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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ३] विमानस्थानम् ५०७

अ० ३] विमानस्थानम् ५०७
जनपद-नाश के इन कारणों को सुन कर भी अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय
से पूछा—हे भगवन् ! वायु आदि में किस कारण से विगुणता उत्पन्न होती है,
जिस से विकृत होकर ये जनपदों को नाश करते हैं ॥२३॥
तमुवाच भगवानात्रेयः—सर्वेषामप्यग्निवेश ! वाय्वादीनां यद्वैगु-
ण्यमुत्पद्यते तस्य मूलमधर्मः, तन्मूलं वाऽसत्कर्म पूर्वकृतम् । तयोर्योनिः
प्रज्ञापराध एव । तद्यथा—यदा देश-नगर-निगम-जनपद-प्रधाना धर्म-
मुत्क्रम्याधर्मेण प्रजां वर्तयन्ति, तदाश्रितोपाश्रिताः पौरजनपदा व्यवहा-
रोपजीविनश्च तमधर्ममभिवर्धयन्ति, ततः सोऽधर्मः प्रसह्य धर्ममन्त-
र्धत्ते, ततस्तेऽन्तर्हितधर्माणो देवताभिरपि त्यज्यन्ते, तेषां तथाऽन्तर्हित-
धर्माणामधर्मप्रधानानामपक्रान्तदेवतानामृतवो व्यापाद्यन्ते, तेन नापो
यथाकालं देवो वर्षति, न वा वर्षति, विकृता वा वर्षति, वाता न
सम्यगभिवान्ति, क्षितिर्व्यापद्यते, सलिलान्युपशुष्यन्ति, ओषधयः
स्वभावं परिहायाऽऽपद्यन्ते विकृतिम्, तत उद्ध्वंसन्ते जनपदाः स्पर्शाभ्य-
वहार्यदोषात् ॥ २४ ॥
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा । इन वायु आदि सब में जो विगु-
णता उत्पन्न होती है, उसका मूल कारण अधर्म है । इस अधर्म का मूल कारण
पूर्व किये और असत् कर्म ( अहित कर्म ) हैं । इन दोनों अधर्म और असत्
कर्मों की उत्पत्ति का कारण प्रज्ञापराध अर्थात् बुद्धि का दोष है । जिस समय
देश, नगर, प्रान्त और जनपद के अध्यक्ष ( प्रधान शासक जन ) धर्मका अति-
क्रमण करके अधर्म से प्रजाजनों के साथ व्यवहार करने लगते हैं, तब इन
प्रधान जनों के आश्रित एवं पीछे चलने वाले नगर और जनपद वासी लोग तथा
वाणिज्य व्यवहार वा अदालत द्वारा जीविका प्राप्त करने वाले मनुष्य इस अधर्म
को और भी बढ़ाते हैं । इस प्रकार से बढ़ा हुआ अधर्म बलात् धर्म का लोप
कर देता है । इस धर्म के लोप हो जाने से देवता लोग नागरिकों के लोगों का
साथ छोड़ देते हैं, इस प्रकार से अधर्म की प्रधानता होने और देवता आदि
का सहयोग छूट जाने पर ऋतुएं ( शीत, उष्ण आर वर्षा ) विकृत हो जाती
हैं । इस से देव ( मेघ ) ठीक समय पर वर्षा नहीं करता, सर्वथा नहीं करता
अथवा विकृत रूप में जल बरसता है, वायुएँ भी भली प्रकार नहीं चलतीं,
भूमि बिगड़ जाती है, पानी सूख जाते हैं । औषधियां अपनी प्रकृति को
छोड़ कर विकृति को प्राप्त हो जाती हैं । तब स्पर्श और आहार के दोष से
जनपद नष्ट होने लगते हैं ॥ २४ ॥

५०८ चरकसंहिता [अ० ३]
तथा शस्त्रप्रभवस्यापि जनपदोद्ध्वंसस्याधर्म एव हेतुर्भवति ।
तेऽतिप्रवृद्ध-लोभ-रोष-मोह-मानास्ते दुर्बलानवमत्याऽऽत्मस्वजनपरोप-
घाताय शस्त्रेण परस्परमभिक्रामन्ति, परांश्वाऽतिक्रामन्ति, परैर्वाऽभि-
क्राम्यन्ते ॥ २५ ॥
रक्षोगणादिभिर्वा विविधैर्भूतसङ्घैस्तमधर्ममन्यद्वाऽप्यपचारान्तर-
मुपलभ्याभिहन्यन्ते ॥ २६ ॥
शस्त्र से होने वाले युद्ध आदि में भी जो जनपद का नाश होता है उस
का भी कारण अधर्म ही है। जिन पुरुषों में लोभ, क्रोध, मान बहुत बढ़ा होता
है, वे दुर्बल पुरुषों का तिरस्कार करके अपने और दूसरों के नाश के लिये
परस्पर शस्त्रों से आक्रमण करते हैं। इस अवस्था में राक्षस आदि नाना प्रकार
के भूत (प्राणि) समूह इस अधर्म या इसी प्रकार के अन्य अपचारों से इन
पर आघात करते हैं ॥२५-२६॥
तथाऽभिशापप्रभवस्याप्यधर्म एव हेतुर्भवति । ये लुप्तधर्माणो धर्मा-
दपेतास्ते गुरु-वृद्ध-सिद्धर्षि-पूज्यानवमत्याहितान्याचरन्ति, ततस्ताः प्रजा
गुर्वादिभिरभिशप्ता भस्मतामुपयान्ति प्रागेवानेकपुरुषकुलविनाशाय
नियतप्रत्ययोपलम्भाध्नियता अनियतप्रत्ययोपलम्भादनियताश्चापरे॥२७॥
इसी प्रकार अभिशाप से देश के नाश होने का भी मुख्य कारण अधर्म
ही है। जिन देशों में धर्म लुप्त हो जाता है और जो धर्म से च्युत हो जाते हैं;
वे गुरु, वृद्ध, सिद्ध, ऋषि, पूज्य पुरुषों का तिरस्कार करके अहित कार्यों का
सेवन करने लगते हैं। तब वे प्रजाएं गुरुजनों से शप्त होकर शीघ्र ही भस्म
हो जाती हैं। अनेक पुरुषों के कुल विनाश के लिए जहां विशेष पुरुषों के
अपराध होते हैं वहां वे ही नष्ट होते हैं और जहां निश्चित कारण नहीं होता
वहां अनियमित रूप से अनेक अन्य भी नष्ट हो जाते हैं ॥ २७ ॥
प्रागपि चाधर्मादृते नाशुभोत्पत्तिरन्यतोऽभूत् , आदिकाले ह्यदिति-
सुतसमौजसोऽतिबलविपुलप्रभावाः प्रत्यक्ष-देवर्षि-धर्म-यज्ञ-विधि-विधा-
नाः शैलेन्द्र-सार-संहत-स्थिर-शरीराः प्रसन्नवर्णन्द्रियाः पवन-सम-बल-
जब-पराक्रमाश्चारुरुचिरोऽभिरूपप्रमाणाकृतिप्रसादोपचयवन्तः सत्या-
र्जवानृशंस्य-दान-दम-नियम-तपउपवास-ब्रह्मचर्य-व्रतपरा व्यपगत-
भय-राग-द्वेष-मोह-लोभ-क्रोध-शोक-मान-रोग-निद्रा-तन्द्रा- श्रम -क्लमा-
लस्य-परिग्रहाश्च पुरुषा बभूवुरमितायुषः । तेषामुदारसत्त्वगुणकर्मणाम-
चिन्त्य-रस-वीर्य-विपाक-प्रभाव-गुण-समुदितानि प्रादुर्बभूवुः सस्यानि
सर्वगुणसमुदितत्वात्पृथिव्यादीनां कृतयुगस्याऽऽदौ ।