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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ३ ] सूत्रस्थानम् ३६

अ० ३ ] सूत्रस्थानम् ३६
अथ सातवां योग कहते हैं—
कुष्ठं हरिद्रे सुरसं पटोलं निम्बाश्वगन्धे सुरदारु शिग्रु ।
ससर्षपं तुम्बुरुधान्यवन्यं चण्डां च चूर्णानि समानि कुर्यात् ॥८॥
तैस्तक्रयुक्तैः प्रथमं शरीरं तैलाक्तमुद्वर्तयितुं यतेत ।
तेनास्य कण्डूः पिडकाः सकोठाः कुष्ठानि शोफाश्च शमं व्रजन्ति ॥६॥
कुष्ठ (कूठ), दोनों हल्दी (दारुहल्दी और हल्दी), सुरसा (तुलसी),
पटोल (परवल), निम्ब (नीम के पत्ते), अश्वगन्धा (असमन्ध), सुरदारु
(देवदार), शिग्रु (सहजना), सर्षप (श्वेत सरसों), तुम्बुरु, धान्य (धनिया)
वन्य (कैवर्त्त मुस्ता), चण्डा (चांरक) इन पन्द्रह औषधियों को परस्पर
समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को छाछ में पीसकर शरीर
पर लगाना चाहिए । शरीर पर लगाने से पूर्व तैल का उबटन लगा लेना
चाहिये । इस लेप के लगाने से कण्डू (खाज़), पिडका (छोटी २ फुन्सियां),
कोठ (न दबने वाली फुन्सियां), कुष्ठ कोढ और शोफ (सूजन) नष्ट होते हैं ॥८-६॥
आठवां योग---
कुष्ठामृतासङ्घटकटङ्कटेरीकाशीसकम्पिल्लकलोध्रमुस्ताः
सौगन्धिकं सर्जरसो विडङ्गं मनःशिलाले करवीरत्वक् ॥ १० ॥
तैलाक्तगात्रस्य कृतानि चूर्णान्येतानि दद्यादवचूर्णनार्थम् ।
दद्रुः सकण्डूः किटिभानि पामा विचर्चिका चैव तथेति शान्तिम्॥११॥
कुष्ठ (कूठ), अमृता (गिलोय), संग (नीला तुत्थ), कटंकटेरी (दारु
हल्दी), काशीस (हीरा कसीस), कम्पिल्लक (कमीला), मुस्त (नागर मोथा),
लोध्र (पठानी लोध), सौगन्धिक (, कह्लार पुष्प, सुगन्धि), सर्जरस (राल),
मनःशिला (मैनसिल), आल (हरताल), करवीरत्वक् (कनेर की छाल), इन
चौदह ओषधियों का चूर्ण करके अवचूर्णन (अर्थात् मलने) के लिए देना
चाहिये । प्रथम शरीर पर तैल की मालिश कर लेनी चाहिये । इस से दाद,
कण्डू, खाज़, किटिभ, कुष्ठ, पामा, विसर्प, बिर्चर्चिका स्रावयुक्त फुन्सियां, नष्ट
होती हैं । कोई अमृतासंग एक वस्तु मानकर नीला थोथ अर्थ करते हैं ॥१०-११॥
नवां योग—
मनःशिलाले मरिचानि तैलमार्कं पयः कुष्ठहरः प्रदेहः ।
मनःशिला (मैनसिल), आल (हरताल), मरिच, तैल (सरसों का तेल
कुष्ठहर होने से), 'आर्कंपयस्' (आक का दूध) इनको परस्पर मिला कर लेप
बना कर लगाने से कुष्ठ अच्छा होता है ।

४० चरकसंहिता [ अ० ३
इस योग में पानी को मिलाना नहीं चाहिये, अपितु आक के दूध में ही
सब बनाना चाहिये ।
दसवां योग—
तुत्थं विडङ्गं मरिचानि कुष्ठं लोध्रं च तद्वन् समनःशिलं स्यात् ॥ १२ ॥
तुत्थ ( नीला थोथा ), विडंग (वायविडंग), मरिच (काली मरिच), कुष्ठ
( कूट ), लोध्र (पटानी लोध्र ), मनःशिला (मनसिल) इनके चूर्ण को पूर्व की
भांति आक के दूध में मिलाकर लगाना चाहिये ॥१२॥
ग्यारहवां लेप—
रसाञ्जनं सप्रपुनाडबीजं युक्तः कपित्थस्य रसेन लेपः ।
रसाञ्जन ( रसौंत ), प्रपुनाडबीज ( पनवाड़ के बीज ), इन को कैथ के
पत्तों के रस में मिलाकर लगाने से कुष्ठ रोग नष्ट होता है । पानी का उपयोग
नहीं करना चाहिये ।
बारहवां योग—
करञ्जबीजैडगजं सकुष्ठं गोमूत्रपिष्टं च परः प्रदेहः ॥ १३ ॥
करंज ( नाटा करंज बीज ), ऐडगज ( चक्रमर्द ) और कुष्ठ ( कूट ),
इनको गोमूत्र में पीस कर लेप करने से कुष्ठ नष्ट होता है ॥ १३ ॥
तेरहवां योग—
उभे हरिद्रे कुटजस्य बीजं करञ्जबीजं सुमनःप्रवालान् ।
त्वचं समध्यां हयमारकस्य लेपं तिलक्षारयुतं विदध्यात् ॥ १४ ॥
दोनों प्रकार की हल्दी ( साधारण हल्दी और दारू हल्दी ), कुटज बीज
(इन्द्रजौ), करंज बीज ( करंजुए का बीज ), सुमनःप्रवाल ( चमेली के कोमल
नये पत्ते ), हयमारक ( कनेर ) की अन्दर की त्वचा, और तिल क्षार (तिलकी
नाल का क्षार भस्म) इनका लेप बनाकर लगाने से कुष्ठ रोग मिटता है ॥१४॥
चौदहवां योग—
मनःशिला त्वक्कुटजात्सकुष्ठात् सलोमशः सैडगजः करञ्जः ।
ग्रन्थिश्च भौर्जः करवीरमूलं चूर्णानि साध्यानि तुषोदकेन ॥१५॥
पलाशक्षारोदकरसेन चापि सर्पोद्धृतान्याढकसंमितेन ।
दर्वीप्रलेपं प्रवदन्ति लेपमेतत्परं कुष्ठनिषूदनाय ॥ १६ ॥
मनःसिल, कुटजत्वक् ( कूड़े की छाल ), कुष्ठ ( कूट ) लोमश, ( जटा-
मांसी ), ऐडगज ( चक्रमर्द ), करंज, ( करंजुआ ), भौर्ज ( भोजपत्र की
गांठें ), करवीर (कनेर की जड़), ये आठो द्रव्य प्रत्येक एक एक कर्ष ( दो २