णयोः ।
रोगवृद्धिमयुक्तां च दृष्ट्वा मरणमादिशेत् ॥ १२ ॥
ऊर्ध्वश्वास गताष्माणं शूलोपहतवङ्क्षणम् ।
शर्म चानाधिगच्छन्तं बुद्धिमान् परिवर्जयेत् ॥ १३ ॥
अपस्वरं भाषमाणं प्राप्त मरणमात्मनः ।
श्रोतारं चाप्यशब्दस्य दूरतः परिवर्जयेत् ॥ १४ ॥
(६) वात रोगी, अपस्मार रोगी, कुष्ठी, शोफयुक्त, उदर रोगी, गुल्मी,
मधुमेही और राजयक्ष्मा से पीड़ित मनुष्य बल और मांस के क्षय होने पर असाध्य
हो जाते हैं। इसके सिवाय इन रोगियों को अन्य कोई दूसरे भी रोग हो जायें

१७४ चरकसंहिता [ अ० ६
तो भी असाध्य हैं । (७) जिस रोगी का विरेचन के द्वारा पेट फूलने का रोग
शान्त करने पर प्रबल तृष्णा उत्पन्न हो जाये, अथवा विरेचन के पीछे पुन
अनाह (अफ़ारा) हो जाये वह रोगी प्रेत के समान है। (८) जो रोगी कण्ठ,
मुख, छाती, के शुष्क होने के कारण जल वा दूध भी नहीं पी सके वह रोगी नहीं
बचता। (६) आवाज कमजोर पड जाये, बल और वर्ण मे न्यूनता आ जाये,
अनुचित रूप से रोग बढ़ जाये, तो ऐसे रोगी का मरण हो कहे। (१०) जिस
रोगी को ऊर्ध्व श्वास आरम्भ हो जाये, अग ठण्डे हो जाये, वक्षण प्रदेश में खूब
शूल रहे, किसी भी प्रकार से रोगी को शान्ति न मिले बुद्धिमान् ऐसे रोगी को छोड़
दे। (११) जो रोगी विकृत स्वर से अपनी आई मृत्यु को बतला रहा हो, जो
बिना शब्द के भी शब्द सुने, उस रोगी को वैद्य दूर से ही त्याग दे ॥ ८-१४ ॥
यं नरं सहसा रोगो दुर्बलं परिमुञ्चति ।
संशयप्राप्तमात्रेयो जीवितं तस्य मन्यते ॥ १५ ॥
अथ चेज्ज्ञातयस्तस्य याचरेन् प्रणिपाततः ।
रसेनाद्यादिति ब्रूयान्नास्मै दद्याद्विशोधनम् ॥ १६ ॥
मासेन चेन्न दृश्येत विशेषस्तस्य शोभनः ।
रसैश्चान्यैर्बहुविधैर्दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ १७ ॥
निष्ठीवतं च पुरीषं च रेतश्चाम्भसि मज्जति ।
यस्य तस्याऽऽयुषः प्राप्तमन्तमाहुर्मनीषिणः ॥ १८ ॥
निष्ठीयूते यस्य दृश्यन्ते वर्णा बहुविधाः पृथक्।
तच्च सीदत्यधः प्राप्य न स जीवितुमर्हति ॥ १६ ॥
(१२) जिस निर्बल हुए रोगी को रोग एकदम से छोड़ जाये, ऐसे रोगी
के जीवन को भगवान आत्रेय संशय-ग्रस्त मानते हैं। (१३) जिस रोगी के सब
सम्बन्धी बहुत नम्रता और विनय के साथ चिकित्सा करने की प्रार्थना करे,
चिकित्सा के समय वैद्य इस रोगी को मास रस देने को कहे। परन्तु साथ मे
विरेचन या वमन रूप सशोधन कार्य नही करे । इस प्रकार एक मास तक
चिकित्सा करने पर भी कुछ शुभ परिवर्त्तन न दीखे, इसी प्रकार अनेक प्रकार के
मास रस देने पर भी जब फायदा न हो, तो उस रोगी का जीवन दुर्लभ है।
(१४) जिस रोगी का थूक (कफ), मल और वीर्य पानी में डूब जाता
है, बुद्धिमान् लोग उसकी आयु को समाप्त हुआ बतलाते हैं। (१५) जिस
रोगी के कफ में नाना प्रकार के बहुत से रंग दिखाई देते हैं और वह कफ
पानी में डूब जाता हो तो वह रोगी जी ने मे असमर्थ है ॥ १५-१९ ॥

अ० १० ] इन्द्रियस्थानम् १७५

अ० १० ] इन्द्रियस्थानम् १७५
पित्तमूष्मानुगं यस्य शङ्खौ प्राप्य विमूर्च्छति ।
स रोगः शङ्खको नाम्ना त्रिरात्राद्धन्ति जीवितम् ॥ २० ॥
सफेनं रुधिरं यस्य मुहुरास्यात्प्रमुच्यते ।
शूलैश्च तुद्यते कुक्षिः प्रत्याख्येयः स तादृशः ॥ २१ ॥
बलमांसक्षयस्तीव्रो रोगवृद्धिररोचकः ।
यस्याऽऽतुरस्य लक्ष्यन्ते त्रीन् पक्षान्न स जीवति ॥ २२ ॥
( १६ ) उष्मा से मिला पित्त जिस समय शंख प्रदेश ( कनपटियों ) में
आकर रुक जाता है, उस समय ‘शङ्खक’ नाम का रोग उत्पन्न होता है । इस
रोग से तीन दिन में रोगी मर जाता है । ( १७ ) जिस रोगी के मुख से झागदार
रक्त गिरता है, और पेट या पार्श्व में तीव्र वेदना रहती हो, उस रोगी को असाध्य
समझना चाहिये । ( १८ ) जिस रोगी में तीव्रता ( शीघ्रता ) से बल और मांस
का क्षय हो रहा हो, रोग में वृद्धि हो, अरुचि हो, वह रोगी तीन पक्ष से अधिक
नहीं जाता ॥ २०-२२ ॥
तत्र श्लोकौ—विज्ञानानि मनुष्याणां मरणे प्रत्युपस्थिते ।
भवन्त्येतानि सपश्येदन्यान्येवंविधानि च ॥ २३ ॥
तानि सर्वाणि लक्ष्यन्ते न तु सर्वाणि मानवम् ।
विशन्ति विनशिष्यन्तं तस्माद्बोध्यानि सर्वशः ॥ २४ ॥
मरणोन्मुख मनुष्यों में इस प्रकार के तथा अन्य इसी तरह के दूसरे नाना
प्रकार के लक्षण होते हैं । सब लक्षण होते तो अवश्य हैं, परन्तु एक ही रोगी में
सब लक्षण स्पष्ट नहीं होते । सब लक्षण एक साथ पुरुष में नहीं आते, इसलिये
इनको विशेष रूप से जानना चाहिये ॥ २३-२४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने यस्य श्याव-
निमित्तीयमिन्द्रियं नाम नवमोऽध्याय ॥ ९ ॥
दशमोऽध्यायः
अथातः सद्योमरणोयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ‘सद्यो-मरणीय इन्द्रिय’ नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

१७६ चरकसंहिता [ अ० १०

सद्यस्तितिक्षतः प्राणांल्लक्षणानि पृथक् पृथक् ।
अग्निवेश प्रवक्ष्यामि सस्पृष्टो येर्न जीवति ॥ ३ ॥
वाताष्ठीला सुसंवृत्ता तिष्ठन्ती दारुणा हृदि ।
तृष्णयाऽभिपरीतस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ४ ॥
पिण्डिके शिथिलीकृत्य जिह्मीकृत्य च नासिकाम् ।
वायुः शरीरे विचरन् सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ५ ॥
हे अग्निवेश ! शीघ्र प्राण छोड़ने वाले रोगी के लक्षणो को पृथक् पृथक्
कहता हू, जिनसे युक्त होने पर रोगी नहीं बचताछ । ( १ ) वाताष्ठीला कठोर
रूप से व्याप+ हाकर हृदय-प्रदेश मे आकर रुक जाये, रोगी को प्यास बहुत
लगती हो तो उस रोगी का जीवन बहुत शीघ्र हर लेती है । ( २ ) वायु
पिण्डलियों को शिथिल बना दे ओर नासिका का टेढ़ी कर दे तथा
सम्पूर्ण शरीर म वायु दौड़ता फिरे तो वह रोगी का जीवन हर लेता है ॥३-५॥
भ्रुवौ यस्य च्युते स्थानादन्तर्दाहश्च दारुणः ।
तस्य हिक्काकरो रोगः सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ६ ॥
( ३ ) जिस रोगी का भोहे अपने स्थान से स्खलित हो जायें, शरीर मे
बहुत तीव्र, कष्टदायी दाह ( जलन ) हो, और उसका रोग हिचकियें पैदा कर
दे तो वह उसके प्राण को हर लेता है ॥ ६ ॥
क्षीणशोणितमांसस्य वायुरूध्वंगतिश्चरन् ।
उभे मन्ये समे यस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ७ ॥
अन्तरेण गुदं गच्छन्नाभि च सहसाऽनिलः ।
कृशस्य वंक्षणो गृह्णन् सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ८ ॥
वितत्य पर्शुकाग्राणि गृहीत्वोरश्च मारुतः ।
स्तिमितस्यायताक्षस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ९ ॥
हृदयं च गुदं चोभे गृहीत्वा मारुतो बली ।
दुर्बलस्य विशेषेण सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ १० ॥
वंक्षणं च गुदं चोभे गृहीत्वा मारुतो बली ।
श्वासं संजनयञ्जन्तोः सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ११ ॥
नाभिं मूत्रं बस्तिशीर्षं पुरीषं चापि मारुतः ।
विबध्य जनयञ्छूलं सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ १२ ॥
---------------------------------------------------------------------------------------------------
❀ 'सद्यः' शब्द से कुछ तो सात दिन गिनते हैं और कुछ आचार्य तीन
दिन मानते हैं ।

अ० १० ] १२ इन्द्रियस्थानम् १७७

अ० १० ] १२ इन्द्रियस्थानम् १७७

भिद्येते वक्षणौ यस्य वातशूलैः समन्ततः ।
भिन्नं पुरीषं तृष्णा च सद्यः प्राणाञ्जहाति सः ॥ १३ ॥
आप्लुतं मारुतेनेह शरीरं यस्य केवलम् ।
भिन्नं पुरीषं तृष्णा च सद्यो जहात्स जीवितम् ॥ १४ ॥
शरीरं शोफितं यस्य वातशोफेन देहिनः ।
भिन्नं पुरीषं तृष्णा च सद्यो जहात्स जीवितम् ॥ १५ ॥
(४) शरीर में रक्त और मांस क्षीण हो जाये, वायु उर्ध्व गति करे, दोनों
मन्याएं (ग्रीवा की शिराये) एक समान हो तो वायु उस रोगी का जीवन
शीघ्र हर लेता है । (५) जिस निर्बल रोगी में वायु गुद द्वार से प्रवेश करके नाभि
प्रदेश में पहुँच कर वक्षण प्रदेश को पीड़ित करता है वह वायु रोगी का जीवन
शीघ्र ही हर लेता है । (६) जिस रोगी में वायु उरो-भाग (छाती) में पहुँच
कर पर्शुकाओं के अग्र भागों को दबाता है और रोगी स्तब्ध तथा आंखें फैलाये
हो, तो वायु उसके शीघ्र प्राण ले लेता है । (७) जिस निर्बल शरीर वाले रोगी
के हृदय और गुदा इन दोनों अवयवों में बलवान् वायु व्याप्त हो जाता है, वह
रोगी शीघ्र मर जाता है । (८) बलवान् वायु वक्षण और गुदा को पीड़ित
करके ऊर्ध्व श्वास उत्पन्न करदे तो रोगी के प्राणो को वायु शीघ्र ही हर लेता है ।
(६) वायु, नाभि, मूत्र, बस्ति, शिर और मल इनको बन्द करदे अथवा इन
स्थानों पर काटने के समान (छेदन के समान) शूल उत्पन्न कर दे तो वायु
उसके प्राणों को शीघ्र हर लेता है । (१०) वात-शूल के कारण जिस रोगी के
वक्षण प्रदेशों में सर्वत्र और भिन्न भिन्न प्रकार की वेदना होती रहती है, रोगी
को अतिसार और प्यास रहती हो तो वह प्राणों को शीघ्र छोड़ देता है । (११)
जिस रोगी के सम्पूर्ण शरीर में वायु व्याप्त हो जाये, अतिसार तथा प्यास हो वह
रोगी शीघ्र ही प्राण त्याग देता है । (१२) जिस रोगी का शरीर वायु के शोफ
के कारण सूज जाये, रोगी को अतिसार हो तथा प्यास रहे वह शीघ्र प्राणों
को छोड़ देता है ॥ ७-१५ ॥
आमाशयसमुत्थाना यस्य स्यात्परिकर्त्तिका ।
तृष्णा गुदग्रहश्चाग्रः सद्यो जहात्स जीवितम् ॥ १६ ॥
पक्वाशयमधितिष्ठाय हत्वा सञ्ज्ञां च मारुतः ।
कण्ठे घुर्घुरकं कृत्वा सद्यो हरति जीवितम् ॥ १७ ॥
दन्ताः कर्द्दमचूर्णाभा मुखं चूर्णकसंनिभम् ।
सिप्रायन्ते च गात्राणि लिङ्गं सद्यो मरिष्यतः ॥ १८ ॥