चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
चिकित्सा करना और न करना दोनों बराबर हैं ॥४॥
बहुत से चिकित्सा करने पर भी मर जाते हैं, बहुत चिकित्सा न करने पर भी
स्वस्थ हो जाते हैं, और न करने पर भी मर जाते हैं, अतः सन्देह होता है कि
चिकित्सा करना और न करना दोनों बराबर हैं ॥४॥
मैत्रेय ! मिथ्या चिन्त्यत इत्यात्रेयः । किं कारणम् ? ये ह्यातुराः
षोडशगुणसमुदितेनानेन भेषजेनोपपद्यमाना म्रियन्त इत्युक्तं तदनुपप-
न्नम्, न हि भेषजसाध्यानां व्याधीनां भेषजमकारणं भवति । ये पुनरा-
तुराः केवलाद्भेषजादृते समुत्तिष्ठन्ते न तेषां संपूर्णभेषजोपपादनाय
समुत्थानविशेषो नास्ति । यथा हि पतितं पुरुषं समर्थमुत्थानायोत्था-
पयन् पुरुषो बलमस्यापादद्योत् , स क्षिप्रतरमपरिक्लिष्ट एवात्तिष्ठेत्तद्व-
त्संपूर्णाभेषजोपलम्भादातुराः ! ये चाऽऽतुराः केवलादुपजादपि म्रियन्ते,
न च सर्व एव ते भेषजोपपन्नाः समुत्तिष्ठेरन्, न हि सर्व व्याधयो
भवन्त्युपायसाध्याः, न चापायसाध्यानां व्याधीनामनुपायेन सिद्धिरस्ति,
न चासाध्यानां व्याधीनां भेषजसमुदायोऽयमस्ति । न ह्यलं ज्ञानवान्
भिषङ्मुमूर्षुमातुरमुत्थापयितुम् । परीक्ष्यकारिणो हि कुशला भवन्ति ।
यथा हि योगज्ञाऽभ्यासनित्य इष्वासो धनुरादायेषुमरास्यन्नातिविप्रकृष्टे
महति काये नापराधवान् भवति सम्पादयति चेष्टकार्यम्, तथा भिषक्
स्वगुणसंपन्न उपकरणवान् वीक्ष्य कर्माऽऽरभमाणः साध्यरोगमनपराधः
संपादयत्येवाऽऽतुरमारोग्येन, तस्मान्न भेषजमभेषजेनाविशिष्टं भवति ॥५॥
आत्रेय भगवान् इसका उत्तर देते हैं कि हे मैत्रेय ! तुम्हारा ऐसा विचार
करना ठीक नहीं है । क्योंकि, रोगी सोलह गुणों से युक्त चिकित्सा करने पर भी
स्वस्थ नहीं होते, मर जाते हैं, यह कथन ठीक नहीं है । क्योंकि चिकित्सा से
अच्छे होने वाले रोगों में चिकित्सा निष्फल नहीं होती, और जो रोगी औषध-
चिकित्सा के बिना भी स्वस्थ हो जाते हैं, उनमें चिकित्सा के पूर्ण कारणों के
होने की आवश्यकता भी नहीं होती । जैसे गिरे हुए मनुष्य को जो कि अपने
आप उठने में समर्थ है, उठाने के लिये दूसरा पुरुष सहायता देता है, तब वह
जल्दी, बिना कष्ट के ही खड़ा हो जाता है । इस प्रकार सम्पूर्ण (सोलह गुणों
से युक्त) चिकित्सा प्राप्त होने से रोगी स्वस्थ हो जाते हैं । जो रोगी सम्पूर्ण
चिकित्सा के मिलने पर भी मर जाते हैं वे सब रोगी भी सोलह गुण युक्त
चिकित्सा से स्वस्थ नहीं हो सकते, क्योंकि सब रोग उपाय से साध्य नहीं हैं
(उन से रोग असाध्य भी हैं) और जो रोग उपाय से अच्छे होने वाले हैं वे
उपाय के अच्छे भी नहीं होते । इसी प्रकार जो रोगी असाध्य हैं उन को
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सारा औषध-समुदाय भी ठीक नहीं कर सकता। ज्ञानवान् वैद्य भी मरणासन्न
रोगी को स्वस्थ करने में समर्थ नहीं होता। जो वैद्य साध्य-असाध्य का विचार
करके चिकित्सा का प्रारम्भ करते हैं वे कुशल चिकित्साकार्य में सफल, यशस्वी
होते हैं। जिस प्रकार कि प्रयोग विधि को जानने वाला, अभ्यासी धनुर्धारी
धनुष को लेकर बहुत दूर के नहीं, प्रत्युत समीपवर्ती स्थूल लक्ष्य पर बाण फेंकता
हुआ नहीं चूकता लक्ष्य वेध कर ही लेता है, इसी प्रकार वैद्य अपने गुणों से
युक्त, उपकरणवान्, साधनवान्, साध्य-असाध्य का विचार करके काम आरम्भ
करके, रोगी के साध्य रोग को स्वस्थ कर देता है, इसमें भूल नहीं करता, इस
लिये कहते हैं कि चिकित्सा करना और न करना दोनों समान नहीं हैं ॥ ५ ॥
इदं चेदं च नः प्रत्यक्षं यदनातुरेण भेषजेनाऽऽतुरं चिकित्सामः, क्षाम-
मक्षामेण, कृशं च दुर्बलमाप्याययामः, स्थूलं मेदस्विनमपतर्पयामः,
शीतेनोष्णाभिभूतमुपचरामः शीताभिभूतमुष्णेन, न्यूनान् धातून् पूर-
यामः, व्यतिरिक्तान् ह्रासयामः, व्याधीन् मूलविपर्ययेणोपचरन्तः सम्यक्
प्रकृतौ स्थापयामः, तेषां नस्तथा कुर्वतामयं भेषजसमुदायः कान्ततमो
भवति ॥ ६ ॥
और यह हमारा प्रत्यक्ष भी है कि रोगी की हम रोगों की प्रकृति से विपरीत
गुण वाली औषध से चिकित्सा करते हैं, क्षीणधातु वाले व्यक्ति की पौष्टिक
औषधियों से चिकित्सा करते हैं, (कृश) पतले-दुबले को मोटा बनाते हैं, स्थूल
चर्बी वाले पुरुष को पतला (कृश) करते हैं, गरमी से पीड़ित व्यक्ति की शीतल
चिकित्सा करते हैं, शीत से पीड़ित व्यक्ति की उष्ण पदार्थों से चिकित्सा करते
हैं, कम हुए धातुओं को पूर्ण करते हैं, परिमाण से अधिक बढ़े हुए धातुओं को
कम करते हैं, रोगों की कारण के विपरीत विरुद्ध चिकित्सा करते हुए दोषों को
प्रकृति में भली प्रकार से स्थित करते हैं। रोगी पुरुषों के लिये ऐसा करते हुए ये
भैषज्य-समुदाय अर्थात् सोलह गुणयुक्त चिकित्सा व्याधिनाशक और सुखकारी
होती है ॥ ६ ॥
भवन्ति चात्र—
साध्यासाध्यविभागज्ञो ज्ञानपूर्वं चिकित्सकः ।
काले चाऽऽरभते कर्म यत्तत् साधयति ध्रुवम् ॥ ७ ॥
अर्थ-विद्या-यशो-हानिमुपक्रोशमसंप्रहम् ।
प्राप्नुयान्नियतं वैद्यो योऽसाध्यं समुपाचरेत् ॥ ८ ॥
इसमें श्लोक हैं—
रोग के साध्य और असाध्य रूप को एवं साध्य असाध्य के गु...