चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २२७
अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २२७
वातः प्लीहानमुद्धूय कुपितो यस्य तिष्ठति ।
शनैः परितुदन् पार्श्वं प्लीहा तस्याभिवर्धते ॥ ३० ॥
यस्य वायुः प्रकुपितो गुल्मस्थानेऽवतिष्ठते ।
शोथं सशूलं जनयन् गुल्मस्तस्योपजायते ॥ ३१ ॥
यस्य वायुः प्रकुपितः शोथशूलकरश्चरन् ।
वंक्षणाद्वृषणौ याति ब्रध्नस्तस्योपजायते ॥ ३२ ॥
यस्य वातः प्रकुपितस्त्वङ्मांसान्तरमाश्रितः ।
शोथं संजनयेत् कुक्षावुदरं तस्य जायते ॥ ३३ ॥
यस्य वातः प्रकुपितः कुक्षिमाश्रित्य तिष्ठति ।
नाधो व्रजति नाप्यूर्ध्वमानाहस्तस्य जायते ॥ ३४ ॥
रोगाश्चोत्सेधसामान्यादधिमांसार्बुदादयः ।
विशिष्टा नामरूपाभ्यां निर्देश्याः शोथसंग्रहे ॥ ३५ ॥
जब वायु कुपित होकर प्लीहा ( तिल्ली ) को ऊपर करती है, तब पार्श्वों
को धीरे धीरे दबाती हुई प्लीहा बढ़ जाती है । जब वायु कुपित होकर ( हृदय,
नाभि, बस्ति और दोनों पार्श्व ) गुल्म स्थानों का आश्रय ले लेती है तब शूलयुक्त
सूजन उत्पन्न होती है, इसे 'गुल्म' कहते हैं । जब वायु कुपित होकर सूजन
और दर्द को उत्पन्न करती हुई वंक्षण ( जंघासन्धि ) प्रदेश से अण्ड कोष में
जाती है, तब 'ब्रध्न' रोग होता है । जब वायु कुपित होकर त्वचा और मांस के
बीच में उदर के अन्दर पहुंचकर आश्रय लेकर शोथ उत्पन्न करती है, तब
'उदर' रोग उत्पन्न हो जाता है । जब वायु कुपित होकर उदर का आश्रय
लेकर स्थिर हो जाती है, न तो नीचे जाती है और न उपर जाती है, इस को
'आनाह' कहते हैं । अधिमांस, अर्बुद आदि रोग में सूजन की समानता होने
से, नाम और रूप से भिन्न होने पर भी इनका इसे शोथसंग्रह में निर्देश करना
चाहिये ॥ ३०-३५ ॥
वात-पित्त-कफा यस्य युगपत्कुपितास्त्रयः ।
जिह्वामूलेऽवतिष्ठन्ते विदहन्तः समुच्छ्रिताः ॥ ३६ ॥
जनयन्ति भृशं शोथं वेदनाश्च पृथग्विधाः ।
तं शीघ्रकारिणं रोगं रोहिणीकेति निर्दिशेत् ॥ ३७ ॥
त्रिरात्रं परमं तस्य जन्तोर्भवति जीवितम् ।
कुशलेन त्वनुक्रान्तः क्षिप्रंसंपद्यते सुखी ॥ ३८ ॥
सन्ति ह्येवंविधा रोगाः साध्या दारुणसंमताः ।
ये हन्युरनुपक्रान्ता मिथ्याचारेण वा पुनः ॥ ३९ ॥
२२८ चरकसंहिता [ अ० १८
साध्याश्चाप्यपरे सन्ति व्याधयो मृदुसंमताः ।
यत्नायत्नकृतं येषु कर्म सिध्यत्यसंशयम् ॥ ४०॥
असाध्याश्चापरे सन्ति व्याधयो याप्यसंज्ञिताः ।
सुसाध्वपि कृतं येषु कर्म यात्राकरं भवेत् ॥ ४१ ॥
जिस पुरुष के वात, पित्त, कफ ये तीनों इकट्ठे मिलकर कुपित होकर जिह्वा
की जड़ में स्थित होते हैं और जलन और बहुत सूजन उत्पन्न करते हैं, तथा
नाना प्रकार की पीड़ायें देते हैं इस शीघ्रकारी रोग को 'रोहिणी' कहते हैं ।
इस रोग के कारण मनुष्य केवल तीन दिन जीवित रहता है । इस बीच में
यदि कुशल वैद्य से शीघ्र चिकित्सा कराई जाये तो मनुष्य बच जाता है । इस
प्रकार के बहुत से भयानक परन्तु साध्य रोग हैं, जिनकी चिकित्सा न करने
अथवा मिथ्या वा अशुद्ध चिकित्सा करने से मनुष्य मर जाता है । दूसरे कोमल
रोग ऐसे सुखसाध्य हैं, जिनमें कि यत्नपूर्वक या अयत्नपूर्वक (योग्य या अयोग्य
वैद्य) के चिकित्सा करने से भी निश्चित रूप में आराम होजाते हैं । दूसरे
असाध्य रोग हैं, जिनको 'याप्य' कहा है । जिन रोगों में भली प्रकार चिकित्सा
करने पर भी जो याप्य रहते हैं, वे कुछ समय के लिये अच्छे हो जाते हैं ॥४१॥
सन्ति चाप्यपरे रोगाः कर्म येषु न सिध्यति ।
अपि यत्नकृतं वैद्यैर्न तान् विद्वानुपाचरेत् ॥ ४२ ॥
साध्याश्चैवाऽप्यसाध्याश्च व्याधयो द्विविधाः स्मृताः ।
मृदु-दारुण भेदेन ते भवन्ति चतुर्विधाः ॥ ४३ ॥
एक और प्रकार के रोग हैं, जिनमें किसी प्रकार की भी चिकित्सा सफल
नहीं होती । इन रोगों में मूढ़ लोग ही उत्साह से काम करते हैं, परन्तु विद्वान्
इनकी चिकित्सा नहीं करते । रोग दो प्रकार के हैं-'साध्य' और 'असाध्य' ।
और मृदु और दारुण भेद से (दोनों) चार प्रकार के होजाते हैं । मृदु-साध्य,
दारुण-साध्य, मृदु-असाध्य और दारुण-असाध्य ॥ ४२-४३ ॥
त एवापरिसंख्येया भिद्यमाना भवन्ति हि ।
रुजा-वर्ण-समुत्थान-स्थान-संस्थान-नामभिः ॥ ४४ ॥
व्यवस्थाकरणं तेषां यथास्थूलेषु संग्रहः ।
तथा प्रकृतिसामान्यं विकारेषूपदिश्यते ॥ ४५ ॥
विकारनामाकुशलो न जिह्रीयात्कदाचन ।
न हि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति ध्रुवा स्थितिः ॥ ४६ ॥
स एव कुपितो दोषः समुत्थानविशेषतः ।