चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ८ ] ३७ विमानस्थानम् ५७७
अ० ८ ] ३७ विमानस्थानम् ५७७
यथा-संशोधनसाध्योऽयं व्याधिरित्युक्ते किं वमनसाध्यः किं वा
विरेचनसाध्यः ? इत्यनुयुज्यते ॥ ५० ॥
अनुयोज्य-जो वाक्य वाक्य के न्यून आदि दोषों से युक्त होता है, उसका
नाम अनुयोज्य है। क्योंकि इस प्रकार का दोषयुक्त वाक्य प्रयुक्त नहीं किया
जा सकता । अथवा सामान्य रूप में कहे हुए वाक्यार्थ में विशेष ग्रहण के लिये
जो वाक्य कहा जाता है, वह भी अनुयोज्य होता है। यथा-यह रोग संशोधन
से साध्य है, ऐसा कहने पर वमनसाध्य है या विरेचनसाध्य है। यह और भी
वक्तव्य शेष रह जाने से 'अनुयोज्य' है ॥ ५० ॥
अथाननुयोज्यं—अननुयोज्यं नामातो विपर्ययेण; यथा—अयम-
साध्यः ॥ ५१ ॥
अननुयोज्य — अनुयोज्य के विपरीत-वाक्यदोष से रहित वचन को 'अननु-
योज्य' कहते हैं। यथा- यह रोग असाध्य है ॥ ५१ ॥
अथानुयोगः- अनुयोगो नाम यत्तद्विद्यानां तद्विद्यैरेव सार्धं तन्त्रे
तन्त्रैकदेशे वा प्रश्नः प्रश्नैकदेशो वा ज्ञान-विज्ञान-वचन-प्रतिवचन-परी-
क्षार्थमादिश्यते । यथा नित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञाते, यत्परः को हेतुरि-
त्याह सोऽनुयोगः ॥ ५२ ॥
अनुयोग—विशेष विद्या वाले पुरुष का उसी (एक समान) विद्या वाले
पुरुष के साथ ज्ञान, विज्ञान, प्रतिवचन शक्ति की परीक्षा के लिये सम्पूर्ण उसी
शास्त्र में अथवा उस शास्त्र के किसी एक भाग में प्रश्न करना 'अनुयोग' कहाता
है। जैसे—एक ने प्रतिज्ञा की—पुरुष नित्य है। दूसरे ने पूछा—इसमें हेतु
क्या है ? यह कहना अनुयोग है ॥ ५२ ॥
अथ प्रत्यनुयोगः -प्रत्यनुयोगो नामानुयोगस्यानुयोगः; यथा—
अस्यानुयोगस्य पुनः को हेतुरिति ॥ ५३ ॥
प्रत्यनुयोग—अनुयोग का अनुयोग करना प्रत्यनुयोग है। जैसे—एक ने
प्रतिज्ञा की-पुरुष नित्य है, दूसरे ने प्रश्न किया इसमें क्या हेतु है? इस हेतु में
क्या हेतु है ? ऐसा प्रश्न पर प्रश्न पूछना 'प्रत्यनुयोग है ॥ ५३ ॥
अथ वाक्यदोषः —वाक्यदोषो नाम यथा —खल्वस्मिन्नर्थे न्यूनम-
धिकमनर्थकमपार्थकं विरुद्धं चेति । तत्र प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनि-
गमनानामन्यतमेनापि न्यूनं न्यूनं भवतीति, बहुद्दिष्टहेतुकमेकेन
साध्यते हेतुना तच्च न्यूनम्, एतानि ह्यन्तरेण प्रकृतोऽप्यर्थः प्रनश्येत् ।
वाक्यदोष—वाक्य में विषय की दृष्टि से निम्न दोष होते हैं जैसे—न्यून,
अधिक, अनर्थक, अपार्थक और विरुद्धार्थ।
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न्यून—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन इनमें से किसी एक से
भी न्यून हो तो वह न्यून दोष गिना जाता है। अथवा जो वस्तु बहुत से हेतु
देकर सिद्ध करनी चाहिये, उस वस्तु को केवल एक ही हेतु से सिद्ध किया जाये
तो वह भी 'न्यून' दोष समझना चाहिये।
अथाधिकं—अधिकं नाम यदायुर्वेदे भाष्यमाणे बार्हस्पत्यमौशन-
समन्यद्वा यत्किंचिदप्रतिसंबद्धार्थमुच्यते । यद्वा पुनः प्रतिसंबद्धार्थमपि
द्विरभिधीयते तत्पुनरुक्तत्वादधिकम् । तच्च पुनरुक्तं, द्विविधम् । अर्थ-
पुनरुक्तं शब्दपुनरुक्तं च । तत्रार्थपुनरुक्तं नाम यथा—भेषजमौषधं
साधनमिति, शब्दपुनरुक्तं नाम पुनः भेषजं भेषजमिति ।
अधिक-न्यून से विपरीत हेतु आदि उदाहरण अधिक हों उसको अधिक
कहते हैं। अथवा आयुर्वेद के विषय में बार्हस्पत्य, औशनस आदि अन्य
अप्रासंगिक बातों का कहना, अथवा प्राकृत ( सम्बन्धित ) वस्तु को दो बार
कहना यह भी पुनरुक्त होने से 'अधिक' ही होता है। यह पुनरुक्त दो प्रकार
का है । जैसे—अर्थपुनरुक्त और शब्दपुनरुक्त । इनमें 'अर्थपुनरुक्त' दो प्रकार
का है । जैसे—भेषज, औषध और साधन । 'शब्दपुनरुक्त' जैसे 'भेषज
भेषज' है।
अनर्थकं नाम यद्वचनमक्षरग्राममात्रमेव स्यात्पञ्चवर्गवन्न चार्थतः
गृह्यते ।
अनर्थक— जिनका कहना पंचवर्ग ( ङ ञ ण न म ) के समान केवल
अक्षर समूह ( वर्णमाला ) के रूप में होता है, जिसका कोई अर्थ नहीं निकलता
उसका नाम 'अनर्थक' है।
अथापार्थकं—अपार्थकं नाम यदर्थवच्च परस्परेण चायुज्यमानार्थ-
कम् । यथा—चक्र-नक्र-वंश-वज्र-निशाकरा इति ।
अपार्थक—जब बहुतोंमें से प्रत्येक शब्द अर्थ वाला होकर भी वे सब पर-
स्पर मिलकर किसी भी अर्थ को न बता सकें तब 'अपार्थक' दोष होता है ।
जैसे—चक्र, नक्र, वंश, वज्र, निशाकर आदि । इनमें से प्रत्येक का पृथक् २
अर्थ है, परन्तु मिलने पर कोई संगत अर्थ नहीं निकलता ।
विरुद्धं नाम यद्दृष्टान्तसिद्धान्तसमयैर्विरुद्धं, तत्र दृष्टान्तसिद्धान्ता-
वुक्तौ,समयः पुनस्त्रिधा भवति, यथा—आयुर्वेदिकसमयो याज्ञिकसमयो
मोक्षशाब्दिकसमय इति । तत्रायुर्वेदिक्समयश्चतुष्पादं भेषजमिति,याज्ञि-
कसमयः, आलब्ध्याः पशव इति,सर्वभूतेष्वहिंसेति मोक्षशाब्दिकसमयः ।
तत्र स्वसमयविपरीतमुच्यमानं विरुद्धं भवतीति वाक्यदोषः ॥ ५४ ॥