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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ११] सूत्रस्थानम् १३३

अ० ११] सूत्रस्थानम् १३३
सर्वश्चेत्संचरेन्मातुः पितुर्वा मरणं भवेत् ।
निरन्तरं नावयवः कश्चित्सूक्ष्मस्य चाऽऽत्मनः ॥ ११ ॥
जो लोग कहते हैं कि माता पिता की आत्मा पुत्र रूप में उत्पन्न होती है;
इस अवस्था में आत्मा की गति दो प्रकार से हो सकती है । एक, आत्मा
सम्पूर्ण पुत्र रूप में आये; दूसरी अवस्था में आत्मा का कोई अवयव पुत्र रूप
में आये । यदि सम्पूर्ण आत्मा पुत्र रूप में आता है तो माता या पिता किसी
एक की मृत्यु हो जानी चाहिये, और दूसरी अवस्था में सूक्ष्म आत्मा का कोई
अवयव हो ही नहीं सकता । परमाणुओं के संयोग से बनी वस्तु का भाग हो
सकता है, परमाणु का नहीं ॥ १०-११ ॥
बुद्धिर्मनश्च निर्णीते यथैवाऽऽत्मा तथैव ते ।
येषां चैषा मतिस्तेषां योनिर्नास्ति चतुर्विधा ॥ १२ ॥
विद्यात्स्वाभाविकं षण्णां धातूनां यत्स्वलक्षणम् ।
संयोगे च वियोगे च तेषां कर्मैव कारणम् ॥ १३ ॥
जिस प्रकार माता पिता की आत्मा उत्पत्ति का कारण नहीं बन सकती
उसी प्रकार ये बुद्धि और मन भी उत्पत्ति का हेतु नहीं बन सकते, क्योंकि मन
और बुद्धि दोनों सूक्ष्म हैं, इसलिये इनका भी विभाग नहीं बन सकता । और
यदि सम्पूर्ण अवतरण मानो तो माता पिता में से एक मन और बुद्धि से रहित
अर्थात् ज्ञान, चिन्तन, बोध से शून्य होना चाहिये । इसलिये यह भी ठीक
नहीं । एक और भी दोष है । उनके मतमें योनि चार प्रकार की ( स्वेदज,
अण्डज, उद्भिज्ज और जरायुज ) नहीं होती । ( क्योंकि उद्भिज्ज योनि वनस्पति
आदि में माता और पिता नहीं है ) । प्राणियों की उत्पत्ति में छः धातु ( पंच
महाभूत, पृथ्वी, अप्, तेज, वायु और आकाश एवं छठी चेतना आत्मा )
अपने लक्षणों से स्वभाव से ही कारण बनते हैं । इनके संयोग और वियोग में
कर्म ही कारण है ॥ १२-१३ ॥
अनादेश्चेतनाधातोर्नैष्यते परनिर्मितिः ।
पर आत्मा स चेद्धेतुरिष्टोऽस्तु परनिर्मितिः ॥ १४ ॥
ईश्वर का ही बनाया जगत् मानकर जो लोग आत्मा का अस्तित्व नहीं
मानते उनका कथन भी ठीक नहीं है । क्योंकि अनादि ( जिसका आदि नहीं )
धातु ( आत्मा ) का दूसरे से बनाया जाना भी सम्भव नहीं । यदि पूर्व
आत्मा नहीं है तो दूसरा पुरुष भी किस उपादान को ले कर दूसरे को
क्योंकि अचेतन वस्तु चेतन को उत्पन्न नहीं कर सकता । यदि

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परमात्मा के केवल शरीर का बनाने वाला मानते हो तो तुम्हारे और हमारे
सिद्धान्त में कोई भेद नहीं। इसलिये आत्मा नित्य है, वह समय २ पर स्थूल
शरीर को छोड़कर परलोक में कर्मों का भोग करके भोग की समाप्ति पर और
भोग्य कर्म फलों के भोग के लिये पुनः उत्पन्न होता है ॥१४॥
न परीक्षा न परीक्ष्यं न कर्ता कारणं न च।
न देवा नर्षयः सिद्धाः कर्म कर्मफलं न च ॥ १५ ॥
नास्तिकस्यास्ति नैवाऽऽत्मा यदृच्छोपहतात्मनः ।
पातकेभ्यः परं चैतत्पातकं नास्तिकग्रहः ॥ १६ ॥
यदृच्छा भी जन्म का कारण नहीं है, क्योंकि यदृच्छावादी के मत में न
कोई परीक्षा (प्रमाण) है, और न कोई परीक्ष्य अर्थात् प्रमेय वस्तु है। इसलिये
माता, पिता, कन्या, बहिन, पत्नी, गुरु, वृद्ध, तपस्वी इत्यादि परीक्षणीय वस्तु
के अभाव में मनमाना आचार होना सम्भव है और कर्म भी नहीं है, जिसका
कि अच्छा या बुरा फल मिलेगा, इसलिये कर्म फल भी नहीं है। न कर्म का
कोई कर्त्ता है, जो कर्म करे। यह सब यदृच्छा से ही, बिना कारण होता है,
कारण के न होने से मनचाहा आचरण करने में कोई दोष नहीं होगा, इससे
गुरु, सिद्ध पुरुषों में पूज्यापूज्य भाव भी नहीं रहेगा। वह माता, कन्या आदि
में दारवत् बुद्धि कर सकेगा, इसलिये जिसका आत्मा यदृच्छावाद से नष्ट हो
जाता है ऐसे नास्तिक का आत्मा नहीं रहता। अतः नास्तिक होना सब पातकों
से बड़ा पातक है ॥ १५-१६ ॥
तस्मान्मतिं विमुच्यैताममार्गप्रसृतां बुधः ।
सतां बुद्धिप्रदीपेन पश्येत्सर्वं यथातथम् ॥ १७ ॥ इति ।
इसलिये बुद्धिमान् को चाहिये कि उल्टे मार्ग में जाने वाली इस विपरीत
बुद्धि को छोड़ दे और सज्जन पुरुषों की बुद्धि रूप दीपक से सब वस्तुओं को
ठीक २ रूप में देखे ॥ १७ ॥
द्विविधमेव खलु सर्वं—सच्चासच्च, तस्य चतुर्विधा परीक्षा आप्तो-
पदेशः प्रत्यक्षमनुमानं युक्तिश्चेति ॥ १८ ॥
संसार में जो कुछ दीख पड़ता है, वह सब दो प्रकार का है, एक सत्
और दूसरा असत् । इस की परीक्षा चार प्रकार से होती है, १. आप्तोपदेश
२. प्रत्यक्ष ३. अनुमान और ४. युक्ति ।
आप्तास्तावत् —
रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तास्तपो-ज्ञान-बलेन ये ।
येषां त्रैकालममलं ज्ञानमव्याहतं सदा ॥ १९ ॥