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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 616 में से

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पृष्ठ 188

१७४ चरकसंहिता [ अ० ६
तो भी असाध्य हैं । (७) जिस रोगी का विरेचन के द्वारा पेट फूलने का रोग
शान्त करने पर प्रबल तृष्णा उत्पन्न हो जाये, अथवा विरेचन के पीछे पुन
अनाह (अफ़ारा) हो जाये वह रोगी प्रेत के समान है। (८) जो रोगी कण्ठ,
मुख, छाती, के शुष्क होने के कारण जल वा दूध भी नहीं पी सके वह रोगी नहीं
बचता। (६) आवाज कमजोर पड जाये, बल और वर्ण मे न्यूनता आ जाये,
अनुचित रूप से रोग बढ़ जाये, तो ऐसे रोगी का मरण हो कहे। (१०) जिस
रोगी को ऊर्ध्व श्वास आरम्भ हो जाये, अग ठण्डे हो जाये, वक्षण प्रदेश में खूब
शूल रहे, किसी भी प्रकार से रोगी को शान्ति न मिले बुद्धिमान् ऐसे रोगी को छोड़
दे। (११) जो रोगी विकृत स्वर से अपनी आई मृत्यु को बतला रहा हो, जो
बिना शब्द के भी शब्द सुने, उस रोगी को वैद्य दूर से ही त्याग दे ॥ ८-१४ ॥
यं नरं सहसा रोगो दुर्बलं परिमुञ्चति ।
संशयप्राप्तमात्रेयो जीवितं तस्य मन्यते ॥ १५ ॥
अथ चेज्ज्ञातयस्तस्य याचरेन् प्रणिपाततः ।
रसेनाद्यादिति ब्रूयान्नास्मै दद्याद्विशोधनम् ॥ १६ ॥
मासेन चेन्न दृश्येत विशेषस्तस्य शोभनः ।
रसैश्चान्यैर्बहुविधैर्दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ १७ ॥
निष्ठीवतं च पुरीषं च रेतश्चाम्भसि मज्जति ।
यस्य तस्याऽऽयुषः प्राप्तमन्तमाहुर्मनीषिणः ॥ १८ ॥
निष्ठीयूते यस्य दृश्यन्ते वर्णा बहुविधाः पृथक्।
तच्च सीदत्यधः प्राप्य न स जीवितुमर्हति ॥ १६ ॥
(१२) जिस निर्बल हुए रोगी को रोग एकदम से छोड़ जाये, ऐसे रोगी
के जीवन को भगवान आत्रेय संशय-ग्रस्त मानते हैं। (१३) जिस रोगी के सब
सम्बन्धी बहुत नम्रता और विनय के साथ चिकित्सा करने की प्रार्थना करे,
चिकित्सा के समय वैद्य इस रोगी को मास रस देने को कहे। परन्तु साथ मे
विरेचन या वमन रूप सशोधन कार्य नही करे । इस प्रकार एक मास तक
चिकित्सा करने पर भी कुछ शुभ परिवर्त्तन न दीखे, इसी प्रकार अनेक प्रकार के
मास रस देने पर भी जब फायदा न हो, तो उस रोगी का जीवन दुर्लभ है।
(१४) जिस रोगी का थूक (कफ), मल और वीर्य पानी में डूब जाता
है, बुद्धिमान् लोग उसकी आयु को समाप्त हुआ बतलाते हैं। (१५) जिस
रोगी के कफ में नाना प्रकार के बहुत से रंग दिखाई देते हैं और वह कफ
पानी में डूब जाता हो तो वह रोगी जी ने मे असमर्थ है ॥ १५-१९ ॥