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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० १३ ] सूत्रस्थानम १५७

अ० १३ ] सूत्रस्थानम १५७
स्नेहाश्रयाः स्थावरसंज्ञिनास्तथा स्युर्जङ्गमा मत्स्यमृगाः सपक्षिणः ।
तेषां दधि-क्षीर घृतामिषं वसा स्नेहेषु मज्जा च तथापदिश्यते ॥ ११ ॥
अग्निवेश के सन्देह को दूर करने वाले भगवान् पुनर्वसु ने उत्तर दिया—
स्नेहो के उत्पत्ति स्थान दो प्रकार के हैं; स्थावर और जंगम । इनमें—तिल,
पियाल, (चिरोंजी फल) अभिषुक (चिलगोज़ा), बहेड़ा, चीता, हरड़ बड़ी,
ऐरण्ड, महुवा, सरसों, कुसुम्भ, बेलगिरी, भिलावा, मूलक, अलसी, निकोटक,
अलरांट, नाटा करंजुआ, सोहांजन ये स्नेह के स्थावर उत्पत्ति स्थान हैं।
मछलियों, मृग (पशु), पक्षी एवं उनका दूध, दही, घृत, माँस वसा और
मज्जा ये स्नेह के जंगम उत्पत्ति स्थान कहे हैं ॥ ६-११ ॥
सर्वेषां तैलजातानां तिलतैलं प्रशस्यते ।
बलार्थे स्नेहने चाम्यमेरण्डं तु विरेचने ॥ १२ ॥
सर्पिस्तैलं वसा मज्जा सर्वस्नेहात्तमा मताः ।
एभ्यश्चंवोत्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात् ॥ १३ ॥
सब प्रकार के तैलों में तिल का तैल श्रेष्ठ है। बल और मृदुता लाने के
लिये तिल का तैल सब में श्रेष्ठ है और विरेचन के लिये एरण्ड का तैल सर्व-
श्रेष्ठ है। सब प्रकार के स्नेहों में घी, तैल, वसा और मज्जा ये चार श्रेष्ठ हैं।
इन चारो में भी घी सबसे श्रेष्ठ है; क्योंकि यह अन्य पदार्थों का गुण अपन में
ले लेता है ॥ १२-१३ ॥
घृतं पित्तानिलहरं रसशुक्रौजसां हितम् ।
निर्वापणं मृदुकरं स्वर-वर्ण-प्रसादनम् ॥ १४ ॥
घी वात और पित्त का नाशक है, रस, शुक्र और ओज को बढ़ाता है,
बढ़ी हुई उष्णिमा को शान्त करता है, शरीर मे कोमलता पैदा करता है, स्वर
और कान्ति को बढ़ाता है ॥ १४ ॥
मारुतघ्नं न च श्लेष्मवर्धनं बलवर्धनम् ।
त्वच्यमुष्णं स्थिरकरं तैलं योनिविशोधनम् ॥ १५ ॥
तैल वायु नाशक, परन्तु कफ को नहीं बढ़ाता, बलवर्धक, त्वचा के लिये
हितकारी, उष्णवीर्य, उष्णगुण, शरीर को स्थिर (टिकाऊ) बनाने वाला एवं
स्त्री-जननेंद्रिय (गर्भाशय) का शोधन करने वाला है, (तिल तैल में ये गुण
विशेष रूप से हैं) ॥ १५ ॥
विद्ध-भग्नाहत भ्रष्ट-योनि-कर्ण-शिरोरुजि ।
पौरुषोपचये स्नेहे व्यायामे चेष्यते वसा ॥ १६ ॥

१५८ चरकसंहिता [ अ० १३
भाले आदि से बिंधने चोट लगाकर अस्थि आदि के टूटने चोट लगने,
योनि की भ्रंशता ( गर्भाशय आदि अंगों की स्थान च्युति ), कर्ण रोग, शिरो
रोग, पुरुषत्व बढ़ाने, शरीर को चिकना करने और व्यायाम अर्थात् शारीरिक
श्रम में वसा ( चर्बी ) हितकारी है ॥ १६ ॥
बल-शुक्र-रस-श्लेष्म-मेदो मज्ज-विवर्धनः ।
मज्जा विशेषतोऽस्थ्नां च बलकृत्स्नेहने हितः ॥ १७ ॥
बल, शुक्र, रस, कफ, मेद और मज्जा को बढ़ाती है । विशेषकर
अस्थियों की शक्ति बढ़ाती एवं शरीर को चिकना बनाने में विशेष रूप से
हितकारी है ॥ १७ ॥
सर्पिः शरदि पातव्यं, वसा मज्जा च माधवे ।
तैलं प्रावृषि, नात्युष्णशीते स्नेहं पिबेन्नरः ॥ १८ ॥
वातपित्ताधिके रात्रावुष्णे चापि पिबेन्नरः ।
श्लेष्माधिके दिवा शीते पिबेच्चामलभास्करे ॥ १९ ॥
घी शरद् ऋतु ( आश्विन-कार्तिक ) में, चर्बी और मज्जा वसन्त ऋतु
( फाल्गुन-चैत्र ) में और तैल वर्षाकाल (श्रावण-भाद्रपद ) में सेवन करना
चाहिये । अति उष्ण काल (ग्रीष्म ) अथवा आते शीतकाल ( हेमन्त ) में
स्नेह नहीं पीना चाहिये । तीव्र व्याधि में, ग्रीष्म ऋतु में, रात्रि के समय; वात
और पित्त की अधिकता होने पर स्नेह पी लेना चाहिये । कफप्रधान व्याधि में
शीतकाल के अन्दर (हेमन्त-शिशिर ऋतु में ) मध्याह्न समय में दिन के समय
स्नेहपान करना चाहिये ॥ १८-१९ ॥
अत्युष्णे वा दिवा पीतो वातपित्ताधिकेन वा ।
मूर्च्छां पिपासामुन्मादं कामलां वा समीरयेत् ॥ २० ॥
शीते रात्रौ पिबेत्स्नेहं नरः श्लेष्माधिकोऽपि वा ।
आनाहमरुचिं शूलं पाण्डुतां वा समृच्छति ॥ २१ ॥
जलमुष्णं घृते पेयं, यूषम्तैलेऽनुशस्यते ।
वशामज्ज्ञोस्तु मण्डः स्यात्सर्वेषूष्णमथाम्बु वा ॥ २२ ॥
वातप्रधान या पित्तप्रधान रोगी ग्रीष्म ऋतु में या दिन के समय यदि
स्नेहपान करता है तो मूर्छा, प्यास, उन्माद अथवा कामला रोग उत्पन्न हो
जाते हैं । कफप्रधान रोगी यदि शीत ऋतु में या रात्रि के समय स्नेहपान करता
है तो उसे अफरा, अरुचि, शूल-पीड़ा या पाण्डुरोग उत्पन्न हो जाता है । घी
पीने के उपरान्त गरम जल, तैल के उपरान्त यूष और वसा एवं मज्जा के