चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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प्रभाहीन नहीं हो सकता । मृत्यु के समीप आने पर प्रभा पर आश्रित छाया
मनुष्य के शुभाशुभ को प्रकाशित कर देती है ॥ १४-१७ ॥
कामलाक्ष्णोर्मुखं पूर्णं गण्डयोर्युक्तमासता ।
संत्रासश्चोष्णगात्रं च यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ १८ ॥
उत्थाप्यमानः शयनात्प्रमोहं याति यो नरः।
मुहुर्मुहुर्न सप्ताहं स जीवति विकुत्थन ॥ १६ ॥
( १ ) जिस रोगी की आंखे कामला रोगी के समान पीली, मुख से लार
गिरना, गण्डस्थल गालों पर मास की वृद्धि ( गालों पर मास की अधिकता )
हो जिसको देखकर डर लगे, और शरीर में उष्णता हो, ऐसे रोगी को त्याग दे,
उसकी चिकित्सा स्वीकार न करे । ( २ ) जो रोगी प्रातःकाल विस्तरे से उठते
समय मूर्च्छित हो जाता हो, और बार बार अपना शोखो मारता रहे या निरन्तर
गालिया बोले वा बड़बड़ावे वह सात दिन में मर जाता है ॥ १८-१६ ॥
संसृष्टा व्याधयो यस्य प्रतिलोमानुलोमगाः ।
व्यापन्ना ग्रहणी प्रायः सोऽर्धमास न जीवति ॥ २० ॥
उपरुद्धस्य रोगेण कर्षितस्याल्पमश्नतः ।
बहुमूत्रपुरीषं स्याद्यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ २१ ॥
दुर्बलो बहु भुक्ते यः प्राग्भुक्तादन्नमातुरः ।
अल्पमूत्रपुरीषश्च यथा प्रेतस्तथैव सः॥ २२॥
इष्टं च गुणसंपन्नमन्नमश्नाति यो नरः ।
शश्वच्च बलवर्णाभ्यां हीयते न स जीवति ॥ २३ ॥
( ३ ) जिस रोगी में प्रतिलोमगामी और अनुलोमगामी दोनों प्रकार के
रोग मिले हुए हों, और जिस की ग्रहणी दूषित हो, ( अन्नपाक होना बन्द हो
जाये ) वह पन्द्रह दिन से अधिक नहीं जीता । (४) रोग से पीडित दुर्बल व्यक्ति
तथा थोड़ा खाने पर जिसको मल ओर मूत्र अधिक परिमाण में आये, वह रोगी
त्याज्य है । ( ५ ) जो रोगी निर्बल होकर पहिले की अपेक्षा अधिक भोजन
करे, जिसको मल और मूत्र कम परिमाण में आता हो, वह प्रेत के समान है ।
(६) जो रोगी मन चाहा और गुणकारी अन्न को खाये, तो भी, बल और वर्ण
निरन्तर क्षीण होता जाये, वह नहीं बचता ॥ २०-२३ ॥
प्रकूजति प्रश्वसिति शिथिलं चातिसार्यते ।
बलहीनः पिपासार्तः शुष्कास्यो न स जीवति ॥ २४ ॥