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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 616 में से

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पृष्ठ 177

अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६३
विकारा यस्य वर्धन्ते प्रकृतिः परिहीयते ।
सहसा सहसा तस्य मृत्युर्हरति जीवितम् ॥ २४ ॥
(१७) जिसके शरीर में विरोधी कारणों से रोग उत्पन्न हुए हों और
जिनकी चिकित्सा परस्पर विपरीत पड़े और रोग बड़े वेग से बढ़े वह शीघ्र ही
मर जाता है।
(१८) जिस रोगी का बल, ज्ञान, आरोग्य, ग्रहणी मास और रक्त क्षीण
हो गये हों, वह रोगी शीघ्र ही मर जाता है।
(१९) जिस रोगी का आरोग्य दिन पर दिन घट रहा हो, तथा प्रकृति
स्वभाव (अथवा जन्म की 'कफ प्रकृति' आदि प्रकृति) बदलती जा रही हो
उस रोगी के जीवन को मृत्यु एकाएक हर लेता है ॥ २२-२४ ॥
तत्र श्लोकः-इत्येतानि शरीराणि व्याधिमन्ति विवर्जयेत् ।
न ह्येषु धीराः पश्यन्ति सिद्धिं काञ्चिदुपक्रमात् ॥ २५ ॥
वर्णन किये हुए इन रोगी शरीरो का परित्याग करे, क्योंकि इनमें चिकित्सा
करने से विद्वान् लोग कुछ लाभ नहीं देखते ॥ २५ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने कतमानि
शरीरीयमिन्द्रियं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः
अथातः पन्नरूपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे छाया-प्रतिच्छाया के विनाश रूप अरिष्ट को बतलाने के लिये
'पन्नरूपीय इन्द्रिय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। जैसा भगवान् आत्रेय
ने कहा था ॥ १-२ ॥
दृष्ट्वा यस्य विजानीयात्पन्नरूपां कुमारिकाम् ।
प्रतिच्छायामयीमक्ष्णोर्नैनमिच्छेच्चिकित्सितुम् ॥ ३ ॥
ज्योत्स्नायामातपे दीपे सलिलादर्शयोरपि ।
अङ्गेषु विकृता यस्य च्छाया प्रेतस्तथैव सः ॥ ४ ॥
छिन्ना भिन्नाकुला छाया हीना वाऽप्यधिकाऽपि वा ।
नष्टा तन्वी द्विधा छिन्ना विशिरा विकृता च या ॥ ५ ॥