सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

[अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०१

[अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०१

खाये, चबाये, पीये या चाटे सब अन्न-पान कहाँ पर पचते हैं, हे धीर
गुरो ! यह हम आप से पूछते हैं, हे बुद्धिमन् ! यह आप हम को बताइये ।
इस प्रकार अग्निवेश आदि शिष्यों के पूछने पर पुनर्वसु ने उन को उपदेश
किया । मनुष्य के नाभि और स्तनों के मध्यवर्त्ती प्रदेश को 'आमाशय' कहते
हैं । स्तनो से नीचे और नाभि से ऊपर 'आमाशय' और नाभि से नीचे गुदा से
ऊपर 'पक्वाशय' है । आमाशय में अशित, खादित, पीत और लीढ यह चारों
प्रकार का अन्न पचता है । आमाशय में पहुंचा सब प्रकार का अन्न यहाँ पर
परिपक्व होकर धमनी-स्रोतों द्वारा सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होता है ॥ २२-२५॥
तत्र श्लोकौ—तस्य मात्रावतो लिङ्गं फलं चोक्तं यथायथम् ।
अमात्रस्य तथा लिङ्गं फलं चोक्तं विभागशः ॥ २६ ॥
आहारविध्यायतनshapeानि चाष्टौ सम्यक्परीक्ष्याऽऽत्महितं विदध्यात् ।
अन्यच्च यः कश्चिदिहास्ति मार्गो हितोपयोगेषु भजेत तं च ॥२७॥
मात्रावाले आहार के लक्षण और फल पूर्ण रूप में कह दिये हैं। इसी
प्रकार अमात्रा अर्थात् हीन और अधिक रूप में सेवन किये आहार के लक्षण
और फल पृथक् २ करके कह दिये हैं। आहार-विधि के आठ आयतन
(कारणों, अंगो) की ठीक २ परीक्षा करके अपना हित करें और भी जो कोई
उत्तम मार्ग जिसका उपदेश नहीं किया हो उस को भी हित पदार्थों के उपयोग
के अवसरों में प्रयोग करे ॥ २७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने त्रिविधकुक्षीयविमानं
नाम द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २ ॥

तृतीयोऽध्यायः ।
अथातो जनपदोद्ध्वंसनीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'जनपद-उद्ध्वंसनीय' नाम विमान का व्याख्यान करेंगे ।
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
जनपदमण्डले पञ्चालक्षेत्रे द्विजातिवराध्युषितायां काम्पिल्यराज-
धान्यां भगवाञ्पुनर्वसुरात्रेयोऽन्तेवासिगणपरिवृतः पश्चिमे घर्ममासे
...तीरे ...विचारमनुविचरन् शिष्यमग्निवेशमब्रवीत् ॥ ३ ॥

५०२ चरकसंहिता [ अ० ३
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन द्विज वर्णों से बसे पांचाल क्षेत्र ( पंजाब )
के जनपद-मण्डल ( प्रान्त ) में, काम्पिल्य नाम राजधानी में शिष्यगण सहित
भगवान् आत्रेय पुनर्वसु ग्रीष्म काल के द्वितीय अर्थात् ज्येष्ठ मांस में गंगा के
किनारे वन में विहार करते हुए शिष्य अग्निवेश को बोले ॥ ३ ॥
दृश्यन्ते हि खलु सौम्य ! नक्षत्र-ग्रह-चन्द्र-सूर्यानिलानलानां दिशां
चाऽप्रकृतिभूतानामृतुवैकारिका१ भावाः, अचिरादितो भूरपि च न यथा-
वद्रस-वीर्य-विपाक-प्रभावमोषधीनां प्रतिविधास्यति,तद्वियोगाच्चाऽऽतङ्क-
प्रायता नियता । तस्मात्प्रागुद्ध्वंसात्प्राक् च भूमेर्विरसीभावादुद्धरध्वं
सौम्य ! भैषज्यानि यावन्नोपहत-रस-वीर्य-विपाक-प्रभावाणि भवन्ति ।
वयं चैषां रसवीर्यविपाकप्रभावानुपयोक्ष्यामहे, ये चास्माननुकाङ्क्षन्ति
यांश्च वयमनुकाङ्क्षामः, नहि सम्यगुद्धृतेषु भैषज्येषु सम्यग्विहितेषु
सम्यग्विचारितेषु जनपदोद्ध्वंसकराणां विकाराणां किंचित्प्रतीकारगौ-
रवं भवति ॥ ४ ॥
हे सौम्य ! नक्षत्र ( अश्विनी आदि ), ग्रह ( बृहस्पति आदि ), चन्द्रमा,
सूर्य, वायु, अग्नि और दिशाओं के प्रकृति अर्थात् स्वाभाविक दशा में न होने
पर ऋतु-विकार से उत्पन्न होनेवाले नाना परिणाम देखे जाते हैं। इधर पृथ्वी
भी ओषधियो में रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव को शीघ्र उत्पन्न नहीं कर सकती,
इसलिये प्रायः भयंकर रोगों का होना सम्भव होता है । अतः हे सौम्य ! जन-
पदोद्ध्वंस अर्थात् देश भर को नाश कर देने वाले रोग होने से पूर्व तथा पृथ्वी
के विरस ( रसहीन या विपरीत रसवाली ) होने से पूर्व ही औषधियों का
संग्रह कर लो; जिस से कि इन ओषधियों के रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव
सुरक्षित बने रहें, नष्ट न हों। हम इन ओषधियों के रस,वीर्य,विपाक और प्रभावका
उपयोग करते हैं, जिन को हम चाहते हैं और जो हम को चाहते हैं, उनके
लिये इन औषधियों का उपयोग करेंगे । ठीक समय पर ओषधियों के उखाड़
लेने पर, ठीक प्रकार से बना लेने पर और ठीक प्रकार से दोष आदि की
अपेक्षा से प्रयोग करने पर जनपद-नाशक रोगों के प्रतीकार करने में कुछ भी
कठिनाई नहीं होती ॥ ४ ॥
१. सुश्रुत में इस विकार को 'मरक' कहा है । यथा—
शीतोष्णवर्षाणि खलु विपरीतान्योषधीर्व्यापादयन्ति, तासामुपयोगाद् विविध
रोगप्रादुर्भावो मरको वा भवेत् ॥ सु० सूत्र० अ० ६