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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० २४ ] १८ सूत्रस्थानम् २७३

अ० २४ ] १८ सूत्रस्थानम् २७३
सूचीभिस्तोदनं शस्त्रैर्दाहः पीडा नखान्तरे ॥ ४६ ॥
लुञ्चनं केशलोम्नां च दन्तैर्दशनमेव च ।
आत्मगुप्तावघर्षश्च हितास्तस्यावबोधने ॥ ४७ ॥
संमूर्च्छितानि तीक्ष्णानि मद्यानि विविधानि च ।
प्रभूतकटुयुक्तानि १ तस्यास्ये गालयेन्मुहुः ॥ ४८ ॥
मातुलुङ्गरसं तद्वन्महौषधसमायुतम् ।
तद्वत्सौवर्चलं २ दद्याद्युक्तं मद्याम्लकाञ्जिकैः ॥ ४९ ॥
हिङ्गूषणसमायुक्तं यावत्संज्ञाप्रबोधनम् ।
प्रबुद्धसंज्ञमन्नैश्च लघुभिस्तमुपाचरेत् ॥ ५० ॥
विस्मापनैः स्मारणैश्च प्रियश्रुतिभिरेव च ।
पटुभिर्गीतवादित्रशब्दैश्चित्रैश्च दर्शनैः ॥ ५१ ॥
स्रंसनोल्लेखनैर्धूमैरञ्जनैः कवलग्रहैः ।
शोणितस्यावसेकैश्च व्यायामोद्धर्षणैस्तथा ॥ ५२ ॥
प्रबुद्धसंज्ञं मतिमाननुबन्धमुपक्रमेत् ।
तस्य संरक्षितव्यं हि मनः प्रलयहेतुतः ॥ ५३ ॥
गहरे पानी में डूबते हुए बर्त्तन को बुद्धिमान् मनुष्य जिस प्रकार तली में
पहुंचने से पूर्व ही पकड़ने का प्रयत्न करता है, उसी प्रकार सन्यास रोगी
की गिरने से पूर्व चिकित्सा करनी चाहिये । इसके लिये अंजन ( आंखों में ),
अवपीडन ( नासिका में औषधियों का रस डालना ), नाक से धूम्रपान, प्रधमन
( नाक में फुत्कार से औषध पहुंचाना ), सुई चुभोना, शस्त्र आदि को गरम
करके दाह करना, नखों में सुई, पिन आदि चुभोना, शिर या शरीर के बालों
या लोमों को खींचना, दांतों से काटना, कौंच की फली का शरीर पर मलना,
ये कर्म रोगी को चेतन करने के लिये हितकारी हैं। नाना प्रकार के तीक्ष्ण,
मूर्च्छित एवं कटु द्रव्य युक्त मद्य रोगी के मुंह में डालने चाहिये । सोठ में
मिलकर बिजौरे निम्बू का रस, या मद्य और खट्टी कांजी में सौंचल मिलाकर
वा हींग और सोंठ मिरच, पिप्पली इनको मिलाकर देवे, जबतक मनुष्य चेतन
हो । चेतन होने पर हल्का भोजन देना चाहिये । चामत्कारिक बातों को सुनाना,
पिछली बातों को याद कराना, मन पसन्द कहानी कहना, बढ़िया गाना-बजाना
सुनाकर, सुन्दर सुन्दर चित्रों को दिखाकर, विरेचन, वमन, धूम्रपान, अञ्जन,
कवल अर्थात् मु ख में औषध या गोली को रखकर, रक्त मोक्षण, व्यायाम कराके,
अंगों के मर्दन से निरन्तर मनुष्य को जाग्रत चेतन रखने का यत्न करना
१. तिक्तानीति च पाठः । २. सौवर्चकमिति च पाठः ।

चाहिये। रोगी के मन को मोहित ( मूर्च्छा उत्पन्न ) करने वाले कारणों से
बचा कर रखना चाहिये ॥ ४५-५३ ॥
स्नेहस्वेदोपपन्नानां यथादोषं यथाबलम् ।
पञ्च कर्माणि कुर्वीत मूर्च्छायाेषु मदेषु च ॥ ५४ ॥
अष्टाविंशत्यौषधस्य तथा तिक्तस्य सर्पिषः ।
प्रयोगः शस्यते तद्वन्महतः षट्पलस्य वा ॥ ५५ ॥
त्रिफलायाः प्रयोगो वा सघृतक्षौद्रशर्करः ।
शिलाजतुप्रयोगो वा प्रयोगः पयसोऽपि वा ॥ ५६ ॥
पिप्पलीनां प्रयोगो वा प्रयोगश्चित्रकस्य वा ।
रसायनानां कौम्भस्य सर्पिषो वा प्रशस्यते ॥ ५७ ॥
रक्तावसेकाच्छास्त्राणां सतां सत्त्ववतामपि ।
सेवनान्मदमूर्च्छायाः प्रशाम्यन्ति शरीरिणाम्॥ ५८ ॥ इति ॥
मूर्च्छा और मद रोगों में बल एवं दोष के अनुसार स्वेदन देकर पीछे
से वमन, विरेचन, शिरोविरेचन ( नस्य ), आस्थापन और अनुवासन
रूपी पंचकर्म करने चाहिये । उन्माद चिकित्सा में कहे ‘पानीय कल्याण घृत’
( अट्ठाईस दवाइयां ), महातिक्त घृत या महाषट्पल घृत ( कुष्ठ रोग में ) का
पान करना उत्तम है। घी, शहद और शर्करा के साथ त्रिफला का प्रयोग
करना, अथवा दूध के साथ शिलाजीत का प्रयोग करना, दूध के साथ पिप्पली
चूर्ण या चीतामूल का प्रयोग करना, रसायनों तथा दस वर्ष पुराने मटके में
रक्खे हुए घी का प्रयोग करना उत्तम है। रक्त मोक्षण, वेद आदि सत् शास्त्रों
का पढ़ना, सज्जन, सत्वगुणी, तपस्वी पुरुषों का सत्संग मद मूर्च्छा रोग को
शान्त करते हैं ॥ ५४-५८ ॥
तत्र श्लोकौ—विशुद्धं चाविशुद्धं च शोणितं तस्य हेतवः ।
रक्तप्रदोषजा रोगास्तेषु रोगेषु चौषधम् ॥ ५६ ॥
मद-मूर्च्छाय-संन्यास-हेतु-लक्षण-भेषजम् ।
विधिशोणितकेऽध्याये सर्वमेतत्प्रकाशितम् ॥ ६० ॥
शुद्ध या अशुद्ध रक्त, इनके कारण, रक्त प्रदोष से उत्पन्न होने वाले रोग,
इनकी औषध, मद, मूर्च्छाय, संन्यास रोगों के कारण लक्षण और औषध, ये सब
विषय इस ‘विधिशोणित’ अध्याय में कह दिये ॥ ५६-६० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के
विधिशोणितीयो नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥ २४ ॥

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २७५

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २७५
पञ्चविंशतितमोऽध्यायः ।
अथातो यज्जःपुरुषीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब 'यज्जःपुरुषीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय
ने कहा था ॥१-२॥
पुरा प्रत्यक्षधर्माणं भगवन्तं पुनर्वसुम् ।
समेतानां महर्षीणां प्रादुरासीदियं कथा१ ॥ ३ ॥
आत्मेन्द्रियमनोर्थानां योऽयं पुरुषसंज्ञकः ।
राशिरस्यामयानां च प्रागुत्पत्तिविनिश्चये ॥ ४ ॥
अथ काशिपतिर्वाक्यं वामकोऽर्थवदन्तरा ।
व्याजहारर्षिसमितिमभिसृत्याभिवाद्य च ॥ ५ ॥
किं नु स्यात् पुरुषो यज्जस्तज्जास्तस्याऽऽमयाः स्मृताः ।
न वेत्युक्ते नरेन्द्रेण प्रोवाचर्षीन् पुनर्वसुः ॥ ६ ॥
सर्व एवामित-ज्ञान-विज्ञान-च्छिन्न-संशयाः ।
भवन्तश्छेत्तुमर्हन्ति काशिराजस्य संशयम् ॥ ७ ॥
धर्म के प्रत्यक्ष किये हुए महर्षि आत्रेय एक बार महर्षियों के साथ मिलकर
बातचीत करने लगे कि—'आत्मा, इन्द्रिय, मन और विषय' इन से युक्त जो
'पुरुष' बनता है इसकी तथा रोगों की उत्पत्ति किस प्रकार और कहां से होती
है ? इस प्रसंग में काशि के राजा वामक ऋषिसभा के सम्मुख अभिवादन
करके बोलने लगे—हे भगवन् ! जिन कारणों से पुरुषों की उत्पत्ति होती है,
उन्हीं कारणों से रोग उत्पन्न होते हैं, यह मानना संगत है या नहीं ? ऋषि
पुनर्वसु ने कहा कि—हे महर्षियों ! तुम सब अपार ज्ञान रखते हो, विज्ञान से
तुम्हारे सब सन्देह मिट चुके हैं। आप लोग इन काशिपति के सन्देह को दूर करें ॥७॥
पारीक्षित्स्तत्परीक्ष्याग्रे मौद्गल्यो वाक्यमब्रवीत् ।
आत्मजः पुरुषो रोगाश्चाऽऽत्मजाः कारणं हि सः ॥ ८ ॥
स चिनोत्युपभुङ्क्ते च कर्म कर्मफलानि च ।
नह्यते चेतनाधातोः प्रवृत्तिः सुखदुःखयोः ॥ ६ ॥
पारीक्षि मौद्गल्य कहने लगे कि—पुरुष आत्मा से उत्पन्न होता है और
रोग भी आत्मा से ही उत्पन्न होते हैं। वही आत्मा आहार-विहारादि कर्मों को
१. महर्षय उपासीना प्रादुश्चकुरिमां कथामिति वा पाठः ।

२७६ चरकसंहिता [ अ० २५
करता है और इसीसे आरोग्यता या रोग रूपी कर्मफलों का भोग करता है।
क्योंकि 'चेतना धातु' आत्मा के बिना सुख दुःख के हेतु रूप आरोग्यता
या व्याधि नहीं हो सकती ॥ ८-६ ॥
शरलोमा तु नेत्याह न ह्यात्माऽऽत्मानमात्मना ।
योजयेद् व्याधिभिर्दुःखैर्दुःखद्वेषी कदाचन ॥ १० ॥
रजस्तमोभ्यां तु मनः परीतं सत्त्वसंज्ञकम् ।
शरीरस्य समुत्पत्तौ विकाराणां च कारणम् ॥ ११ ॥
शरलोमा ऋषि बोले—यह ठीक नहीं। क्योंकि आत्मा स्वभाव से दुःखों
से द्वेष रखने वाला 'आनन्दमय' है। इसलिये आत्मा अपने आपको व्याधियों
के कष्टों से युक्त नहीं करेगा। वास्तव में, 'सत्त्व' नामक मन के साथ रज और
तम गुण मिलकर पुरुष और रोग दोनों को ही उत्पन्न करते हैं ॥ १०-११ ॥
वार्योविदस्त्व नेत्याह नह्येकं कारणं मनः ।
नर्ते शरीरं शारीररोगा न मनसः स्थितः ॥ १२ ॥
रसजानि तु भूतानि व्याधयश्च पृथग्विधाः ।
आपो हि रसवत्यस्ताः स्मृता निर्वृत्तिहेतवः ॥ १३ ॥
वार्योविद ऋषि बोले—यह ठीक नहीं है कि अकेला मन ही इनकी उत्पत्ति
में कारण है। क्योंकि शरीर के बिना न तो शारीरिक रोग हो सकते हैं और न
मन ही रह सकता है। इसलिये प्राणियों की उत्पत्ति में कारण रस है और 'रस'
से ही सब नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। रस की उत्पत्ति का जल ही
इनकी उत्पत्ति का कारण है ॥ १२-१३ ॥
हिरण्याक्षस्तु नेत्याह न ह्यात्मा रसजः स्मृतः ।
नातीन्द्रियं मनः सन्ति रोगाः शब्दादिजास्तथा ॥ १४ ॥
षड्धातुजस्तु पुरुषो रोगाः षड्धातुजास्तथा ।
राशिः षड्धातुजो ह्येष सांख्यैराद्यैः प्रकीर्तितः ॥ १५ ॥
हिरण्याक्ष ऋषि बोले—कि नहीं, यह ठीक नहीं, आत्मा रसजन्य नहीं है,
आत्मा और मन अतीन्द्रिय हैं। (कुछ रोग) भी शब्दादि (अतियोग
अयोग, मिथ्यायोग) से उत्पन्न होते हैं। जो कि रसजन्य नहीं। वास्तव में पुरुष
छः धातुओं (आत्मा और पृथ्वी अप, तेज, वायु एवं आकाश) से उत्पन्न
होता है, रोग भी इन्हीं छः धातुओं से पैदा होते हैं। सांख्य दर्शन का सिद्धान्त
भी है कि 'छः धातुओं के समूह का नाम पुरुष' है ॥ १४-१५ ॥

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २७७

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २७७
तथा ब्रुवाणं कौशिकमाह तन्नेति शौनकः ।
कस्मान्मातापितृभ्यां हि बिना षड्धातुजो भवेत् ॥ १६ ॥
पुरुषः पुरुषाद् गौर्गोरश्वादश्वः प्रजायते ।
पैत्र्या मेहादयश्चोक्ता रोगास्तावत्र कारणम् ॥ १७ ॥
इस प्रकार कहते हुए कुशिक (हिरण्याक्ष) को शौनक ने कहा कि—
माता पिता के बिना छः धातु कैसे हो सकते हैं ? पुरुष से, पुरुष गौ से गाय,
और घोड़े से घोड़ा उत्पन्न होता है और माता पिता के प्रमेहादि रोग पुत्र में
आते हैं, इसलिये रोगों और पुरुषों की उत्पत्ति में कारण माता-पिता ही हैं ॥१७॥
भद्रकाप्यस्तु नेत्याह नह्यन्धोऽन्धात्प्रजायते ।
मातापित्रोरपि च ते प्रागुत्पत्तिर्न युज्यते ॥ १८ ॥
कर्मजस्तु मतो जन्तुः कर्मजास्तस्य चाऽऽमयाः ।
नह्यृते कर्मणो जन्म रोगाणां पुरुषस्य च ॥ १९ ॥
भद्रकाप्य ऋषि बोले—यह ठीक नहीं, क्योंकि अन्धे माता-पिता से पुत्र
अन्धा उत्पन्न नहीं होता । मता-पिता की उत्पत्ति से पूर्व पुरुष का और रोग
का होना असम्भव होता है । इसलिये कर्म से ही पुरुष उत्पन्न होता है और
कर्म से ही रोग उत्पन्न होते हैं। कर्म के बिना न तो पुरुष का और न रोगों का
जन्म हो सकता है ॥ १८–१९ ॥
भरद्वाजस्तु नेत्याह कर्ता पूर्वं हि कर्मणः ।
दृष्टं न चाकृतं कर्म यस्य स्यात्पुरुषः फलम् ॥ २० ॥
भावहेतुः स्वभावस्तु व्याधीनां पुरुषस्य च ।
खरद्रवचलोष्णत्वं तेजोन्तानां यथैव हि ॥ २१ ॥
भरद्वाज ऋषि बोले कि—कर्म से पहिले कर्त्ता है। बिना कर्मों के किये
हुए कर्म का फल नहीं देखा जाता । प्रथम कर्म होने से फल होता है, इसलिये
प्रथम कर्म होना चाहिये, जिसके फलस्वरूप पुरुष उत्पन्न होना चाहिये । कर्म
को करने के लिये कर्त्ता ( पुरुष ) आवश्यक है । इसलिये मनुष्य और रोग की
उत्पत्ति में कारण 'स्वभाव' ही है। जिस प्रकार पृथ्बी, अप, वायु और अग्नि
में खरत्व ( खरखरापन ) द्रवत्व ( तरलता ), चलत्व ( गति ) और उष्णत्व
( गरमी ), स्वभाव से ही होता है ॥ २०-२१ ॥
काङ्कायनस्तु नेत्याह नह्यारम्भ फलं भवेत् ।
भवेत्स्वभावाद्भावानांमसिद्धिः सिद्धिरेव वा ॥ २२ ॥

स्रष्टा त्वमितसंकल्पो ब्रह्मापत्यं प्रजापतिः ।

२७८ चरकसंहिता [अ० २५
स्रष्टा त्वमितसंकल्पो ब्रह्मापत्यं प्रजापतिः ।
चेतनाचेतनस्यास्य जगतः सुखदुःखयोः ॥ २३ ॥
कांकायन ऋषि बोले—यह ठीक नहीं। यदि स्वभाव से ही रोग और
पुरुषों की सिद्धि और असिद्धि होती हो, तो आरम्भ अर्थात् लोक और शास्त्र में
प्रसिद्ध यज्ञ, कृषि, पढ़ाना, पढ़ना आदि कार्य निष्प्रयोजन होजायें । इस सुख-
दुःख को बनाने वाला एवं चेतन तथा अचेतन जगत् का कर्त्ता अनन्त संकल्प
वाला, ब्रह्मा का पुत्र प्रजापति है ॥ २२-२३ ॥
तन्नेति भिक्षुरात्रेयो नह्यपत्यं प्रजापतिः ।
प्रजाहितैषी सततं दुःखैर्युञ्ज्यादसाधुवत् ॥ २४ ॥
कालजस्त्वेव पुरुषः कालजास्तस्य चाऽऽमयाः ।
जगत्कालवशं सर्वं कालः सर्वत्र कारणम् ॥ २५ ॥
भिक्षुरात्रेय बोले—यह ठीक नहीं है । यह संसार प्रजापति से (पुत्र रूपेण)
उत्पन्न नहीं हुआ । क्योंकि प्रजा की मंगलकामना करने वाला प्रजापति,
संतान से द्वेष करने वाले की भांति किस प्रकार से दुःखों को देता, अपनी
संतान को दुःखी करता, वास्तव में पुरुष काल से उत्पन्न होता है और रोग
भी काल से ही उत्पन्न होते हैं । सम्पूर्ण जगत् काल के वश में है और सब
जगह काल ही कारण है ॥ २४-२५ ॥
तथर्षीणां विवदतामुवाचेदं पुनर्वसुः ।
मैवं वोचत तत्त्वं हि दुष्प्रापं पक्षसंश्रयात् ॥ २६ ॥
वादान् सप्रतिवादान् हि वदन्तो निश्चितानिव ।
पक्षान्तं नैव गच्छन्ति तिलपीडकवद् गतौ ॥ २७ ॥
मुक्त्वैवं वादसंघट्टमध्यात्ममनुचिन्त्यताम् ।
नाविधूततमःस्कन्धे ज्ञेये ज्ञानं प्रवर्तते ॥ २८ ॥
येषामेव हि भावानां संपत्संजनयेन्नरम् ।
तेषामेव विपद्व्याधीन् विविधान् समुदीरयेत् ॥२६॥
इस प्रकार ऋषिमण्डल में विवाद चलते हुए देख कर पुनर्वसु ऋषि बोले
कि इस प्रकार एक पक्ष को लेकर वादविवाद करते जाओगे तो किसी निश्चित
तत्त्व को नहीं पहुंच सकोगे । जिस प्रकार तैल के कोल्हू (चरखी) पर बैठा
हुआ मनुष्य चारों ओर अनन्त काल तक घूमता रहता है, परन्तु किसी निश्चित
दिशा या स्थान पर नहीं पहुंचता । इस लिये इस वादविवाद को छोड़ कर मत-
लब की बात सोचो । अन्धकारसमूह को नष्ट किये बिना ज्ञातव्य विषय में ज्ञान

अ० २५] सूत्रस्थानम् २७९

अ० २५] सूत्रस्थानम् २७९
नहीं प्राप्त होता । जिस प्रकार के गुणों से पुरुष उत्पन्न होता है उसी प्रकार
के अप्रशस्त गुणों से रोग उत्पन्न होते हैं। पांच महाभूतों से पुरुष उत्पन्न होता
और इन्हीं महाभूतों से वात, पित्त, कफ, (रोगों के कारण) बनते हैं ॥२६-२६॥
अथात्रेयस्य भगवतो वचनमनुनिशम्य पुनरेव वामकः काशिपति-
रुवाच भगवन्तमात्रेयं—भगवन् ! संपन्निमित्तजस्य पुरुषस्य विपन्निमि-
त्तानां च रोगाणां किमभिवृद्धिकारणमिति ॥ ३० ॥
आत्रेय ऋषि के वचन सुन कर फिर काशिपति वामक कहने लगे । हे
भगवन् ! प्रशस्त गुणों से उत्पन्न पुरुष की और अप्रशस्त गुणों से उत्पन्न रोगों
की वृद्धि करने वाले कौन से कारण हैं ? ॥३०॥
तमुवाच भगवानात्रेयः—हिताहारोपयोग एक एव पुरुषस्याभिवृ-
द्धिकरो भवति, अहिताहारोपयोगः पुनर्व्याधीनां निमित्तमिति ॥३१॥
वामक ऋषि को भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया । हितकारी वस्तुओं का
आहार रूप में उपयोग करना ही पुरुष की वृद्धि में अकेला कारण है। अहित-
कारी वस्तुओं का सेवन करना ही रोगों की वृद्धि में एकमात्र कारण है ॥३१॥
एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—कथमिह भगवन् !
हिताहितानामाहारजातानां लक्षणमनपवादमभिजानीयान्, हितस-
माख्यातानां चैव ह्याहारजातानामहितसमाख्यातानां च मात्राकालक्रि-
याभूमिदेहदोषपुरुषावस्थान्तरेषु विपरीतकारित्वमुपलभामहे ।३२। इति
इस प्रकार कहते हुए आत्रेय ऋषि को अग्निवेश ने पूछा—हे भगवन् !
किस प्रकार से हितकारी या अहितकारी आहार रूप पदार्थों को बिना दोष
(अपवाद) के जान सकते हैं । क्योंकि हितकारी पदार्थ एवं अहितकारी पदार्थ
मात्रा, काल, क्रिया (संस्कार), भूमि, देह, दोष और पुरुष भेद से विपरीत,
विरुद्ध गुण वाले हितकारी पदार्थ अहितकारी, और अहितकारी पदार्थ
हितकारी बन जाते हैं ॥ ३२ ॥
तमुवाच भगवानात्रेयः—यदाहारजातमग्निवेश ! समांश्चैव शरीर-
धातून् प्रकृतौ स्थापयति विषमांश्च समीकरोतीत्येतद्धितं विद्धि, विप-
रीतमहितमिति; एतद्धिताहितलक्षणमनपवादं भवति ॥ ३३ ॥
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया—हे अग्निवेश जो भोजन
(आहार के पदार्थ) शरीर के सम धातुओं को प्रकृति अर्थात् समानावस्था
में रखता है और विषम धातुओं को सम करता है वह हितकारी है । इसके
विपरीत पदार्थ अहितकारी हैं, हित और अहित पदार्थों का यह लक्षण
दोषशून्य है ॥ ३३ ॥

तदेवमुपदिष्टं भूयिष्ठकल्पाः सर्वभिषजो विज्ञास्यन्ति ॥ ३४ ॥

एवंवादिनं च भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—भगवन्! नत्वे-
तदेवमुपदिष्टं भूयिष्ठकल्पाः सर्वभिषजो विज्ञास्यन्ति ॥ ३४ ॥
तमुवाच भगवानात्रेयः—येषां विदितमाहारतत्वमग्निवेश! गुणतो
द्रव्यतः कर्मतः सर्वावयवतश्च मात्रादयो भावाः, त एतदेवमुपदिष्टं
विज्ञातुमुत्सहन्ते। यथा तु खल्वेतदुपदिष्टं भूयिष्ठकल्पाः सर्वभिषजो
विज्ञास्यन्ति, तथैतदुपदेक्ष्यामो मात्रादीन् भावानुदाहरन्तः। तेषां
हि बहुविधविकल्पा भवन्ति। आहारविधिविशेषांस्तु खलु लक्ष-
णतश्चावयवतश्चानुव्याख्यास्यामः॥ ३५॥
तद्यथा—आहारत्वमाहारस्यैकविधमर्थभेदात्; स पुनर्द्वियोनिः,
स्थावरजङ्गमात्मकत्वात्; द्विविधप्रभावो हिताहितोदर्कविशेषात्;
चतुर्विधोपयोगः पानाशन-भक्ष्य-लेह्योपयोगात्; षडास्वादो रसभेदतः
षड्विधत्वात्; विंशतिगुणो गुरु-लघु-शीतोष्ण-स्निग्ध-रूक्ष-मन्द-तीक्ष्ण-
स्थिर-सर-मृदु-कठिन-विशद-पिच्छिल-श्लक्ष्ण-खर-सूक्ष्म-स्थूल-सान्द्र-
द्रवा-नुगमात्; अपरिसंख्येयविकल्पो द्रव्य-संयोग-करण-बाहुल्यात् ॥ ३६॥
इस प्रकार कहते हुए आत्रेय ऋषि को अग्निवेश बोले—इतना कह देने
से सब वैद्य सब बातों को नहीं समझ सकेंगे। अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने
कहा—कि जिन वैद्यों को आहारयोग्य पदार्थ गुण, (गुरु लघु आदि) कारण
(यह आप्य है, यह आग्नेय है इत्यादि), कर्म (यह जीवनीय, यह बृंहणीय
इत्यादि) सब अवयव २ (रस, वीर्य, विपाक प्रभाव से), मात्रा एवं पुरुष
की अवस्था का ज्ञान होगा वे ही इतने (ऊपर कहे हुए) उपदेश से समझ
सकते हैं। जिस प्रकार कहने से सब वैद्य सम्पूर्ण रूप में जान सकेंगे, उसी
प्रकार से मात्रा आदि वस्तुओं को उदाहरण के साथ कहेंगे। इनके बहुत
से भेद होते हैं। आहार की जो विशिष्ट विधि है, उसको प्रथम साधारण
रूप में कहकर फिर विभाग पूर्वक कहेंगे। यथा—आहारत्व (खाद्यत्व) गुण
समान होने से सम्पूर्ण आहार एक प्रकार का है, क्योंकि अर्थ में कोई भेद नहीं
है। इस आहार के दो उत्पत्ति स्थान हैं, स्थावर और जंगम। इस आहार के
दो प्रकार के प्रभाव हैं, एक हितफलजनक और दूसरा अहितफलजनक। इस
आहार का चार प्रकार से उपयोग होता है। यथा—पान (पीना), अशन
(दांतों से काटकर खाना), भक्ष्य (चबाना) और लेह्य (चाटने) के उपयोग
से। इस आहार के छः स्वाद होने से यह रस भेद से छः प्रकार का है, क्योंकि
रस छः प्रकार के हैं। इस आहार के गुण बीस प्रकार के हैं। यथा—गुरु, लघु,

[अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २८१

[अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २८१

शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मन्द, तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु, कठिन, विशद, पिच्छिल
श्लक्ष्ण, खर, सूक्ष्म, स्थूल, सान्द्र, द्रव भेद से । द्रव्य (शूकधान्यादि), संयोग
(खाद्य पदार्थों का मिश्रण), करण (संस्कार) भेद से आहार-द्रव्य असंख्य
प्रकार का हो जाता है ॥ ३४-३६ ॥
तस्य खलु ये ये विकारावयवा भूयिष्ठमुपयुज्यन्ते, भूयिष्ठकल्पानां
च मनुष्याणां प्रकृत्यैव हिततमाश्चाहिततमाश्च, तांस्तान्यथावदनु-
व्याख्यास्यामः ॥ (१)
तद्यथा-लोहितशालयः शूकधान्यानां पथ्यतमत्वे श्रेष्ठतमा भवन्ति,
मुद्गाः शमीधान्यानां, आन्तरिक्षमुदकानां, सैन्धवं लवणानां, जीवन्ती-
शाकं शाकानां, ऐणेयं मृगमांसानां, लावः पक्षिणां, गोधा बिलेशयानां,
रोहितो मत्स्यानां, गव्यं सर्पिषां, गोक्षीरं क्षीराणां, तिलतैलं स्थावरजा-
तानां स्नेहानां, वराहवसा आनूपमृगवसानां, चुलुकीवसा मत्स्यवसानां,
पाकहंसवसा जलचरविहङ्गवसानां, कुक्कुटवसा विष्किरशकुनिवसानां,
अजमोदः शाखादममेदसां, शृङ्गवेरं कन्दानां, मृद्वीका फलानां, शर्करा
इक्षुविकाराणामिति प्रकृत्यैव हिततमानामाहारविकाराणां प्राधान्यतो
द्रव्याणि व्याख्यातानि भवन्ति ॥ (२)
प्रायः करके जो जो आहार पदार्थ हितकारी और अहितकारी कहे जाते हैं
और बहुत अधिक व्यवहार में आते हैं, उन पदार्थों का यहां वर्णन करते हैं।
जैसे—लाल चावल शूकधान्यों में सबसे अधिक हितकारी (श्रेष्ठ) है। मूंग
शमीधान्यों में, बरसात का पानी सब पानियों में, सेंधा नमक सब नमकों में,
जीवन्ती का शाक सब शाकों में, मृग का मांस सब पशुओं के मांसों में, बटेर
सब पक्षियों में, गोधा (गोह) बिल में रहने वाले जन्तुओं में, रोहित मत्स्य सब
मछलियों में, गौ का घी सब घी में, गाय का दूध सब दूधों में, तिल का तेल
स्थावरजन्य सब स्नेहों में, वराह की चर्बी सब जलचर प्राणियों की चर्बियों में,
चुलुकी (शुशु) मछली की चर्बी सब मछलियों की चर्बियों में, सफेद हंस की
वसा सब जलचर पक्षियों की वसा में, मुर्गे की चर्बी बिखेर कर खाने वाले सब
पक्षियों में, बकरी का मेद शाखा या टहनी खाने वाले पशुओं की मेदों में,
अदरख सब कन्दों अर्थात् भूमि में रहने वाले फलों में, किशमिश सब फलों
में, शकर गन्ने के रस से बनी सब बस्तुओं में श्रेष्ठ है। ये भोज्य पदार्थों में
स्वभाव से हितकारी द्रव्य कह दिये हैं ॥
अत ऊर्ध्वमहितानुपदेक्ष्यामः-यवकाः शूकधान्यानामपथ्यतमे

३८२ चरकसंहिता [अ० २५
प्रकृष्टतमा भवन्ति, माषाः शमीधान्यानां, वर्षानदेयमुदकानां, औद्धरं
लवणानां, सर्षपशाकं शाकानां, गोमांसं मृगमांसानां, काणकपोतः
पक्षिणां, भेको बिलेशयानां, चिलिचिमो मत्स्यानां, आविकं सर्पिः,
अविक्षीरं क्षीराणां, कुसुम्भस्नेहः स्थावरस्नेहानां, महिषवसा आनूपमृग-
वसानां, कुम्भीरवसा मत्स्यवसानां, काकमद्गुवसा जलचरविहङ्गव-
सानां, चटकवसा विष्किरशकुनिवसानां, हस्तिमेदः शाखादमदसां,
लिकुचं फलानां, आलुकं कन्दानां, फाणितमिक्षुविकाराणाम्, -इति प्रकृ-
त्येव अहिततमानामाहारविकाराणां प्रकृष्टतमानि द्रव्याणि व्याख्यातानि
भवन्ति - इति हिताहितावयवो व्याख्यात आहारविकाराणाम् ॥ ३७ ॥
अब इसके अनन्तर अहित पदार्थों का उपदेश करेंगे - यवक ( जई,
जत्री ) शूक-धान्यों में सबसे अपथ्य एवं अति निन्दित है। माष ( उड़द )
शमी-धान्यों में, बरसात में नदियों का पानी सब पानियों में, ऊसर देश मे
उत्पन्न नमक सब नमकों में, सरसों का शाक सब शाकों में, गाय का मांस सब
पशुओं के मांसों में, छोटा कबूतर सब पक्षियों में, मेंढक बिल में रहने वालों में,
चिलचिम मत्स्य सब मछलियों में, भेड़ का घी सब घीयों में, भेड़ का दूध सब
दूधों में, कुसुम्भ का तेल सब स्थावर तेलों में, भैंस की चर्बी सब जलीय देश
के पशुओं की चर्वियों में, कुम्भीर मछली की वसा सब मछलियों की वसा में,
पानी के कौवे (पनकव्वा) की चर्बी सब जलचर पक्षियों में, कारण्डव (पनडुब्बी
हंसभेद ) की चर्बी सब जलचारी पक्षियों की चर्वियों में, हाथी की चर्बी शाखा
खानेवाले सब पशुओं में, लिकुच, ( बड़हल, ल्हो ) सब प्रकार के फलों में,
आलू सब कन्दों में, राब गन्ने से बने सब विकारों में, चिड़िया की चर्बी बिखेर
कर खाने वाले सब पक्षियों की चर्वियों में निन्दित हैं। ये भोज्य पदार्थों मे
स्वभाव से ही हितकारी एवं निन्दनीय द्रव्य कहे गये हैं ॥ ३७ ॥
अतो भूयः कर्मौषधानां च प्राधान्यतः सानुबन्धानि च द्रव्याण्यनु-
व्याख्यास्यामः । तद्यथा-- अन्नं वृत्तिकराणां श्रेष्ठं, उदकमाश्वासकराणां,
सुरा श्रमहराणां, क्षीरं जीवनीयानां, मांसं बृंहणीयानां, रसस्तर्पणीयानां,
लवणमन्नद्रव्यरुचिकराणां, अम्लं हृद्यानां, कुक्कुटो बल्यानां, नक्ररेतो
वृष्याणां, मधु श्लेष्मपित्तप्रशमनानां, सर्पिर्वातपित्तप्रशमनानां, तैलं
वातश्लेष्मप्रशमनानां, वमनं श्लेष्महराणां, विरेचनं पित्तहराणां, बस्ति-
-र्वातहराणां, स्वेदो मार्दवकराणां, व्यायामः स्थैर्यकराणां, क्षारः पुंस्त्वोप-
घातिनां, तिन्दुकमन्नद्रव्यरुचिकराणां, आमं कपित्थमकण्ठ्यानां, आ-

अ० २५] | सूत्रस्थानम् | २७३

अ० २५] | सूत्रस्थानम् | २७३

र्विकं सर्पिर्हृद्यानां, अजाक्षीरं शोषघ्न-स्तन्य-सात्म्य-रक्त-सांग्राहिक-रक्त-पित्त-प्रशमनानां, अविक्षीरं श्लेष्मपित्तोपचयकराणां, महिषी-
क्षीरं स्वप्नजननानां, मन्दकं दध्यभिष्यन्दकराणां, गवेधुकान्नं कर्शणीया-
नां, उद्दालकान्नं रूक्षणीयानां, इक्षुर्मूत्रजननानां, यवाः पुरीषजननानां,
जाम्बवं वातजननानां, शष्कुल्यः श्लेष्मपित्तजननानां, कुलत्था अम्ल-
पित्तजननानां, माषाः श्लेष्मपित्तजननानां, मदनफलं वमनास्थापनानु-
वासनोपयोगिनां, त्रिवृत्सुखविरेचनानां, चतुरङ्गुलं मृदुविरेचनानां,
स्नुक्पयस्तीक्ष्णविरेचनानां, प्रत्यक्पुष्पा शिरोविरेचनानां, विडङ्गं
क्रिमिघ्नानां, शिरीषो विषघ्नानां, खदिरः कुष्ठघ्नानां, रास्ना वातहराणां,
आमलकं वयःस्थापनानां, हरीतकी पथ्यानां, एरण्डमूलं वृष्यवात-
हराणां, पिप्पलीमूलं दीपनीय-पाचनीयानाह-प्रशमनानां, चित्रकमूलं
दीपनीय-पाचनीय-गुदशूलशोथार्शो-हराणां, पुष्करमूलं हिक्का-श्वास-कास-
पार्श्व-शूलहराणां, मुस्तं संग्राहक-दीपनीय-पाचनीयानां, उदीच्यं निर्वाप-
णीय-दीपनीय-पाचनीय-च्छर्द्यतीसार-हराणां, कट्वङ्गं संग्राहक-दीपनीय-
पाचनीयानां, अनन्ता संग्राहक-दीपनीय-रक्त-प्रशमनानां, अमृता संग्रा-
हक-वातहरदीपनीय-श्लेष्म-शोणित-विबन्ध-प्रशमनानां, बिल्वं संग्राहक-
दीपनीयवात-कफ-प्रशमनानां, अतिविषा दीपनीय-पाचनीय-संग्राहक-सर्व-
दोष हराणां, उत्पल-कुमुद-पद्म-किञ्जल्कं संग्राहक रक्त-पित्त-प्रशमनानां,
दुरालभा पित्त-श्लेष्म-प्रशमनानां, गन्धप्रियङ्गुः शोणित-पित्तात्तियोग-प्रशम-
नानां, कुटजत्वक् श्लेष्म-पित्त-रक्त-संग्राहकोपशोषणानां, काश्मर्यफलं रक्तसं-
ग्राहक-रक्त-पित्त-प्रशमनानां, पृश्निपर्णी संग्राहक-वातहर-दीपनीय-वृष्या-
णां, विदारिगन्धा वृष्यसर्वदोषहराणां, बला संग्राहक-बल्य-वात-हराणां,
गोक्षुरको मूत्रकृच्छ्रानिलहराणां, हिङ्गुनिर्यासश्छेदनीय-दीपनीय-भेदनी-
यानुलोमिक-वात-कफ-प्रशमनानां, अम्लवेतसो भेदनीय-दीपनीयानुलोमि-
क-वात-श्लेष्म-प्रशमनानां, यावशूकः संसनीय-पाचनीयार्शोघ्नानां, तक्रा-
भ्यासो ग्रहणी-दोषार्शो-घृत-व्यापत्प्रशमनानां, क्रव्याद्-मांस-रसाभ्यासो
ग्रहणी-दोष-शोषार्शोघ्नानां, घृतक्षीराभ्यासो रसायनानां, समघृतसक्तुप्रा-
शाभ्यासो वृष्योदावर्तहराणां, तैलगण्डूषाभ्यासो दन्त-बल-रुचि-कराणां,
चन्दनोदुम्बरं दाहनिर्वापणालेपनानां, रास्नागुरुणी शीतापनयन-प्रलेप-
नानां, लामज्जकोशीरे दाहत्वग्दोषस्वेदापनयप्रलेपनानां, कुष्ठं वातहराभ्य-
ङ्गोपगाह-योगिनां, मधुकं चक्षुष्य-वृष्य-केश्य-कण्ठ्य-वर्ण्य-व्रण्य-विरेचनीय-

३८४ चरकसंहिता। [ अ० २५

रोपणीनां, वायुः प्राणसंज्ञाप्रदानहेतूनां, अग्निरामस्तम्भ-शीत-शूलो-
द्वेपन-प्रशमनानां, जलं स्तम्भनीयानां, मृद्भाण्डलोष्ट्रनिर्वापितमुदकं तृष्णा-
तियोगप्रशमनानां, अतिमात्राशनमामप्रदोषहेतूनां, तथाऽग्न्यभ्यवहारोऽ-
ग्निसंधुक्षणानां, यथासात्म्यं चेष्टाभ्यवहारावुपसेव्यानां, कालभोजन-
मारोग्यकराणां, वेगसंधारणमनारोग्यकराणां, तृप्तिराहारगुणानां, मद्यं
सौमनस्यजननानां, मद्याक्षेपो धी-धृति-स्मृति-हराणां, गुरुभोजनं दुर्वि-
पाकानां, एककालभोजनं सुखपरिणामकराणां, स्त्रीष्वतिप्रसङ्गः शोष-
द्वाराणां, शुक्रवेगनिग्रहः षाण्ढ्यकराणां, पराघातनमन्नाश्रद्धाजननानां,
अनशनमायुषो ह्रासकराणां, प्रमिताशनं कर्शणीयानां, अजीर्णाध्यशनं
ग्रहणीदूषणानां, विषमाशनमग्निवैषम्यकराणां, विरुद्धवीर्याशनं निन्दित-
व्याधिकराणां, प्रशमः पथ्यानां, आयासः सर्वापथ्यानां, मिथ्यायोगो
व्याधिमुखानां, रजस्वलाभिगमनमलक्ष्मीमुखानां, ब्रह्मचर्यमायुष्याणां,
सकल्पो वृष्याणां, दौर्मनस्यमवृष्याणां, अयथाबलमारम्भः प्राणोपरो-
धिनां, विषादो रोगवर्धनानां, स्नानं श्रमहराणां, हर्षः प्रीणनानां, शोकः
शोषणानां, निर्वृत्तिः पुष्टिकराणां, पुष्टिः स्वप्नकराणां, स्वप्नस्तन्द्राकराणां,
सर्वरसाभ्यासो बलकराणां, एकरसाभ्यासो दौर्बल्यकराणां, गर्भशल्य-
मनाहार्याणां, अजीर्णमुद्धार्याणां, बालो मृदु भेषजीयानां, वृद्धो याप्यानां,
गर्भिणी तीक्ष्णौषध-व्यायाम-वर्जनीयानां, सौमनस्यं गर्भधारकाणां,
संनिपातो दुश्चिकित्स्यानां, आमो विषमचिकित्स्यानां, ज्वरो रोगाणां,
कुष्ठं दीर्घरोगणां, राजयक्ष्मा रोगसमूहानां, प्रमेहोऽनुषङ्गिणां, जलौ-
कसोऽनुशस्त्राणां, बस्तिस्तन्त्राणां, हिमवानौषधिभूमीनां, मरुभूरारोग्य-
देशानां, अनूपोऽहितदेशानां, निर्देशकारित्वमातुरगुणानां, भिषक्
चिकित्साङ्गानां, नास्तिको वर्ज्यानां, लौल्यं क्लेशकराणां, अनिर्देशका-
रित्वमरिष्टानां, अनिर्वेदॊ वार्तलक्षणानां, वैद्यसमूहो निःसंशयकराणां,
योगो वैद्यगुणानां, विज्ञानमौषधीनां, शास्त्रसहितस्तर्कः साधनानां,
संप्रतिपत्तिः कालज्ञान-प्रयोजनानां, अव्यवसायः कालातिपत्तिहेतूनां,
दृष्टकर्मता निःसंशयकराणां, असमर्थता भयकराणां, तद्विद्यसंभाषा
बुद्धिवर्धनानां, आचार्यः शास्त्राधिगमहेतूनां, आयुर्वेदोऽमृतानां,
सद्द्वचनमनुष्ठेयानां, असंबद्धवचनमसंग्रहणसर्वाहितानां, सर्वसंन्यासः
सुखानामिति ॥ ३८ ॥
अब तक सब प्रकार के हितकारी वा अहितकारी मुख्य-मुख्य द्रव्य कहे हैं।

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २८१

अब इसके आगे बस्ति आदि कर्मों में तथा ओषधियों में मुख्य रूप से अनुबन्ध
सहित द्रव्यों की व्याख्या करेंगे-
शरीर की स्थिति करने वाले सब पदार्थों में अन्न श्रेष्ठ है। धैर्य, उत्साह
पैदा करने वाले सब पदार्थों में पानी, थकन मिटाने वाले सब पदार्थों में शराब,
जीवन देने वाले पदार्थों में दूध, बृंहण करने वालों में मांस, अन्नद्रव्य भोजन
में रुचि उत्पन्न करनेवालों में नमक, हृदय को पसंद आने वालों में अम्ल रस,
बलकारक वस्तुओं में कुक्कुट, वृष्य (शुक्रवर्धक) वस्तुओं में नक्र (मकर) का
वीर्य, कफ-पित्तनाशक वस्तुओं में मधु, वातपित्तनाशकों में घी, वातकफनाशक
वस्तुओं में तेल, कफनाशक वस्तुओं में विरेचन, वातनाशक वस्तुओं में बस्तिकर्म,
कोमलता उत्पन्न करने वालों में स्वेदन, स्थिरता करनेवालों में व्यायाम, पुरुषत्व
नाश करने वालों में क्षार, अन्न के अन्दर अरुचि करने वाले पदार्थों में तिन्दुक,
आवाज़ या गला बिगाड़ने वाले पदार्थों में कच्चा कैथ, हृदय के लिये ग्लानि-

२८६ चरकसंहिता [अ० २५
वाली वस्तुओं में नागरमोथा; निर्वापण (दाह को कम करनेवाली) दीपन,
पाचन, वमन, अतिसार को नष्ट करनेवाली वस्तुओं में नेत्रबाला; संग्राहक,
पाचन और दीपनीय वस्तुओं में टेटू (स्योनाक); संग्राहक, रक्त पित्तनाशक
वस्तुओं में सारिवा; संग्राहक, दीपनीय, वात-कफ-रक्त और विबन्धनाशक
वस्तुओं में गिलोय, संग्राहक, दीपन, वात कफनाशक वस्तुओं में बेलगिरी;
दीपन, पाचन, संग्राहक सर्वदोषनाशकों में अतीस; संग्राहक, रक्त-पित्तनाशक
वस्तुओं में नील कमल; कमल श्वेत, पद्म का केशर (कमल केशर); पित्त-
कफनाशक वस्तुओं में धमासा; रक्त-पित्त के अतियोग को कम करने वाली
वस्तुओं में गन्धप्रियंगू (घेउला); कफ-पित्त-रक्त संग्राहक, शुष्क करने वाली
वस्तुओं में कुड़े की छाल, रक्तसंग्राहक, रक्त-पित्तनाशक-वस्तुओं में गम्भारी का
फल; संग्राहक, वातनाशक, दीपनीय और शुक्रवर्धक वस्तुओं में पृश्निपर्णी; वृष्य
और सर्वदोषनाशक वस्तुओं में विदारीकन्द, संग्राहक, बलकारक, वातनाशक
वस्तुओं में बला (खरैंटी); मूत्रकृच्छ्र, वायुनाशक वस्तुओं में गोखरू; छेदनीय,
दीपनीय, आनुलोमिक (वायु मल-मूत्र का अनुलोमन करने वाले), वात-
कफनाशक वस्तुओं में अम्लवेतस; मलनिःसारक, पाचनीय अर्शनाशक वस्तुओं
में यवक्षार; ग्रहणी-दोष, अर्श, घृतजन्य रोगों की शान्ति के लिये तक्र का
अभ्यास अर्थात् सतत सेवन; ग्रहणी रोग, शोष, अर्श नाशक वस्तुओं में व्याघ्र
आदि मांस खाने वाले पशुओं का मांस; रसायनों में दूध और घी का सततसेवन;
उदावर्त्तनाशक और वृष्यकारक वस्तुओं में बराबर घी और सत्तू को खाना;
दांतों को बल और रुचि, चमक, कान्ति पैदा करने की वस्तुओं में तैल के
कोगले करना; दाह जलन को शान्त करने लिये चन्दन और गूलर का
लेप; शीत को दूर करने वाले लेपों में चन्दन और अगर का लेप; जलन में
त्वग्-रोग, पसीने को दूर करने वाले लेपों में कत्तृण और खस का लेप,
वातनाशक मर्दन और लेप के प्रयोग में कूठ; आंखों के लिये हितकारी, वृष्य
केश्य, कण्ठ के हितकारी वर्ण, बल और विरजनीय (रंग पैदा करने) और
रोपण करने वाली वस्तुओं में मुलैहठी; प्राण या जीवन देने वाली वस्तुओं में
वायु; आमविकार, मल मूत्रादि का अवरोध, ठण्ड, शूल, कम्पन को दूर करने
के लिए आग का सेक; स्तम्भक पदार्थों में जल; प्यास की अधिकता को कम
करने के लिये मिट्टी के ढेले या पत्थर को खूब गरम करके बुझाया हुआ पानी
पिलाना; आम रोग को करने वाले कारणों में बहुत अधिक खाना; अग्निवर्धक
वस्तुओं में जाठराग्नि के बलानुसार खाना; सेव्य, उपयोगी वस्तुओं में अपनी

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २८७

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २८७
प्रकृति के अनुसार आहार विहार करना; आरोग्यकारक वस्तुओं में, समय पर
भोजन करना; अनारोग्योत्पादक वस्तुओं में, वेगों का रोकना; मन की प्रसन्नता
करने वालों में मद्य; बुद्धि, धैर्य और स्मृतिनाशक वस्तुओं में, मद्य का अधिक
उपयोग; पचने में कठिन वस्तुओं में, गुरु, गरिष्ठ भोजन; सुगमता से पचाने
वाली वस्तुओं में, एक समय भोजन करना; शोष और क्षय करने वाली वस्तुओं
में, स्त्री संग की अधिकता; नपुंसक करनेवाले कारणोंमें शुक्र के उपस्थित वेग का
रोकना; अन्न में अश्रद्धा पैदा करने वालों में वध्यस्थान; आयु का ह्रास करने
वाले कारणों में न खाना; क्षीण, निर्बल करने वालों में थोड़ा खाना; ग्रहणी
रोग को करने वाले कारणों में अजीर्णावस्था में अध्यशन अर्थात् खाने के ऊपर
खाना; अग्नि को विषम करने वाले कारणों में विषम (ठीक समय पर न खाना)
खाना; कुष्ठ आदि निन्दित रोगों को पैदा करने में विरुद्ध वीर्य (जैसे दूध और
मछली आदि) वस्तुओं का खाना; सब पथ्यों में शान्ति; सब अपथ्यों में परिश्रम
थकान (शक्ति से बाहर परिश्रम करना); व्याधियों में मुख्य वमन, विरेचन,
आहार-विहार का मिथ्यायोग; दारिद्र या अमंगलता के कारणों में रजस्वला
स्त्री के साथ सम्भोग; आयुवर्धक वस्तुओं में ब्रह्मचर्य; वृष्य-वस्तुओं में संकल्प;
अवृष्य वस्तुओं में मन की अप्रसन्नता; प्राणहारक वस्तुओं में बल से बाहर काम
करना; रोग के बढ़ाने में शोक; श्रमनाशक वस्तुओं में स्नान; प्रीणन, पुष्टिकारक
वस्तुओं में प्रसन्नता; सुखाने वाली वस्तुओं में शोक; पुष्ट करने वाली वस्तुओं में
बेफ़िकरी (सन्तोष); नींद लाने वाली वस्तुओं में पुष्टि; आलस्य करने वाली
वस्तुओं में नींद; बलकारक वस्तुओं में सब रसों का अभ्यास, निर्बल करने वालों
में एक ही रस का निरन्तर सेवन; अनाहार्य अर्थात् खींच कर निकालने में
अयोग्य वस्तुओं में गर्भ रूपी शल्य; बाहर निकालने वाली वस्तुओं में अजीर्ण,
कोमल औषधियों के उपचार में बालक; याप्य रोगों में वृद्ध; तीक्ष्ण वेग की औषध
और व्यायाम त्याग करनेवालों में गर्भिणी; गर्भ स्थिर कराने वालों में मन की
प्रसन्नता; दुश्चिकित्स्य रोगों में सन्निपात जन्य रोग; विषम चिकित्सा (कठिन)
व ले रोगों में आमजन्य रोग; सब रोगों में ज्वर; दीर्घ रोगों में कुष्ठ; रोग समूहों
में राजयक्ष्मा; आनुषङ्गिक रोगों में प्रमेह; अनुशस्त्रों में, जोंक, तंत्रों में बस्ति;
औषध-भूमियों में हिमालय, आरोग्य देशों में मरुभूमि; अहितकारी देशों में जल-
प्राय प्रदेश (जैसे बंगाल), रोगी के चारों गुणों में वैद्य के आदेशानुसार काम
करना; चिकित्सा के चारों अंगों में वैद्य; त्याज्य वस्तुओं में नास्तिक; दुःखदायक
कारणों में लोभ; अरिष्ट अर्थात् मृत्यु-कारणों में कहे के अनुसार न चलना; रोग

२८८ चरकसंहिता [ अ० २५
के लक्षणों में मन की दुश्चिन्ता; शोक, सन्देह मिटानेवालों में वैद्यों का समूह
अर्थात् बहुत वैद्यों का होना; वैद्य के गुणों में देश काल के अनुसार चिकित्सा
करना; ओषधियों में यथार्थ ज्ञान; ज्ञानसाधनों में शास्त्र सहित तर्क; काल ज्ञान
समयानुसार काम करना; व्यवसाय न करना-समय के नाश करने वाले कारणों
में, कर्म का देखना सन्देह को मिटाने वाली वस्तुओं में; भय करनेवाले कार्योंमें
असामर्थ्य; बुद्धि बढ़ाने वाले कारणों में उस विद्या को जानने बालों से बात-
चीत; शास्त्र के तत्त्व को जानने के लिये आचार्य; अमृर्तों में आयुर्वेद, कर्त्तव्य
कार्यों में उत्तम सत्य बचन, सब अहितकारी वस्तुओं में 'असत्य' का सेवन;
सब प्रकार के सुखों में; संन्यास ( सर्वस्व त्याग ) श्रेष्ठ अर्थात् श्रेयस्कर है ॥
भवन्ति चात्र—अग्र्याणां शतमुद्दिष्टं यद् द्विपञ्चाशदुत्तरम् ।
अलमेतद्विकाराणां विघातायोपदिश्यते ॥ ३९ ॥
इस प्रकार से १५२ ( एक सौ बावन ) श्रेष्ठ पदार्थ कहे हैं, ये विकार
अर्थात् रोगों के नाश करने के लिये पर्याप्त हैं ॥ ३६ ॥
समानकारिणो येऽर्थास्तेषां श्रेष्ठस्य लक्षणम् ।
ज्यायस्त्वं कार्यकारित्वेऽवरत्वं चाप्युदाहृतम् ॥ ४० ॥
वातपित्तकफेभ्यश्च यद्यत्प्रशमने हितम् ।
प्राधान्यतश्च निर्दिष्टं यद् व्याधिहरमुत्तमम् ॥ ४१ ॥
एतन्निशाम्य निपुणं चिकित्सां संप्रयोजयेत् ।
एवं कुर्वन् सदा वैद्यो धर्मकामौ समश्नुते ॥ ४२ ॥
पथ्यं पथोऽनपेतं यद्यच्चोक्तं मनसः प्रियम् ।
यच्चाप्रियमपथ्यं च नियतं तन्न लक्षयेत् ॥ ४३ ॥
मात्रा-काल-क्रिया-भूमि-देह-दोष-गुणान्तरम् ।
प्राप्य तत्तद्धि दृश्यन्ते ते ते भावास्तथा तथा ॥ ४४ ॥
तस्मात्स्वभावो निर्दिष्टस्तथा मात्रादिराश्रयः ।
तदपेक्ष्योभयं कर्म प्रयोज्यं सिद्धिमिच्छता ॥ ४५ ॥
जो पदार्थ शरीर के दोषों को समान करते हैं, या समान अवस्था में रहने
देते हैं वे श्रेष्ठ का लक्षण है । इन के कार्य करने की शक्ति से ही श्रेष्ठ और
हीन भेद किये हैं । ( यथा—लोहितशालयः शूकधान्यानां श्रेष्ठतमाः, उदकमा-
श्वासकराणां श्रेष्ठम् ) । इसी प्रकार वात, पित्त, कफ के नाश के लिये जो वस्तु
मुख्य रूप में श्रेष्ठ है और जो रोग को नष्ट करने के लिये उत्तम है, इन को
जानकर चिकित्सा का आरम्भ करना चाहिये । इस प्रकार करने से वैद्य को

अ० २५ ] १६ सूत्रस्थानम् २८६

अ० २५ ] १६ सूत्रस्थानम् २८६
धर्म और काम दोनों मिलते हैं। शरीर और मन के लिये जो प्रिय या हितकर
हों, वे पथ्य हैं और जो शरीर और मन के लिये अप्रिय हों वे अपथ्य हैं, ऐसा
लक्षण नहीं समझना चाहिये । क्योंकि मात्रा (जैसे-घृत पथ्य होते हुए भी
अधिक मात्रा में अपथ्य है), काल (वसन्त में घी अपथ्य है), क्रिया (घृत
विरुद्ध द्रव्य के साथ अपथ्य है), भूमि (जल बहुत देश में अपथ्य है)। देह
(अतिस्थूल शरीर में घी अपथ्य है), दोष (कफ दोष में घी अपथ्य है) से
भेद हो जाता है। इसी प्रकार विष भी पथ्य हो जाता है (यथा—'उदरे
विषं तिलं दद्यात्।' उदर रोगों में तिलमात्र विष देना चाहिये)। इस प्रकार
पथ्य वस्तु अपथ्य हो जाती है और अपथ्य वस्तु पथ्य बन जाती है, इसलिये
जो वैद्य यश की इच्छा करते हों, उन को वस्तु के स्वभाव, प्राकृतिक गुण और
मात्रा, काल आदि का विचार करके प्रयोग करना चाहिये ॥ ४०-४५ ॥
तदात्रेयस्य भगवतो वचनमनुनिशम्य पुनरपि भगवन्तमात्रेयमग्नि-
वेश उवाच—यथोद्देशमभिनिर्दिष्टः केवलोऽयमर्थो भगवता श्रुतस्त्व-
स्माभिः । आसवद्रव्याणामिदानीं लक्षणमनतिसंक्षेपेणोपदिश्यमानं
शुश्रूषामह इति ॥ ४६ ॥
आत्रेय ऋषि के वचन को सुनकर फिर भी अग्निवेश भगवान् आत्रेय मुनि
से पूछने लगे। हे महाराज ! आपने प्रतिज्ञानुसार पथ्यापथ्य का प्रधान विषय
सम्पूर्ण रूप से प्रतिपादन कर दिया है। इस समय आसव द्रव्यों के लक्षणों को
विस्तार में आपसे सुनना चाहते हैं ॥ ४६ ॥
तमुवाच भगवानात्रेयः—धान्य-फल-मूल-सार-पुष्प-काण्ड-पत्र-त्वचो
भवन्त्यासवयोनयोऽग्निवेश ! संग्रहेणाष्टौ शर्करा नवमीकाः, तास्वेव द्रव्य-
संयोगकरणतोऽपरिसंख्येयासु यथापथ्यतमानामासवानां चतुरशीतिं
निबोध । तद्यथा—सुरा-सौवीर-तुषोदक-मैरेय-मेदक-धान्याम्लाः षड्
धान्यासवा भवन्ति, मृद्वीका-खर्जूर-काश्मर्य-धन्वन-राजादन-तृणशून्य-
परूषकाभयामलक-मृगलिण्डिका-जाम्बव- कपित्थ-कुवल - बदर-कर्कन्धु-
पीलु-प्रियाल-पनस-न्यग्रोधाश्वत्थ-प्लक्ष-कपीतनोदुम्बराजमोद-शृङ्गाटक-
शङ्खिनीभिः फलासवाः पञ्चविंशतिः। विदारिगन्धाश्वगन्धा-कृष्णगन्धा-
शतावरी - श्यामा - त्रिवृद्दन्ती - बिल्बोत्थुबुक - चित्रक - मूलैरेकादश
मूलासवाः। शालप्रियकैकवकर्ण-चन्दन-स्यन्दन-खदिर - कदर-सप्तप-
र्णार्जुनासनारिमेद-विन्दुक-किणिही-शमी-शुक्ति-शिंशपा-शिरीष-वञ्जुल -
धन्वन-मधूकैः सारासवा विंशतिः। पद्मोत्पल-नलिन-कुमुद-सौगन्धिक-

पुण्डरीक-शतपत्र-मधूक-प्रियङ्गु-धातकीपुष्पैर्दश पुष्पाप्तवा भवन्ति । इक्षु-
काण्डेक्ष्विक्षुबालिका-पुण्ड्रक-चतुर्थाः काण्डाप्तवा भवन्ति । पटोल-ता-
डपत्रासवौ द्वौ भवतः । तिल्वक-लोध्रैलबालुक-क्रमुक-चतुर्थास्त्वगासवा
भवन्ति, शर्करासब एक एवेति । एवमेषामासवानां चतुरशीतिः परस्प-
रेणासंस्पृष्टानामासवद्रव्याणामुपनिर्दिष्टा भवति । एषामासवानामासु-
तत्त्वादासकसंज्ञा । द्रव्य-संयोग-विभागस्त्वेषां बहुविकल्पः संस्कारश्च ।
यथास्वं योनिसंस्कारसंस्कृताश्चाऽऽसवाः स्वकर्म कुर्वन्ति । संयोग-
संस्कार-देश-काल-स्थापन-मात्रादयश्च भावास्तेषां तेषामासवानां ते ते
समुपदिश्यन्ते तत्तत्कार्यमभिसमीक्ष्येति ॥ ४७ ॥
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश ! संक्षेप से उन सब
के उत्पत्ति स्थान ६ ( नौ ) हैं । यथा— धान्य, फल, मूल, सार, पुष्प, काण्ड,
पत्र, त्वचा, (छाल) और शर्करा । इन्हीं में द्रव्यसंयोग (मिश्रण), करण
(संस्कार) द्वारा असंख्येय आसव बन जाते हैं । इनमें अधिक हितकारी (मुख्य)
आसव २४ ( चौबीस ) हैं । उनको कहते हैं—
सुरा, सौवीरक, तुषोदक, मैरेय और मेदक और धान्याम्ल—ये छः धान्या-
म्बुक (कांजी) आसव होते हैं १ । द्राक्षा, खजूर, गम्भारी, धान्वन, राजादन
(खिरनी), तृणशून्य (केतकी), परूषक (फालसा), अभया (हरड़),
आमलक (आंवला), मृगलिण्डिका (बहेड़ा ?), जाम्भव (जामुन), कपित्थ
(कैथ), कुवल (बड़ा बेर), बदर (छोटा बेर), कर्कन्धु (झाड़ी का बेर),
पीलु, पियालु (प्याल), पनस (कटहल), न्यग्रोध (बड़), अश्वत्थ (पीपल),
प्लक्ष (पिलखन), कपीतन, उदुम्बर (गूलर), अजमोद (अजवायन),
शृङ्गाटक (सिंघाड़ा), और शंखिनी, ये छब्बीस फलासव हैं । विदारीगन्धा
(शालपर्णी), अश्वगन्धा (असगन्ध), कृष्णागन्धा (शोभाञ्जन), शतावरी,
निशोथ, जमाल गोटा, द्रवन्ती (मुगलई ऐरण्ड), बेलगिरी, एरण्डमूल, चीतामूल,
ये ग्यारह मूलासव हैं । बड़ासाल, अश्वकर्ण (साल भाग), चन्दन, तीनस,
खैर, सफेद खैर, सलवन, अर्जुन, असन, अरिमेद (विट् खदिर), तिन्दुक,
किणिही (अपामार्ग), शमी (जंड), शुक्ति (बेर), शीशम, सिरस, अशोक,
| धान्वन और मुलेहठी ये बीस 'सारासव' है । पद्म (लाल आठ पत्तों वाला),
उत्पल (नील कमल), कुमुद, सौगन्धिक, पुण्डरीक, (श्वेत कमल), शतपत्र_


१. सौवीरं निष्तुषयवकृतम्, मैरेयं सुरासवकृता सुरा, मेदकः श्वेतसुर
जगलाख्या, धान्याम्बु (काञ्जि) ।

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २६१

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २६१
कमल, मधूक ( महुवे के फूल ), प्रियंगु, धाय के पुष्प, ये दस 'पुष्पासव' हैं ।
गन्ना, इक्षुवालिका ( गन्ने के ऊपर का भाग ), गन्ने की जड़, पौण्डा ये चार
'काण्डासव' हैं । परवल और ताड़ के पत्ते ये दो 'पत्रासव' होते हैं । तिल्वक
( शाबर लोध ), लोध ( पठानी लोध ), एलवालुक, क्रमुक ये चार 'त्वगासव'
हैं । शर्करासव एक ही है । इस प्रकार एक एक द्रव्य से बनने वाले ये ८४
( चौरासी ) आसव हैं । आसुत अर्थात् सत के खिंच जाने से इन को
'आसव' कहते हैं । द्रव्यों के संयोग और विभाग से ये बहुत प्रकार के और
असंख्य बन जाते हैं । आसव अपने संयोग तथा संस्कार के अनुसार अपना कार्य
करते हैं । संयोगसंस्कार से अभिप्राय देश ( भस्मराशि, धान्यराशि ), काल
( पन्द्रह दिन, एक मास ), स्थापन ( सन्धान ), मात्रा आदि ( द्रव्यस्वभाव )
से है । कार्य की अपेक्षा से ही आसवों के संयोग संस्कार रूपी कार्य किये
जाते हैं ॥ ४७ ॥
भवति चात्र-मनःशरीराग्नि-बल-प्रदानाम्स्वप्न-शोकारुचि-नाशनानाम् ।
संहर्षणानां प्रवरासवानांमशीतिरुक्ता चतुरुत्तरैषा ॥ ४८ ॥
तत्र श्लोकः—
शरीररोगप्रकृतौ मतानि तत्त्वेन चाऽऽहारविनिश्चयो यः ।
उवाच यज्जःपुरुषादिकेऽस्मिन्मुनिस्तथाऽग्र्याणि वरासवांश्च ॥ ४९ ॥
मन, शरीर, अग्नि को बल देनेवाले, नींद न आना, शोक और अरुचि को
मिटाने वाले, मन में प्रसन्नता करने वाले ये उत्तम ( श्रेष्ठ ) ८४ आसव कह
दिये । शरीर एवं रोगों की उत्पत्ति, ऋषियों के मत, आहार की हिताहित-विधि
का अन्तिम सार, पथ्यापथ्य और श्रेष्ठ आसव इस अध्याय में कह दिये हैं।
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने अन्नपानचतुष्के
यज्जःपुरुषीयोऽध्यायः पञ्चविंशतितमः समाप्तः ॥
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षड्विंशोऽध्यायः ।
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अथात आत्रेयभद्रकाप्यीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब 'भद्रकाप्यीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने
कहा था ॥ १-२ ॥

२६२ चरकसंहिता [ अ० २६

आत्रेयो भद्रकाप्यश्च शाकुन्तेयस्तथैव च ।
पूर्णाक्षश्चैव मौद्गल्यो हिरण्याक्षश्च कौशिकः ॥ ३ ॥
यः कुमारशिरा नाम भरद्वाजः स चानघः ।
श्रीमान् वार्योविदश्चैव राजा मतिमतां वरः ॥ ४ ॥
निमिश्च राजा वैदेहो बडिशश्च महामतिः ।
काङ्कायनश्च बाह्लीको बाह्लीकभिषजां वरः ॥ ५ ॥
एते श्रुतवयोवृद्धा जितात्मानो महर्षयः ।
वने चैत्ररथे रम्ये समीयुर्विजिहीर्षवः ॥ ६ ॥
तेषां तत्रोपविष्टानामित्यर्थवती कथा ।
बभूवार्थविदां सम्यग्रसाहारविनिश्चये ॥ ७ ॥
आत्रेय, भद्रकाप्यीय, शाकुन्तेय, पूर्णाक्ष, मौद्गल्य, हिरण्याक्ष, कौशिक,
भरद्वाज कुमारशिर, विद्वच्छ्रेष्ठ वार्योविद, वैदेहमहाराज निमि, महाराज बडिश,
बाह्लीक देशी भिषजों में श्रेष्ठ बाह्लीक (बलख देशीय), कांकायन ये ज्ञानवृद्ध
वयोवृद्ध और जितेन्द्रिय महर्षि चैत्ररथ नामक सुन्दर वन में बिहार करते थे ।
वहां इन के एक साथ बैठने पर रस द्वारा आहार के निर्णय करने के लिये
आपस में गोष्ठी आरम्भ हुई ॥३-७॥
एक एव रस इत्युवाच भद्रकाप्यो यं पञ्चानामिन्द्रियार्थानामन्य-
तमं जिह्वावैषयिकं भावमाचक्षते कुशलाः, स पुनरुदकानन्य इति । द्वौ
रसाविति शाकुन्तेयो ब्राह्मणश्छेदनीयश्चोपशमनीयश्चेति । त्रयो रसा
इति पूर्णाक्षो मौद्गल्यश्छेदनीयोपशमनीयौ साधारणश्चेति । चत्वारो
रसा इति हिरण्याक्षः कौशिकः स्वादुहितश्च स्वादुरहितश्चास्वादुर्हि-
तश्चेति । पञ्च रसा इति कुमारशिरा भरद्वाजो भौमोदकाग्नेयवायवी-
यान्तरिक्षाः । षडूसा इति निमिर्वैदेहो मधुरारम्ल-लवण-कटुक-तिक्त-कषाय-
क्षाराः । अष्टौ रसा इति बडिशो धामार्गवो मधुरारम्ल-लवण-कटु-तिक्त-क-
षाय-क्षाराव्यक्ताः । अपरिसंख्येया रसा इति काङ्कायनो बाह्लीक-भिष-
क्,आश्रय-गुण-कर्म-संस्वाद-विशेषाणामपरमेयत्वात् ॥ ८ ॥
भद्रकाप्य ऋषि बोले कि—'रस' एक ही है जिसको कि पांचों इन्द्रियों
के विषयों में से एक जिह्वा का ही विषय कहते हैं, वह 'रस' पानी से अभिन्न है
और एक ही है । शाकुन्तेय ब्राह्मण ने कहा कि—'रस' दो हैं, एक छेदनीय और
दूसरा उपशमनीय (अर्थात् अपतर्पण-कारक और बृंहणकारक) । पूर्णाक्ष मोद्गल्य
ऋषि बोले कि—तीन रस हैं । यथा—छेदनीय, उपशमनीय और साधारण अर्थात्
आग्नेय और सौम्य गुणों की समानता से लंघन, बृंहण दोनों कार्य करने वाला । हिर-