चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १ ] सूत्रस्थानम् २५
अ० १ ] सूत्रस्थानम् २५
स्नुह्यर्काश्मन्तकास्तेषामिदं कर्म पृथक्पृथक् ॥ ११४ ॥
वमनेऽश्मन्तकं विद्यात्स्नुहीक्षीरं विरेचने ।
क्षीरमर्कस्य विज्ञेयं वमने सविरेचने ॥ ११५ ॥
अब शोधन के लिये कहे हुए छः वृक्षों में तीन का दूध और तीन की
त्वचा ग्रहण की जाती है । इनमें प्रथम दूधवाले तीन वृक्ष फलिनी और
मूलिनी वनस्पतियों से पृथक् हैं, उन के नाम १. स्नुही (थोर); २. अर्क
(आक) और ३. अश्मन्तक हैं । अश्मन्तक का दूध वमन के लिये; स्नुही
का दूध विरेचन के लिये और आक का दूध वमन और विरेचन दोनों कार्यों
के लिये जानना चाहिये * ॥ ११४-११५ ॥
इमांस्त्रीनपरान् वृक्षानाहुर्येषां हितास्त्वचः ।
पूतीकः कृष्णगन्धा च तिल्वकश्च तथा तरुः ॥ ११६ ॥
विरेचने प्रयोक्तव्यः पूतीकस्तिल्वकस्तथा ।
कृष्णगन्धा परिसर्पे शोथेऽर्शःसु चोच्यते ॥ ११७ ॥
दद्रुविद्रधिगण्डेषु कुष्ठेष्वप्यलजीषु च ।
षड्वृक्षाञ्छोधनानेतानपि विद्याद्विचक्षणः ॥ ११८ ॥
दूसरे-शेष तीन वृक्ष हैं-जिनकी त्वचा हितकारी है । उन वृक्षों के नाम—
पूतीक (करंज), कृष्णगन्धा और तिल्वक (लोध्र) हैं। इन में करंज और
लोध्र वृक्ष की छाल विरेचन कार्य में प्रयुक्त होती है, और कृष्णगन्धा की छाल
परिसर्प (वीसर्प, एक्ज़ीमा, त्वग् रोग में), शोथ, अर्श रोग, दद्रु (दाद),
विद्रधि, गण्डमाला, कुष्ठ और अलजी नामक नाना रोगों में प्रयुक्त होती है ।
शिरोविरेचन में इसका प्रयोग रोग-भिषग्जितीय अध्याय (विमानस्थान
अ० ८) में कहेंगे ॥ ११६-११८ ॥
इन ऊपर कहे हुए छः वृक्षों को शोधनकारक जाने ।
उपसंहार—
इत्युक्ताः फलमूलिन्यः स्नेहाश्च लवणानि च ।
मूत्रं क्षीराणि वृक्षाश्च षड्ये दृष्टाः पयस्त्वचः ॥ ११९ ॥
फलिनी १६, मूलिनी १६, स्नेह ४, लवण ५, मूत्र ८, दूध ८, और शोधन
वृक्ष ६, जिनके दूध और त्वचा काम में आते हैं वे कह दिये हैं ॥११९ ॥
- अश्मन्तक के समान कार्य करने वाला वृक्ष अष्टा है जो महाराष्ट्रों में
होता है, इसका दूध वामक है ।
२६ चरकसंहिता [ अ० १
ओषधीर्नामरूपाभ्यां जानते ह्यजपा वने ।
अविपाश्चैव गोपाश्च ये चान्ये वनवासिनः ॥ १२० ॥
बकरियां चराने वाले, भेंड़े चराने वाले, गौवें चराने वाले और अन्य
तपस्वी या भील आदि जो कि जंगल में रहते हैं ये लोग ओषधियों को नाम रूप
और आकृति से पहिचानते हैं ॥ १२० ॥
न नामज्ञानमात्रेण रूपज्ञानेन वा पुनः ।
ओषधीनां परां प्राप्तिं कश्चिद्वेदितुमर्हति ॥ १२१ ॥
योगवित्त्वामरूपज्ञस्तासां तत्त्वविदुच्यते ।
किं पुनर्यो विजानीयादोषधीः सर्वथा भिषक् ॥ १२२ ॥
योगमासां तु यो विद्याद्देशकालोपपादितम् ।
पुरुषं पुरुषं वीक्ष्य स विज्ञेयो भिषक्तमः ॥ १२३ ॥
ओषधियों के नाम जान लेने मात्र से, अथवा रूप से पहिचान लेने से
भी कोई ओषधि के सम्यक् प्रयोग को नहीं जान सकता । इसीलिये शास्त्र में
इनका वर्णन किया जाता है ।
जो वैद्य ओषधियों को नाम, रूप, और उनके योग और प्रयोगों सहित
जानता है, वह तो तत्त्ववित् है ही, जो वैद्य ओषधियों को सभी प्रकार से
समझता है; उसके लिये कहना ही क्या ? और जो व्यक्ति प्रत्येक पुरुष के बल,
शरीर, आहार, सार, सात्म्य, सत्त्व प्रकृति और वयस का विचार करके देश, काल,
मात्रा के अनुसार ओषधि को जानता है वह वैद्यों में श्रेष्ठ है ॥१२१-१२३॥
न जानी हुई औषधियों से हानियाँ-
यथा विषं यथा शस्त्रं यथाग्निरशनिर्यथा ।
तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतं यथा ॥ १२४ ॥
औषधं ह्यनभिज्ञातं नामरूपगुणैस्त्रिभिः ।
विज्ञातमपि दुर्युक्तमनर्थायोपपद्यते ॥ १२५ ॥
जिस प्रकार न जाना हुआ ( मूढ़ आदमी से प्रयुक्त किया हुआ ) विष,
जिस प्रकार शस्त्र, जिस प्रकार अग्नि और जिस प्रकार अशनि ( वज्र ) या
( बिजली ) मृत्यु के कारण बनते हैं, उसी प्रकार नाम रूप गुण से
न जानी हुई औषधि भी मृत्यु का कारण हो सकता है और नामरूप और
गुण से जानी हुई औषधि अमृत के समान है । नाम, रूप एवं गुण से न