चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
सप्तविधं चाऽऽहुर्भिषजो वातादिविकल्पात् ॥ १५ ॥
४१८ चरकसंहिता [ अ० १
प्रकार की चिकित्सा की जाती है, क्योंकि ज्वर एक ही प्रकार का है। इस
प्रकार से ज्वर के आठ प्रकार कह दिये हैं ॥१४॥
ज्वरस्त्वेक एव संतापलक्षणः। तमेवाभिप्रायविशेषाद् द्विविधमा-
चक्षते। निजागन्तुविशेषाच्च । तत्र निजं द्विविधं त्रिविधं चतुर्विधं
सप्तविधं चाऽऽहुर्भिषजो वातादिविकल्पात् ॥ १५ ॥
ज्वर तो एक ही प्रकार का है। क्योंकि सब प्रकार के ज्वरों में 'सन्ताप'
(गरमी) पाई जाती है। परन्तु अभिप्राय विशेष को लेकर इसके निज
(शारीरिक) और आगन्तुज ये दो भेद लिये जाते हैं। इसमें निजज्वर को
वातादि दोषों की विकल्पना से (संसृष्ट और असंसृष्ट शीत या उष्णभेद से)
दो प्रकार का, (वात आदि दोष भेद से) तीन प्रकार का, (वात, पित्त, कफ
और सन्निपातज भेद से) चार प्रकार का, (दोष जन्य, मिश्रण सन्निपात
भेद से) सात प्रकार का कहा जाता है ॥१५॥
तस्येमानि पूर्वरूपाणि । तद्यथा—मुखवैरस्यं गुरुगात्रत्वमनन्ना-
भिलाषश्चक्षुषोराकुलत्वमस्रागमनं निद्राया आधिक्यमरतिर्जृम्भा विनामो
वेपथुः श्रम-भ्रम-प्रलाप-जागरण रोमहर्ष-दन्तहर्षाः शब्द-शीत-वातातपा-
सहत्वासहत्वमरोचकाविपाको दौर्बल्यमङ्गमर्दः सदनमल्पप्राणता-दीर्घ-
सूत्रताऽऽलस्यमुचितस्य कर्मणो हानिः प्रतीपता स्वकार्येषु गुरूणां वाक्ये-
ष्वभ्यसूया, बालेषु प्रद्वेषः, स्वधर्मेष्वचिन्ता माल्यानुलेपन-भोजन-परि-
क्लेशनं मधुराेषु भक्ष्येषु प्रद्वेषोऽम्ललवणकटुकप्रियता चेति ज्वरपूर्व-
रूपाणि भवन्ति प्राक्सन्तापात्, अपि चैनं सन्तापार्त्तमन्बध्नन्ति ॥ १६ ॥
इत्येतान्येकैकशो ज्वरलिङ्गानि व्याख्यातानि भवन्ति बिस्तरस-
मासाभ्याम् ।
ज्वर के पूर्वरूप—उस ज्वर के पूर्वरूप ये हैं। जैसे-मुख में विरसता,
शरीर में भारीपन, भोजन में अनिच्छा, आंखों में बेचैनी, आंखो से आंसू
बहना; नींद का अधिक आना, १बेचैनी, जंभाई आना, शरीर का मुड़ना २कम्पन,
श्रम, भ्रम, प्रलाप, नींद का न आना, लोमहर्ष, शब्द, गीत, ३ वायु, धूप की
कभी सहन करने की रुचि और कभी सहने में अरुचि का होना; भोजन में
१. 'असृगागमनम्' इति वा पाठः । अर्थात् आंखे लाल हो जाती हैं।
२. 'विराम' इति पाठान्तरम्, अर्थात् मन की उदासीनता ।
३. गीत के स्थान पर 'गीत' पाठान्तर है, वहां गीत अर्थात् संगीत में अनिच्छा ।
अरुचि, अविपाक, दुर्मनाता, अंगों का टूटना, शक्ति का कम हो जाना; अल्प-
प्राणता, दीर्घसूत्रता (काम में आलस्य), आरम्भ किये हुए कार्य में इच्छा का
न होना, अपने किये हुए काम में प्रतिकूलता, गुरुजनों के वाक्यों में अश्रद्धा,
बालकों से द्वेष, अपने कर्त्तव्य में (धर्मकार्य में) बेपर्वाही; फूलों की माला,
चन्दन का लेपन, और भोजन में दुःख मानना; मधुर वस्तुओं से द्वेष, खट्टे-
नमकीन कडुवे पदार्थों की चाह होना,-ये ज्वर के पूर्व रूप हैं संताप से भी पूर्व,
सन्तापयुक्त रोगी में प्रतीत होने लगते हैं। इस प्रकार से ज्वर के लक्षण अलग
अलग विस्तार एवं संक्षेप में कह दिये हैं ॥ १६ ॥
ज्वरस्तु खलु महेश्वर-कोप-प्रभवः सर्वप्राणिनां प्राणहरो देहेन्द्रि-
यमनस्तापकरः प्रज्ञा-बल-वर्ण-हर्षोत्साह-सादनः १, श्रम-क्लम-मोहाहारोप-
रोध-संजननो, ज्वरयति शरीराणि इति ज्वरः, नान्ये व्याधयस्तथा
दारुणा बहुपद्रवा दुश्चिकित्स्याश्च यथाऽयमिति, स सर्वरोगाधिपति-
र्नानातिर्यग्योनिशु बहुविधैः शब्दैरभिधीयते, सर्वप्राणभृतश्च सज्ज्वरा
एव जायन्ते सज्ज्वरा एव म्रियन्ते, स महामोहः, तेनाभिभूता देहिनः
प्राग्दैहिकं कर्म किंचिदपि न स्मरन्ति, सर्वप्राणभृतां च ज्वर एवान्ते
प्राणानादत्ते ॥ १७ ॥
ज्वर का परिणाम—ज्वर महेश्वर के क्रोध से उत्पन्न हुआ है। यह ज्वर
सब प्राणियों का प्राण लेने वाला, इन्द्रिय और मन को ताप (दुःख) देने
वाला; बुद्धि, बल, कान्ति, हर्ष, उत्साह का नाश करने वाला, व्याधि, भ्रम,
क्लान्ति, मोह और क्षुधानास को उत्पन्न करने वाला है।
ज्वर शब्द की निरुक्ति—ज्वर शरीरों को पीड़ित करता है, इसलिये इसको
'ज्वर' कहते हैं। इसके समान कठिन, बहुत उपद्रवयुक्त, चिकित्सा करने में
दुःसाध्य और दूसरा रोग नहीं हैं। ज्वर ही सब रोग का अधिपति है। नाना-
प्रकार के पशु पक्षियों में अनेक प्रकार के शब्दों से कहा जाता है। २ सब
प्राणी ज्वर के साथ उत्पन्न होते हैं और ज्वर के साथ ही मरते हैं। ज्वर महा-
मोह स्वरूप है, इसलिये इस ज्वर से आक्रान्त होने से पूर्वजन्म (पूर्व शरीर) के
किसी भी कर्म का स्मरण नहीं करता। यह ज्वर ही सब प्राणियों के प्राणों का
हरण करता है ॥ १७ ॥
१. 'त्साहह्रासकरः' इति पाठः। २. यथा—हाथियों में होने वाले ज्वर को
'पाकल', गायों में होने वाले ज्वर को 'खेरिक', मछलियों के ज्वर को 'इन्द्र-
ताल', पक्षियों के ज्वर को 'भ्रामरक' कहते हैं।
४२० चरकसंहिता [ अ० १
तत्र पूर्वरूपदर्शने ज्वरादौ वा हितं लघ्वशनमतर्पणं वा ज्व-
रस्याऽऽमाशयसमुत्थत्वात् ततः कषायपानाभ्यङ्ग-स्वेद-प्रदेह-परिषेकानुले-
पन-वमन-विरेचनाऽऽस्थापनअनुवासनोपशमन-नस्तःकर्म-धूप-धूमपाना-
ञ्जन-क्षीरभोजन-विधानं च यथास्वं युक्त्या प्रयोज्यम् ।
ज्वर के चिकित्सा सूत्र—ज्वर के पूर्व रूप होने पर अथवा ज्वर के प्रारम्भ
में ही हलका अन्न सेवन करना अथवा लंघन करना चाहिये । क्योंकि ज्वर
आमाशय से उत्पन्न होता है । इसके अनन्तर कषाय ( क्वाथ ) अभ्यंग, स्वेद
प्रदेह ( लेप ), परिषेक, अनुलोमन ( वात को अनुकूल करने की क्रिया ),
वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासनबस्ति, कर्म उपशमन, नस्यकर्म, धूपन,
धूमपान, अंजन और दूध भोजन की कल्पना, यथायोग्य उपयोग करना चाहिये ॥
जीर्णज्वरेषु तु सर्वेष्वेव सर्पिषः पानं प्रशस्यते, यथास्वौषधसिद्धस्य
सर्पिर्हि स्नेहाद्वातं शमयति, संस्कारात्कफं, शैत्यात्पित्तमूष्माणं च ।
तस्माज्जीर्णज्वरेषु तु सर्वेष्वेव सर्पिर्हितमुदकमिवाग्निप्लुतेषु द्रव्येष्विति १८
जीर्णज्वर में घृतपान—सब प्रकार के जीर्ण ज्वरों में घी का पान करना
प्रशस्त है । इसके लिये योग्य रीति से ओषधियों द्वारा सिद्ध किया घी काम में
लाना चाहिये । चिकना होने से घी वायु का शमन करता है, भिन्न २ ओष-
धियों के संस्कार से कफ को शीतलता से पित्त और उष्मा को शान्त करता है ।
इसलिये सब प्रकार के जीर्णज्वरो में घी ऐसा ही हितकारक होता है जिस प्रकार
कि आग से जलते हुए पदार्थों के लिये पानी हितकारक है ॥१८॥
भवन्ति चात्र—यथा प्रज्वलितं वेश्म परिषिञ्चन्ति वारिणा ।
नराः शान्तिमभिप्रेत्य तथा जीर्णज्वरे घृतम् ॥ १९ ॥
स्नेहाद्वातं शमयति, शैत्यात्पित्तं नियच्छति ।
घृतं तुल्यगुणं दोषं संस्कारात्तु जयेत्कफम् ॥ २० ॥
नान्यः स्नेहस्तथा कश्चित्संस्कारमनुवर्तते ।
यथा सर्पिरतः सर्पिः सर्वस्नेहोत्तमं मतम् ॥ २१ ॥
संस्कारसिद्ध घृत—जिस प्रकार आग से जलते हुए घर को बुझाने के लिये
मनुष्य पानी डाला करते हैं, उसी प्रकार जीर्णज्वर में घृत का उपयोग उत्तम है
घी स्नेह गुण से वायु को, शीतगुण से पित्त को तथा जिस ओषधि से सिद्ध
किया जाता है उस ओषधि का गुण लेकर कफ को शान्त करता है ।
घृत की श्रेष्ठता—जिस प्रकार घी दूसरी दवाईयों के गुण अपने में ग्रहण
अ० २ ] निदानस्थानम् ४२१
करके संस्कारयुक्त हो जाता है उस प्रकार और कोई अन्य स्नेह पदार्थों के
गुण ग्रहण नहीं करता। इसलिये सब स्नेहों में घी ही श्रेष्ठ है ॥१६-२१॥
गद्योक्तो यः पुनः श्लोकैरर्थः समनुगीयते ।
तद्व्यक्तिव्यवसायार्थं द्विरुक्तं तन्न गर्ह्यते ॥ २२ ॥
जो अर्थ गद्यरूप में कहा गया है, उसी को श्लोक रूप में कहते हैं।
इसमें पुनरुक्त दोष नहीं है। क्योंकि गद्य में कहे हुए विषय को ही पुनः और
अधिक स्पष्ट और दृढ़ करने के लिये पद्य में कहा जाता है ॥२२॥
तत्र श्लोकाः—त्रिविधं नामपर्यायैर्हेतुं पञ्चविधं गदम् ।
गदलक्षणपर्यायान् न्यायाः पञ्चविधं ग्रहम् ॥ २३ ॥
ज्वरमष्टविधं तस्य प्रकृष्टासन्नकारणम् ।
पूर्वरूपं च रूपं च भेषजं संग्रहेण च ॥ २४ ॥
व्याख्यातवान् १ ज्वरस्याग्रे निदाने विगतज्वरः ।
भगवानग्निवेशाय प्रणताय पुनर्वसुः ॥ २५ ॥
रोगों के तीन प्रकार के हेतु, पर्यायवाचक शब्द, पांच प्रकार के रोग,
इनके लक्षण, पर्यायवाचक शब्द, रोगों के पांच प्रकारों का संग्रह, ज्वर के
आठ भेद, इसके समीप एवं दूरवर्ती कारण, ज्वर के पूर्वरूप, रूप और
औषध का संक्षेप में वर्णन, ये सब विषय 'ज्वर-निदान' नामक अध्याय में
विनीत अग्निवेश को भगवान् पुनर्वसु ने उपदेश किये।
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने ज्वरनिदानं
नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
अथातो रक्तपित्तनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब रक्तपित्त निदान का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने
कहा था ॥ १-२ ॥
पित्तं यथा भूतं लोहितपित्तमिति संज्ञां लभते तथाऽनुव्याख्या-
स्यामः। यदा जन्तुर्यवकोद्दालक-कोरदूषक-प्रायाण्यन्नानि भुङ्क्ते भृशोष्ण-
१. 'व्याजहार' इति पाठः ।
४२२ चरकसंहिता [ अ० २
तीक्ष्णमपि चान्नमजातं निष्पाव-माष-कुलत्थ-क्षार-सूपोपहितं दधि-
मण्डोदश्वित्कट्वराम्ल-काञ्जिकोपसेकं वाराह-माहिषाविक-मात्स्य-गाव-
पिशित-पिण्याक-पिण्डालु-शुष्क-शाकोपहितं मूलक-सर्षप-लशुन-करञ्ज-
शिग्रु-मधुशिग्रु-खडयूष-भूस्तृण-सुमुख-सुरस-कुठेर-गण्डीर-कालमानक-
पर्णास-क्षवक-फणिज्जकोपदंशं सुरासौवीरक-तुषोदक-मैरेय-मेदक-मधूल-
क-शुक्त-कुवल-बदराम्ल-प्रायानुपानं पिष्टान्ननोत्तरभूयिष्ठमुष्माभितप्तो
वाऽतिमात्रमतिवेलं पयः पिबति पयसा वा समश्नाति रौहिणीकं काण-
कपोतं वा सर्षपतैलक्षारसिद्धं कुलत्थ-पिण्याक-जाम्बव-लकुच-पक्कैः
शौक्तिकैर्वा सह क्षीरमाममतिमात्रमथवा पिबत्युष्माभितप्तस्तस्यैवमा-
चरतः पित्तं प्रकोपमापद्यते, लोहितं च स्वप्रमाणमतिवर्तते, तस्मिन्
प्रमाणातिप्रवृत्ते पित्तं प्रकुपितं शरीरमनुसर्पद्यदैव यकृत्प्लीहप्रभवाणां
लोहितवहानां स्रोतसां लोहिताभिष्यन्दगुरूणि मुखान्यासाद्य प्रति-
रुन्ध्यात् तदैव लोहितं दूषयति ॥ ३ ॥
जिस प्रकार से पित्त को 'रक्तपित्त' कहते हैं, उसकी व्याख्या करते हैं ।
जब मनुष्य यवक (ब्रीहि-विशेष), उद्दालक (वनकोद्रव) कोरदूष, इनमें
मिले खान-पान के अति सेवन से, अथवा दूसरे कोई अति उष्ण या तीक्ष्ण
गुण वाले अन्न के सेवन करने से, अथवा पूए, उड़द, कुलथी, दालें, क्षारयुक्त
पदार्थों के सेवन से, दही, दधिमण्ड (मस्तु), उदश्वित् (आधा जल मिश्रित
तक्र), कट्वर (बिना पानी का तक्र या खट्टी छाछ), अम्लकांजी (खट्टी
कांजी), सूअर, भैंस, भेड़, मछली और गाय के मांस के सेवन से, पिण्याक
(फेणी) पिण्डालु, कचालु शुष्क शाक (सूखे शाक) से युक्त अन्न पान के
सेवन से, मूली, सरसों, लशुन, करञ्ज, सहजन, मधुशिग्रु (मीठा सहजन),
खडयूष (कढी आदि), भूस्तृण (रोहिष तृण), सुमुख, सुरस, कुठेर,
गण्डीर, कालमानक, पर्णास, क्षवक और फणिज्जक (सब तुलसी के भेद)
इनके सेवन से, सुरा, सौवीर (कांजी), तुषोदक, मैरेय, मेदक, मधूलक
(महुवे की शराब), शुक्त (सिरका आदि), कुवल (बड़ा बेर), बेर अथवा
दूसरे खट्टे पदार्थ मिश्रित वस्तुओं के अत्यन्त उपयोग करने से, अधिक उष्णिमा
में रहने के पीछे अथवा पिष्टी युक्त अन्न के खाने के उपरान्त बार बार पानी
के पीने से, अथवा दूध के साथ रोहतक शाक या कबूतर का मांस, सरसों के
तेल अथवा क्षार में सिद्ध किये हुए पदार्थों के खाने से, अथवा कुलथी, उड़द,
पिण्याक, जामुन, बड़हल आदि पके हुए फलों के साथ कांजी या कच्चा दूध